Opening the text

Book 3 operationalizes the Vijigīṣu’s internal sovereignty by converting social exchange into legally legible transactions. Chapter 16 treats ‘giving’ (dāna) and ‘sale by a non-owner’ (asvāmivikrayāḥ) as state-governed events, not private sentiments. The pragmatic objective is to secure clarity of title, prevent coercion disguised as charity, and keep markets liquid without rewarding theft. Kautilya places the Dharmastha as the king’s instrument for stabilizing property relations: he tests provenance (‘kutaste labdham’), orders restitution, and calibrates daṇḍa to the social danger of the transfer. By distinguishing valid gifts from harmful or coerced ‘gifts’ (bhaya/roṣa/darpa-dāna), the text blocks elite predation and extortion. By defining remedies for stolen/lost goods sold by non-owners, it protects owners while disciplining sellers and discouraging fencing. This judicial reliability enlarges Kośa via fines and, more importantly, sustains Janapada productivity by lowering transaction costs and preventing retaliatory violence.
Sutra 1
दत्तस्याप्रदानमृणादानेन व्याख्यातम् ॥ कZ_०३.१६.०१ ॥
किसी ने कहा मैं यह दे देता हूँ, फिर दे न दिया। यह वही बात है जैसे कोई कर्ज़ लिया और वापस नहीं किया। इसका हिसाब कर्ज़ के हिसाब से होगा।
Sutra 2
दत्तमव्यवहार्यमेकत्रानुशये वर्तेत ॥ कZ_०३.१६.०२ ॥
जब कोई गिफ्ट दे दिया, तो उस पर कोर्ट काम नहीं कर सकता। सिर्फ एक ही रास्ता है, अगर बात बिगड़ी तो उस हिसाब से सुलह करनी पड़ेगी।
Sutra 3
सर्वस्वं पुत्रदारमात्मानं वा प्रदायानुशयिनः प्रयच्छेत् ॥ कZ_०३.१६.०३ ॥
अगर कोई गिफ्ट वापस माँग रहा है, तो उसको पूरा गारंटी देना पड़ेगा। अपना सब कुछ, घर-बार, और अगर बात आगे बढ़ गई तो खुद को भी पक्का करके रखना पड़ेगा।
Sutra 4
धर्मदानमसाधुषु कर्मसु चाउपघातिकेषु वा अर्थदानमनुपकारिष्वपकारिषु वा कामदानमनर्हेषु च ॥ कZ_०३.१६.०४ ॥
धरम के नाम पर पैसा देना गलत काम के लिए, यह सही नहीं है। जो लोग मदद नहीं करते या नुकसान करते हैं, उन्हें पैसा देना भी गलत है। और जैसे लोग जो डिज़र्व नहीं करते, उन्हें खुशी के लिए गिफ्ट देना, वो भी ठीक नहीं है। इन सब में दान में कोई फायदा नहीं, बस नुकसान है।
Sutra 5
यथा च दाता प्रतिग्रहीता च नोपहतौ स्यातां तथानुशयं कुशलाः कल्पयेयुः ॥ कZ_०३.१६.०५ ॥
