
Sukta 8.100
Indra (with Viśve Devāḥ as supporting powers)
यह सूक्त इन्द्र की स्तुति करता है—उन्हें निर्णायक विजेता के रूप में, जो वृत्त्र रूपी अवरोध को तोड़कर जीवनदायिनी नदियों को मुक्त करते हैं। इन्द्र के वज्र के लिए विश्वे देवाः तथा विष्णु और द्यौः जैसे सहायक देवताओं का आवाहन किया गया है कि वे ब्रह्माण्डीय/दिव्य आकाश-स्थान को विस्तृत करें। कवि स्वयं को देवताओं द्वारा प्रेरित और समर्थित अनुभव करते हुए इन्द्र से प्रार्थना करता है कि वे ‘भाग’ (भāग) निर्धारित करें, जिससे वीर कर्म और समृद्धि सिद्ध हो सके। इस प्रकार यह सूक्त व्यक्तिगत सामर्थ्य, सामुदायिक एकजुटता और वृत्त्र-वध की आदिम कथा—इन सबको एक ही यज्ञीय तथा मनोवैज्ञानिक गति में पिरोता है, जो बंधन से मुक्ति की ओर ले जाती है।
Mantra 1
अयं त एमि तन्वा पुरस्ताद्विश्वे देवा अभि मा यन्ति पश्चात् । यदा मह्यं दीधरो भागमिन्द्रादिन्मया कृणवो वीर्याणि ॥
मैं अपने देह-स्वरूप सहित तुम्हारे पास, अग्रभाग में, आता हूँ; और समस्त देव मेरे पीछे-पीछे चलते हैं। जब हे इन्द्र, तुमने मेरे लिए मेरा भाग निर्धारित कर दिया, तब मेरे द्वारा वीर्य-पराक्रम के कर्म सिद्ध होते हैं।
Mantra 2
दधामि ते मधुनो भक्षमग्रे हितस्ते भागः सुतो अस्तु सोमः । असश्च त्वं दक्षिणतः सखा मेऽधा वृत्राणि जङ्घनाव भूरि ॥
मैं तुम्हारे आगे मधुर पोषण-भक्ष्य रखता हूँ; तुम्हारा भाग स्थापित है—सोम का सुत (पेषण) हो। और तुम, मेरे सखा, दक्षिण-पार्श्व में स्थित होकर—तब हम बहुत-से वृत्रों/अवरोधों को रौंदकर गिरा दें।
Mantra 3
प्र सु स्तोमं भरत वाजयन्त इन्द्राय सत्यं यदि सत्यमस्ति । नेन्द्रो अस्तीति नेम उ त्व आह क ईं ददर्श कमभि ष्टवाम ॥
स्तोत्र को आगे बढ़ाकर लाओ—समृद्धि की ओर प्रेरित करते हुए—इन्द्र के लिए; सत्यभाव से, यदि सत्य वास्तव में है। कोई यह न कहे—‘इन्द्र नहीं है’; उसे किसने देखा है? फिर हम किसकी स्तुति करें, किसके प्रति गान करें?
Mantra 4
अयमस्मि जरितः पश्य मेह विश्वा जातान्यभ्यस्मि मह्ना । ऋतस्य मा प्रदिशो वर्धयन्त्यादर्दिरो भुवना दर्दरीमि ॥
मैं ही यह स्तोता हूँ—मुझे देखो; अपनी महिमा से मैं उत्पन्न हुए समस्त जगत् को आच्छादित करता हूँ। ऋत की दिशाएँ मुझे बढ़ाती हैं; उस प्रेरणा से प्रेरित होकर मैं भुवनों को गुंजित करता, उनकी जड़ बँधन-स्थिरता को चीर देता हूँ।
Mantra 5
आ यन्मा वेना अरुहन्नृतस्यँ एकमासीनं हर्यतस्य पृष्ठे । मनश्चिन्मे हृद आ प्रत्यवोचदचिक्रदञ्छिशुमन्तः सखायः ॥
जब वेना—दर्शन के साधक—मुझे ऋत की ओर उठा ले गए—मुझे, जो एक में आसीन था, हर्यत (दीप्तिमान) के पृष्ठ पर—तब हृदय में स्थित मेरा मन भी प्रत्युत्तर में ‘हाँ’ कह उठा; और शिशु-सदृश नव-आनन्द से परिपूर्ण सखागण एक साथ पुकार उठे।
Mantra 6
विश्वेत्ता ते सवनेषु प्रवाच्या या चकर्थ मघवन्निन्द्र सुन्वते । पारावतं यत्पुरुसम्भृतं वस्वपावृणोः शरभाय ऋषिबन्धवे ॥
