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Sukta 4.58
Vāmadeva Gautama (traditional attribution for RV 4.58)
Ghṛta / Soma-essence (with a mystic-theological focus rather than a single anthropomorphic deity)
Triṣṭubh
RV 4.58 is a mystic hymn on ghṛta (clarified butter) as the luminous Soma-essence: a honeyed wave rising from the cosmic ocean and becoming “immortality” through subtle pressing and inner purification. It links ritual oblation with a hidden metaphysics—ghṛta as the gods’ tongue and the navel of amṛta—so that the outer offering mirrors an inner flow of clarified consciousness.
Mantra 1
समुद्रादूर्मिर्मधुमाँ उदारदुपांशुना सममृतत्वमानट् । घृतस्य नाम गुह्यं यदस्ति जिह्वा देवानाममृतस्य नाभिः ॥
समुंदर से एक मीठी लहर उठती है। जब उसे दबा के निकालते हैं, तब वोह अमर हो जाता है। यह घी का छुपा नाम है। यह देवताओं की जीभ है, अमृत का बिंदु है।
Mantra 2
वयं नाम प्र ब्रवामा घृतस्यास्मिन्यज्ञे धारयामा नमोभिः । उप ब्रह्मा शृणवच्छस्यमानं चतुःशृङ्गोऽवमीद्गौर एतत् ॥
हम यज्ञ में घी का नाम ले रहे हैं और उसे अपना नमस्ते दे रहे हैं। ब्रह्मा जो शब्द से पैदा होता है, वो हमारी बात सुन रहा है। चार सींग वाला बैल ने यह सच बोल दिया है।
Mantra 3
चत्वारि शृङ्गा त्रयो अस्य पादा द्वे शीर्षे सप्त हस्तासो अस्य । त्रिधा बद्धो वृषभो रोरवीति महो देवो मर्त्याँ आ विवेश ॥
इस बैल के चार सींग हैं, तीन पाँव हैं, दो सर हैं और सात हाथ हैं। वो तीन तरह से बंधा है और ज़ोर से आवाज़ कर रहा है। यह बड़ा भगवान इंसानों के अंदर आ गया है।
Mantra 4
त्रिधा हितं पणिभिर्गुह्यमानं गवि देवासो घृतमन्वविन्दन् । इन्द्र एकं सूर्य एकं जजान वेनादेकं स्वधया निष्टतक्षुः ॥
घी तीन जगह छुपा हुआ था, दुश्मन लोग उसे छुपा के रखे थे। देवताओं ने उसे गाय के अंदर ढूँढ लिया। इंद्र ने एक रूप बनाया, सूर्य ने एक बनाया, और तीसरा अपनी शक्ति से बनाया।
Mantra 5
एता अर्षन्ति हृद्यात्समुद्राच्छतव्रजा रिपुणा नावचक्षे । घृतस्य धारा अभि चाकशीमि हिरण्ययो वेतसो मध्य आसाम् ॥
यह धारें दिल के समुंदर से बह रही हैं, सौ रास्ते ले के। दुश्मन उन्हे देख नहीं पाता। मैं घी की धारें देख रहा हूँ, बीच में सोने की एक लकड़ी खड़ी है।
Mantra 6
सम्यक्स्रवन्ति सरितो न धेना अन्तर्हृदा मनसा पूयमानाः । एते अर्षन्त्यूर्मयो घृतस्य मृगा इव क्षिपणोरीषमाणाः ॥
यह धारें सीधी बह रही हैं जैसे नदियाँ बह ती हैं, जैसे गाइयाँ दूध देती हैं। दिल और मन से साफ हो के बह रही हैं। घी की लहरें ऐसे उछल रही हैं जैसे तीर डीर भाग रहे हो।
Mantra 7
सिन्धोरिव प्राध्वने शूघनासो वातप्रमियः पतयन्ति यह्वाः । घृतस्य धारा अरुषो न वाजी काष्ठा भिन्दन्नूर्मिभिः पिन्वमानः ॥
जैसे सिंधु नदी आगे बढ़ती है, वैसे ही ये शक्तियाँ भी तेज़ी से आगे बढ़ रही हैं। हवा उन्हें आगे धकेलती है और वो उड़ने लगते हैं। घी की धारें ऐसे बह रही हैं जैसे लाल घोड़ा दौड़ रहा हो। ये धारें रास्ते के पत्थर तोड़ के आगे बढ़ रही हैं और उनमें लहरें उठ रही हैं।
Mantra 8
अभि प्रवन्त समनेव योषाः कल्याण्यः स्मयमानासो अग्निम् । घृतस्य धाराः समिधो नसन्त ता जुषाणो हर्यति जातवेदाः ॥
घी की धारें अग्नि की तरफ जा रही हैं। जैसे लड़कियाँ किसी मिलन में मुस्कुराती हुई आती हैं, वैसे ही ये धारें भी खुशी से आ रही हैं। ये धारें ऐसे हैं जैसे पूजा के लिए लकड़ियाँ। अग्नि उन्हें खुशी से अपने पास बुलाता है और उनसे प्रसन्न हो के ऊपर उठता है।
Mantra 9
कन्या इव वहतुमेतवा उ अञ्ज्यञ्जाना अभि चाकशीमि । यत्र सोमः सूयते यत्र यज्ञो घृतस्य धारा अभि तत्पवन्ते ॥
जैसे दुल्हन अपना श्रृंगार कर के बारात में जाती है, वैसे ही मैं इन घी की धारों को देख रहा हूँ। ये धारें वहाँ जा रही हैं जहाँ सोम रस निकाला जा रहा है और यज्ञ हो रहा है। वहाँ ये धारें उस ऊपर की तरफ जा रही हैं।
Mantra 10
अभ्यर्षत सुष्टुतिं गव्यमाजिमस्मासु भद्रा द्रविणानि धत्त । इमं यज्ञं नयत देवता नो घृतस्य धारा मधुमत्पवन्ते ॥
अच्छी तरह से गाए हुए गीतों के साथ आओ। चमक-दमक और जीत की शक्ति ले के आओ। हमें अच्छी संपत्ति दो। देवता लोग, इस यज्ञ को सही रास्ते पे लगाओ। घी की धारें मीठी हो के बहें और सब को साफ करें।
Mantra 11
धामन्ते विश्वं भुवनमधि श्रितमन्तः समुद्रे हृद्यन्तरायुषि । अपामनीके समिथे य आभृतस्तमश्याम मधुमन्तं त ऊर्मिम् ॥
तुम्हारा नियम सारी दुनिया को संभाले हुए है। ये ऊपर भी है और अंदर भी, समुंदर के पानी में भी और दिल में भी। तुम्हारी एक ऐसी लहर है जो मीठी है और पानी के ऊपर लाई जाती है। हमें उस लहर को पाना चाहिए।
It uses ghee as the ritual symbol, but it mainly teaches a hidden meaning: ghṛta is a subtle “essence” that becomes amṛta when purified and offered with right inner awareness.
Because ghṛta is the medium through which the offering is ‘tasted’ and carried—ritually by Agni, and mystically as the divine power that receives and transforms the sacrifice.
The “ocean” is the cosmic source (often linked with the Waters and Soma); the “wave” is the rising current of sweetness/essence—experienced outwardly as oblation and inwardly as clarified, life-giving consciousness.
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