
Sukta 4.5
Vāmadeva Gautama (traditional attribution for RV 4.5)
Agni Vaiśvānara
Trishtubh (probable; verify in critical edition)
This hymn to Agni Vaiśvānara asks how the sacrificers may rightly offer to the Fire of vast radiance who opens the path by propping apart obstruction. Agni is praised as the revealer of the hidden “word” in the cave and as guardian of the foremost step of the rays (vision), culminating in the vivid image of his shining face blazing within the house (the ritual dwelling and the inner being). Overall, the sukta moves from invocation and praise to a doctrine of revelation—Agni as the force that makes the concealed truth and light manifest.
Mantra 1
वैश्वानराय मीळ्हुषे सजोषाः कथा दाशेमाग्नये बृहद्भाः । अनूनेन बृहता वक्षथेनोप स्तभायदुपमिन्न रोधः ॥
हम सब मिलकर अग्नि को पुकारते हैं। वो बड़ा तेज है और हमें बहुत देता है। हम सोच रहे हैं कि उसे कैसे भोग लगाएं। अग्नि की ताकत कभी कम नहीं होती, वो बड़ी है। उसने रास्ता साफ कर दिया है, जैसे कोई दीवार हटा दी हो। अब रोशनी के लिए रास्ता खुला है।
Mantra 2
मा निन्दत य इमां मह्यं रातिं देवो ददौ मर्त्याय स्वधावान् । पाकाय गृत्सो अमृतो विचेता वैश्वानरो नृतमो यह्वो अग्निः ॥
कोई भगवान को बुरा मत कहो। उसने मुझे यह तोहफा दिया है। वो इंसान को अपनी ताकत देता है। अग्नि हमें अंदर से पकाता है, साफ करता है। वो अमर है और रास्ता जानता है। वो सबसे बड़ा और तेज है।
Mantra 3
साम द्विबर्हा महि तिग्मभृष्टिः सहस्ररेता वृषभस्तुविष्मान् । पदं न गोरपगूळ्हं विविद्वानग्निर्मह्यं प्रेदु वोचन्मनीषाम् ॥
अग्नि की महिमा गाते हैं। वो बड़ी ताकत वाला है, तेज है, और बिजली की तरह चमकता है। वो बैल की तरह बलवान है। उसने छुपा हुआ राज़ पा लिया है, जैसे कोई छुपा हुआ पायर मिल गया हो। उसने मुझे समझ दी है।
Mantra 4
प्र ताँ अग्निर्बभसत्तिग्मजम्भस्तपिष्ठेन शोचिषा यः सुराधाः । प्र ये मिनन्ति वरुणस्य धाम प्रिया मित्रस्य चेततो ध्रुवाणि ॥
अग्नि बड़ा तेज है, आग से भरा है। वो अपनी सबसे बड़ी आग से दुश्मनों को जला देता है। वो लोगों को मारता है जो गलत काम करते हैं। मित्र और वरुण के नियम को तोड़ते हैं। वो पकड़े जाते हैं।
Mantra 5
अभ्रातरो न योषणो व्यन्तः पतिरिपो न जनयो दुरेवाः । पापासः सन्तो अनृता असत्या इदं पदमजनता गभीरम् ॥
यह लोग भाई के बिना लड़कियों की तरह हैं, कोई साथ नहीं। दुश्मन के घर की औरतों की तरह हैं, बुरा काम करते हैं। पाप करते हैं, झूठ बोलते हैं। सच नहीं जानते। इसलिए वो गहरा राज़ नहीं पा सकते।
Mantra 6
इदं मे अग्ने कियते पावकामिनते गुरुं भारं न मन्म । बृहद्दधाथ धृषता गभीरं यह्वं पृष्ठं प्रयसा सप्तधातु ॥
अग्नि, मैं जो सोच रहा हूँ वो बहुत बड़ा बोझ है। मेरी आग इसे उठा नहीं पाती। तू इसे फैला दे, गहरा कर दे, हिम्मत से स्थिर कर दे। अपनी पूरी शक्ति से इसे सात हिस्सों में बना दे।
Mantra 7
तमिन्न्वेव समना समानमभि क्रत्वा पुनती धीतिरश्याः । ससस्य चर्मन्नधि चारु पृश्नेरग्रे रुप आरुपितं जबारु ॥
वही अग्नि सब जगह सामे रहता है। जो सोच साफ करती है वो उस तक पहुँचती है। जैसे ज़मीन पर खेत होता है, वैसे ही प्रकृति पर उसका रूप बनता है। वो आगे रहता है, सुंदर दिखता है, अंदर की बात बाहर दिखाता है।
