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Sukta 10.59
Āyuṣ (life) and the banishment of Nirṛti (dissolution); protective/āyuṣya orientation
त्रिष्टुभ् (probable; longer pādas with complex cadence)
यह सूक्त एक आयुष्य (जीवन-रक्षक) प्रार्थना है, जो प्राण-शक्ति से आग्रह करती है कि वह “और दूर, सदा-नवीन” निरन्तरता की ओर अग्रसर हो, और साथ ही क्षय व विघटन की शक्ति निरृति को दूर भगाए। इसमें दृष्टि, श्वास और जीवन के रस/आनन्द की पुनर्स्थापना की याचना है, तथा उदित होते सूर्य के दीर्घकाल तक, बिना बाधा दर्शन की—जो नवजीवन और मंगल के लक्षण हैं। अंत में रक्षात्मक स्वर में पोषक शक्तियों (और इन्द्र की प्रेरणा) का आह्वान किया गया है कि वे पीड़ा को हटाएँ, ताकि उपासक को कोई हानि न छुए।
Mantra 1
प्र तार्यायुः प्रतरं नवीय स्थातारेव क्रतुमता रथस्य । अध च्यवान उत्तवीत्यर्थं परातरं सु निॠतिर्जिहीताम् ॥
हमारी आयु को और आगे—दूरतर, सदा-नवीन प्रगति में—ले चलो; जैसे रथ के स्थिर सारथि, क्रतु (संकल्प-शक्ति) से युक्त होकर। तब आगे बढ़ते हुए हम उच्चतर लक्ष्य को प्राप्त करें; और निरृति—विघटन की शक्ति—दूरतर हट जाए।
Mantra 2
सामन्नु राये निधिमन्न्वन्नं करामहे सु पुरुध श्रवांसि । ता नो विश्वानि जरिता ममत्तु परातरं सु निॠतिर्जिहीताम् ॥
सामन् (समस्वर) में, राय (समृद्धि/पूर्णता) के लिए, हम अपने लिए ऐसा अन्न करें जो निधि-युक्त (अंतर-धन से भरपूर) हो, और बहुत-सी सुदृढ़ श्रवांसि—श्रवण-शक्ति और यश—उत्पन्न हों। ये सब हमारे जरीता (स्तुतिकर्ता) को आनंदित करें; और निरृति दूरतर हट जाए।
Mantra 3
अभी ष्वर्यः पौंस्यैर्भवेम द्यौर्न भूमिं गिरयो नाज्रान् । ता नो विश्वानि जरिता चिकेत परातरं सु निॠतिर्जिहीताम् ॥
आर्य (श्रेष्ठ) पुरुषार्थ-बलों से हम विजयी हों—द्यौः के समान दृढ़, पृथ्वी के समान विस्तृत, पर्वतों के समान अचल। ये सब शुभ प्रवृत्तियाँ हमारे लिए जरीता (अन्तर्द्रष्टा/स्तुतिकर्ता) भली-भाँति जाने; और निॠति (विघटन व दुर्भाग्य की शक्ति) हमसे बहुत दूर हट जाए।
Mantra 4
मो षु णः सोम मृत्यवे परा दाः पश्येम नु सूर्यमुच्चरन्तम् । द्युभिर्हितो जरिमा सू नो अस्तु परातरं सु निॠतिर्जिहीताम् ॥
हे सोम, हमें मृत्यु के हाथों न सौंप; हम अभी भी उदित होते सूर्य को देखें। द्यु-लोकों की ज्योति से हमारे भीतर जरा (आयु) का शुभ परिपाक स्थापित हो; और निॠति हमसे बहुत दूर हट जाए।
Mantra 5
असुनीते मनो अस्मासु धारय जीवातवे सु प्र तिरा न आयुः । रारन्धि नः सूर्यस्य संदृशि घृतेन त्वं तन्वं वर्धयस्व ॥
हे असुनीति (प्राण-नेता), जीवित रहने के लिए मन को हमारे भीतर स्थिर धारण कर; हमारे आयु-बल को सुरक्षित रूप से आगे पार करा। हमें सूर्य के दर्शन में प्रतिष्ठित कर; घृत के साथ तू हमारी तनु (देह) को बढ़ा और पुष्ट कर।
