Rig Veda Sukta 31
Mandala 3Sukta 3122 Mantras

Sukta 31

Sukta 3.31

Rishi

Viśvāmitra Gāthina (Kauśika) (traditional attribution for Maṇḍala 3; hymn 3.31 often associated with Viśvāmitra’s circle)

Devata

Agni (with esoteric family/cosmic relations imagery)

Chandas

Triṣṭubh

विश्वामित्र-परंपरा का यह सूक्त अग्नि की स्तुति घनी “कुल” और पीढ़ीगत उपमाओं—पिता, पुत्री, स्वजन-सम्बन्ध—के माध्यम से करता है, और संकेत देता है कि इन्हीं गुप्त सम्बन्धों से ऋत (ब्रह्माण्डीय व्यवस्था) प्रज्वलित होकर स्थिर रहती है। यह भीतर के, नियम-ज्ञ अग्नि से आरम्भ होकर—जो शक्तियों को जोड़ता और समरस करता है—एक व्यापक सृष्टि-दृष्टि तक बढ़ता है, जहाँ पिता के लिए आसन/आधार स्थापित होता है और प्रकाशमय लोक का विस्तार होता है। अंत में स्वर युद्धात्मक और व्यावहारिक हो जाता है: विघ्नों को तोड़ने तथा धन और विजय सुनिश्चित करने वाली शक्ति के रूप में इन्द्र का आह्वान किया जाता है, जिससे दिखता है कि यज्ञीय व्यवस्था का फल संरक्षण और समृद्धि में पूर्ण होता है।

Recitation with translationRig Veda 3.31

Mantras

Mantra 1

शासद्वह्निर्दुहितुर्नप्त्यं गाद्विद्वाँ ऋतस्य दीधितिं सपर्यन् । पिता यत्र दुहितुः सेकमृञ्जन्त्सं शग्म्येन मनसा दधन्वे ॥

आज्ञा से वह्नि (अग्नि) दुहिता के नप्त्य—उसके वंश-सम्बन्ध—की ओर गया; ऋत की दीप्त प्रेरणा को जानकर उसकी उपासना करता हुआ। जहाँ पिता दुहिता के स्रवण को रँगता/संस्कारित करता है, वहाँ वे शग्म्य (सुमेल) मन से एक साथ जुड़कर लक्ष्य को साधते हैं।

Mantra 2

न जामये तान्वो रिक्थमारैक्चकार गर्भं सनितुर्निधानम् । यदी मातरो जनयन्त वह्निमन्यः कर्ता सुकृतोरन्य ऋन्धन् ॥

उसने जामय (कुटुम्बी/स्वजन) के लिए देह को विरासत-धन की तरह नहीं छोड़ा; उसने गर्भ को ‘सनीतु’ (प्राप्ति/विजय) का गुप्त निधि बनाया। जब माताएँ वह्नि को जनती हैं, तब एक सुकृत (सत्कर्म) का कर्ता होता है, और दूसरा उसे प्रज्वलित कर बढ़ाने वाला (ऋन्धन्) होता है।

Mantra 3

अग्निर्जज्ञे जुह्वा रेजमानो महस्पुत्राँ अरुषस्य प्रयक्षे । महान्गर्भो मह्या जातमेषां मही प्रवृद्धर्यश्वस्य यज्ञैः ॥

अग्नि जुहू (हविर्लडले) पर रेजमान—दीप्त—होकर महान् प्रयक्ष (महायज्ञीय अर्पण) के लिए जन्मा; अरुष (रुद्र/रक्तिम) के पुत्रों के निमित्त। यह महान् गर्भ—इनके लिए महिमा से जन्मा; और मह्य (महान्) अर्यश्व (ताम्र-घोड़े वाले) की वृद्धि यज्ञों से महान् होती है।

Mantra 4

अभि जैत्रीरसचन्त स्पृधानं महि ज्योतिस्तमसो निरजानन् । तं जानतीः प्रत्युदायन्नुषासः पतिर्गवामभवदेक इन्द्रः ॥

विजयिनी शक्तियाँ प्रतिद्वन्द्वी पर टूट पड़ीं; उन्होंने तमस् से महा-ज्योति को बाहर प्रकट किया। उसे जानकर उषाएँ उसके सम्मुख उठ खड़ी हुईं; इन्द्र अकेले ही गो-रश्मियों (किरणों) के स्वामी बने।

