Rig Veda Sukta 89
Mandala 9Sukta 897 Mantras

Sukta 89

Sukta 9.89

Devata

Soma Pavamāna

यह संक्षिप्त पवमान सूक्त सोम की स्तुति करता है जब वह शुद्ध किया जाता है—स्वर्ग से वर्षा की धारा-सा बहता हुआ, ‘माता की गोद’ (छन्नी/अधिष्ठान) में ठहरता हुआ, और उपासकों में बल तथा मधुरता बनकर प्रवेश करता हुआ। सोम की कल्पना मधु-पीठ वाले शक्तिशाली अश्व के रूप में है, जो चौड़े पहियों वाले रथ में जुता है; ‘बहनों’ (जलधाराओं) द्वारा परिशुद्ध किया जाता है और देवताओं की ओर हाँका जाता है। सूक्त का समापन प्रत्यक्ष प्रार्थना में होता है: इन्द्र के लिए शुद्ध हुआ सोम हमें तेजस्वी धन और सुंदर वीर-शक्ति प्रदान करे, जो बाधाओं को परास्त करे।

Sanskrit recitationRig Veda 9.89

Mantras

Mantra 1

प्रो स्य वह्निः पथ्याभिरस्यान्दिवो न वृष्टिः पवमानो अक्षाः । सहस्रधारो असदन्न्यस्मे मातुरुपस्थे वन आ च सोमः ॥

वह्नि (अग्नि-वाहक) वह पवमान सोम धर्मयुक्त पथों से आगे बढ़ता है; जैसे द्युलोक से वर्षा, वैसे ही वह शुद्ध करने वाला धाराओं में प्रवाहित होता है। सहस्र-धारा सोम हमारे भीतर आकर स्थित होता है—माता के उपस्थ में, वन-वनस्पति में—और हमारे अस्तित्व-क्षेत्र में प्रवेश करता है।

Mantra 2

राजा सिन्धूनामवसिष्ट वास ऋतस्य नावमारुहद्रजिष्ठाम् । अप्सु द्रप्सो वावृधे श्येनजूतो दुह ईं पिता दुह ईं पितुर्जाम् ॥

हे वसिष्ठ! नदियों का राजा उसने अपना वसन धारण किया है; वह ऋत की अति-शीघ्र नौका पर आरूढ़ हुआ है। अप्सु (जल में) वह बूँद बढ़ी है—श्येन-प्रेरित; पिता उसे दुहता है, और वह पिता की जाति/संबंधता को दुहकर प्रकट करता है।

Mantra 3

सिंहं नसन्त मध्वो अयासं हरिमरुषं दिवो अस्य पतिम् । शूरो युत्सु प्रथमः पृच्छते गा अस्य चक्षसा परि पात्युक्षा ॥

वे उसे सिंह की भाँति समीप आते हैं—मधु-आनन्द से अयासरहित; हरित-स्वर्ण, अरुण, इस द्युलोक का स्वामी। वह शूर, युद्धों में प्रथम, गौओं (रश्मियों) को खोजता है; अपनी दृष्टि से वह उक्षा (वृषभ-शक्ति) चारों ओर विचरता है।

Mantra 4

मधुपृष्ठं घोरमयासमश्वं रथे युञ्जन्त्युरुचक्र ऋष्वम् । स्वसार ईं जामयो मर्जयन्ति सनाभयो वाजिनमूर्जयन्ति ॥

मधु-पृष्ठ, घोर, अयास (अथक) अश्व को वे उरु-चक्र (विस्तृत पहियों) वाले रथ में, ऊँचे वेग से चलने वाला, जोतते हैं। उसकी स्वसाएँ और जामयः (निकट-स्वजन) उसे मर्जित/शुद्ध करते हैं; सना-भयः (एक ही नाभि/एक ही मूल वाले) वाजिन् (वेगवान) को ऊर्जस्वी करते हैं।

Mantra 5

चतस्र ईं घृतदुहः सचन्ते समाने अन्तर्धरुणे निषत्ताः । ता ईमर्षन्ति नमसा पुनानास्ता ईं विश्वतः परि षन्ति पूर्वीः ॥

चार घृत-दुहः (घी-दोहन करने वाली) शक्तियाँ उसके साथ लगती हैं, एक ही अन्तर्धरुण (आन्तरिक आधार) में साथ बैठी हुई। वे नमसा (श्रद्धा-नमस्कार) से उसे पुना॒न (शुद्ध करते हुए) प्रवाहित करती हैं; वे प्राचीनाएँ उसे विश्वतः (सब ओर से) परि षन्ति—घेर लेती हैं।

Mantra 6

विष्टम्भो दिवो धरुणः पृथिव्या विश्वा उत क्षितयो हस्ते अस्य । असत्त उत्सो गृणते नियुत्वान्मध्वो अंशुः पवत इन्द्रियाय ॥

वह दिवः का विष्टम्भ (स्तम्भ/आधार) है, पृथिव्या का धरुण (धारण-आधार) है; समस्त क्षितयः (स्थिर लोक/निवास) उसके हस्त में हैं। गृणते (स्तुति करने वाले) के लिए तेरा उत्सः (स्रोत) स्थापित है, नियुत्वान् (बलों से युक्त/जुता हुआ); मध्वः अंशुः (मधुर किरण/रस-धारा) इन्द्रियाय—इन्द्र की शक्ति के लिए—पवत (प्रवाहित होता) है, विजयकारी प्रभुत्व की ओर।

Mantra 7

वन्वन्नवातो अभि देववीतिमिन्द्राय सोम वृत्रहा पवस्व । शग्धि महः पुरुश्चन्द्रस्य रायः सुवीर्यस्य पतयः स्याम ॥

विजय करते हुए, वायु-प्रेरित होकर, देव-प्राप्ति (देववीति) की ओर बढ़ो; हे सोम, वृत्रहन्, इन्द्र के लिए अपने को पवित्र करो। हमें महान, बहु-दीप्तिमान धन-समृद्धि प्रदान करो; हम सुन्दर पराक्रम (सुवीर्य) के स्वामी हों।

Frequently Asked Questions

The hymn praises Soma as Pavamāna—Soma while being purified through the filter—then offered especially for Indra’s strength and victory.

It describes Soma’s abundant, many-channel flow during purification and symbolically suggests overflowing vitality and inspiration spreading in many currents.

Soma is poetically imagined as a powerful horse yoked to a chariot, while the “sisters” are the cleansing waters that wash and strengthen him during the filtering process.

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