Rig Veda Sukta 98
Mandala 9Sukta 9812 Mantras

Sukta 98

Sukta 9.98

Devata

Soma Pavamāna (Indu)

यह पवमान सोम सूक्त इन्दु का स्तवन करता है, जब वह जलों और ऊनी छन्नों से शुद्ध होकर गायक-यजमानों की ओर बहने के लिए प्रार्थित होता है—प्रचुर धन, बल और विजय प्रदान करने हेतु। सोम की परिशोधित धारा ऊपर उठती है; उसे समस्त देवों के साथ आनन्दपूर्ण सामंजस्य में गतिमान बताया गया है, जो यज्ञकर्ताओं को सामर्थ्य देता और समृद्धि के ‘गृह’ को खोल देता है। सूक्त का समापन ऋषियों और साथियों की संयुक्त अभिलाषा में होता है कि वे सोम के दीप्तिमान नेतृत्व को प्राप्त करें और स्थायी शक्ति तथा समृद्धि को सुरक्षित करें।

Sanskrit recitationRig Veda 9.98

Mantras

Mantra 1

अभि नो वाजसातमं रयिमर्ष पुरुस्पृहम् । इन्दो सहस्रभर्णसं तुविद्युम्नं विभ्वासहम् ॥

हे इन्दो! हमारे पास वाज-सातम—बल-विजय का परम—रयि प्रवाहित कर; बहु-आकांक्षित धन को हमारी ओर बहा। सहस्र-भरणस—हजारों को धारण करने वाली—समृद्धि, बहु-द्युम्न—विस्तीर्ण तेज—और विभ्वा-सह—सब प्रतिरोधों को जीतने वाली—शक्ति हमें दे।

Mantra 2

परि ष्य सुवानो अव्ययं रथे न वर्माव्यत । इन्दुरभि द्रुणा हितो हियानो धाराभिरक्षाः ॥

निचोड़े जाने पर वह ऊन के आवरण को रथ पर चढ़े कवच की भाँति अपने चारों ओर लपेट लेता है। इन्दु, लकड़ी के द्रोणों पर स्थापित होकर, वेग से बढ़ता है और अपनी धाराओं में बह निकलता है।

Mantra 3

परि ष्य सुवानो अक्षा इन्दुरव्ये मदच्युतः । धारा य ऊर्ध्वो अध्वरे भ्राजा नैति गव्ययुः ॥

निचोड़ा गया इन्दु ऊन के भीतर से बहता है; उसका मद (आनन्द-रस) कहीं च्युत नहीं होता। जो धारा यज्ञ में ऊपर उठती है, वह दीप्तिमान होकर चलती है—गव्ययु, प्रकाश-गवों की खोज में।

Mantra 4

स हि त्वं देव शश्वते वसु मर्ताय दाशुषे । इन्दो सहस्रिणं रयिं शतात्मानं विवाससि ॥

क्योंकि तू ही, हे देव इन्दु, सदा अर्पण करने वाले मर्त्य को वसु प्रदान करता है। हे इन्दो, तू उसे सहस्रगुण रयि, शतात्मा-सम्पन्न धन देता है—और उसे विस्तार व कल्याण में वास कराता है।

Mantra 5

वयं ते अस्य वृत्रहन्वसो वस्वः पुरुस्पृहः । नि नेदिष्ठतमा इषः स्याम सुम्नस्याध्रिगो ॥

हे वसु, हे वृत्रहन्! हम तुम्हारे असंख्य वसुओं के अभिलाषी हैं; प्रेरणा की धाराओं के निकटतम हमें स्थान मिले। अध्रिगो—अडिग धारण वाले—हम तुम्हारे सुम्न (अनुग्रह) के धारक हों।

Mantra 6

द्विर्यं पञ्च स्वयशसं स्वसारो अद्रिसंहतम् । प्रियमिन्द्रस्य काम्यं प्रस्नापयन्त्यूर्मिणम् ॥

