Rig Veda Sukta 29
Mandala 3Sukta 2916 Mantras

Sukta 29

Sukta 3.29

Rishi

Viśvāmitra Gāthina (family attribution for early RV 3)

Devata

Agni (manifested through manthana)

Chandas

Jagatī or Tr̥ṣṭubh (verse needs metrical verification; fire-kindling hymns often vary)

यह सूक्त मन्थन (अग्नि-मन्थन) द्वारा अग्नि के प्रज्वलन की सजीव विधि-लितुर्गी है, जिसमें अग्नि का जन्म एक जान-बूझकर किया गया, पवित्र जनन माना गया है जो प्राचीन यज्ञ-रीति का नवीनीकरण करता है। धूम और ज्वाला के लक्षणों सहित जब अग्नि उदित होता है, तब वह चुना हुआ होतृ बनकर यज्ञ को आगे बढ़ाता है, उपद्रवकारी/अवरोधक शक्तियों पर विजय और बल प्रदान करता है, और उपासकों को स्थिर, ‘निश्चय’ आसन तक पहुँचाता है, जहाँ उसके माध्यम से सोम-आनन्द के निकट पहुँचा जाता है।

Recitation with translationRig Veda 3.29

Mantras

Mantra 1

अस्तीदमधिमन्थनमस्ति प्रजननं कृतम् । एतां विश्पत्नीमा भराग्निं मन्थाम पूर्वथा ॥

यहाँ अधिमन्थन (मन्थन-दण्ड) है; यहाँ प्रजनन का साधन सिद्ध है। गृहपत्नी (विश्पत्नी) को ले आओ; आओ, पूर्ववत् अग्नि का मन्थन करें।

Mantra 2

अरण्योर्निहितो जातवेदा गर्भ इव सुधितो गर्भिणीषु । दिवेदिव ईड्यो जागृवद्भिर्हविष्मद्भिर्मनुष्येभिरग्निः ॥

दो अरणियों में जातवेदस् गर्भ के समान छिपा है—गर्भिणियों में सुस्थापित भ्रूण की भाँति। प्रतिदिन हविष्-युक्त, जाग्रत मनुष्यों द्वारा अग्नि वन्दनीय है।

Mantra 3

उत्तानायामव भरा चिकित्वान्त्सद्यः प्रवीता वृषणं जजान । अरुषस्तूपो रुशदस्य पाज इळायास्पुत्रो वयुनेऽजनिष्ट ॥

उत्तान (अधो) अरणि-लकड़ी पर उसे नीचे उतारो—हे जानने वाले; प्रेरित मन्थन से तत्क्षण बलवान वृषभ (अग्नि) उत्पन्न होता है। अरुण-शिखा वाला, जिसका तेज दमकता है—इळा का पुत्र, यज्ञ के गूढ़ विधान/वयुन से जन्म लेता है।

Mantra 4

इळायास्त्वा पदे वयं नाभा पृथिव्या अधि । जातवेदो नि धीमह्यग्ने हव्याय वोळ्हवे ॥

इळा के पद पर, पृथ्वी की नाभि पर, हे जातवेदस्, हम तुम्हें स्थापित करते हैं। हे अग्ने, हमारे हवि को वहन करने हेतु दृढ़ होकर स्थित हो—यज्ञ का देव-व्यवहार/आदान-प्रदान सम्यक् चले।

Mantra 5

मन्थता नरः कविमद्वयन्तं प्रचेतसममृतं सुप्रतीकम् । यज्ञस्य केतुं प्रथमं पुरस्तादग्निं नरो जनयता सुशेवम् ॥

हे नर (यजमानो), मन्थन करो—अग्नि को जन्म दो: वह कवि है, अद्वय, अचल-चित्त, प्रचेतस्, अमृत, सु-प्रतिमुख (दीप्त मुख) वाला। यज्ञ का केतु उसे पहले, अग्रभाग में, स्थापित करो—हे नर, सुशेव (कल्याणकारी) अग्नि को उत्पन्न करो।

Mantra 6

यदी मन्थन्ति बाहुभिर्वि रोचतेऽश्वो न वाज्यरुषो वनेष्वा । चित्रो न यामन्नश्विनोरनिवृतः परि वृणक्त्यश्मनस्तृणा दहन् ॥

जब वे अपनी भुजाओं से मथते हैं, तब वह प्रकट होकर चमक उठता है—वनों में बलवान् वेगशाली अरुण अश्व के समान; अश्विनों की उज्ज्वल, अनवरोध यात्रा के समान, वह चारों ओर विचरता है, पाषाण-सी कठोरता और अस्तित्व की शुष्क तृणों को दग्ध करता हुआ।

Mantra 7

जातो अग्नी रोचते चेकितानो वाजी विप्रः कविशस्तः सुदानुः । यं देवास ईड्यं विश्वविदं हव्यवाहमदधुरध्वरेषु ॥

जन्म लेते ही अग्नि चमकता है—जाग्रत्, विवेकशील; वाज-विजयी, विप्र, कवियों द्वारा प्रशस्त, सुदानु (उदार दाता)। जिसे देवों ने अध्वर-यज्ञों में स्थापित किया—ईड्य, विश्वविद्, हव्यवाह।

Mantra 8

सीद होतः स्व उ लोके चिकित्वान्त्सादया यज्ञं सुकृतस्य योनौ । देवावीर्देवान्हविषा यजास्यग्ने बृहद्यजमाने वयो धाः ॥