Mantra 8
प्रवाच्यं वचसः किं मे अस्य गुहा हितमुप निणिग्वदन्ति । यदुस्रियाणामप वारिव व्रन्पाति प्रियं रुपो अग्रं पदं वेः ॥
मेरा यह शब्द छुपा हुआ है, गुप्त जगह में है। लोग कहते हैं वो छुपा दिया गया। जब ज़ख्म खुलता है जैसे दरवाज़ा, तब प्यारा रूप आगे रहता है। वो रोशनी के पहले कदम की रक्षा करता है।
Mantra 9
इदमु त्यन्महि महामनीकं यदुस्रिया सचत पूर्व्यं गौः । ऋतस्य पदे अधि दीद्यानं गुहा रघुष्यद्रघुयद्विवेद ॥
यह बहुत बड़ी चीज़ है, बड़ी शक्ति का चेहरा। पुरानी गाय रोशनी के साथ चलती है। सत्य के स्थान पर चमक रही है, गुप्त जगह में है। जो तेज़ी से ढूँढ़ता है वो उसे पा लेता है।
Mantra 10
अध द्युतानः पित्रोः सचासामनुत गुह्यं चारु पृश्नेः । मातुष्पदे परमे अन्ति षद्गोर्वृष्णः शोचिषः प्रयतस्य जिह्वा ॥
फिर चमकने वाला दोनों माता-पिता के पास खड़ा था। उसने पृश्नि का गुप्त और सुंदर काम देखा। माँ के सबसे ऊँचे स्थान में वो बैठा। अग्नि की जीभ सही दिशा में चलती है, चमकती है।
Mantra 11
ऋतं वोचे नमसा पृच्छ्यमानस्तवाशसा जातवेदो यदीदम् । त्वमस्य क्षयसि यद्ध विश्वं दिवि यदु द्रविणं यत्पृथिव्याम् ॥
मैं सच बोल रहा हूँ, झुक के पूछ रहा हूँ। जातवेद, मुझे तुम्हारा आश है। तुम ही इस सब के मालिक हो। जो आसमान में है, जो ज़मीन में दौलत है, सब तुम्हारे पास है।
Mantra 12
किं नो अस्य द्रविणं कद्ध रत्नं वि नो वोचो जातवेदश्चिकित्वान् । गुहाध्वनः परमं यन्नो अस्य रेकु पदं न निदाना अगन्म ॥
हमें बताओ, असली दौलत क्या है? खज़ाना क्या है? जातवेद, तुम जानते हो। हम ढूँढने आए हैं, झगड़ने नहीं। वो ऊँचा पद है जो छुपा है, वहीं तक पहुँचे हैं।
Mantra 13
का मर्यादा वयुना कद्ध वाममच्छा गमेम रघवो न वाजम् । कदा नो देवीरमृतस्य पत्नीः सूरो वर्णेन ततनन्नुषासः ॥
हद क्या है, सही रास्ता कौनसा है? ऐसा क्या है जो सीधा ले जाए? कब सुबह होगी? अमृत की पत्नियाँ, वो देवियाँ, कब चमकेंगी? सूरज के साथ उगेंगी।
Mantra 14
अनिरेण वचसा फल्ग्वेन प्रतीत्येन कृधुनातृपासः । अधा ते अग्ने किमिहा वदन्त्यनायुधास आसता सचन्ताम् ॥
जिनके पास बात में जान नहीं, जो समझते नहीं, वो खाली घूमते हैं। अग्नि, उनसे क्या कहते हैं? जो हथियार नहीं रखते, वो बैठ के अपनी कमज़ोरी पकड़े रहते हैं।
Mantra 15
अस्य श्रिये समिधानस्य वृष्णो वसोरनीकं दम आ रुरोच । रुशद्वसानः सुदृशीकरूपः क्षितिर्न राया पुरुवारो अद्यौत् ॥
जब जलाया, चमक उठा। घर में चमक दिख गई। रोशन कपड़े पहने, साफ दिख रहा है। जैसे कोई घर हो जिसमे दौलत हो, खुला हो, वैसे ही चमक रहा है।
Vaiśvānara is Agni seen as the universal fire—present for all people and beings—who carries offerings and brings light, order, and protection.
It points to sacred truth or inspired insight that is concealed within; Agni is praised as the power that opens the closed space and makes that hidden knowledge and vision emerge.
It can be recited at the lighting of a lamp or household fire (especially at dawn or dusk) with a simple ghee offering, focusing on removing inner obstacles and gaining clarity and right direction.
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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