
Sukta 9.50
Soma Pavamāna
यह संक्षिप्त पवमान स्तुति सोम का गुणगान करती है—जब वह निचोड़े जाने और ऊनी छननी से छानकर शुद्ध किए जाने पर नदी की लहर-सा वेग और नाद के साथ उमड़ पड़ता है। इसमें सोम के मधुर, उल्लासकारी रस का वर्णन है और यह भी कि वह इन्द्र के पान हेतु तत्पर होकर विजयी पराक्रम और प्रेरित वाणी को बल देता है।
Mantra 1
उत्ते शुष्मास ईरते सिन्धोरूर्मेरिव स्वनः । वाणस्य चोदया पविम् ॥
तेरे शुष्म—प्रबल बल—ऊपर उठते हैं; नदी की लहर-गर्जना के समान तेरा स्वन है। वाणी के प्रेरक पविम्—मार्ग-छेदक धार—को आगे बढ़ा।
Mantra 2
प्रसवे त उदीरते तिस्रो वाचो मखस्युवः । यदव्य एषि सानवि ॥
तेरी प्रेरणा से यज्ञ-इच्छुक तीन प्रकार की वाणियाँ उठती हैं, जब तू अवि-ऊन—पवित्र के शिखर—पर चलता है।
Mantra 3
अव्यो वारे परि प्रियं हरिं हिन्वन्त्यद्रिभिः । पवमानं मधुश्चुतम् ॥
अवि-ऊन के वारे में, प्रिय हरि (ताम्रवर्ण) के चारों ओर, वे उसे अद्रि (दबाने के पत्थरों) से आगे बढ़ाते हैं—स्वयं को पवमान करता सोम, मधुर रस टपकाता हुआ।
Mantra 4
आ पवस्व मदिन्तम पवित्रं धारया कवे । अर्कस्य योनिमासदम् ॥
हे अत्यन्त मदकारक, पवित्र से धाराप्रवाह होकर पवस्व और आ; हे कवि, अर्च (स्तुति-गीत) की योनि—उस मूल आसन—में विराज।
Mantra 5
स पवस्व मदिन्तम गोभिरञ्जानो अक्तुभिः । इन्दविन्द्राय पीतये ॥
हे अत्यन्त मद-प्रद पवमान सोम! गो-रश्मियों से अभिषिक्त, दीप्त कणों सहित तू अपने को पवित्र कर। हे इन्दु! इन्द्र के पान हेतु बन—विजयी संकल्प को बल देने वाला।
It praises Soma while he is being pressed and purified (Pavamāna), describing his powerful sound and sweet flow, and preparing him as a drink for Indra.
These are key tools in the Soma ritual: stones press out the juice, and the woolen strainer filters it, symbolizing purification and clarification of power.
Beyond the ritual, it suggests that raw energy and desire can be refined into clear strength, delight, and inspired speech that support right action and inner growth.
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