
Sukta 1.129
Indra
Trishtubh (probable; verify)
यह इन्द्र-स्तोत्र देव से प्रार्थना करता है कि वह कवि के प्रेरित विचार-रथ को जोते और उसका मार्गदर्शन करे, ताकि स्तुति सच्ची ऋषि-वाणी बने और शीघ्र फल प्रदान करे। इसमें बार-बार इन्द्र को ‘रक्षो-हन्’ (शत्रु/तमसी शक्तियों का संहारक) कहकर पुकारा गया है, जो दुर्भावना, निन्दा और कुटिल विरोधों को दूर भगाकर प्रेरित गायक और उसके समुदाय की रक्षा करता है। यह सूक्त काव्यात्मक आत्मचिन्तन (मन्त्र कैसे प्रभावी बनता है) को संरक्षण, विजय तथा दुष्ट वाणी और दुष्ट अभिप्राय के क्षय की प्रत्यक्ष याचना के साथ जोड़ता है।
Mantra 1
यं त्वं रथमिन्द्र मेधसातयेऽपाका सन्तमिषिर प्रणयसि प्रानवद्य नयसि । सद्यश्चित्तमभिष्टये करो वशश्च वाजिनम् । सास्माकमनवद्य तूतुजान वेधसामिमां वाचं न वेधसाम् ॥
हे इन्द्र! जिस रथ को तुम मेधासाति (बुद्धि-लाभ) के लिए आगे बढ़ाते हो—यद्यपि वह अभी अपाक (अपरिपक्व) है—हे ऋषि-प्रेरक! तुम उसे आगे प्रेरित करते हो, तुम उसे निर्दोष रूप से आगे ले जाते हो। तुम उसे तत्क्षण ही अभीष्ट-प्राप्ति के लिए ऐसा बना देते हो कि वह वश (आज्ञाकारी) हो और वाजिन् (विजयी, बल-सम्पन्न) हो। अतः हे अनवद्य, हे तूतुजान (वेगवान)! वेधसों (ऋषियों) की इस वाणी को—वेधसों की वाणी की भाँति—हमारी भी स्वीकार करो।
Mantra 2
स श्रुधि यः स्मा पृतनासु कासु चिद्दक्षाय्य इन्द्र भरहूतये नृभिरसि प्रतूर्तये नृभिः । यः शूरैः स्वः सनिता यो विप्रैर्वाजं तरुता । तमीशानास इरधन्त वाजिनं पृक्षमत्यं न वाजिनम् ॥
हे इन्द्र! सुनो—जो तुम किसी भी युद्ध में दक्ष और समर्थ हो। नर-समूह के साथ तुम आह्वान को वहन कराने वाले हो, नर-समूह के साथ अग्रसर होकर विजय दिलाने वाले हो। जो शूरवीरों के साथ स्वर्ग-लोक (स्वः) को जीतने वाले हो, जो विप्रों के साथ वाज (बल-समृद्धि) को पार कराने वाले हो—वे ईशान (अधिपति) उस विजयी वाजिन् को पुष्ट करें, जैसे युद्ध-घोड़ा, जैसे वाजिन्।
Mantra 3
दस्मो हि ष्मा वृषणं पिन्वसि त्वचं कं चिद्यावीरररुं शूर मर्त्यं परिवृणक्षि मर्त्यम् । इन्द्रोत तुभ्यं तद्दिवे तद्रुद्राय स्वयशसे । मित्राय वोचं वरुणाय सप्रथः सुमृळीकाय सप्रथः ॥
क्योंकि तुम ही दसम (अद्भुत) हो; तुम वृषण (वृष-बल) को उभारते हो, और किसी दुर्बल मर्त्य की त्वचा तक को पुष्ट कर देते हो। हे शूर! तुम मर्त्य को चारों ओर से घेरकर ढाँप लेते हो, उसकी रक्षा करते हो। इन्द्र! यह वचन मैं तुम्हारे लिए कहता हूँ—और दिव (द्यौः) के लिए, तथा स्वयशस्वी रुद्र के लिए। मित्र के लिए मैं कहता हूँ, ऋत-व्यापक वरुण के लिए; और सुमृळीका (कृपामय) के लिए—विस्तृत कृपा वाले के लिए।
