
Sukta 1.141
Dīrghatamas Āucathya (traditional, subject to recension)
Agni
Triṣṭubh (probable; confirm)
This hymn praises Agni as the visible splendour born of strength, the forward-leading power that carries thought and sacrifice along the streams of ṛta (cosmic order). Agni is depicted as wind-driven, swift, pure-born, yet able to stride through darkness, opening paths across the worlds. The sukta culminates in a communal aspiration: through strong praise and right offering, may worshippers gain wider mastery and pass beyond obstruction like the Sun beyond mist.
Mantra 1
बळित्था तद्वपुषे धायि दर्शतं देवस्य भर्गः सहसो यतो जनि । यदीमुप ह्वरते साधते मतिॠतस्य धेना अनयन्त सस्रुतः ॥
भगवान की चमक को एक दिखने वाली शकल में बना दिया गया है। यह चमक ताकत से पैदा हुई थी। जब कोई इच्छा पूरी करने के लिए मन लगाता है, तब सच्चाई की गायें उससे आगे बढ़ाती हैं। यह गायें दूध जैसा अमृत देती हैं।
Mantra 2
पृक्षो वपुः पितुमान्नित्य आ शये द्वितीयमा सप्तशिवासु मातृषु । तृतीयमस्य वृषभस्य दोहसे दशप्रमतिं जनयन्त योषणः ॥
अग्नि की शकल खाने-पीने से भरी हुई है। वो हमेशा से है और आराम करता है। पहले वो सात माताओं के पास रहता है। फिर दूसरी बार जब वो बैल की तरह दूध देता है, तब दस शक्तियाँ पैदा होती हैं जो सही रास्ता दिखाती हैं।
Mantra 3
निर्यदीं बुध्नान्महिषस्य वर्पस ईशानासः शवसा क्रन्त सूरयः । यदीमनु प्रदिवो मध्व आधवे गुहा सन्तं मातरिश्वा मथायति ॥
जब बड़े देवता की शकल नीचे से बाहर आती है, तब रिशियों की ताकत उसे पकड़ती है। जब आसमान से मीठा रस मिलता है, तब मातरिश्वन नाम की शक्ति उसे छुपा के निकालती है। वो छुपा हुआ था, फिर भी मिल गया।
Mantra 4
प्र यत्पितुः परमान्नीयते पर्या पृक्षुधो वीरुधो दंसु रोहति । उभा यदस्य जनुषं यदिन्वत आदिद्यविष्ठो अभवद्घृणा शुचिः ॥
जब अग्नि को सबसे बड़े पिता से बाहर लाया जाता है, तब उसके आस-पास सारे पौधे उगने लगते हैं। उसकी ताकत से वो सब ऊपर आते हैं। जब उसके दोनों जनम होते हैं, तब वो सबसे नया और सबसे साफ चमकने लगता है। वो अग्नि बड़ा तेज़ होता है।
Mantra 5
आदिन्मातॄराविशद्यास्वा शुचिरहिंस्यमान उर्विया वि वावृधे । अनु यत्पूर्वा अरुहत्सनाजुवो नि नव्यसीष्ववरासु धावते ॥
वो माताओं के पास जाता है जहाँ उसका काम शुरू है। वो साफ है, कोई उसको नुकसान नहीं पहुँचा सकता। वो खुल के फैलता है जैसे कोई बड़ा खुला मैदान हो। वो पुराने रास्ते पे चलता है जो पहले लोगों ने बनाए थे। वो नीचे की तरफ दौड़ता है नए-नए रूप में। उसका काम है छुपा हुआ चीज़ को जगाना।
Mantra 6
आदिद्धोतारं वृणते दिविष्टिषु भगमिव पपृचानास ऋञ्जते । देवान्यत्क्रत्वा मज्मना पुरुष्टुतो मर्तं शंसं विश्वधा वेति धायसे ॥
लोग उसे चुनते हैं जो ऊपर बैठ के पूजा करता है। वो उसे भगवान जैसा मान के तैयार करते हैं जो सबको बाँटता है। जब वो भगवानों के बीच चलता है अपनी ताकत से, वो इंसान की बात ले के जाता है। हर तरफ उसकी बात पक्की हो जाती है।
Mantra 7
वि यदस्थाद्यजतो वातचोदितो ह्वारो न वक्वा जरणा अनाकृतः । तस्य पत्मन्दक्षुषः कृष्णजंहसः शुचिजन्मनो रज आ व्यध्वनः ॥
