
Sukta 8.98
Unknown/uncertain (Anukramaṇī attribution not provided in input)
Indra
Likely Anuṣṭubh or a short meter (verse is compact; confirm by scan)
यह संक्षिप्त इन्द्र-स्तोत्र विशालदर्शी इन्द्र के लिए साम-गान करने का आह्वान है। इन्द्र की स्तुति धर्म के स्थापक और विजयदायी बल के दाता के रूप में की गई है। कवि अपनी महान अभिलाषाओं को उफनते जल-प्रवाहों की भाँति उसकी ओर ‘प्रवाहित’ करते हैं और अंत में सुवीर्य—धर्मानुकूल कर्म के लिए श्रेष्ठ, प्रभावी वीरता और शक्ति—की याचना करते हैं।
Mantra 1
इन्द्राय साम गायत विप्राय बृहते बृहत् । धर्मकृते विपश्चिते पनस्यवे ॥
इन्द्र के लिए साम गाओ—विप्र के लिए, बृहद् के लिए, उस महत्तर के लिए; जो धर्म (धारणा-नियम) को स्थापित करता है, जो विपश्चित् है, और जो पनस्य—खोजने व स्नेह से पूजने योग्य—है।
Mantra 2
त्वमिन्द्राभिभूरसि त्वं सूर्यमरोचयः । विश्वकर्मा विश्वदेवो महाँ असि ॥
हे इन्द्र, तुम अभिभू—विजयी—हो; तुमने सूर्य को प्रकाशित किया। तुम विश्वकर्मा हो, विश्वदेव हो; और हमारे भीतर महाँ—महान—हो।
Mantra 3
विभ्राजञ्ज्योतिषा स्वरगच्छो रोचनं दिवः । देवास्त इन्द्र सख्याय येमिरे ॥
अपने तेजस्वी ज्योति से दीप्त होकर तुम स्वर्ग के रोचन लोक को जा पहुँचे। हे इन्द्र, देवगण सख्य-भाव में तुमसे बँध गए हैं।
Mantra 4
एन्द्र नो गधि प्रियः सत्राजिदगोह्यः । गिरिर्न विश्वतस्पृथुः पतिर्दिवः ॥
हे इन्द्र, हमारे पास आओ; प्रिय बनकर हमारे साथ रहो—सर्व संग्रामों के विजेता, अगोचर न होने वाले। सर्व दिशाओं में विस्तृत पर्वत की भाँति, स्वर्ग के अधिपति होकर हमें धारण और आश्रय दो।
Mantra 5
अभि हि सत्य सोमपा उभे बभूथ रोदसी । इन्द्रासि सुन्वतो वृधः पतिर्दिवः ॥
हे सत्य सोमपा, तुमने निश्चय ही दोनों रोदसी—द्यावा और पृथिवी—पर प्रभुत्व प्राप्त किया है। हे इन्द्र, सोम पेरने वाले का तुम वर्धक हो; प्रकाशमय ऊँचाइयों के अधिपति हो।
Mantra 6
त्वं हि शश्वतीनामिन्द्र दर्ता पुरामसि । हन्ता दस्योर्मनोर्वृधः पतिर्दिवः ॥
हे इन्द्र! तू ही शाश्वत दुर्गों का विदारक है; तू दस्युओं का हन्ता, मनु की वृद्धि करने वाला, और दिव्य लोकों का स्वामी है।
Mantra 7
अधा हीन्द्र गिर्वण उप त्वा कामान्महः ससृज्महे । उदेव यन्त उदभिः ॥
अतः हे गिरिवण (स्तुति-प्रिय) इन्द्र! हम महत् कामनाओं को तेरी ओर प्रवृत्त करते हैं—उर्ध्वगामी होकर, मानो उफनते जल-प्रवाहों के साथ ऊपर उठती हुई।
Mantra 8
वार्ण त्वा यव्याभिर्वर्धन्ति शूर ब्रह्माणि । वावृध्वांसं चिदद्रिवो दिवेदिवे ॥
हे शूर! नव्य-यौवनयुक्त शक्तियों से ब्रह्म (मन्त्र) तुझे बढ़ाते हैं; हे अद्रिवो (वज्र-धारी)! जो सदा वर्धमान है, तुझे दिव्य लोक में दिन-प्रतिदिन और भी बढ़ाते हैं।
Mantra 9
युञ्जन्ति हरी इषिरस्य गाथयोरौ रथ उरुयुगे । इन्द्रवाहा वचोयुजा ॥
वेगवान् (इषिर) के लिए, दोनों गाथाओं के लिए, विस्तृत जुए वाले विशाल रथ पर वे दोनों हरि (ताम्रवर्ण अश्व) जोतते हैं—वे इन्द्र-वाहक, वाणी से युक्त (वचोयुज) हैं।
Mantra 10
त्वं न इन्द्रा भरँ ओजो नृम्णं शतक्रतो विचर्षणे । आ वीरं पृतनाषहम् ॥
हे इन्द्र, हमारे लिए बल और नर-तेज का वैभव ले आओ, हे शतक्रतु, हे मनुष्यों में द्रष्टा; युद्धों को जीतने वाला वीर हमारे पास लाओ।
Mantra 11
त्वं हि नः पिता वसो त्वं माता शतक्रतो बभूविथ । अधा ते सुम्नमीमहे ॥
क्योंकि, हे वसु, हे शतक्रतु, तुम ही हमारे लिए पिता बने हो, तुम ही माता; इसलिए हम तुम्हारे सुम्न—अनुग्रह और कल्याण—की याचना करते हैं।
Mantra 12
त्वां शुष्मिन्पुरुहूत वाजयन्तमुप ब्रुवे शतक्रतो । स नो रास्व सुवीर्यम् ॥
हे शुष्मिन्, हे पुरुहूत, हे शतक्रतो! बल-समृद्धि को बढ़ाने वाले तुम्हें मैं वाणी से समीप बुलाता/स्तुति करता हूँ। हमें सु-वीर्य (उत्तम वीरता) प्रदान करो।
It calls the singers to praise Indra with Sāman-like song, recognize him as the establisher of right order, and ask him for strength, victory, and noble heroism (suvīrya).
The image suggests that sincere desires and prayers should surge upward with force and clarity, moving toward Indra who releases and directs vital energies—like waters set free to flow.
Suvīrya is ‘good heroism’—effective courage, strength, and capacity to act rightly and win obstacles, both outwardly (success, protection) and inwardly (resolve and mastery).
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