जब कोई दान वापस लेना हो या सेटल करना हो, तो स्मार्ट लोग ऐसा प्लान बनाते हैं कि न देने वाला का नुकसान हो न लेने वाला का। दोनों साइड से बात साफ होनी चाहिए।
Sutra 6
दण्डभयादाक्रोशभयादनर्थभयाद्वा भयदानं प्रतिगृह्णतः स्तेयदण्डः प्रयच्छतश्च ॥ कZ_०३.१६.०६ ॥
अगर कोई डर के मारे दान ले या दे, जैसे सज़ा के डर से, लोगों के चिल्लाने का डर से, या किसी नुकसान का डर से, तोह यह दान नहीं है। यह तोह चोरी जैसा है। दोनों को, जो दे रहा है और जो ले रहा है, चोरी की सज़ा मिलनी चाहिए।
Sutra 7
रोषदानं परहिंसायां राज्ञामुपरि दर्पदानं च ॥ कZ_०३.१६.०७ ॥
गुस्से में जब कोई दूसरों को हर्ट करने के लिए कुछ दे, वो भी गलत है। और अपनी घमंड में राजा के खिलाफ कुछ देना, वो भी ठीक नहीं है। इन दोनों हालत में दिया हुआ दान सही नहीं माना जाता।
Sutra 8
तत्रोत्तमो दण्डः ॥ कZ_०३.१६.०८ ॥
इस केस में सबसे बड़ा दंड लगेगा। जो सबसे ज़्यादा सज़ा है, वो देगा। कोई छोटा नहीं, पूरा वही जो मैक्सिमम है।
Sutra 9
प्रातिभाव्यं दण्डशुल्कशेषमाक्षिकं सौरिकं च नाकामः पुत्रो दायादो वा रिक्थहरो दद्यात् । इति दत्तस्यानपाकर्म ॥ कZ_०३.१६.०९ ॥
बेटा को, जिसका हक़ है, उसे ज़बरदस्ती पैसे नहीं देना चाहिए। अगर किसी ने गारंटी दी थी, या फाइन बाकी थी, या टैक्स पेंडिंग थी, यह सब उसे नहीं देना पड़ेगा। जो कुछ दिया गया है, वो वापस नहीं लिया जाता। यह एक सिंपल रूल है।
Sutra 10
अस्वामिविक्रयस्तु नष्टापहृतमासाद्य स्वामी धर्मस्थेन ग्राहयेत् ॥ कZ_०३.१६.१० ॥
अगर कोई ऐसी चीज़ बेच रहा है जो उसकी नहीं है, और वो चीज़ चोरी की हुई है या खो गई थी, असली मालिक को वो वापस मिलनी चाहिए। जज यह काम करेगा।
Sutra 11
देशकालातिपत्तौ वा स्वयं गृहीत्वोपहरेत् ॥ कZ_०३.१६.११ ॥
अगर टाइम और जगह की वजह से जज काम नहीं कर पा रहा, तो मालिक खुद उस चीज़ को पकड़ के ले सकता है। वेट करना पड़ेगा, लेकिन हक़ वापस लेने का भी तरीका है।
Sutra 12
धर्मस्थश्च स्वामिनमनुयुञ्जीत कुतस्ते लब्धमिति ॥ कZ_०३.१६.१२ ॥
जज उस आदमी से पूछेगा जिसके पास चीज़ है। बोलेगा, भाई, यह चीज़ तुम्हे कहाँ से मिली? किसने तुम्हे दी?
Sutra 13
स चेदाचारक्रमं दर्शयेत न विक्रेतारं तस्य द्रव्यस्यातिसर्गेण मुच्येत ॥ कZ_०३.१६.१३ ॥
अगर वो आदमी साफ़ कर देता है कि उसने सही तरीके से लिया है, तो उसे सिर्फ चीज़ वापस करके छोड़ नहीं देना। उसको पकड़ के रखना है। असली गुनहगार वो है जो बेच रहा था, उसको ढूंढना पड़ेगा।
Sutra 14
विक्रेता चेद्दृश्येत मूल्यं स्तेयदण्डं च दद्यात् ॥ कZ_०३.१६.१४ ॥
अगर बेचने वाला मिल जाए, तो उसको वापस पैसा देना पड़ेगा। उसके साथ चोरों वाला जुर्माना भी देना पड़ेगा।
Sutra 15
