
Sukta 10.13
Dual devatā (vām) unspecified in the provided excerpt; broadly addressed to a paired divine power; also invokes the Viśve Devāḥ (‘all gods’) as amṛtasya putrāḥ.
Triṣṭubh (probable; requires verification).
यह संक्षिप्त सूक्त “प्राचीन वाणी/ब्रह्म” (pūrvyaṃ brahma) को एक युगल दिव्य शक्ति (vām) के साथ जोड़ता है और प्रार्थना करता है कि शुद्ध किया हुआ स्तोत्र-गान प्रेरित ऋषि के लिए सुनिश्चित पथ की भाँति अग्रसर हो। इसके बाद यह वाणी और रूप का एक प्रतीकात्मक, लगभग छन्दोमय-याज्ञिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है—पाँच पद, चार-पदीय माप, और अविनाशी अक्षर (akṣara)—ताकि गायक को ऋत, अर्थात् सत्य-व्यवस्था, के साथ समन्वित किया जा सके। अंत में सात प्रवहमान धाराओं और प्रकाशमान द्वैत की छवि एक ऐसी समाहित, पोषित पूर्णता दिखाती है जिसमें परस्पर पूरक शक्तियाँ मिलकर सत्य के कार्य को धारण करती हैं।
Mantra 1
युजे वां ब्रह्म पूर्व्यं नमोभिर्वि श्लोक एतु पथ्येव सूरेः । शृण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्रा आ ये धामानि दिव्यानि तस्थुः ॥
मैं तुम्हारे लिए उस प्राचीन ब्रह्म (वाणी) को नमस्कारों सहित युग्मित करता हूँ; प्रेरित सूरे (ऋषि) के पथ की भाँति यह स्पष्ट श्लोक आगे बढ़े। अमृत के पुत्र—जो दिव्य धामों में स्थित हैं—वे सब सुनें; ताकि उच्च शक्तियाँ आत्मा की ऊर्ध्व-यात्रा को स्वीकार करें।
Mantra 2
यमे इव यतमाने यदैतं प्र वां भरन्मानुषा देवयन्तः । आ सीदतं स्वमु लोकं विदाने स्वासस्थे भवतमिन्दवे नः ॥
यम-लोक के समान, जब देव-यज्ञ की कामना करने वाले मनुष्य तुम्हारे लिए इस (सोम) को आगे लाते हैं, तब तुम अपने ही ज्ञात लोक में आकर विराजो। हमारे इस इन्दु (सोम) के लिए अपने स्वस्थान में दृढ़तापूर्वक प्रतिष्ठित होओ—ताकि आनन्द अपने सत्य-गृह में हमारे भीतर ही प्राप्त हो।
Mantra 3
पञ्च पदानि रुपो अन्वरोहं चतुष्पदीमन्वेमि व्रतेन । अक्षरेण प्रति मिम एतामृतस्य नाभावधि सं पुनामि ॥
मैं रूप के पीछे उसके पाँच पदों पर चढ़ता हूँ; ऋत के विधान से मैं चार-पदी माप का अनुसरण करता हूँ। अक्षर (अविनाशी ध्वनि) से मैं इसे प्रत्यावर्तित नापता हूँ; ऋत की नाभि पर मैं इसे शुद्ध कर एकत्र करता हूँ।
Mantra 4
देवेभ्यः कमवृणीत मृत्युं प्रजायै कममृतं नावृणीत । बृहस्पतिं यज्ञमकृण्वत ऋषिं प्रियां यमस्तन्वं प्रारिरेचीत् ॥
देवों में किसे उसने मृत्यु के लिए चुना, और प्रजा के लिए किसे अमृतत्व के हेतु नहीं चुना? उन्होंने बृहस्पति को यज्ञ—प्रिय ऋषि—बनाया; यम ने अपनी तनु को आगे फैलाया—मर्त्य देह को वह क्षेत्र ठहराते हुए जहाँ पवित्र कर्म सिद्ध हो और उससे परे भी जाया जा सके।
Mantra 5
सप्त क्षरन्ति शिशवे मरुत्वते पित्रे पुत्रासो अप्यवीवतन्नृतम् । उभे इदस्योभयस्य राजत उभे यतेते उभयस्य पुष्यतः ॥
मरुत्वान् पिता के लिए, होने वाले शिशु के लिए, सात धाराएँ प्रवाहित होती हैं; पुत्रों ने भी ऋत (सत्य-नियम) को आगे बढ़ाया, उसे क्रियाशील किया। उसकी द्विविध सत्ता के दोनों पक्ष प्रकाशमान हैं; दोनों ही प्रयत्न करते हैं, और दोनों ही परिपूर्णता में पोषित होते हैं।
The hymn addresses a paired divine power (“you two,” vām) without clearly naming the pair in the excerpt, and it also calls on the Viśve Devāḥ (all gods) as “children of immortality.” Much of the hymn points to the guiding principle of ṛta (truth-order) and the akṣara (imperishable syllable) behind effective sacred speech.
“Ṛtasya nābhi” means the “navel” or central hub of ṛta—the truth-order. In context it suggests a truth-center where speech and action are purified and gathered so the hymn becomes accurate, aligned, and effective.
These images link the hymn to Vedic ‘measure’—both the structure of metre and the disciplined steps of right performance. The idea is that inspired speech must be correctly formed and ‘measured’ (with akṣara as the stable reference) to harmonize the singer with ṛta.
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