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Sukta 1.185
Traditionally attributed to an early seer of the Dyāvā-Pṛthivī (Heaven-and-Earth) cycle in RV 1.185 (exact rishi varies by tradition; not supplied in input)
Ahanī (Day and Night) / cosmic duality; implicitly Rodasī order
Triṣṭubh (probable; verify by metrical scan)
This hymn contemplates the revolving alternation of Day and Night and, by extension, the ordered duality that sustains the world. It marvels at their mysterious origin, praises their cosmic steadiness under ṛta (truth-order), and finally petitions Heaven-and-Earth as universal parents to protect, nurture, and guide the sacrificer toward enduring prosperity and right impulse.
Mantra 1
कतरा पूर्वा कतरापरायोः कथा जाते कवयः को वि वेद । विश्वं त्मना बिभृतो यद्ध नाम वि वर्तेते अहनी चक्रियेव ॥
दिन और रात में से कौन पहले आया, कौन बाद में आया? कैसे पैदा हुए, कोई रिशि भी नहीं जानता। दोनों अपनी शक्ति से पूरा संसार उठा के चलते हैं। जैसे कोई चक्कर घूरता है, वैसे ही यह दोनों घूरते रहते हैं।
Mantra 2
भूरिं द्वे अचरन्ती चरन्तं पद्वन्तं गर्भमपदी दधाते । नित्यं न सूनुं पित्रोरुपस्थे द्यावा रक्षतं पृथिवी नो अभ्वात् ॥
दिन और रात दोनों बड़े हैं, खड़े रहते हैं। लेकिन जो बच्चा अंदर है, उसको हिलाते हैं। उसके पैर हैं, वो चलता है। जैसे माँ बाप अपने बच्चे को गोद में उठा के रखते हैं। आकाश और धरती, तुम दोनों हमारे ऊपर नज़र रखो। बड़ी मुसीबत से बचा के रखना।
Mantra 3
अनेहो दात्रमदितेरनर्वं हुवे स्वर्वदवधं नमस्वत् । तद्रोदसी जनयतं जरित्रे द्यावा रक्षतं पृथिवी नो अभ्वात् ॥
अदिति का जो देना है, वो बिना रुके चलता रहता है। उसमें कोई टूट नहीं है। वो चमकता है, कोई हाथ नहीं लगा सकता। उसमें इज़्ज़त है। आकाश और धरती, वो हमारे गाने के लिए लाओ। आकाश और धरती, बड़ी मुसीबत से बचा के रखना।
Mantra 4
अतप्यमाने अवसावन्ती अनु ष्याम रोदसी देवपुत्रे । उभे देवानामुभयेभिरह्नां द्यावा रक्षतं पृथिवी नो अभ्वात् ॥
आकाश और धरती, तुम दोनों देवियाँ हो। तुम अंदर से चमक रही हो और हमें पोषने की शक्ति रखती हो। हम तुम्हारे साथ चलना चाहते हैं। तुम देवियों की हो और दिन-रात दोनों को अपने में समेटी हो। हमें बुरी ताकत से बचाओ।
Mantra 5
संगच्छमाने युवती समन्ते स्वसारा जामी पित्रोरुपस्थे । अभिजिघ्रन्ती भुवनस्य नाभिं द्यावा रक्षतं पृथिवी नो अभ्वात् ॥
आकाश और धरती, तुम दोनों बहनें हो। तुम साथ-साथ चलती हो, एक ही मन से। तुम एक पिताजी की गोद में बैठे हो। तुम दुनिया की नाभि की तरफ साँस ले रही हो। हमें बुरी ताकत से बचाओ जो हमें तोड़ना चाहती है।
Mantra 6
उर्वी सद्मनी बृहती ऋतेन हुवे देवानामवसा जनित्री । दधाते ये अमृतं सुप्रतीके द्यावा रक्षतं पृथिवी नो अभ्वात् ॥
आकाश और धरती, तुम्हारी जगह बड़ी है और तुम बड़ी हो। तुम माँ हो, जन्म देने वाली। मैं सत्य के साथ तुम्हे पुकारता हूँ, देवियों की शक्ति के साथ। तुम अमृत को अपने पास रखती हो, चमकदार रूप में। हमें बुरी ताकत से बचाओ।
Mantra 7
उर्वी पृथ्वी बहुले दूरेअन्ते उप ब्रुवे नमसा यज्ञे अस्मिन् । दधाते ये सुभगे सुप्रतूर्ती द्यावा रक्षतं पृथिवी नो अभ्वात् ॥
आकाश और धरती, तुम्हारी धरती बड़ी है और सबसे भरपूर है। तुम बहुत दूर तक फैली हो। मैं इस यज्ञ में तुम्हे नमन करता हूँ। तुम भाग्य और अच्छी राह दोनों देती हो। हमें बुरी ताकत से बचाओ।
Mantra 8
देवान्वा यच्चकृमा कच्चिदागः सखायं वा सदमिज्जास्पतिं वा । इयं धीर्भूया अवयानमेषां द्यावा रक्षतं पृथिवी नो अभ्वात् ॥
अगर हमने किसी देवी के खिलाफ गलती की है, या दोस्त के खिलाफ, या अपने परिवार के प्रमुख के खिलाफ, तो यह सोच उनको मनाने का तरीका हो। हमें माफ कर दो। आकाश और धरती, हमें बुरी ताकत से बचाओ।
Mantra 9
उभा शंसा नर्या मामविष्टामुभे मामूती अवसा सचेताम् । भूरि चिदर्यः सुदास्तरायेषा मदन्त इषयेम देवाः ॥
दोनों तरह की प्रार्थना मुझे रखे, इंसान की भी और वीरों की भी। दोनों मदद मेरे साथ हो और मुझे संभाले। जो लोग देते हैं उनको बहुत मिलता है। हम खुश रह के भगवानों को काम करने बुलाते हैं।
Mantra 10
ऋतं दिवे तदवोचं पृथिव्या अभिश्रावाय प्रथमं सुमेधाः । पातामवद्याद्दुरितादभीके पिता माता च रक्षतामवोभिः ॥
मैंने आसमान को सत्य बताया है और धरती को भी पहली बार सुनाया है। पिताजी और माँ हमारे पास रह के हमें बुरी बातों से बचाएँ। वो हमें मुश्किल वक्त में भी सही रस्ता दिखाएँ।
Mantra 11
इदं द्यावापृथिवी सत्यमस्तु पितर्मातर्यदिहोपब्रुवे वाम् । भूतं देवानामवमे अवोभिर्विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम् ॥
आसमान और धरती, तुम पिताजी और माँ हो। जो मैं बोल रहा हूँ वो सच हो। भगवानों में तुम सबसे करीब हो, हमारे साथ रहो। हमें सही रस्ता मिल जाए और जो देता है उसका देना चलता रहे।
It reflects on the mystery and order of Day and Night and then invokes Heaven and Earth as universal parents to protect and guide the worshipper according to ṛta (cosmic truth-order).
The question highlights that the deepest origins of cosmic cycles are beyond ordinary knowing, while still affirming that the cycle itself is steady and purposeful in sustaining the world.
It can be recited at dawn or dusk to cultivate regularity and clarity, and to pray for protection from adversity, balanced living through cycles, and steadfast progress on a “victorious path.”
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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