
Sukta 10.33
Pūṣan (inner guide) with Viśve Devāḥ as protectors
यह सूक्त पूषन् को ‘अंतः’ धारण किए हुए अंतर्यामी मार्गदर्शक के रूप में प्रस्तुत करता है, जबकि विश्वे देवाः संकट, भय और शत्रुतापूर्ण शक्तियों के विरुद्ध सामूहिक रक्षक बनकर खड़े हैं। इसमें यात्रा और संरक्षण का भाव नैतिक उपदेश के साथ जुड़ता है: देवताओं के व्रत (ऋत/विश्व-नियम) का उल्लंघन नहीं करना चाहिए, और सच्चा विस्तार ‘सम्यक् युग्मन’ से होता है—अर्थात् अनुशासित रूप से स्वयं को दिव्य व्यवस्था के अनुरूप जोड़ना।
Mantra 1
प्र मा युयुज्रे प्रयुजो जनानां वहामि स्म पूषणमन्तरेण । विश्वे देवासो अध मामरक्षन्दुःशासुरागादिति घोष आसीत् ॥
मनुष्यों के अग्रणी मुझे आगे जोतते हैं; मैं भीतर पूषण को धारण किए हुए वहन करता था। तब सब देवों ने मेरी रक्षा की—‘दुःशासु आ गया!’—ऐसा ही घोष उठा।
Mantra 2
सं मा तपन्त्यभितः सपत्नीरिव पर्शवः । नि बाधते अमतिर्नग्नता जसुर्वेर्न वेवीयते मतिः ॥
मेरी पसलियाँ चारों ओर मुझे तपाती हैं, मानो सौतन स्त्रियाँ; अमति (अज्ञान) मुझे दबाती है—नग्नता, क्षीणता। मेरा मन भय की भाँति काँपकर दूर नहीं भागता।
Mantra 3
मूषो न शिश्ना व्यदन्ति माध्य स्तोतारं ते शतक्रतो । सकृत्सु नो मघवन्निन्द्र मृळयाधा पितेव नो भव ॥
हे शतक्रतो! जैसे चूहे कुतरते हैं, वैसे ही वे मेरे मध्य—मेरे ही बल को—और तेरे स्तोता को कुतर रहे हैं। हे मघवन् इन्द्र! एक बार तो हम पर दया कर; तब तू हमारे लिए पिता के समान हो जा।
Mantra 4
कुरुश्रवणमावृणि राजानं त्रासदस्यवम् । मंहिष्ठं वाघतामृषिः ॥
ऋषि ने कुरुश्रवण—त्रासदस्यव राजा—को चुना, जो वाणी के गायक स्तोताओं के लिए अत्यन्त उदार, सर्वाधिक दानी था।
Mantra 5
यस्य मा हरितो रथे तिस्रो वहन्ति साधुया । स्तवै सहस्रदक्षिणे ॥
जिसके रथ को तीन हरित अश्व वहन करते हैं—वह सहस्र-दक्षिण, दान-समर्थ प्रभु, साधु-मार्ग से चलने वाला, हमारे स्तवन से प्रशंसित हो।
Mantra 6
यस्य प्रस्वादसो गिर उपमश्रवसः पितुः । क्षेत्रं न रण्वमूचुषे ॥
जिसकी वाणी निरन्तर अधिक मधुर होती जाती है—पिता के पुत्र उपमश्रवस् की वे गिराएँ—उन्होंने रमणीय क्षेत्र के समान उद्घोष किया है; जैसे विस्तृत, मनोहर खेत, वैसे ही वह वचन-विस्तार उन्नति का आधार है।
Mantra 7
अधि पुत्रोपमश्रवो नपान्मित्रातिथेरिहि । पितुष्टे अस्मि वन्दिता ॥
हे पुत्र उपमश्रवस्, मित्रातिथि के नपात्, यहाँ आओ। पिता के आधार पर स्थित होकर मैं तुम्हारा वन्दन करने वाला स्तुतिकार हूँ; तुम्हें नमस्कार अर्पित करता हूँ।
Mantra 8
यदीशीयामृतानामुत वा मर्त्यानाम् । जीवेदिन्मघवा मम ॥
यदि मैं अमृतों में—अथवा मर्त्यों में भी—ईशित्व प्राप्त कर सकूँ, तो मेरा मघवन् (मघवान्) मेरे भीतर ही निश्चय जीवित रहे; समृद्धि का स्वामी मेरे प्राण को धारण करे।
Mantra 9
न देवानामति व्रतं शतात्मा चन जीवति । तथा युजा वि वावृते ॥
जो देवताओं के व्रत का अतिक्रमण करता है, वह—मानो सौ आत्माएँ भी हों—फिर भी नहीं जीता। केवल सम्यक् युग्मन (युजा) से ही मनुष्य विस्तार पाकर सत्य-भवन में प्रवृत्त होता है।
Pūṣan is the Vedic guide of paths and safe passages. In this hymn he is presented as an inner guide—something the worshipper ‘carries within’ while moving through danger.
The Viśve Devāḥ are the ‘All-Gods,’ a collective form of divine protection. They represent the unified powers that guard the worshipper when threats arise and when one stays aligned with ṛta.
It teaches that no one truly thrives by crossing the gods’ law (vrata). Real growth and freedom come from ‘right yoking’—disciplined alignment of action and mind with divine order.
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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