
Sukta 8.48
This Soma-hymn celebrates the tasted “sweetness” (madhu) of Soma as a life-giving power that clarifies the mind, widens inner freedom, and gathers gods and mortals around a single sustaining essence. Soma is praised as an indwelling guardian seated in every limb, asked to forgive lapses in right action (vrata), and invoked for all-sided protection and access to the sun-world (svar). The hymn thus moves from ecstatic experience to ethical reconciliation and finally to comprehensive safeguarding by Soma/Indu.
Mantra 1
स्वादोरभक्षि वयसः सुमेधाः स्वाध्यो वरिवोवित्तरस्य । विश्वे यं देवा उत मर्त्यासो मधु ब्रुवन्तो अभि संचरन्ति ॥
मैंने उस मीठा रस चखा है, जिसमें जान है। मेरा दिमाग साफ हो गया, मैंने खुद को आज़ाद पाया। सारे भगवान और इंसान उस मीठा रस के पास आते हैं, उसे मीठा कहते हैं।
Mantra 2
अन्तश्च प्रागा अदितिर्भवास्यवयाता हरसो दैव्यस्य । इन्दविन्द्रस्य सख्यं जुषाणः श्रौष्टीव धुरमनु राय ऋध्याः ॥
सोम अंदर आ जा और आगे बढ़। तू अदिति बन जा, जो हद नहीं जाने। भगवान की गर्मी को कंट्रोल कर। इंद्र तेरा दोस्त है, इसलिए उसके साथ खुश रह। ऐसे बढ़ जैसे घोड़ी गाड़ी के साथ चलती है। धन और समृद्धि में आगे बढ़।
Mantra 3
अपाम सोमममृता अभूमागन्म ज्योतिरविदाम देवान् । किं नूनमस्मान्कृणवदरातिः किमु धूर्तिरमृत मर्त्यस्य ॥
हमने सोम पिया है, अब हम मरने वाले नहीं हैं। हम रोशनी तक पहुँच गए, भगवान को पा लिया। अब दुश्मन हमें क्या बिगाड़ेगा? धोखेबाज़ हमें क्या करेगा? जो इंसान इस स्थिति में आ गया, उसको कुछ नहीं हो सकता।
Mantra 5
इमे मा पीता यशस उरुष्यवो रथं न गावः समनाह पर्वसु । ते मा रक्षन्तु विस्रसश्चरित्रादुत मा स्रामाद्यवयन्त्विन्दवः ॥
मैंने सोम पिया है, यह बड़ाई वाला है और मुझे बचाने को तैयार है। यह घोड़ों की तरह गाड़ी में जुड़े हैं। इनसे मेरी रक्षा हो, मैं टूट न जाऊँ। इंद्र मुझे थकान और सुस्ती से दूर रखे।
Mantra 6
अग्निं न मा मथितं सं दिदीपः प्र चक्षय कृणुहि वस्यसो नः । अथा हि ते मद आ सोम मन्ये रेवाँ इव प्र चरा पुष्टिमच्छ ॥
जैसे आग सुलग के चमक उठती है, वैसे ही अंदर चमक। हमें साफ नज़र दे और अच्छी ज़िंदगी दे। सोम, तेरे नशे में लगता है तू आगे बढ़ रहा है। तू धन और शक्ति की तरह आगे बढ़ के पूरा करे।
Mantra 7
इषिरेण ते मनसा सुतस्य भक्षीमहि पित्र्यस्येव रायः । सोम राजन्प्र ण आयूंषि तारीरहानीव सूर्यो वासराणि ॥
दिल से तैयार होके हम सोम पीते हैं। यह पुराने ख़ज़ाने की तरह है। राजा सोम, हमारी ज़िंदगी आगे ले जा। जैसे सूरज दिन आगे बढ़ाता है, वैसे हमारी उम्र भी बढ़ती रहे।
Mantra 8
सोम राजन्मृळया नः स्वस्ति तव स्मसि व्रत्यास्तस्य विद्धि । अलर्ति दक्ष उत मन्युरिन्दो मा नो अर्यो अनुकामं परा दाः ॥
हे सोम राजा, हम पे दया कर और हमें ठीक रखो। हम तुम्हारे भक्त हैं, यह जान लो। हमारी समझ और इरादा दोनों जाग गए हैं। हमें दुश्मन के हाथ नहीं देना, वो जो चाहता है वो मत करना।
Mantra 9
त्वं हि नस्तन्वः सोम गोपा गात्रेगात्रे निषसत्था नृचक्षाः । यत्ते वयं प्रमिनाम व्रतानि स नो मृळ सुषखा देव वस्यः ॥
सोम, तुम हमारे शरीर की रक्षा करते हो। तुम हर अंग में बैठ गए हो, तुम इंसानों को देख सकते हो। अगर हमने तुम्हारे नियम थोड़े तोड़ दिए, तो माफ कर दो। तुम भगवान हो, हमारे अच्छे दोस्त, और सबसे अच्छा देते हो।
Mantra 10
