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Sukta 8.88
Indra
यह संक्षिप्त इन्द्र-सूक्त सोम-आनन्दित, अद्भुत कर्म करने वाले वीर की स्तुति करता है, जो अपनी इच्छा, बल और प्रभावी कर्मों से समस्त जन्मे हुए प्राणियों से बढ़कर है। कवि (गौतम) वाणी के द्वारा उसकी ओर वैसे ही दौड़ते हैं जैसे गायें अपने बछड़े की ओर; वे उससे प्रार्थना करते हैं कि वह उनके स्तोत्र पर जागे और असीम दानशीलता, संरक्षण तथा सामर्थ्य-प्राप्ति में विजय प्रदान करे।
Mantra 1
तं वो दस्ममृतीषहं वसोर्मन्दानमन्धसः । अभि वत्सं न स्वसरेषु धेनव इन्द्रं गीर्भिर्नवामहे ॥
उस अद्भुत-कर्मा, ऋत-सेनानी, शत्रु-प्रवृत्तियों को जीतने वाले, सोम-रस (अन्धस्) में आनन्दित इन्द्र का हम तुम्हारे लिए स्तवन करते हैं। जैसे दुहने के स्थानों पर गौएँ अपने बछड़े की ओर दौड़ती हैं, वैसे ही हम वाणी-स्तुतियों से इन्द्र की ओर बढ़ते हैं।
Mantra 2
द्युक्षं सुदानुं तविषीभिरावृतं गिरिं न पुरुभोजसम् । क्षुमन्तं वाजं शतिनं सहस्रिणं मक्षू गोमन्तमीमहे ॥
हम उस द्युतिमान, सुदानु (उदार दाता) को चाहते हैं, जो अपनी शक्तियों से आवृत है—बहु-भोगसम्पन्न पर्वत के समान। वह क्षुमन्त (समृद्ध), वाज (बल/विजय) से युक्त, शतगुणित और सहस्रगुणित है; वह शीघ्र ही गोमन्त (गव्यों/दीप्त-सम्पदा से युक्त) धन प्रदान करे—ऐसा हम याचते हैं।
Mantra 3
न त्वा बृहन्तो अद्रयो वरन्त इन्द्र वीळवः । यद्दित्ससि स्तुवते मावते वसु नकिष्टदा मिनाति ते ॥
हे इन्द्र, अजेय पराक्रम वाले, न कोई विशाल बल और न कोई कठोर शिला-बल तुम्हें रोक सकता है। जो भी वसु (अन्तर-धन) तुम स्तुति करने वाले, वृद्धि के लिए खुले साधक को देना चाहते हो—उस तुम्हारे दान को कोई भी घटा नहीं सकता।
Mantra 4
योद्धासि क्रत्वा शवसोत दंसना विश्वा जाताभि मज्मना । आ त्वायमर्क ऊतये ववर्तति यं गोतमा अजीजनन् ॥
तू संकल्प (क्रतु) से योद्धा है, बल (शवस्) से भी; और अपने प्रभावी कर्म-वैभव (दंसना) की महिमा से तू समस्त उत्पन्न जगत् से बढ़कर है। रक्षा (ऊति) के लिए यह स्तुति-ऋक् तेरी ओर प्रवृत्त होती है—जिसे गोतम-वंशियों ने उत्पन्न किया है।
Mantra 5
प्र हि रिरिक्ष ओजसा दिवो अन्तेभ्यस्परि । न त्वा विव्याच रज इन्द्र पार्थिवमनु स्वधां ववक्षिथ ॥
क्योंकि अपने ओज से तू स्वर्ग की परम सीमाओं के भी परे छलाँगकर प्रकट हुआ है। हे इन्द्र, कोई पार्थिव रज (लोक-परिसर) तुझे समेट नहीं सकता; तू अपनी स्वधा के अनुसार—अपने अंतर्निहित सामर्थ्य से—अपने ही नियम को धारण और पोषित करता है।
Mantra 6
नकिः परिष्टिर्मघवन्मघस्य ते यद्दाशुषे दशस्यसि । अस्माकं बोध्युचथस्य चोदिता मंहिष्ठो वाजसातये ॥
हे मघवन्, जब तू दाता (दाशुष) को सम्मान देता है, तब तेरे दान (मघ) की कोई परिधि नहीं ठहर सकती। हमारे स्तोत्र के प्रति जाग्रत हो; हमारी वाणी का प्रेरक बन—हे परम उदार—बल-समृद्धि (वाजसाति) की विजय के लिए।
It asks Indra to come to the hymn, protect the worshippers, and give generous help—especially strength, success, and victory.
It shows how naturally and urgently the singers move toward Indra with their words, seeking closeness and support just as cows seek their calf.
They are a Rigvedic seer-family (a lineage of poets). The hymn says their inspired chant is directed to Indra for protection.
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