Mantra 4
अस्माकं व इन्द्रमुश्मसीष्टये सखायं विश्वायुं प्रासहं युजं वाजेषु प्रासहं युजम् । अस्माकं ब्रह्मोतयेऽवा पृत्सुषु कासु चित् । नहि त्वा शत्रुः स्तरतेः स्तृणोषि यं विश्वं शत्रुं: स्तृणोषि यम् ॥
हम अपनी इष्टि (अभिलषित सिद्धि) के लिए इन्द्र को चाहते हैं—मित्र को, विश्वायु (सर्व-जीवन) को, वाजों के युद्धों में प्रासह (अतिशय विजयी) युज (सहयोजक) को—उस प्रासह युज को। हमारे ब्रह्म (प्रेरित स्तुति-वचन) की सहायता के लिए, किसी भी संघर्ष में हमारे पास उतरो। क्योंकि कोई शत्रु तुम्हें लाँघ नहीं सकता; जिसे तुम गिराते हो, उस समस्त शत्रु को तुम गिरा देते हो।
Mantra 5
नि षू नमातिमतिं कयस्य चित्तेजिष्ठाभिररणिभिर्नोतिभिरुग्राभिरुग्रोतिभिः । नेषि णो यथा पुरानेनाः शूर मन्यसे । विश्वानि पूरोरप पर्षि वह्निरासा वह्निर्नो अच्छ ॥
निश्चय ही, जिस किसी की भी अति-मापने वाली (अतिमति) बुद्धि हो, उसे तू अपनी अत्यन्त तीक्ष्ण प्रज्वलन-शक्तियों और उग्र, बलवान सहायताओं से नीचे गिरा दे। हे शूर, जैसे तू जानता है, वैसे ही हमें प्राचीन मार्ग से ले चल। पूरु से सब शत्रु-शक्तियों को दूर हटा दे; हे वह्नि-वाहक, आ—हमारे पास आने वाला वही वह्नि बन।
Mantra 6
प्र तद्वोचेयं भव्यायेन्दवे हव्यो न य इषवान्मन्म रेजति रक्षोहा मन्म रेजति । स्वयं सो अस्मदा निदो वधैरजेत दुर्मतिम् । अव स्रवेदघशंसोऽवतरमव क्षुद्रमिव स्रवेत् ॥
मैं वह वाणी प्रकट करूँगा जो बढ़ते हुए इन्दु (सोम) के लिए कल्याणकारी है—हव्य के समान; वह मनोभाव जो बाण-बल से कम्पित होता है, जो रक्षोघ्न होकर कम्पित होता है। वह स्वयं अपने प्रहारों से हमारे पास से दुर्मति को जीतकर हटा दे; अघशंस (दुष्ट-वक्ता) नीचे बहकर दूर हो जाए—तिरस्कृत होकर, तुच्छ वस्तु की भाँति बह निकले।
Mantra 7
वनेम तद्धोत्रया चितन्त्या वनेम रयिं रयिवः सुवीर्यं रण्वं सन्तं सुवीर्यम् । दुर्मन्मानं सुमन्तुभिरेमिषा पृचीमहि । आ सत्याभिरिन्द्रं द्युम्नहूतिभिर्यजत्रं द्युम्नहूतिभिः ॥
हम उस फल को विचारशील होतृ-यज्ञ से जीतें; हे रयिवः, हम रयि की समृद्धि जीतें—जो रमणीय और विद्यमान है, वह सुवीर्य (श्रेष्ठ वीर-शक्ति) हम प्राप्त करें। दुर्मन को हम सुमन्तु (सद्भाव) से सामना कर जीतें, और उसे इषा (प्रेरक खोज-शक्ति) से जोड़कर आगे बढ़ें। सत्य आह्वानों से हम यजत्र इन्द्र को समीप लाते हैं—द्युम्न-हूतियों से, द्युम्न-हूतियों से।
