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Sukta 8.99
Indra
This Indra hymn is an urgent invitation for the Vajra-bearer to hear the singers and come swiftly to their call, as he has been strengthened by praise before. It celebrates Indra as the universal conqueror who breaks hostile resistances and false speech, granting repeated aids and right outcomes to the striving worshipper.
Mantra 1
त्वामिदा ह्यो नरोऽपीप्यन्वज्रिन्भूर्णयः । स इन्द्र स्तोमवाहसामिह श्रुध्युप स्वसरमा गहि ॥
कल ही लोगों ने तुझे बड़ा कर दिया। तू वज्र वाला है, तुझे ताकत मिली। हे इंद्र, अब हमारी सुन। हम गाना गाते हैं तेरे लिए। हमारी पुकार सुन और आ जा।
Mantra 2
मत्स्वा सुशिप्र हरिवस्तदीमहे त्वे आ भूषन्ति वेधसः । तव श्रवांस्युपमान्युक्थ्या सुतेष्विन्द्र गिर्वणः ॥
हे इंद्र, खुश हो जा। तू जैसे सोम पानी पीता है, उसमें मस्ती आ जाती है। रिशि लोग तुझे देख के अपने मन्न में सोचने लगते हैं कि कितना अच्छा है। तेरी बड़ाई सब गाते हैं। सोम पानी में तेरी ताकत चमक रही है। तू गानों से खुश होता है।
Mantra 3
श्रायन्त इव सूर्यं विश्वेदिन्द्रस्य भक्षत । वसूनि जाते जनमान ओजसा प्रति भागं न दीधिम ॥
जैसे सूरज की तरफ सब देखते हैं, वैसे ही सब लोग इंद्र के पास आते हैं। जो ताकत पैदा होती रहती है, उससे हम अपना हिस्सा पकड़ के रखना चाहते हैं। इंद्र हमें भी अपनी चमक और दौलत का हिस्सा दे।
Mantra 4
अनर्शरातिं वसुदामुप स्तुहि भद्रा इन्द्रस्य रातयः । सो अस्य कामं विधतो न रोषति मनो दानाय चोदयन् ॥
इंद्र जो देता है, वो कभी हाथ नहीं खींचता। उसकी देन अच्छी होती है। जो लोग सही मन से पूजा करते हैं, इंद्र उनसे नाराज़ नहीं होता। वो उनका मन समझ के उनको और देता है।
Mantra 5
त्वमिन्द्र प्रतूर्तिष्वभि विश्वा असि स्पृधः । अशस्तिहा जनिता विश्वतूरसि त्वं तूर्य तरुष्यतः ॥
इंद्र, जब भी लड़ाई होती है, तू सबसे आगे होता है। जो लोग बुरी बातें बोलते हैं, उनको तू हरा देता है। तू सब कुछ जीता है। जो आगे बढ़ना चाहता है, तू उसका साथी बनता है।
Mantra 6
अनु ते शुष्मं तुरयन्तमीयतुः क्षोणी शिशुं न मातरा । विश्वास्ते स्पृधः श्नथयन्त मन्यवे वृत्रं यदिन्द्र तूर्वसि ॥
जब इंद्र दौड़ता है, तो धरती और आसमान दोनों उसके पीछे लग जाते हैं, जैसे माँ बच्चे के पीछे। जो भी रास्ता रोके, वो टूट जाता है। इंद्र जब वृत्र दानव से लड़ता है, उसको हरा देता है।
Mantra 7
इत ऊती वो अजरं प्रहेतारमप्रहितम् । आशुं जेतारं हेतारं रथीतममतूर्तं तुग्र्यावृधम् ॥
हम यहाँ से तुम्हे बुला रहे हैं मदद के लिए। इंद्र, तुम कभी पुराना नहीं होते, तुम हमेशा ताकत से काम करते हो। तुम जल्दी जीत जाते हो, दुश्मन पे वार करते हो। तुम रथ में सबसे बड़े हो, तुम्हे कोई नहीं हरा सकता। तुम आगे बढ़ने वाली ताकत को और बढ़ा देते हो।
Mantra 8
इष्कर्तारमनिष्कृतं सहस्कृतं शतमूतिं शतक्रतुम् । समानमिन्द्रमवसे हवामहे वसवानं वसूजुवम् ॥
हम इंद्र को मदद के लिए बुला रहे हैं। जो काम सही ढंग से करता है, उसमे कोई कमी नहीं आने देता। सौ सौ बार मदद करता है, सौ सौ तरीके से काम करता है। यही इंद्र हम प्रोटेक्शन के लिए बुला रहे हैं। वो धन देता है और सच्चे धन की तरफ ले जाता है।
It calls Indra to listen to the singers and come near, praising him as the power that overcomes every resistance and grants protection and success.
It highlights Indra’s repeated, many-sided capacity to assist—victory, protection, abundance, and effective action in many situations.
It can be recited as an invocation for courage and obstacle-removal—especially before demanding tasks—while offering simple oblations (like ghee) or sincere praise as the ‘stoma.’
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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