ऋदूदरेण सख्या सचेय यो मा न रिष्येद्धर्यश्व पीतः । अयं यः सोमो न्यधाय्यस्मे तस्मा इन्द्रं प्रतिरमेम्यायुः ॥
मैं सोम से दोस्ती करना चाहता हूँ। यह जो सोम अंदर आता है, यह मुझे नुकसान नहीं करता। यह सोम जो हमारे अंदर है, मैं उसे इंद्र के पास ले के जाता हूँ। वहाँ ज़िन्दादिली पक्की मिलती है।
Mantra 11
अप त्या अस्थुरनिरा अमीवा निरत्रसन्तमिषीचीरभैषुः । आ सोमो अस्माँ अरुहद्विहाया अगन्म यत्र प्रतिरन्त आयुः ॥
अब सारी बिमारियाँ भाग गई हैं, उनमें ताकत नहीं रही। अंधेरा और डर सब गायब हो गया। सोम ने हमें उठा के ऊपर ले लिया, जहाँ खुला स्पेस है। हम वहाँ पहुँच गए जहाँ ज़िन्दादिली पक्की चल रही है।
Mantra 12
यो न इन्दुः पितरो हृत्सु पीतोऽमर्त्यो मर्त्याँ आविवेश । तस्मै सोमाय हविषा विधेम मृळीके अस्य सुमतौ स्याम ॥
यह सोम रस, हे पित्र देवता, जब दिल में पिया जाता है तो वो अमर हो के इंसान के अंदर आ जाता है। हम उस सोम को पूजा के साथ देंगे। उसकी दया से हम ठीक रहेंगे और उसकी अच्छी नज़र में रहेंगे।
Mantra 13
त्वं सोम पितृभिः संविदानोऽनु द्यावापृथिवी आ ततन्थ । तस्मै त इन्दो हविषा विधेम वयं स्याम पतयो रयीणाम् ॥
हे सोम, तुमने अपने पुरखों के साथ मिलकर आसमान और धरती को फैला दिया। तुम्हारे लिए हम यह पूजा समर्पते हैं। हम ऐसे बनो कि हम धन-दौलत के मालिक हो जाएँ।
Mantra 14
त्रातारो देवा अधि वोचता नो मा नो निद्रा ईशत मोत जल्पिः । वयं सोमस्य विश्वह प्रियासः सुवीरासो विदथमा वदेम ॥
हे भगवान, हमारी रक्षा करो और हमारे लिए बोल। ना नींद हमें पकड़े, ना बेवकूफी की बातें। हम सोम को हमेशा प्यारे लगते हैं। हम ताकतवर हो के सबके सामने बात करें।
Mantra 15
त्वं नः सोम विश्वतो वयोधास्त्वं स्वर्विदा विशा नृचक्षाः । त्वं न इन्द ऊतिभिः सजोषाः पाहि पश्चातादुत वा पुरस्तात् ॥
हे सोम, तुम हर तरफ से ताकत देते हो। तुम धूप और रोशनी ढूंढने वाले हो और लोगों को रास्ता दिखाते हो। तुम्हारी मदद से हमें पीछे से भी बचाओ, आगे से भी।
The seer declares direct experience: having tasted the sweet Soma, the mind becomes clear and mastery arises, opening a wider freedom.
Soma is universalized as the ‘Honey’ around which gods and mortals move; then he is addressed as an indwelling guardian present in every limb and as the seer who watches human life.
A frank ethical turn: if we have diminished Soma’s laws (vrata), may he forgive—Soma as intimate friend and moral protector.
The hymn settles into comprehensive protection and empowerment: Soma gives strength from every side, leads toward the sun-world, and guards from front and behind.
madhu
gātre-gātre niṣasatthā
pāhi paścātād uta vā purastāt
It says Soma is a sweet, life-giving power that brings mental clarity and inner freedom, while also guarding the person from within and protecting them from all sides.
“Madhu” points to Soma’s delightful, nourishing essence—both as the ritual drink and as an inner sweetness that refreshes life and consciousness.
It portrays Soma as an indwelling guardian: the sacred vitality is present throughout the body and being, supporting health, strength, and right living.
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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