Mantra 6
असुनीते पुनरस्मासु चक्षुः पुनः प्राणमिह नो धेहि भोगम् । ज्योक्पश्येम सूर्यमुच्चरन्तमनुमते मृळया नः स्वस्ति ॥
हे असुनीति, हमारे भीतर फिर से दृष्टि लौटा दे; यहाँ हमारे प्राण को फिर से स्थापित कर, और हमारे भीतर भोग-शक्ति (आनन्द-समर्थ्य) धारण करा। हम दीर्घकाल तक ऊपर उठते हुए सूर्य का दर्शन करते रहें; हे अनुमति, हम पर कृपा कर—हमें स्वस्ति प्रदान कर।
Mantra 7
पुनर्नो असुं पृथिवी ददातु पुनर्द्यौर्देवी पुनरन्तरिक्षम् । पुनर्नः सोमस्तन्वं ददातु पुनः पूषा पथ्यां या स्वस्तिः ॥
पृथ्वी हमें फिर से हमारा प्राण लौटा दे; दिव्य द्यौः (स्वर्ग) उसे फिर से लौटाए; और अन्तरिक्ष भी उसे फिर से लौटाए। सोम हमें फिर से यह देह-युक्त अस्तित्व (तन्व) प्रदान करे; और पूषा हमें फिर से पथ्य स्वस्ति—सुरक्षित मार्ग की कल्याण-शक्ति—लौटा दे।
Mantra 8
शं रोदसी सुबन्धवे यह्वी ऋतस्य मातरा । भरतामप यद्रपो द्यौः पृथिवि क्षमा रपो मो षु ते किं चनाममत् ॥
द्यावा-पृथिवी तुम्हारे लिए शान्ति और सु-बंधुत्व बनें—वे ऋत की व्यापक-गामिनी माताएँ। वे जो भी आघात और पीड़ा है, उसे दूर वहन कर दें। हे द्यौः, हे पृथिवी, हे क्षमा (धैर्यशील भूमि), तुम्हें अव्यवस्था का कोई भी अंश स्पर्श न करे।
Mantra 9
अव द्वके अव त्रिका दिवश्चरन्ति भेषजा । क्षमा चरिष्ण्वेककं भरतामप यद्रपो द्यौः पृथिवि क्षमा रपो मो षु ते किं चनाममत् ॥
द्विविध से भी नीचे, त्रिविध से भी नीचे—स्वर्ग से चलती हैं ये भेषज (औषधियाँ)। क्षमा (धरती) पर, चलने-फिरने वाले के लिए, एकाकी जन के लिए भी वे चलती हैं। जो भी रपस् (पीड़ा/क्लेश) हो, उसे द्यौः (स्वर्ग) और पृथिवी—और यह क्षमा—दूर ले जाएँ; तुम्हें किंचित् भी हानि न छुए।
Mantra 10
समिन्द्रेरय गामनड्वाहं य आवहदुशीनराण्या अनः । भरतामप यद्रपो द्यौः पृथिवि क्षमा रपो मो षु ते किं चनाममत् ॥
हे इन्द्र, उसिनर-जन के रथ को लाने वाली गौ और अनड्वाह (जुआ-धारी बैल) को प्रेरित कर। जो भी रपस् (पीड़ा/क्लेश) हो, उसे द्यौः (स्वर्ग) और पृथिवी—और यह क्षमा—दूर ले जाएँ; तुम्हें किंचित् भी हानि न छुए।
It is a life-protecting hymn that asks life-force to move forward, restores breath and sight, and sends away Nirṛti—the power linked with decay, loss, and dissolution.
Asunīti is invoked to restore vital functions like breath and vision, while Anumati represents gracious consent/blessing and is asked to grant svasti (well-being).
It is suited for dawn recitation, for recovery from illness, and for longevity/protection intentions—any time one seeks renewed vitality and the removal of misfortune.
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