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Sukta 1.68
Parāśara (traditional for this Agni hymn cluster)
Agni
Triṣṭubh (likely; confirm)
This hymn praises Agni as the ever-awakening Fire who rises toward heaven, orders the paths of the moving and the fixed, and "opens out" the nights—making room for light, knowledge, and right action. It asks Agni, the conscious Knower and household lord, to widen the doors of plenitude (rāyas) for those who offer and those who seek instruction from him.
Mantra 1
श्रीणन्नुप स्थाद्दिवं भुरण्युः स्थातुश्चरथमक्तून्व्यूर्णोत् ॥
वो उत्सुक हो कर आसमान की तरफ़ खड़ा हो गया और फैल गया। उसने जो चीज़ पक्की थी उसके लिए चलने का रास्ता बना दिया, और रातों को खोल कर फैला दिया। अब सब रास्ता साफ़ है।
Mantra 2
परि यदेषामेको विश्वेषां भुवद्देवो देवानां महित्वा ॥
जब एक भगवान सबसे बड़ा हो जाता है, वो सब देवताओं को अपने में समेट लेता है। उसकी ताकत इतनी बड़ी है कि वो सब काम अपने कंट्रोल में रखता है। यह बात बताती है कि एक ही पावर सबसे ऊपर है।
Mantra 3
आदित्ते विश्वे क्रतुं जुषन्त शुष्काद्यद्देव जीवो जनिष्ठाः ॥
फिर सब लोग तुम्हारी बात मान लेते हैं। भगवान, तुमने जहाँ कुछ नहीं था, वहाँ जान डाली। सूखे से जीते हुए पैदा हुए हो। यह दिखाता है कि तुम ज़िन्दगी ला सकते हो जहाँ भी कुछ नहीं है।
Mantra 4
भजन्त विश्वे देवत्वं नाम ऋतं सपन्तो अमृतमेवैः ॥
सब लोग भगवान के पास जाते हैं और उसका नाम लेते हैं। वो सच्चाई के रास्ते चलते हैं। इससे वो अमर हो जाते हैं, मौत इनको छू नहीं पाती। सच्चाई से ही बड़ी ताकत मिलती है।
Mantra 5
ऋतस्य प्रेषा ऋतस्य धीतिर्विश्वायुर्विश्वे अपांसि चक्रुः ॥
सच्चाई से ही आगे बढ़ने का जोश आता है। सोच भी सच्चाई से आती है। पूरी ज़िन्दगी और सारी ताकतें मिलकर काम करती हैं। सब कुछ सच्चाई पे चलता है, यह मेन बात है।
Mantra 6
यस्तुभ्यं दाशाद्यो वा ते शिक्षात्तस्मै चिकित्वान्रयिं दयस्व ॥
जो तुम्हे पूजा करके समर्पित करता है, उसको आशीर्वाद दो। जो तुमसे सीखना चाहता है, उसको भी ज्ञान दो। तुम तो जानते हो सब कुछ। इनको वो खुशी और सम्पत्ति दो जो दिल माँगता है।
Mantra 7
होता निषत्तो मनोरपत्ये स चिन्न्वासां पती रयीणाम् ॥
होत्र जो यज्ञ के पुजारी का काम करता है, वो इंसानी वंश में बैठता है। वो सब दौलत का मालिक बन जाता है। यह दौलत अंदर की दौलत है जो इंसानी खानदान में मिलती है।
Mantra 8
इच्छन्त रेतो मिथस्तनूषु सं जानत स्वैर्दक्षैरमूराः ॥
वो अपने शरीर में वो बीज ढूंढते हैं जो नए जनम का काम करता है। अपनी समझ से वो एक दूसरे की बात समझते हैं। कोई घबराहट नहीं, वो सही रास्ता पकड़ते हैं।
Mantra 9
पितुर्न पुत्राः क्रतुं जुषन्त श्रोषन्ये अस्य शासं तुरासः ॥
जैसे बेटे अपने बाप की मर्ज़ी से खुश रहते हैं, वैसे ही वो भी उस इरादे को अपनाते हैं। जो जल्दी काम करते हैं, वो बाप के हुकम को सुनते हैं और मानते हैं।
Mantra 10
वि राय और्णोद्दुरः पुरुक्षुः पिपेश नाकं स्तृभिर्दमूनाः ॥
वो दौलत के दरवाज़े खोल देता है। जो शक्ति बहुत जगह रहती है, वो आसमान को अपने सहारे से दबा देती है। यह घर के अंदर का मालिक है।
It presents Agni as the awakened fire and guiding intelligence who maintains cosmic order and opens the way to prosperity (rayi) for those who worship and those who sincerely learn.
These are poetic symbols for Agni’s power to expand space for light and understanding: he "opens" the darkness (night) and also the "doors" of abundance and well-being.
Triṣṭubh is the most likely meter for RV 1.68, but confirming it strictly requires checking each verse’s syllable count and cadence across all 10 mantras.
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