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Sukta 10.40
Aśvinau
यह सूक्त उषाकाल में रथारूढ़ दिव्य वैद्य अश्विनौ का अत्यन्त आतुर और स्नेहपूर्ण आह्वान है—पूछता है कि वे कहाँ हैं और आज किसके यहाँ उनका सत्कार हो रहा है। इसमें उनके शीघ्रगामी रथ, कुल-कुल पर बरसने वाली उनकी उपकार-शक्ति, और उनके प्रसिद्ध उद्धार-कार्य की स्तुति है—दुर्बलों को राहत, असहायों की रक्षा, तथा रुकी हुई ‘बाड़ों/घेरों’ को खोल देना ताकि समृद्धि और आरोग्य का प्रवाह हो सके। कवि का उद्देश्य है कि उचित समय, अर्थात् प्रभात में, उन दिव्य युगलों को यजमान के गृह की ओर आकर्षित किया जाए और जीवन के संधिकालों को सफलतापूर्वक पार करने हेतु शान्ति, कल्याण और कुशल-गति प्राप्त हो।
Mantra 1
रथं यान्तं कुह को ह वां नरा प्रति द्युमन्तं सुविताय भूषति । प्रातर्यावाणं विभ्वं विशेविशे वस्तोर्वस्तोर्वहमानं धिया शमि ॥
हे दो वीर नरों, तुम्हारे गतिमान रथ का स्वागत कौन करेगा—तुम्हारी उस दीप्त शक्ति का, जो शुभ-गमन के लिए है? तुम जो प्रातःकाल आते हो, सर्वव्यापी, कुल-कुल में जाते हुए, हर उषा और हर संध्या में वहन किए जाते हुए—हम अपनी धिया में तुम्हें शान्त करें; और तुम्हारा आगमन हमारे भीतर शान्ति को स्थिर करे।
Mantra 2
कुह स्विद्दोषा कुह वस्तोरश्विना कुहाभिपित्वं करतः कुहोषतुः । को वां शयुत्रा विधवेव देवरं मर्यं न योषा कृणुते सधस्थ आ ॥
हे अश्विनौ! सचमुच रात्रि में तुम कहाँ होते हो, उषा के समय कहाँ? तुम अपना घनिष्ठ संगम कहाँ करते हो, कहाँ विश्राम करते हो? कौन तुम्हारे लिए संगति का आसन सजाता है—जैसे विधवा देवर को चाहती है, जैसे युवती अपने प्रिय को तैयार करती है—कि तुम इस समान-सदन, इस साझा अधिष्ठान में आओ?
Mantra 3
प्रातर्जरेथे जरणेव कापया वस्तोर्वस्तोर्यजता गच्छथो गृहम् । कस्य ध्वस्रा भवथः कस्य वा नरा राजपुत्रेव सवनाव गच्छथः ॥
प्रातः तुम काँपती हुई वृद्धा-सी जाग उठते हो; और संध्या-संध्या, उषा-उषा, हे यजनीय, तुम गृह की ओर जाते हो। तुम किसके निकट सहचर बनते हो, और किसके, हे नर-वीर? राजपुत्रों की भाँति तुम सवनों—सोम-निष्पीडनों—की ओर जाते हो।
Mantra 4
युवां मृगेव वारणा मृगण्यवो दोषा वस्तोर्हविषा नि ह्वयामहे । युवं होत्रामृतुथा जुह्वते नरेषं जनाय वहथः शुभस्पती ॥
तुम दोनों, जैसे वन्य-मृग के खोजी, हम रात्रि और उषा में हवि के साथ पुकारते हैं। हे शुभस्पती, तुम दोनों ऋतु के अनुसार, विधि-क्रम से, जब होतृ जुहू से आहुति देता है, तब ‘नरेष’—नर-बल, वीर-रस—को जनों तक वहन करते हो।
Mantra 5
युवां ह घोषा पर्यश्विना यती राज्ञ ऊचे दुहिता पृच्छे वां नरा । भूतं मे अह्न उत भूतमक्तवेऽश्वावते रथिने शक्तमर्वते ॥
हे अश्विनौ! राजा की पुत्री घोषा, खोज में भटकती हुई, तुम दोनों से बोली; हे नरवीरौ, उसने तुमसे पूछा—“मेरे दिन में उपस्थित रहो और मेरी रात में भी उपस्थित रहो; अश्ववान को, रथी को, और धावक को सामर्थ्य दो—अग्रसर जीवन के लिए बल प्रदान करो।”
Mantra 6
युवं कवी ष्ठः पर्यश्विना रथं विशो न कुत्सो जरितुर्नशायथः । युवोर्ह मक्षा पर्यश्विना मध्वासा भरत निष्कृतं न योषणा ॥
हे अश्विनौ! तुम दोनों कवि-शक्ति हो; रथ के चारों ओर विचरते हुए तुम जनों की रक्षा करते हो—जैसे कुत्स जारित्र (स्तुतिकर्ता) को नाश से बचाता है। हे अश्विनौ, तुम्हारे चारों ओर शीघ्र ही मधुमय आनंद है; उसे यहाँ ले आओ—जैसे युवती सुसज्जित, निष्कृत (मुक्त/उद्घाटित) वस्तु को आगे लाती है।
Mantra 7
युवं ह भुज्युं युवमश्विना वशं युवं शिञ्जारमुशनामुपारथुः । युवो ररावा परि सख्यमासते युवोरहमवसा सुम्नमा चके ॥
तुमने ही भुज्यु को (विपत्ति से) लौटा लाया; तुमने, हे अश्विनौ, वश को (भी) पहुँचाया; तुमने उत्कंठित शिञ्जार को समीप लाया। तुम्हारे चारों ओर गूँजने वाले मित्रभाव में आसन लेते हैं; तुम्हारी सहायता से मैं अपने लिए सुम्न—कल्याणमय अनुग्रह—रचता हूँ।
