
Sukta 9.102
Traditional Soma Pavamāna seer-line (exact attribution varies by hymn index; commonly Bhṛgu/Angiras-related for Book 9 sequences)
Soma Pavamāna
Jagatī (probable for opening of RV 9.102)
यह सोम पवमान सूक्त शुद्ध किए गए सोम की स्तुति करता है, जो बढ़ती हुई, दीप्तिमान शक्ति बनकर ‘ऋत की प्रकाशमान धारा/विचार’ को प्रेरित करता है और यज्ञ को आगे बढ़ाता है। सोम को प्रिय और सर्वव्यापी रूप में चित्रित किया गया है, जो देवताओं को एक ही नियम (व्रत) के अधीन समरस करता है और ‘स्वर्ग के बाड़े/गोठ’ को खोलकर प्रकाश और व्यवस्था को यज्ञ तथा जगत में प्रवाहित कर देता है।
Mantra 1
क्राणा शिशुर्महीनां हिन्वन्नृतस्य दीधितिम् । विश्वा परि प्रिया भुवदध द्विता ॥
वृद्धि पाता हुआ, महानों का शिशु ऋत की दीप्ति/दीधिति को प्रेरित करता है। सबको परि-व्याप्त कर वह प्रिय बनता है; फिर-फिर (द्विता) वह अस्तित्व में ऋत के आनन्द को स्थापित करता है।
Mantra 2
उप त्रितस्य पाष्योरभक्त यद्गुहा पदम् । यज्ञस्य सप्त धामभिरध प्रियम् ॥
त्रित के दोनों पार्श्वों के निकट उसने अपना स्थान ग्रहण किया—वहीं, जहाँ गुहा में छिपा हुआ गुप्त पद है। तब यज्ञ के सात धामों/शक्तियों के द्वारा वह कर्म के भीतर प्रिय (आनन्द) बन जाता है।
Mantra 3
त्रीणि त्रितस्य धारया पृष्ठेष्वेरया रयिम् । मिमीते अस्य योजना वि सुक्रतुः ॥
अपनी धारा से वह त्रित के उच्च पृष्ठों पर—त्रिविध—रयि (समृद्धि) को प्रवाहित/प्रेरित करता है। सुक्रतु (दीप्त संकल्प वाला) उसके योजनों—संयोगों और विस्तारों—को विधिपूर्वक नापता-ठहराता है।
Mantra 4
जज्ञानं सप्त मातरो वेधामशासत श्रिये । अयं ध्रुवो रयीणां चिकेत यत् ॥
जब वह जन्मा, तब सात माताओं ने वेधा (ज्ञाता) को श्री (तेज/समृद्धि) के लिए कार्य में नियुक्त किया। यह वही है जो, जब वह उस सत्य को जान लेता है, तब रयियों (धनों) का ध्रुव आधार बन जाता है।
Mantra 5
अस्य व्रते सजोषसो विश्वे देवासो अद्रुहः । स्पार्हा भवन्ति रन्तयो जुषन्त यत् ॥
उसके व्रत (नियमित कर्म-धर्म) में सब देव एकमत हो जाते हैं, अद्रुह—अहिंसक, वैर-रहित। स्पृहणीय आनन्द-रस परिपूर्ण होते हैं; और जब वह ऋत (सही व्यवस्था) स्थापित होता है, तब वे उसे स्वीकार करते हैं।
Mantra 6
यमी गर्भमृतावृधो दृशे चारुमजीजनन् । कविं मंहिष्ठमध्वरे पुरुस्पृहम् ॥
ऋत-वर्धक (सत्य के पोषक) जनों ने उसे गर्भयुक्त शक्ति-रूप में जन्म दिया—दर्शन में रमणीय। वह कवि है, अध्वर (यज्ञ) में सर्वाधिक दानी, और बहुजनों द्वारा अभिलषित।
Mantra 7
समीचीने अभि त्मना यह्वी ऋतस्य मातरा । तन्वाना यज्ञमानुषग्यदञ्जते ॥
ऋत की दो महती माताएँ, आमने-सामने, अपने ही स्वबल से चलती हैं। मनुष्य-क्रम में यज्ञ को विस्तार देती हुई, वे उसे उस (दैवी कर्म) के लिए अभिषिक्त/सज्जित करती हैं।
Mantra 8
क्रत्वा शुक्रेभिरक्षभिॠणोरप व्रजं दिवः । हिन्वन्नृतस्य दीधितिं प्राध्वरे ॥
क्रतु (संकल्प-शक्ति) से, उज्ज्वल ‘अक्षों’ (नेत्रों/किरणों) के साथ वह दिव्य व्रज (गो-आवास/बाड़ा) को खोल देता है। ऋत (सत्य-नियम) की दीधिति (प्रकाशमयी प्रेरणा) को आगे हाँकता हुआ, अध्वर (यज्ञ) में उसे प्रवर्तित करता है।
The deity is Soma Pavamāna—Soma as he is being purified and flowing through the filter during the soma ritual.
It means Soma energizes truth-aligned inspiration (ṛta) so that clear insight and right order become active in the mind and in the sacrifice.
It is a symbolic image for a heavenly enclosure holding light, abundance, or divine powers; Soma ‘opens’ it by his luminous force, releasing that wealth into the rite and the world.
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