हे होतृ, अपने ही लोक (स्व-धाम) में, जानकार होकर, विराज; सु-कृत कर्म की योनि में यज्ञ को प्रतिष्ठित कर। देवों के सहायक होकर, हवि से देवों का यजन कर; हे अग्ने, यजमान में विस्तृत वयस्—जीवन-शक्ति और वृद्धि—स्थापित कर।

Mantra 9

कृणोत धूमं वृषणं सखायोऽस्रेधन्त इतन वाजमच्छ । अयमग्निः पृतनाषाट् सुवीरो येन देवासो असहन्त दस्यून् ॥

हे सखाओ, धुएँ को वृषभ-सा प्रबल करो; अच्युत होकर समृद्धि (वाज) की ओर बढ़ो। यह वही अग्नि है—रण-विजयी, सु-वीर—जिसके द्वारा देवों ने दस्युओं, उन तमसिक अवरोधों, को पराजित किया।

Mantra 10

अयं ते योनिॠत्वियो यतो जातो अरोचथाः । तं जानन्नग्न आ सीदाथा नो वर्धया गिरः ॥

यह तेरा ऋतु-युक्त योनि-स्थान है, जिससे जन्म लेकर तू प्रकाशमान हुआ। हे अग्नि, इसे जानकर यहाँ आसीन हो; तब हमारे लिए गिरः—प्रेरित वाणी—को बढ़ा।

Mantra 11

तनूनपादुच्यते गर्भ आसुरो नराशंसो भवति यद्विजायते । मातरिश्वा यदमिमीत मातरि वातस्य सर्गो अभवत्सरीमणि ॥

वह तनूनपात कहलाता है—तेजस्वी शक्ति का गर्भ; और जब वह प्रकट जन्म लेता है, तब नराशंस बनता है। और जब मातरिश्वा ने उसे माता में मापा, तब वायु का प्रवाह—सरि-मार्ग पर—मुक्त होकर बह निकला।

Mantra 12

सुनिर्मथा निर्मथितः सुनिधा निहितः कविः । अग्ने स्वध्वरा कृणु देवान्देवयते यज ॥

भली-भाँति मथा हुआ, भली-भाँति उत्पन्न; भली-भाँति धरा गया—कवि (अग्नि) भीतर स्थापित है। हे अग्ने, स्वध्वरा (सु-मार्गी यज्ञ) को सुशोभित और सत्य-पथयुक्त कर; देव-इच्छुक यजमान के लिए देवों का यजन कर।

Mantra 13

अजीजनन्नमृतं मर्त्यासोऽस्रेमाणं तरणिं वीळुजम्भम् । दश स्वसारो अग्रुवः समीचीः पुमांसं जातमभि सं रभन्ते ॥

मर्त्यों ने अमृत को जन्म दिया—अडिग, त्वरित तारक, दुर्ग-भंजक। दस स्वसाएँ, अग्रुवः (सीधी-गामी), समेचीः (एक-दिशा में संयुक्त), नवजात पुरुष-शक्ति को चारों ओर से आलिंगित करती हैं।

Mantra 14

प्र सप्तहोता सनकादरोचत मातुरुपस्थे यदशोचदूधनि । न नि मिषति सुरणो दिवेदिवे यदसुरस्य जठरादजायत ॥

सनकाद् (आदिम मूल) से सप्त-होता प्रकट होकर चमका, जब वह माता के उपस्थ में—पोषण के ऊधन में—प्रज्वलित हुआ। वह सुरणः (सुदाता) दिन-प्रतिदिन निमिष नहीं करता, क्योंकि वह असुर (प्रभु-शक्ति) के जठर से जन्मा।

Mantra 15

अमित्रायुधो मरुतामिव प्रयाः प्रथमजा ब्रह्मणो विश्वमिद्विदुः । द्युम्नवद्ब्रह्म कुशिकास एरिर एकएको दमे अग्निं समीधिरे ॥

शत्रु-बलों के विरुद्ध आयुधधारी, मरुतों की अग्रगामी धारा के समान, वाणी (ब्रह्म) की ये प्रथम-जन्मी प्रेरणाएँ कर्म के समस्त सत्य को जानती हैं। कुशिकों ने तेजस्वी, विजयी ब्रह्म-मंत्र को ऊँचा उठाया; और प्रत्येक ने अपने-अपने गृह (दमे) में अग्नि को सम्यक् प्रज्वलित किया—एक ही शक्ति-दीप्त ज्वाला में।

Mantra 16

यदद्य त्वा प्रयति यज्ञे अस्मिन्होतश्चिकित्वोऽवृणीमहीह । ध्रुवमया ध्रुवमुताशमिष्ठाः प्रजानन्विद्वाँ उप याहि सोमम् ॥

आज, इस अग्रसर यज्ञ में, हमने तुम्हें यहाँ विवेकी होतृ के रूप में चुना है। दृढ़ पथ से आओ, दृढ़ शान्ति-आसन तक आओ; जन्मों को और उनके अर्थ को जानने वाले, हे विद्वान्, हमारे भीतर के सोम के निकट आओ।

Frequently Asked Questions

It centers on producing Agni by manthana (churning the fire-sticks) and installing him as the Hotar who carries offerings and moves the sacrifice forward.

Because Vedic ritual treats fire as a living, sacred presence hidden in the wood; the rite “brings him to birth,” renewing divine order and vitality in the household and community.

In this context, Dasyus represent hostile obstructions—darkness, disorder, and resistance to ṛta. Agni is praised as the power by which the gods overcome these forces, giving strength and clear progress to the worshippers.

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