
Sukta 1.187
A mighty upholder of dharma (likely Indra or a related heroic power; identification requires full hymn context beyond 1.187.1)
Gayatri/Anuṣṭubh uncertain (meter requires syllable verification; short verse suggests non-Trishtubh)
यह सूक्त सोम की स्तुति करता है—उस पवित्र “पेय” (पितु) की, जो देव-संकल्प को दृढ़ करता है, देवताओं को बल देता है और वृत्र/अहि द्वारा प्रतीकित अवरोध पर विजय का सामर्थ्य प्रदान करता है। इसमें सोम की यज्ञीय पहचान (निचोड़ा गया, अर्पित, और सधमाद में साझा किया गया) के साथ उसका ब्रह्माण्डीय कार्य भी जुड़ता है: धर्म/ऋत की पुनर्स्थापना करना तथा देवों और उपासकों—दोनों के लिए शक्ति और प्रकाश को मुक्त करना।
Mantra 1
पितुं नु स्तोषं महो धर्माणं तविषीम् । यस्य त्रितो व्योजसा वृत्रं विपर्वमर्दयत् ॥
अब मैं उस महाबली की स्तुति करूँगा—महान धर्म के धारक, पराक्रम-शक्ति के स्वरूप की—जिसकी विस्तृत सामर्थ्य से त्रित ने वृत्र को संधि-संधि (जोड़-जोड़) करके चूर कर दिया।
Mantra 2
स्वादो पितो मधो पितो वयं त्वा ववृमहे । अस्माकमविता भव ॥
हे स्वादु पितो, हे मधुर पितो—हम तुम्हीं को वरण करते हैं, तुम्हीं की ओर मुड़ते हैं। हमारे रक्षक और अंतरात्मा के धारक बनो।
Mantra 3
उप नः पितवा चर शिवः शिवाभिरूतिभिः । मयोभुरद्विषेण्यः सखा सुशेवो अद्वयाः ॥
हे पितवा, हमारे निकट आओ; शिव होकर, शिव सहायों के साथ विचरो। मयोभू, अद्विषेण्य, पथ का सखा—सुशेव, अद्वय—हमारे पास आकर ठहरो।
Mantra 4
तव त्ये पितो रसा रजांस्यनु विष्ठिताः । दिवि वाता इव श्रिताः ॥
हे पितो, तुम्हारे वे रस-तत्त्व प्रदेशों के अनुगामी होकर विस्तृत हैं; वे दिवि में स्थित हैं, जैसे वायु—व्याप्त होकर धारण करते हैं।
Mantra 5
तव त्ये पितो ददतस्तव स्वादिष्ठ ते पितो । प्र स्वाद्मानो रसानां तुविग्रीवा इवेरते ॥
हे पितो (पेय), वे दाता तेरे ही हैं; हे परम-मधुर पितो, तू भी तेरा ही है। रसों की मधुरताएँ आगे उमड़ पड़ती हैं, मानो बलवान्-ग्रीवा वाले, वेग से धक्का देते हुए।
Mantra 6
त्वे पितो महानां देवानां मनो हितम् । अकारि चारु केतुना तवाहिमवसावधीत् ॥
हे पितो, तुझ्यामध्ये महान देवों का मन यथास्थान स्थापित है। सुन्दर केतु (प्रकाश-चिह्न) से वह प्रकट किया गया है; तेरी सहायता से अवरोधक सर्प (अहि) का वध होता है।
Mantra 7
यददो पितो अजगन्विवस्व पर्वतानाम् । अत्रा चिन्नो मधो पितोऽरं भक्षाय गम्याः ॥
जब वहाँ, हे पितो, तू विवस्वान्-सा दीप्त होकर पर्वतों के बीच से निकल पड़ा, तब यहाँ भी, हे मधुमय पितो, हमारे भक्षण-आत्मसात् के लिए तू सुलभ होकर प्राप्त होने योग्य है।
Mantra 8
यदपामोषधीनां परिंशमारिशामहे । वातापे पीव इद्भव ॥
जब हम जलों और औषधियों के अंश को मिलाते हैं, तब, हे वातापे (वायु-तप्त), तू हमारे भीतर निश्चय ही पुष्ट, पोषक और समृद्ध हो।
Mantra 9
यत्ते सोम गवाशिरो यवाशिरो भजामहे । वातापे पीव इद्भव ॥
हे सोम, जब हम तेरे गो-शिरस् (गवाशिर) और यव-शिरस् (यवाशिर) के मिश्रण का सेवन करते हैं, तब, हे वातापे (वायु-तप्त), तू निश्चय ही प्रचुर और पोषणकारी हो।
Mantra 10
करम्भ ओषधे भव पीवो वृक्क उदारथिः । वातापे पीव इद्भव ॥
हे औषधे, करम्भ बन—पुष्ट हो, बलवर्धक हो, व्यापक-आधार देने वाली हो। हे वातापे (वायु-तप्त), तू निश्चय ही प्रचुर और पोषणकारी हो।
Mantra 11
तं त्वा वयं पितो वचोभिर्गावो न हव्या सुषूदिम । देवेभ्यस्त्वा सधमादमस्मभ्यं त्वा सधमादम् ॥
हे पितो (सोम-पेय)! हम तुम्हें वचनों से दबाते-निचोड़ते और प्रज्वलित करते हैं, जैसे गौएँ हवि की ओर उमड़ती हैं। देवों के लिए हम तुम्हें सधमाद (सह-आनन्द) हेतु सिद्ध करते हैं; हमारे लिए भी हम तुम्हें सधमाद हेतु सिद्ध करते हैं।
The hymn primarily addresses Soma, called “pitu” (the Drink). Soma is praised as a power that supports dharma/ṛta and helps defeat obstruction symbolized by Vṛtra or Ahi.
In Vedic thought Soma empowers the gods—especially the heroic force that overcomes blockage. So the Vṛtra/Ahi motif shows Soma’s role in turning sacred offering into victorious strength and release.
Offer and cultivate Soma-like clarity: a purified, luminous energy that steadies the mind, strengthens resolve, and helps remove inner and outer obstacles, concluding in shared well-being (sadhamāda).
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