Rig Veda Sukta 142
Mandala 1Sukta 14213 Mantras

Sukta 142

Sukta 1.142

Rishi

Dīrghatamas Āucathya (traditional for this adjoining Agni hymn cluster; attribution may vary by tradition)

Devata

Agni

Chandas

Gāyatrī (probable for RV 1.142.1; verify by syllable count)

This hymn is primarily an Agni-invocation that opens the sacrifice: Agni is kindled and asked to bring the gods, to “stretch the ancient thread” of the rite, and to seat the divine powers on the barhis (sacrificial grass). As the liturgy unfolds, allied deities such as Night-and-Dawn are welcomed as guardians of Ṛta (cosmic order), and the hymn culminates in inviting the chief guests to partake of offerings made effective by svāhā.

Recitation with translationRig Veda 1.142

Mantras

Mantra 1

समिद्धो अग्न आ वह देवाँ अद्य यतस्रुचे । तन्तुं तनुष्व पूर्व्यं सुतसोमाय दाशुषे ॥

अग्नि, अभी जल उठो और देवियों को ले के आओ। तुम्हारा चम्मच सही तरीके से चल रहा है। सोम पीने के लिए तैयार है, जो देने वाला है उसके लिए पुराना धागा बिछा दो।

Mantra 2

घृतवन्तमुप मासि मधुमन्तं तनूनपात् । यज्ञं विप्रस्य मावतः शशमानस्य दाशुषः ॥

अग्नि को बुला रहे हैं कि वो पास आए। यह हवन में घी और मीठा डाला है। रिशि जो यह करता है, वो शांत हो के दान करता है। अग्नि उसकी यज्ञ को पक्का करे और आगे बढ़ा दे।

Mantra 3

शुचिः पावको अद्भुतो मध्वा यज्ञं मिमिक्षति । नराशंसस्त्रिरा दिवो देवो देवेषु यज्ञियः ॥

अग्नि बिल्कुल साफ है और सब को साफ करता है। वो यज्ञ में मीठापन मिला देता है। यह देवता आसमान से तीन रास्ते आता है। देवता लोग उसको अपना मान लेते हैं और यह बलि बन जाती है।

Mantra 4

ईळितो अग्न आ वहेन्द्रं चित्रमिह प्रियम् । इयं हि त्वा मतिर्ममाच्छा सुजिह्व वच्यते ॥

अग्नि, हम तुम्हे बुला रहे हैं। इंद्र को यहाँ लाओ। इंद्र चमकता है और सब को प्यारा लगता है। मेरा मन तुम्हे पुकार रहा है। सही बात निकले और जीत आए।

Mantra 5

स्तृणानासो यतस्रुचो बर्हिर्यज्ञे स्वध्वरे । वृञ्जे देवव्यचस्तममिन्द्राय शर्म सप्रथः ॥

हवन के लिए आसन बिछा रहे हैं और समिच सही पकड़ के रखा है। यह सब सही तरीके से चल रहा है। इंद्र के लिए शब्द बोल रहे हैं। वो शांति और सुरक्षा दे।

Mantra 6

वि श्रयन्तामृतावृधः प्रयै देवेभ्यो महीः । पावकासः पुरुस्पृहो द्वारो देवीरसश्चतः ॥

मंदिर के बड़े दरवाज़े खुल जाओ। यह साफ करते हैं और बहुत लोग उनको चाहते हैं। सत्य से मज़बूत हो के देवता के लिए रास्ता बनाओ। दरवाज़े पीछे नहीं रहो, आगे बढ़ के रास्ता छोड़ दो।

Mantra 7

आ भन्दमाने उपाके नक्तोषासा सुपेशसा । यह्वी ऋतस्य मातरा सीदतां बर्हिरा सुमत् ॥

रात और सवेरे की दुआ है कि वो साथ में आएँ। दोनों बहुत खूबसूरत हैं, चमकते हुए। यह दोनी सचाई की माँ जैसी हैं। इनकी दुआ है कि वो हमारे पास आके बैठ जाएँ। वो हमारे काम में सही और अच्छा भावना लाएँ।