Mantra 5

वीळौ सतीरभि धीरा अतृन्दन्प्राचाहिन्वन्मनसा सप्त विप्राः । विश्वामविन्दन्पथ्यामृतस्य प्रजानन्नित्ता नमसा विवेश ॥

स्थिर द्वारों को धीर बुद्धिमानों ने तोड़कर खोल दिया—मन से आगे हाँकते हुए, वे सात विप्र। उन्होंने ऋत का सर्वव्यापी पथ पाया; जानकर वह नमस्कार सहित उनमें प्रविष्ट हुआ।

Mantra 6

विदद्यदी सरमा रुग्णमद्रेर्महि पाथः पूर्व्यं सध्र्यक्कः । अग्रं नयत्सुपद्यक्षराणामच्छा रवं प्रथमा जानती गात् ॥

जब सरमा ने अद्रि (शिला) के टूटे हुए द्वार-छिद्र को—उस महान, प्राचीन पथ को—सीधे बढ़ते हुए पाया, तब क्या ही! उसने अक्षरों के सुदृढ़-पद (सुपद) को अग्रभाग तक ले गया; प्रथम, जानती हुई, वह उस नाद-रव की ओर गई।

Mantra 7

अगच्छदु विप्रतमः सखीयन्नसूदयत्सुकृते गर्भमद्रिः । ससान मर्यो युवभिर्मखस्यन्नथाभवदङ्गिराः सद्यो अर्चन् ॥

अत्यन्त प्रेरित (विप्रतम) ऋषि सख्य की खोज में आगे बढ़ा; अद्रि—पत्थर—ने सुकृत (सत्कर्मी) के लिए प्रकाश-गर्भ, उस गुप्त भ्रूण को जन्म दिया। युवा वीर अपने युव-बलों सहित मख (यज्ञ) में उमंग से आगे बढ़कर विजयी हुआ; तब अङ्गिरसों ने तत्क्षण प्रकाश-स्तुति का गान छेड़ दिया।

Mantra 8

सतःसतः प्रतिमानं पुरोभूर्विश्वा वेद जनिमा हन्ति शुष्णम् । प्र णो दिवः पदवीर्गव्युरर्चन्त्सखा सखीँरमुञ्चन्निरवद्यात् ॥

जो सत्-के सत् का प्रतिमान, अग्रगामी है, वह समस्त जन्मों को जानता है और शुष्ण (शोषक/मुरझाने वाली शक्ति) का वध करता है। हमारे लिए गव्यु (दीप्तिमान गौओं/किरणों का अन्वेषी) ने उज्ज्वल स्तुति से दिव्य पथ खोल दिए; सखा ने अपने सखाओं को बाँधने वाले दोष से मुक्त कर दिया।

Mantra 9

नि गव्यता मनसा सेदुरर्कैः कृण्वानासो अमृतत्वाय गातुम् । इदं चिन्नु सदनं भूर्येषां येन मासाँ असिषासन्नृतेन ॥

गव्यता (दीप्त गौओं/किरणों) की ओर मन लगाए, वे अपने अर्क (ऋचाओं) सहित बैठ गए, अमृतत्व की ओर जाने का पथ गढ़ते हुए। और यह भी उनके लिए विस्तृत सदन बन गया—उस शक्ति से, जिसके द्वारा उन्होंने ऋत (ऋत) के सहारे मासों को वश में किया।

Mantra 10

सम्पश्यमाना अमदन्नभि स्वं पयः प्रत्नस्य रेतसो दुघानाः । वि रोदसी अतपद्घोष एषां जाते निष्ठामदधुर्गोषु वीरान् ॥

एक साथ दृष्टि करते हुए वे अपने ही आनन्द में मतवाले हो उठे, प्राचीन बीज के दुग्ध को दुहती हुईं। उनका घोष दोनों लोकों में दहक उठा; जन्म लेते ही उन्होंने दृढ़ प्रतिष्ठा रख दी—प्रकाश की किरण-गौओं में वीर-शक्तियों को स्थापित किया।

Mantra 11

स जातेभिर्वृत्रहा सेदु हव्यैरुदुस्रिया असृजदिन्द्रो अर्कैः । उरूच्यस्मै घृतवद्भरन्ती मधु स्वाद्म दुदुहे जेन्या गौः ॥