जब वो आगे आता है, पूजा लायक है, हवा उसे आगे बढ़ा रही है। वो तेज़ घोड़े जैसा है जो गाना गाता है, उसमें कोई पुराना फीकापन नहीं है। वो साफ दिल से पैदा हुआ है, लेकिन अंधेरे में भी चल सकता है। उसके लिए रास्ता खुल जाता है आसमान तक।
Mantra 8
रथो न यातः शिक्वभिः कृतो द्यामङ्गेभिररुषेभिरीयते । आदस्य ते कृष्णासो दक्षि सूरयः शूरस्येव त्वेषथादीषते वयः ॥
वो आगे बढ़ता है जैसे कोई रथ चल रहा हो जो समझदार लोगों ने बनाया है। वो आसमान की तरफ जाता है, उसके अंग लाल हैं चमक रहे हैं। रिशि लोग उसकी ताकत के लिए तरसते हैं, अभी थोड़ा अंधेरे में हैं। जैसे योद्धा अपने हीरो के आने का इंतज़ार करते हैं।
Mantra 9
त्वया ह्यग्ने वरुणो धृतव्रतो मित्रः शाशद्रे अर्यमा सुदानवः । यत्सीमनु क्रतुना विश्वथा विभुररान्न नेमिः परिभूरजायथाः ॥
अग्नि, तुम्हारे साथ वरुण, मित्र और अर्यमन भी पूरे हो जाते हैं। यह सब अपना काम ठीक से करते हैं और अच्छा देते हैं। तुम्हारी इच्छा की ताकत से तुम हर जगह फैल जाते हो। जैसे पहिये में बाहर का गोला सब चीज़ों को पकड़ के रखता है, तुम भी ऐसे ही सबको अपने में समेट लो।
Mantra 10
त्वमग्ने शशमानाय सुन्वते रत्नं यविष्ठ देवतातिमिन्वसि । तं त्वा नु नव्यं सहसो युवन्वयं भगं न कारे महिरत्न धीमहि ॥
अग्नि, जब कोई सोम पीने के लिए मेहनत करता है, तो तुम उसके लिए खज़ाना और देवियों की ताकत ला देते हो। इसलिए हम तुम्हे अपने काम में रखते हैं। तुम हमेशा नए हो, बल से भरे हो। तुम भग जैसे हो जो बड़ा धन देता है।
Mantra 11
अस्मे रयिं न स्वर्थं दमूनसं भगं दक्षं न पपृचासि धर्णसिम् । रश्मीँरिव यो यमति जन्मनी उभे देवानां शंसमृत आ च सुक्रतुः ॥
तुम हम में धन मिलाते हो, जो सच्चा लाभ है और घर को संभालता है, भग की तरह। तुम दक्ष जैसी शक्ति भी मिलाते हो जो सब संभाल के रखता है। जैसे लगाम दोनों जन्मों को रोकती है, तुम अच्छी इच्छा से देवियों की प्रार्थना और सत्य को साथ लाते हो।
Mantra 12
उत नः सुद्योत्मा जीराश्वो होता मन्द्रः शृणवच्चन्द्ररथः । स नो नेषन्नेषतमैरमूरोऽग्निर्वामं सुवितं वस्यो अच्छ ॥
अग्नि, जो चमकता हुआ और तेज़ है, वो हमारी सुन ले। उसके पास चमकता रथ है। अग्नि हमें सही रास्ते ले चल, बिना किसी उलझन के। वो रास्ता अच्छा हो, जहाँ सुख मिले और हम आगे बढ़ जाएँ।
Mantra 13
अस्ताव्यग्निः शिमीवद्भिरर्कैः साम्राज्याय प्रतरं दधानः । अमी च ये मघवानो वयं च मिहं न सूरो अति निष्टतन्युः ॥
अग्नि को हमने ज़ोर से स्तुति की है, ताकि वो बड़ा राज पाए। जो लोग देता हैं और हम भी, हम सब आगे बढ़ जाएँ। जैसे सूरज धुंध के पार निकल जाता है, वैसे हम भी रुकावटों के पार चले जाएँ।
It praises Agni as the visible divine radiance that makes the sacrifice work, leads the worshipper’s intention along ṛta (right order), and opens safe passage through difficulties.
It is a poetic way of saying that the ordered, nourishing powers of truth—like life-giving streams—carry the seeker’s thought and prayer forward toward success.
It asks for clarity and freedom from obstacles: just as the Sun shines past fog, the worshipper prays to extend beyond hindrances through Agni’s guiding fire.
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
A free sign-in with Google or Apple keeps your chat saved across web and the app.