Mantra 8

मन्द्रजिह्वा जुगुर्वणी होतारा दैव्या कवी । यज्ञं नो यक्षतामिमं सिध्रमद्य दिविस्पृशम् ॥

दो दिव्य शक्तियाँ हैं जो हमारे लिए यज्ञ करें। इनकी जीभ से अच्छे शब्द निकलते हैं, जो मन को खुश करते हैं। यह आज ही काम करें, आसमान तक पहुँचे। हमारा काम ऊपर उठके भगवान तक पहुँचे और उसका जवाब मिले।

Mantra 9

शुचिर्देवेष्वर्पिता होत्रा मरुत्सु भारती । इळा सरस्वती मही बर्हिः सीदन्तु यज्ञियाः ॥

भारती, इला और सरस्वती, यह तीन शक्तियाँ हैं। भारती मरुत देवता के साथ है। यह सब साफ हैं और देवता के पास बैठ जाएँ। यह हमारे अंदर सही बात, सही खाना और ज्ञान की नदी जैसी फ्लो लाएँ।

Mantra 10

तन्नस्तुरीपमद्भुतं पुरु वारं पुरु त्मना । त्वष्टा पोषाय वि ष्यतु राये नाभा नो अस्मयुः ॥

एक अद्भुत शक्ति हमारे लिए आए जो जल्दी मदद करे। यह बहुत तरह से हमारी रक्षा करे, बहुत बड़ी अपने आप में। त्वष्ट्र देवता इस्से फैला दे हमारे लिए। इस्से हमारे पास धन और समृद्धि आए, वो हमसे जुड़ा न हो।

Mantra 11

अवसृजन्नुप त्मना देवान्यक्षि वनस्पते । अग्निर्हव्या सुषूदति देवो देवेषु मेधिरः ॥

हे वनस्पति के स्वामी, तुम अपनी शक्ति से देवता के लिए समर्पित करो। अग्नि देवता जो सबसे ज्ञानी है, वो हमारी भोग सही तरह तैयार करता है। वो इस्से इतना अच्छा बनाता है कि देवता स्वीकार कर सकें।

Mantra 12

पूषण्वते मरुत्वते विश्वदेवाय वायवे । स्वाहा गायत्रवेपसे हव्यमिन्द्राय कर्तन ॥

हवन की आहुति ऊपर की तरफ भेजो। पूषन को भेजो जो खिलाता है, मरुत को भेजो जो हवा की ताकत है, सब देवताओं को भेजो, और वायु को भेजो जो साँस है। स्वाहा बोल के आहुति बनाओ इंद्र के लिए। इंद्र जो बिजली और ताकत वाला देवता है, गायत्री की शक्ति से यह ऑफरिंग उसके लिए बनाओ।

Mantra 13

स्वाहाकृतान्या गह्युप हव्यानि वीतये । इन्द्रा गहि श्रुधी हवं त्वां हवन्ते अध्वरे ॥

स्वाहा बोल के जो आहुतियाँ तैयार हुई हैं, उनके पास आओ। इन्हे ले और खुश हो जाओ। इंद्र, तुम आओ। पुकार सुनो, लोग यज्ञ में तुम्हे बुला रहे हैं। तुम वो शक्ति हो जो ऊपर की इच्छा पूरी करती है।

Frequently Asked Questions

It is an opening-invocation hymn: Agni is kindled and asked to bring the gods, establish the rite’s correct order, and help the offerings reach the divine powers.

Night and Dawn are praised as paired goddesses who embody the daily rhythm of Ṛta (cosmic order). Their presence symbolizes renewal, right timing, and harmony in the sacrifice.

It is a ritual metaphor: the sacrifice is like a woven work. Agni is asked to extend the traditional, time-tested sequence correctly so the yajña proceeds without break or error.

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