स चेदपसारमधिगच्छेदपसरेदापसारक्षयात् ॥ कZ_०३.१६.१५ ॥
अगर वो समझ जाए कि बेचने वाला भाग गया है, तो उसके पीछे लग जाओ। तब तक पीछे रहो जब तक टाइम खत्म न हो जाए।
Sutra 16
क्षये मूल्यं स्तेयदण्डं च दद्यात् ॥ कZ_०३.१६.१६ ॥
जब वो टाइम खत्म हो जाए, तो फिर भी पैसा देना पड़ेगा। उसके साथ चोरों वाला जुर्माना भी देना पड़ेगा।
Sutra 17
नाष्टिकश्च स्वकरणं कृत्वा नष्टप्रत्याहृतं लभेत ॥ कZ_०३.१६.१७ ॥
जो आदमी झूठ बोलके अपना प्रूफ बना ले। वो अपना खोया हुआ माल माँग के नहीं पा सकता।
Sutra 18
स्वकरणाभावे पञ्चबन्धो दण्डः ॥ कZ_०३.१६.१८ ॥
अगर आपके पास अपनी चीज़ का कोई प्रूफ नहीं है, तो आपको पाँच गुना जुर्माना देना पड़ेगा। यह रूल तब लगता है जब आप अपना हक़ प्रूव नहीं कर पाते।
Sutra 19
तच्च द्रव्यं राजधर्म्यं स्यात् ॥ कZ_०३.१६.१९ ॥
यह माल राजा के कानून के हिसाब से सरकार का हो जाएगा। राजा इसपे अपना हक जता सकता है।
Sutra 20
नष्टापहृतमनिवेद्योत्कर्षतः स्वामिनः पूर्वः साहसदण्डः ॥ कZ_०३.१६.२० ॥
अगर किसी का खोया या चुराया हुआ माल मिलता है, और तुम भी नहीं बताते, उससे बेच के पैसे कमा लेते हो। तो मालिक को पहले दर्जे का जुर्माना देना पड़ेगा।
Sutra 21
शुल्कस्थाने नष्टापहृतोत्पन्नं तिष्ठेत् ॥ कZ_०३.१६.२१ ॥
जो चीज़ खोई है, चुराई गई है, या वापस मिली है, वो सब सरकार की कस्टम ऑफिस में रखी जाएगी। वही इसकी जगह है।
Sutra 22
त्रिपक्षादूर्ध्वमनभिसारं राजा हरेत्स्वामी वा स्वकरणेन ॥ कZ_०३.१६.२२ ॥
तीन महीने बाद तक अगर कोई अपना माल लेने नहीं आता, तो राजा ले सकता है। अगर मालिक आता है और प्रूफ देता है कि उसका है, तो वापस ले सकता है।
Sutra 23
पञ्चपणिकं द्विपदरूपस्य निष्क्रयं दद्यात् चतुष्पणिकमेकखुरस्य द्विपणिकं गोमहिषस्य पादिकं क्षुद्रपशूनाम् ॥ कZ_०३.१६.२३ ॥
माल वापस लेने के लिए पैसे देने पड़ेंगे। आदमी के लिए पाँच पणा, घोड़े जैसा जानवर के लिए चार पणा, गाय या भैंस के लिए दो पणा, और छोटे जानवर के लिए एक पणा।
Sutra 24
रत्नसारफल्गुकुप्यानां पञ्चकं शतं दद्यात् ॥ कZ_०३.१६.२४ ॥
ज्वेल्स, सोने-चाँदी के माल, छोटे-मोटे कीमत वाली चीज़ें, या सस्ती चीज़ें, इन सब पर 5 रुपये पर 100 का टैक्स लगता है। यह 5% है।
Sutra 25
परचक्राटवीहृतं तु प्रत्यानीय राजा यथास्वं प्रयच्छेत् ॥ कZ_०३.१६.२५ ॥
अगर दुश्मन फ़ौज या जंगल के लोग किसी का माल ले गए, और बाद में वो माल वापस मिलता है, तो राजा उसे सही मालिक को वापस करे।
Sutra 26
चोरहृतमविद्यमानं स्वद्रव्येभ्यः प्रयच्छेत्प्रत्यानेतुमशक्तो वा ॥ कZ_०३.१६.२६ ॥