हे मघवन् इन्द्र, सोम पेरने वाले के लिए, प्रत्येक सवन में तुम्हारे ये सब कर्म प्रशंस्य और प्रख्यात किए जाने योग्य हैं—कि कैसे तुमने दूरस्थ, बहुत-संचित वसु को शरभ—ऋषि-बन्धु—के लिए उघाड़ दिया।
Mantra 7
प्र नूनं धावता पृथङ्नेह यो वो अवावरीत् । नि षीं वृत्रस्य मर्मणि वज्रमिन्द्रो अपीपतत् ॥
अब आगे बढ़ो—प्रत्येक अपने-अपने पथ से; देखो, यही वह है जो तुम्हें रोककर दबा देना चाहता है। इन्द्र ने वज्र को वृत्र के मर्मस्थल में, उसके दुर्बल केन्द्र पर, सीधा आघात कर के गाड़ दिया।
Mantra 8
मनोजवा अयमान आयसीमतरत्पुरम् । दिवं सुपर्णो गत्वाय सोमं वज्रिण आभरत् ॥
मन के वेग-सा, सीधा अग्रसर होकर, वह लोहे के दुर्ग को पार कर गया। सुन्दर-पंखों वाला (सुपर्ण) स्वर्ग को गया और वज्रधारी के लिए सोम ले आया।
Mantra 9
समुद्रे अन्तः शयत उद्ना वज्रो अभीवृतः । भरन्त्यस्मै संयतः पुरःप्रस्रवणा बलिम् ॥
समुद्र के भीतर वज्र-शक्ति जलों से आवृत होकर शयन करती है। अनुशासन में संयत, अग्र-प्रस्रवण धाराएँ उसके लिए बलि—शक्ति का अर्पण—ले आती हैं।
Mantra 10
यद्वाग्वदन्त्यविचेतनानि राष्ट्री देवानां निषसाद मन्द्रा । चतस्र ऊर्जं दुदुहे पयांसि क्व स्विदस्याः परमं जगाम ॥
जब वाणी अविचेतन—अप्रत्यक्ष—वस्तुओं को कहती है, तब देवों की राष्ट्र्री (सम्राज्ञी) आनन्दमयी होकर विराजती है। चारों ऊर्जाएँ पोषण-रस और आनन्द-धाराएँ दुहती हैं—पर उसकी परम आसंदी कहाँ जा पहुँची है?
Mantra 11
देवीं वाचमजनयन्त देवास्तां विश्वरूपाः पशवो वदन्ति । सा नो मन्द्रेषमूर्जं दुहाना धेनुर्वागस्मानुप सुष्टुतैतु ॥
देवों ने देवी वाणी को उत्पन्न किया; विश्वरूप पशु (समस्त प्राणी) उसे बोलते हैं। वह वाणी-धेनु हमारे लिए मन्द्र (आनन्द), प्रेरणा और ऊर्ज को दुहती हुई, सुस्तुत होकर हमारे समीप आए।
Mantra 12
सखे विष्णो वितरं वि क्रमस्व द्यौर्देहि लोकं वज्राय विष्कभे । हनाव वृत्रं रिणचाव सिन्धूनिन्द्रस्य यन्तु प्रसवे विसृष्टाः ॥
हे सखे विष्णो, और व्यापक होकर पग बढ़ाओ; हे द्यौ (स्वर्ग), वज्र-बल के लिए लोक (अवकाश) दो—उसे फैलाकर स्थिर करो। हम वृत्र का वध करें; हम सिन्धुओं (नदियों) को मुक्त करें—प्रसव (प्रेरणा) से विमुक्त होकर वे इन्द्र के लिए प्रवाहित हों।
The hymn centers on Indra striking down Vṛtra (the power of obstruction) with the vajra and thereby releasing the rivers—symbolizing the return of flow, fertility, and order.
They function as supporting powers who accompany and reinforce the act of worship and victory, showing that Indra’s breakthrough is upheld by a wider divine harmony.
It asks Indra to assign the worshipper’s rightful share of strength and prosperity, so that one’s efforts become effective and ‘heroic powers’ (vīrya) can be accomplished.
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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