दो बार पाँच—दस—बहिनी-शक्तियाँ उसे स्नान कराती हैं: स्वयशस्वी को, जो अद्रि (पत्थरों) से निचोड़ा गया है। इन्द्र का प्रिय, इन्द्र का काम्य—उसके ऊर्मि (उमड़ते तरंग) को वे शुद्ध करतीं, उसे तरंगित करती हैं।

Mantra 7

परि त्यं हर्यतं हरिं बभ्रुं पुनन्ति वारेण । यो देवान्विश्वाँ इत्परि मदेन सह गच्छति ॥

उस प्रिय हरित-हरि सोम को—स्वर्ण-भूरा बभ्रु को—वे शुद्ध जल से चारों ओर से परिशुद्ध करते हैं। जो अपने मद (आनन्द-उन्माद) से समस्त देवों को परि-व्याप्त कर, उनके साथ एकत्व में गमन करता है।

Mantra 8

अस्य वो ह्यवसा पान्तो दक्षसाधनम् । यः सूरिषु श्रवो बृहद्दधे स्वर्ण हर्यतः ॥

क्योंकि उसके ही अवस (सहायता/रक्षा) से वह निश्चय ही तुम्हारा रक्षक है, दक्ष (कुशल) शक्ति को साधने वाला। वह प्रिय, दीप्तिमान (स्वर्ण-हरित) देव ऋषियों के बीच विशाल यश/श्रवस् स्थापित करता है—मानो सूर्य-दीप्त स्वर्ग का प्रकाश।

Mantra 9

स वां यज्ञेषु मानवी इन्दुर्जनिष्ट रोदसी । देवो देवी गिरिष्ठा अस्रेधन्तं तुविष्वणि ॥

हे द्यावा-पृथिवी! मनुष्यों के यज्ञों में वह इन्दु तुम्हारे लिए उत्पन्न होता है—देव-शक्तियों के लिए देव; गिरि-स्थित, अस्रेद्ध (अक्लान्त/अविचल), और महाध्वनि से गर्जने वाला।

Mantra 10

इन्द्राय सोम पातवे वृत्रघ्ने परि षिच्यसे । नरे च दक्षिणावते देवाय सदनासदे ॥

इन्द्र के लिए, हे सोम, पान हेतु—वृत्रघ्न इन्द्र के लिए—तू चारों ओर से परि-षिच्यसे (उंडेला/अभिषिक्त होता) है। और उस नर (वीर) तथा दक्षिणावान (दक्षिणा-धारी) देव के लिए, उस देव के लिए जो सदनों में आसीन है।

Mantra 11

ते प्रत्नासो व्युष्टिषु सोमाः पवित्रे अक्षरन् । अपप्रोथन्तः सनुतर्हुरश्चितः प्रातस्ताँ अप्रचेतसः ॥

वे प्राचीन सोम, रात्रियों के उषाकाल-उद्भास में, पवित्र (पवित्र) से होकर प्रवाहित हुए। शत्रु-भाव को दूर धकेलते हुए, वे उसे ऊपर से नीचे गिरा देते हैं—प्रातःकाल—वे गतियाँ जो सम्यक् चेतना से रहित हैं।

Mantra 12

तं सखायः पुरोरुचं यूयं वयं च सूरयः । अश्याम वाजगन्ध्यं सनेम वाजपस्त्यम् ॥

हे सखाओ, वह पुरोरुच—अग्र-दीप्तिमान—तुम और हम, ये सूर्य (सूऱयः), उसे प्राप्त करें। हम वाज-गन्ध्य—बल-समृद्धि की सुगन्ध—को पाएं; हम वाज-पस्त्य—उस समृद्धि के गृह और आधार—को जीतें।

Frequently Asked Questions

The deity is Soma Pavamāna (Indu)—Soma as the purified, flowing juice during the ritual filtering process.

As Soma is purified, he is asked to flow toward the worshippers with abundant wealth, victorious strength, and radiant power that removes obstacles and supports the gods.

Because the hymn is meant for the Soma-pressing rite: the poetry mirrors Soma’s real movement through water and filters, and also symbolizes inner purification leading to clarity and power.

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