
Sukta 1.134
Gautama Rāhūgaṇa (traditional for RV 1.134)
Vāyu
Jagatī (probable; extended lines typical of Vāyu hymns here)
यह सूक्त वेगवान् वायु को आमंत्रित करता है कि वह सोम-निष्पादन (सोम-पीड़न) में सबसे पहले आए और प्रथम पान स्वीकार करे, तथा यज्ञ में उन्नत सत्य-वाणी (सूनृता) और स्थिर, जानकार मन को ले आए। इसमें उसकी जीवनदायी शक्ति की स्तुति है जो उषा की ज्योति को खोलती है, दुहने वाली गौ के समान समृद्धि को मुक्त करती है, और उसे दीप्तिमान स्वर्ग से उत्पन्न मरुतों के जन्म से जोड़ती है। इसका प्रयोजन अनुष्ठानिक भी है—प्रथम सोम पर वायु की उपस्थिति सुनिश्चित करना—और आध्यात्मिक भी—प्राण, गति और स्पष्टता को यज्ञ-शक्ति (मख) के साथ समस्वर करना।
Mantra 1
आ त्वा जुवो रारहाणा अभि प्रयो वायो वहन्त्विह पूर्वपीतये सोमस्य पूर्वपीतये । ऊर्ध्वा ते अनु सूनृता मनस्तिष्ठतु जानती । नियुत्वता रथेना याहि दावने वायो मखस्य दावने ॥
हे वायो, वेगवान जुवः (प्रेरणाएँ/आवेग), आगे को धकेलती हुई, तुझे यहाँ लाएँ—सोम के पूर्वपीतये (प्रथम पान) के लिए, उस प्रथम आस्वाद के लिए। तेरे पीछे ऊर्ध्वा सूनृता (उर्ध्व सत्य-वाणी/कल्याणकारी सत्य) चले; जानती हुई मनः (बोधयुक्त मन) स्थिर रहे। नियुत्वता रथेना (नियुतों से युक्त रथ) पर आ—दान के लिए, हे वायो—मखस्य दावने (यज्ञ-दान/अर्पण) के लिए।
Mantra 3
वायुर्युङ्क्ते रोहिता वायुररुणा वायू रथे अजिरा धुरि वोळ्हवे वहिष्ठा धुरि वोळ्हवे । प्र बोधया पुरंधिं जार आ ससतीमिव । प्र चक्षय रोदसी वासयोषसः श्रवसे वासयोषसः ॥
वायु लाल अश्वों को जोतता है; वायु ही अरुण (ताम्रवर्ण) अश्वों को। रथ पर वे अति-शीघ्र हैं, धुरी पर वहन करने में सर्वश्रेष्ठ। हे वायु, पुरंधि (समृद्धि/पूर्णता) को ऐसे जगा, जैसे जार (प्रियतम) उत्कंठित प्रिया को जगाता है। द्यावा-पृथिवी को विस्तृत दृष्टि दे; और उषाओं को श्रवस् (यश/श्रवण-समृद्धि) के लिए, उषाओं को श्रवस् के लिए, वस्त्रों-सा आवृत कर।
Mantra 4
तुभ्यमुषासः शुचयः परावति भद्रा वस्त्रा तन्वते दंसु रश्मिषु चित्रा नव्येषु रश्मिषु । तुभ्यं धेनुः सबर्दुघा विश्वा वसूनि दोहते । अजनयो मरुतो वक्षणाभ्यो दिव आ वक्षणाभ्यः ॥
तेरे लिए, दूर-विस्तार से आई शुचि उषाएँ किरणों में—नव-नव किरणों में—अपने भद्र वस्त्र बुनती हैं, हे दक्ष (दंसु)। तेरे लिए सबर्दुघा (प्रचुर-दुग्धा) धेनु समस्त वसुओं को दुहती है। तूने मरुतों को दिवः के वक्षणों (स्तनों) से—उस प्रकाशमय विशाल के वक्षणों से—जन्म दिया।
Mantra 5
तुभ्यं शुक्रासः शुचयस्तुरण्यवो मदेषूग्रा इषणन्त भुर्वण्यपामिषन्त भुर्वणि । त्वां त्सारी दसमानो भगमीट्टे तक्ववीये । त्वं विश्वस्माद्भुवनात्पासि धर्मणासुर्यात्पासि धर्मणा ॥
तेरे लिए शुचि शुक्र (दीप्त) जन—तुरण्यवः (शीघ्रगामी), मदों में उग्र—भुवर्णि (विस्तृत गमन) में अपनी प्रेरणाएँ चलाते हैं; और आपः (जल) को भी उसी भुवर्णि में प्रेरित करते हैं। दसमान (दशम-चरण वाला साधक) तुझे भाग (सौभाग्य-भाग) के लिए पूजता है, हे तक्ववीय (शीघ्र-वीर्य के स्वामी)। तू धर्मणा (ऋत/नियम) से प्रत्येक भुवन की रक्षा करता है; धर्मणा से असुर्यात् (असुर-बल/अंधकार) से भी रक्षा करता है।
Mantra 6
त्वं नो वायवेषामपूर्व्यः सोमानां प्रथमः पीतिमर्हसि सुतानां पीतिमर्हसि । उतो विहुत्मतीनां विशां ववर्जुषीणाम् । विश्वा इत्ते धेनवो दुह्र आशिरं घृतं दुह्रत आशिरम् ॥
हे वायु! इन सब में तू हमारे लिए अनुपम है; तू सोमों के प्रथम पान का अधिकारी है, तू निचोड़े हुए (सुत) सोम के पान का अधिकारी है। और उन सु-आहूत, सम्यक् प्रवृत्त जनों (विशों) का भी। तेरी समस्त धेनुएँ पोषण-रस (आशिर) दुहती हैं; वे घृत—पोषक मिश्रण—दुहती हैं।
Because Vāyu is invoked to arrive first at the Soma-pressing and receive the earliest cup; this marks him as the swift opener of the rite and the one who sets the sacrifice in right motion.
Sūnṛtā is ‘true, well-ordered speech’ or ‘upright truth.’ The hymn asks that truthful clarity accompany Vāyu’s movement, so the ritual and the mind stay aligned with what is right.
Vāyu also symbolizes prāṇa (breath) and inner momentum. Reciting or reflecting on the hymn can be taken as a way to steady the mind, invite clarity, and awaken life-energy for disciplined action.
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