Mantra 8
युवं ह कृशं युवमश्विना शयुं युवं विधन्तं विधवामुरुष्यथः । युवं सनिभ्यः स्तनयन्तमश्विनाप व्रजमूर्णुथः सप्तास्यम् ॥
तुम ही दुर्बल की सहायता करते हो; हे अश्विनौ, तुमने शयु की भी सहायता की; तुम विधवा को ग्रस लेने वाले वैधव्य से यजमान/उपासक की रक्षा करते हो। हे अश्विनौ, तुम लाभ-प्रार्थियों के लिए गर्जनशील व्रज (बाड़ा/आवरण) को—सप्तास्य (सात-मुख) को—खोल देते हो।
Mantra 9
जनिष्ट योषा पतयत्कनीनको वि चारुहन्वीरुधो दंसना अनु । आस्मै रीयन्ते निवनेव सिन्धवोऽस्मा अह्ने भवति तत्पतित्वनम् ॥
कन्या जन्म लेती है; युवक (कनीनक) उसकी ओर उड़ता/दौड़ता है; सुन्दर-हनु (चारुहन्वी) शक्तियाँ कर्म-कौशल (दंसना) के पीछे चलती हैं। उसके लिए धाराएँ ढलान की ओर जैसे बहती हैं; उसी दिन उसके लिए पतित्व—अधिकार/स्वामित्व की अवस्था—उत्पन्न होती है।
Mantra 10
जीवं रुदन्ति वि मयन्ते अध्वरे दीर्घामनु प्रसितिं दीधियुर्नरः । वामं पितृभ्यो य इदं समेरिरे मयः पतिभ्यो जनयः परिष्वजे ॥
वे जीवित के लिए रोते हैं, और अध्वर (यज्ञ) में रूपान्तरित हो जाते हैं; नर दीर्घ प्रसृति—लम्बे प्रस्थान-पथ—पर अपनी धिया (विचार) को स्थिर करते हैं। पितरों के लिए प्रिय हैं वे, जो इस गति को इस प्रकार प्रेरित करते हैं; जनयः (पत्नीगण) हर्ष में अपने पतियों का आलिंगन करती हैं।
Mantra 11
न तस्य विद्म तदु षु प्र वोचत युवा ह यद्युवत्याः क्षेति योनिषु । प्रियोस्रियस्य वृषभस्य रेतिनो गृहं गमेमाश्विना तदुश्मसि ॥
हम उसे नहीं जानते—उसे तो हमारे लिए स्पष्ट कहो: वह युवा-शक्ति युवती की योनियों (गर्भ-आश्रयों) में कैसे निवास करती है। हे अश्विनौ, प्रकाश-बीज से समृद्ध प्रिय वृषभ के गृह को हम जाएँ—यही हमारी अभिलाषा है।
Mantra 12
आ वामगन्त्सुमतिर्वाजिनीवसू न्यश्विना हृत्सु कामा अयंसत । अभूतं गोपा मिथुना शुभस्पती प्रिया अर्यम्णो दुर्याँ अशीमहि ॥
हे वाजिनीवसू (समृद्धि-स्वामी) अश्विनौ, आपके पास सुमति (सद्बुद्धि) आई है; हृदयों में कामनाएँ स्थापित हुई हैं। हे शुभस्पती, युगल होकर गोपा (रक्षक) बनो; हम आर्यमन् के प्रिय द्वारों तक पहुँचें।
Mantra 13
ता मन्दसाना मनुषो दुरोण आ धत्तं रयिं सहवीरं वचस्यवे । कृतं तीर्थं सुप्रपाणं शुभस्पती स्थाणुं पथेष्ठामप दुर्मतिं हतम् ॥
हे दोनों, मनुष्य के गृह में आनंदित होकर, वाणी-सेवी के लिए सहवीर (वीर-शक्ति सहित) रयि—समृद्धि—धरो। हे शुभस्पती, तीर्थ (पार-स्थान) को सु-प्रपाण (सुप्रजल) करो; पथ में ठूँठ-सा अड़कर खड़ी दुर्मति (कुमति) को दूर मारो।
Mantra 14
क्व स्विदद्य कतमास्वश्विना विक्षु दस्रा मादयेते शुभस्पती । क ईं नि येमे कतमस्य जग्मतुर्विप्रस्य वा यजमानस्य वा गृहम् ॥
आज वास्तव में कहाँ, और किन-किन जनों के बीच, हे अश्विनौ—हे दसरौ, हे शुभस्पती—तुम दोनों आनंद लेते हो? यहाँ तुम्हें किसने रोका—किसके गृह को तुम दोनों गए हो: ऋषि के, या यजमान के?
The Aśvinau are twin Vedic deities who arrive at dawn in a radiant chariot. They are praised as swift helpers, healers, and protectors who respond quickly to human prayers.
It asks the Aśvins to come to the worshipper, bring peace of mind, protect life and household, and remove obstacles so one can move forward with ‘suvitā’—a good and safe passage.
Because the hymn is an invitation. By asking where they are and whose house they have chosen, the poet intensifies the call so the Aśvins turn their attention and blessings toward the reciter’s home and ritual.
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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