वह वृत्रहन्, जन्मी हुई शक्तियों के हव्यों सहित आसन पर विराजमान हुआ; इन्द्र ने प्रकाशमय अर्कों (स्तोत्रों) से उज्ज्वल गौओं को मुक्त किया। उसके लिए वह व्यापक-दीप्तिमती, घृत-समृद्ध ऐश्वर्य लाती हुई, कुलीन गौ ने मधुर मधु-सा आनन्द दुहा।

Mantra 12

पित्रे चिच्चक्रुः सदनं समस्मै महि त्विषीमत्सुकृतो वि हि ख्यन् । विष्कभ्नन्तः स्कम्भनेना जनित्री आसीना ऊर्ध्वं रभसं वि मिन्वन् ॥

पिता के लिए भी उन्होंने आसन बनाया, और उसके लिए उसे एकत्र स्थापित किया; सुकृत-कर्म करने वालों ने महान्, दीप्तिमान् (लोक) को प्रकट कर दिया। स्कम्भ (आधार) से उसे थामते हुए वे जनित्री-शक्ति में आसीन हुए, और उर्ध्व की ओर वेगवान् बल को चलाकर उसे विस्तृत करते गए।

Mantra 13

मही यदि धिषणा शिश्नथे धात्सद्योवृधं विभ्वं रोदस्योः । गिरो यस्मिन्ननवद्याः समीचीर्विश्वा इन्द्राय तविषीरनुत्ताः ॥

जब महान् धिषणा (प्रेरित प्रज्ञा) प्रज्वलित होकर अपना आसन ग्रहण करती है, तब वह तत्क्षण दोनों लोकों के बीच व्याप्त सर्वव्यापी बल को बढ़ा देती है। उसी में निर्दोष, सम्यक्-संगत वाणियाँ स्थित हैं—इन्द्र के लिए अर्पित समस्त अजेय शक्तियाँ, अनुपम और अनुत्तर।

Mantra 14

मह्या ते सख्यं वश्मि शक्तीरा वृत्रघ्ने नियुतो यन्ति पूर्वीः । महि स्तोत्रमव आगन्म सूरेरस्माकं सु मघवन्बोधि गोपाः ॥

महान् कार्य हेतु मैं तेरा सख्य चुनता हूँ; हे वृत्रघ्न, तेरी प्राचीन, युक्त शक्तियाँ (नियुतः) आती हैं। सूर्यज (प्रकाशमय) सहायतार्थ हम महत् स्तोत्र लेकर आए हैं; हे मघवन्, हमारे लिए जाग—किरणों (गवों) के गोपा बन।

Mantra 15

महि क्षेत्रं पुरु श्चन्द्रं विविद्वानादित्सखिभ्यश्चरथं समैरत् । इन्द्रो नृभिरजनद्दीद्यानः साकं सूर्यमुषसं गातुमग्निम् ॥

विशाल क्षेत्र और अनेक दीप्तिमान ज्योतियों को जानकर, उसने तब अपने सखाओं के साथ मार्ग (चरथ) को एकत्र नियत किया। दीप्तिमान इन्द्र ने नर-शक्तियों के साथ सूर्य और उषा, गमन-पथ, और अग्नि को उत्पन्न किया—वह दिव्य संकल्प जो अग्रसर कराता है।

Mantra 16

अपश्चिदेष विभ्वो दमूनाः प्र सध्रीचीरसृजद्विश्वश्चन्द्राः । मध्वः पुनानाः कविभिः पवित्रैर्द्युभिर्हिन्वन्त्यक्तुभिर्धनुत्रीः ॥

यह सर्वव्यापी गृहपति (इन्द्र) तो जलों को भी एक ही सीधी, संयुक्त धारा में प्रवाहित कर देता है, उन्हें सर्वत्र दीप्तिमान बनाता है। मधु-रस को पवित्र करते हुए, कवियों/ऋषियों द्वारा पवित्र छन्नों (पवित्र) से प्रेरित होकर वे धाराएँ दिन-रात के द्वारा वेग पाती हैं, और रक्षाकवच धारण करती हुई आगे बढ़ती हैं।

Mantra 17

अनु कृष्णे वसुधिती जिहाते उभे सूर्यस्य मंहना यजत्रे । परि यत्ते महिमानं वृजध्यै सखाय इन्द्र काम्या ऋजिप्याः ॥

अनुगमन करते हुए, दोनों कृष्ण-धारिणी आधार-भूमियाँ ढीली होकर अलग होती हैं—सूर्य की उदार शक्ति से दोनों यजनीय हैं। और तुम्हारे महान महिमान के लिए चारों ओर स्थान बनाने हेतु, हे इन्द्र, तुम्हारे ऋजिप्य—सीधे चलने वाले, काम्य के साधक—सखा आगे बढ़कर मार्ग को साफ़ करते हैं।