अगर चोर किसी का माल ले गए और वो माल नहीं मिलता, या फिर वापस लाना पॉसिबल नहीं है, तो राजा अपनी तरफ से उसका पैसा देना पड़ेगा।
Sutra 27
स्वयं ग्राहेणाहृतं प्रत्यानीय तन्निष्क्रयं वा प्रयच्छेत् ॥ कZ_०३.१६.२७ ॥
अगर सरकार के लोग किसी का माल पकड़ के रख लेते हैं, तो वो माल वापस करना पड़ेगा। या फिर उसकी कीमत देनी पड़ेगी।
Sutra 28
परविषयाद्वा विक्रमेणानीतं यथाप्रदिष्टं राज्ञा भुञ्जीत अन्यत्रार्यप्राणेभ्यो देवब्राह्मणतपस्विद्रव्येभ्यश्च । इत्यस्वामिविक्रयः ॥ कZ_०३.१६.२८ ॥
जो माल दूसरी जगह से ज़बरदस्ती लाया गया है, राजा कहता है कि उसे कैसे इस्तेमाल करना है। लेकिन आर्य की जान, मंदिर का माल, पंडित और साधु की चीज़ नहीं छेड़ी जा सकती। यह उसका रूल है जब माल किसी और का हो और बेचा जाए।
Sutra 29
स्वस्वामिसम्बन्धस्तु भोगानुवृत्तिरुच्छिन्नदेशानां यथास्वं द्रव्याणाम् ॥ कZ_०३.१६.२९ ॥
अगर कोई चीज़ तुम्हारी है और तुम उसे करते भी रहे, तो वो तुम्हारा माना जायेगा। लेकिन जहाँ रिकॉर्ड टूट गया हो या पता नहीं रहा, वहाँ जो उसका असली मालिक है, उसके हिसाब से फैसला होगा।
Sutra 30
यत्स्वं द्रव्यमन्यैर्भुज्यमानं दश वर्षाण्युपेक्षेत हीयेतास्य अन्यत्र बालवृद्धव्याधितव्यसनिप्रोषितदेशत्यागराज्यविभ्रमेभ्यः ॥ कZ_०३.१६.३० ॥
अगर तुम्हारी अपनी चीज़ दूसरे लोग उसे कर रहे हैं और तुमने दस साल तक कुछ नहीं कहा, तो तुम्हारा हक चला जायेगा। लेकिन अगर तुम बच्चे थे, या बूढ़े हो गए, या बीमार थे, या कोई मुसीबत थी, या बाहर गए हुए थे, या गाँव छोड़ के चले गए थे, या राज्य में गड़बड़ थी, तो माफ किया जायेगा।
Sutra 31
विंशतिवर्षोपेक्षितमनवसितं वास्तु नानुयुञ्जीत ॥ कZ_०३.१६.३१ ॥
कोई खाली ज़मीन है जो बीस साल से पड़ी है, उसका केस नहीं चलेगा। उसपे हक जमाने की कोशिश मत करो।
Sutra 32
ज्ञातयः श्रोत्रियाः पाषण्डा वा राज्ञामसंनिधौ परवास्तुषु विवसन्तो न भोगेन हरेयुः उपनिधिमाधिं निधिं निक्षेपं स्त्रियं सीमानं राजश्रोत्रियद्रव्याणि च ॥ कZ_०३.१६.३२ ॥
जब राजा नहीं होता, तब रिश्तेदार, पंडित या धरम के लोग दूसरों की ज़मीन पर रह के मालिक नहीं बन जाते। वो लोग किसी की अमानत, गिरवी, खज़ाना, औरत, बाउंड्री, या राजा और पंडित के माल पे हक नहीं जमा सकते।
Sutra 33
आश्रमिणः पाषण्डा वा महत्यवकाशे परस्परमबाधमाना वसेयुः ॥ कZ_०३.१६.३३ ॥
साधु और धरम के लोग बड़े खुले जगह पे रहते हैं। एक दूसरे को तंग नहीं करते।
Sutra 34
अल्पां बाधां सहेरन् ॥ कZ_०३.१६.३४ ॥
छोटी-मोटी तकलीफ सहनी चाहिए। जैसे कोई रास्ता रोके, या थोड़ा वक़्त लग जाए, यह सब नॉर्मल है।
Sutra 35
पूर्वागतो वा वासपर्यायं दद्यात् ॥ कZ_०३.१६.३५ ॥
