
Sukta 10.57
Indra (with Soma-sacrificer context)
यह संक्षिप्त सूक्त सोम-यज्ञ में प्रवृत्त यजमानों के लिए रक्षात्मक और पुनर्स्थापनकारी प्रार्थना है। इसमें इन्द्र से याचना की जाती है कि यज्ञकर्ता धर्मपथ से न डिगें और शत्रु शक्तियों द्वारा बाधित न हों। फिर यह अंतर्मुख होकर मनस् (मन) की वापसी और स्थिरता का आवाहन करता है—सत्-संकल्प (क्रतु), विवेक/दक्षता (दक्ष), प्राण-जीवन, तथा अंतर्ज्योति रूप सूर्य-दर्शन के निरंतर बने रहने के लिए। अंत में सोम के व्रतों (सम्यक् कर्म-नियमों) के साथ समन्वय की पुष्टि होती है—पुनःस्थापित मन को देह में धारण करते हुए और फलदायी सृजन-शक्ति/संतति (प्रजा) को प्राप्त करते हुए।
Mantra 1
मा प्र गाम पथो वयं मा यज्ञादिन्द्र सोमिनः । मान्त स्थुर्नो अरातयः ॥
हम पथ से आगे भटक न जाएँ; और हे इन्द्र, हम सोमिन जन यज्ञ से भी न हटें। हमारे बीच अराति—शत्रु शक्तियाँ—आकर खड़ी न हों।
Mantra 2
यो यज्ञस्य प्रसाधनस्तन्तुर्देवेष्वाततः । तमाहुतं नशीमहि ॥
जो यज्ञ का प्रसाधन—उसका सिद्धि-कारक तन्तु—देवों के बीच तना हुआ है, उस सु-आहुति को हम प्राप्त करें, उसे अपने अधिकार में करें।
Mantra 3
मनो न्वा हुवामहे नाराशंसेन सोमेन । पितॄणां च मन्मभिः ॥
अब हम नाराशंस के सोम द्वारा मन को पुनः बुलाते हैं, और पितरों की प्रेरित मनोवृत्तियों (मन्म) के साथ।
Mantra 4
आ त एतु मनः पुनः क्रत्वे दक्षाय जीवसे । ज्योक्च सूर्यं दृशे ॥
तेरा मन फिर तेरे पास लौट आए—संकल्प (क्रतु) और सम्यक् विवेक (दक्ष) के लिए, जीवन के लिए, और दीर्घकाल तक सूर्य (अन्तर्ज्योति) के दर्शन के लिए।
Mantra 5
पुनर्नः पितरो मनो ददातु दैव्यो जनः । जीवं व्रातं सचेमहि ॥
पितर हमारे लिए मन को फिर से प्रदान करें; दैवी जन (देवगण) उसे हमें दें। हम जीवित व्रात (जीवंत समूह/समष्टि-शक्ति) के साथ समरस होकर चलें।
Mantra 6
वयं सोम व्रते तव मनस्तनूषु बिभ्रतः । प्रजावन्तः सचेमहि ॥
हे सोम! तेरे व्रत (ऋत-नियम) में, हम अपने तनुओं में मन को धारण करते हुए, प्रजावन्त (संतति/सृजन-शक्ति से युक्त) होकर तेरे साथ समन्वय में रहें।
It asks for protection so the sacrificers do not deviate from the right path or the Soma-yajña, and it prays for the mind to return—bringing will, discernment, life, and clear inner vision.
In Vedic thought, scattered mind weakens both ritual effectiveness and inner clarity. The hymn calls mind back so intention (kratu) and discernment (dakṣa) become steady, leading to sustained ‘seeing of the Sun’ as light and truth.
It can be recited as a prayer before any disciplined practice—study, meditation, or ritual—asking for protection from distractions, restoration of focus, and alignment with a higher order of living (vrata).
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