Mantra 18

पतिर्भव वृत्रहन्त्सूनृतानां गिरां विश्वायुर्वृषभो वयोधाः । आ नो गहि सख्येभिः शिवेभिर्महान्महीभिरूतिभिः सरण्यन् ॥

हे वृत्रहन्, सूनृता-युक्त वचनों के, जीवन-विस्तारक गिराओं के तुम पति बनो; तुम वृषभ हो—हमारी वृद्धि-शक्तियों को धारण करने वाले। हमारे पास आओ—शिव सख्य-बंधनों के साथ; हे सरण्यन्, अपनी महान, महत्तर ऊतियों (सहायताओं) के साथ।

Mantra 19

तमङ्गिरस्वन्नमसा सपर्यन्नव्यं कृणोमि सन्यसे पुराजाम् । द्रुहो वि याहि बहुला अदेवीः स्वश्च नो मघवन्त्सातये धाः ॥

उस अङ्गिरस-तुल्य देव के लिए, नमस्कार और सेवा-भाव से, मैं प्राचीन-जन्मा के हेतु एक नया अर्पण रचता हूँ। बहुत-सी अदेवी, शत्रु शक्तियों को दूर हटा दे; और हे मघवन्, हमारे लिए स्वस्ति—दीप्तिमय सुख-शान्ति—और प्राप्ति हेतु विजय स्थापित कर।

Mantra 20

मिहः पावकाः प्रतता अभूवन्त्स्वस्ति नः पिपृहि पारमासाम् । इन्द्र त्वं रथिरः पाहि नो रिषो मक्षूमक्षू कृणुहि गोजितो नः ॥

शुद्धि करने वाली वर्षाएँ फैल गई हैं; इन प्रवाहों के पार के तट तक हमें स्वस्ति से पहुँचा। हे इन्द्र, रथ-बल में समर्थ, हमें हानि से बचा; शीघ्र, बार-बार, हमें गो-जित—प्रकाश-किरणों के विजेता—बना।

Mantra 21

अदेदिष्ट वृत्रहा गोपतिर्गा अन्तः कृष्णाँ अरुषैर्धामभिर्गात् । प्र सूनृता दिशमान ऋतेन दुरश्च विश्वा अवृणोदप स्वाः ॥

वृत्रहा, प्रकाशमान गो-समूहों का गोपति, अपने अरुण धामों द्वारा कृष्ण अन्धकार के भीतर ही गौओं को चलायमान कर गया। वह ऋत के द्वारा दिशाओं को नापता हुआ सत्य-वाणी (सूनृता) को आगे बढ़ाता है; उसने अपने ही सब द्वारों को, जो बन्द थे, व्यापक रूप से खोल दिया।

Mantra 22

शुनं हुवेम मघवानमिन्द्रमस्मिन्भरे नृतमं वाजसातौ । शृण्वन्तमुग्रमूतये समत्सु घ्नन्तं वृत्राणि संजितं धनानाम् ॥

हम अपने कल्याण के लिए इस संग्राम में दानवीर इन्द्र का आह्वान करते हैं—वाज-साति (विजय) में सर्वाधिक नर-श्रेष्ठ। जो सुननेवाला है, सहायता हेतु उग्र है, समर-समूहों में; वह वृत्रों (अवरोधों) को मारता है—धनों का संजयिता, विजयी संग्राहक।

Inside Sukta 31

How it unfolds

  1. Where it opens

    Agni advances as the commanded carrier-flame, portrayed through intimate kinship language and as the knower of Ṛta’s shining thought.

  2. Development

    The hymn deepens into esoteric cosmogony: establishing a ‘seat’ for the Father, propping and widening the luminous world through sustaining power and generative force.

  3. Climax

    A revelation of cosmic construction—supporting, seating, and expanding the world-order—where sacrificial intelligence becomes world-making power.

  4. Where it settles

    The vision resolves into pragmatic invocation: Indra is called for good fortune in battle, to strike down obstructions and secure riches.