अगर कोई पहले आ गया है, तो उसको भी चांस देना चाहिए। बारी-बारी से रहना चाहिए, जगह बाँट के।
Sutra 36
अप्रदाता निरस्येत ॥ कZ_०३.१६.३६ ॥
जो बाँटने को तैयार नहीं है, उसको हटा देना चाहिए। वहाँ से निकाल दो बस।
Sutra 37
वानप्रस्थयतिब्रह्मचारिणामाचार्यशिष्यधर्मभ्रातृसमानतीर्थ्या रिक्थभाजः क्रमेण ॥ कZ_०३.१६.३७ ॥
जब कोई साधु या ब्रह्मचारी मर जाता है, उसकी प्रॉपर्टी का पहले हक़ गुरु का होता है। उसके बाद शिष्य का, फिर धरम भाई का, और आखिर में अपने ही संप्रदाय के लोगों का।
Sutra 38
विवादपदेषु चैषां यावन्तः पणा दण्डास्तावती रात्रीः क्षपणाभिषेकाग्निकार्यमहाकच्छवर्धनानि राज्ञश्चरेयुः ॥ कZ_०३.१६.३८ ॥
जब किसी केस में जुर्माना होता है, जितने पैसे का जुर्माना है, उतने दिन राजा इनके लिए जो नियम बताता है वोह फॉलो करने पड़ते हैं। यह खास तरह के व्रत और नियम होते हैं।
Sutra 39
अहिरण्यसुवर्णाः पाषढाः साधवः ॥ कZ_०३.१६.३९ ॥
यह लोग अलग-अलग तरह के संन्यासी हैं। कुछ को पाशंद कहते हैं। कुछ सोने-धन को छोड़ के भाग गए हैं। और कुछ साधु हैं जो भगवान के नाम पे घूमते हैं।
Sutra 40
ते यथास्वमुपवासव्रतैराराधयेयुः अन्यत्र पारुष्यस्तेयसाहससंग्रहणेभ्यः ॥ कZ_०३.१६.४० ॥
अगर इनमे कोई गलती हो जाए, तो अपना व्रत और उपवास से सुधार करना पड़ेगा। लेकिन अगर किसी पे हाथ उठाया, चोरी की, जबरदस्ती की, या ज्यादा सामान जमा किया, तो अलग सज़ा होगी।
Sutra 41
तेषु यथोक्ता दण्डाः कार्याः ॥ कZ_०३.१६.४१ ॥
इन सब पर जो सज़ा लिखी है, वो लगानी पड़ेगी। राजा के यहाँ जो नियम है, वही चलेगा।
Sutra 42
धर्मो ह्यधर्मोपहतः शास्तारं हन्त्युपेक्षितः ॥ कZ_०३.१६.४२च्द् ॥
राजा को देखना है कि संन्यासी लोग गलत काम ना करें। अगर कोई गलत हरकत करे, तो सज़ा देनी पड़ेगी।
Secure title and predictable remedies reduce private retaliation and market fear; lawful gifting and disciplined sales practices increase commercial confidence, protect households from coercive extraction, and stabilize revenue through orderly fines rather than disorderly violence.
Coerced ‘fear-gifts’ trigger steya-daṇḍa for both receiver and giver; ‘anger-gifts’ aimed at harming others and ‘arrogance-gifts’ against kings attract the highest penalty (uttama-daṇḍa). In non-owner sales, if the seller is found, he pays the price (mūlya) and steya-daṇḍa; the judge interrogates provenance and orders restitution/return under due process.
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