The deity: Agni

  • In the VedaAgni is the vahni (carrier) and hotṛ (invoking priest), the bright intelligence that knows Ṛta and conveys offerings to the gods; he is also spoken of in kinship metaphors, as if the cosmos is a household whose relations are revealed by fire. Indra appears as the battle-helper who listens, smashes Vṛtra-like obstructions, and wins riches.
  • Cosmic functionAgni mediates between human and divine realms, kindling sacrifice and sustaining Ṛta; he “joins” powers and establishes continuity between generations of being. Indra functions as the force of breakthrough—clearing resistance so the ordered world and its gains can be secured.
  • Inner significanceAgni signifies awakened will and discerning insight that aligns the mind with Ṛta, harmonizing conflicting impulses into a single purposeful offering. Indra signifies courage and victorious energy that cuts through inner inertia and fear, enabling the fruits of right action to manifest.

The seer

  • Viśvāmitra Gāthina (Kauśika)Kauśika (Gāthina lineage) · A paradigmatic seer-king turned brahmarṣi, central to Maṇḍala 3, celebrated for visionary hymns to Agni and Indra and for articulating Ṛta through powerful poetic symbolism.

Famous verses

saṃ śagmyena manasā
Verse 3.31.1Sets the hymn’s signature symbolism: Agni as Ṛta-knowing intelligence moving through ‘daughter/kinship’ imagery and uniting powers by a harmonious mind.Read verse 3.31.1 →
पित्रे चिच्चक्रुः सदनं समस्मै महि त्विषीमत्सुकृतो वि हि ख्यन् । विष्कभ्नन्तः स्कम्भनेना जनित्री आसीना ऊर्ध्वं रभसं वि मिन्वन् ॥
Verse 3.31.12Expresses the cosmogonic core: the ‘doers of good work’ establish a seat for the Father and expand the luminous world by support (skambha-like imagery).Read verse 3.31.12 →
ghnantaṃ vṛtrāṇi
Verse 3.31.22Provides the hymn’s practical culmination: a direct call to Indra as listener, fierce helper, Vṛtra-slayer, and gatherer of riches—linking sacrificial order to victory and abundance.Read verse 3.31.22 →

Attributes of the deity

  • Vahni (carrier of offerings)
  • Hotṛ/priestly voice of the rite
  • Knower of Ṛta and inspirer of right thought (dīdhiti)
  • Kindler of harmony and union (saṃ śagmyena manasā)
  • Cosmic establisher through support/seat imagery
  • Obstacle-slayer and wealth-winner (Indra motif at the end)

Also by this seer

  • Rig Veda Maṇḍala 3 (many hymns traditionally attributed to Viśvāmitra and his family)
  • Hymns to Agni and Indra emphasizing Ṛta, divine friendship, and victory (e.g., clusters within RV 3.1–3.62)
  • Later tradition associates Viśvāmitra with the Gāyatrī mantra (RV 3.62.10), though attribution is traditional and contextual

The rite, step by step

  • Prepare the altar/fireplace and kindle Agni with kindling (samidh), establishing a focused, harmonized intention (manas).
  • Recite the hymn to awaken Agni as Ṛta-knowing intelligence and invite divine participation through him.
  • Make offerings into the fire while contemplating the ‘family/cosmic relations’—the joining of powers that sustains the world-order.
  • Conclude with an appeal for practical results—protection in conflicts, removal of obstacles, and gaining of wealth (Indra-impulse).

Offerings

  • Ghee (ājya)
  • Kindling sticks (samidh)
  • Grains/cakes as appropriate to the rite
  • Soma-related offerings when used in soma contexts (where applicable)

Frequently Asked Questions

The hymn speaks in symbolic family language to show hidden relationships in creation—how powers “beget,” nourish, and join to sustain Ṛta. Agni is the revealer and unifier of these relationships through the sacrificial fire.

Its main focus is Agni, especially as the Ṛta-knowing mediator and cosmic organizer. The final verse turns to Indra for practical help—victory, protection, and the breaking of obstacles.

It can be recited at a morning or evening lamp/fire offering with ghee, focusing on aligning the mind with Ṛta and asking for clarity and harmony. The concluding Indra-invocation can be used when seeking strength to overcome difficulties.

Ask anything about Sukta 31 of the Rig Veda

Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.

Not sure where to start?

A free sign-in with Google or Apple keeps your chat saved across web and the app.

Read Rig Veda in the Vedapath app

Scan the QR code to open this directly in the app, with word-by-word meanings, Sanskrit recitation where available, and more.

Download on the App StoreGet it on Google Play

Continue reading in the Vedapath app

Open in App
Download on the App StoreGet it on Google Play