Mantra 8
प्रप्रा वो अस्मे स्वयशोभिरूती परिवर्ग इन्द्रो दुर्मतीनां दरीमन्दुर्मतीनाम् । स्वयं सा रिषयध्यै या न उपेषे अत्रैः । हतेमसन्न वक्षति क्षिप्ता जूर्णिर्न वक्षति ॥
आगे-आगे—तुम्हारे लिए; और यहाँ हमारे लिए—अपने स्वयंज्योति-यशस्वी संरक्षण से इन्द्र दुर्मति वालों को उलट देने वाला, दुर्मति वालों को चीर देने वाला है। जो हमें हानि पहुँचाने और हम पर दबाव डालने को उठे, उसे अत्रियों की ऋषि-दृष्टि (ऋषित्व-तेज) से स्वयं ही विफल किया जाए। आहत होकर वह आगे नहीं बढ़ पाता—जैसे फेंकी हुई, जीर्ण वस्तु आगे नहीं चलती।
Mantra 9
त्वं न इन्द्र राया परीणसा याहि पथाँ अनेहसा पुरो याह्यरक्षसा । सचस्व नः पराक आ सचस्वास्तमीक आ । पाहि नो दूरादारादभिष्टिभिः सदा पाह्यभिष्टिभिः ॥
हे इन्द्र, तू अपने रयि-सम्पूर्णत्व के साथ हमारे आगे-आगे चल; क्लेशरहित पथों से चल; अहिंसक-रक्षा के साथ अग्रभाग में चल। दूर से भी हमारे साथ रह, और निकट से भी हमारे साथ रह। दूर और पास—दोनों ओर से—अपनी सुनिश्चित सहायताओं (अभिष्टियों) से हमारी रक्षा कर; सदा अपनी अभिष्टियों से रक्षा कर।
Mantra 10
त्वं न इन्द्र राया तरूषसोग्रं चित्त्वा महिमा सक्षदवसे महे मित्रं नावसे । ओजिष्ठ त्रातरविता रथं कं चिदमर्त्य । अन्यमस्मद्रिरिषेः कं चिदद्रिवो रिरिक्षन्तं चिदद्रिवः ॥
हे इन्द्र, तू अपने रयि-सम्पूर्णत्व से सबको पार कर देता है; तेरी उग्र महिमा भी सहायता करने में समर्थ है—मानो कोई महान मित्र हमारी सहायता को आए। हे अति-बलवान, त्राता, अविता, अमर्त्य—तू किसी भी रथ-बल की रक्षा करता है। हे अद्रिवः, तू किसी अन्य को तो आघात के लिए छोड़ देता है; पर हमसे तू उस एक को भी सुरक्षित रखता है जो आघात के लिए लक्षित हो।
Mantra 11
पाहि न इन्द्र सुष्टुत स्रिधोऽवयाता सदमिद्दुर्मतीनां देवः सन्दुर्मतीनाम् । हन्ता पापस्य रक्षसस्त्राता विप्रस्य मावतः । अधा हि त्वा जनिता जीजनद्वसो रक्षोहणं त्वा जीजनद्वसो ॥
हे सुष्टुत इन्द्र! हमें बचा; टेढ़े-मेढ़े विरोधों पर उतरकर हमारी रक्षा कर। देव होकर तू सदा दुष्ट-बुद्धि का दमन करने वाला है—दुर्मति का संहारक। पापमय तमस्/राक्षसी अन्धकार का हन्ता, वाणी-सम्पन्न ऋषि का रक्षक—हमारे लिए त्राता बन। क्योंकि, हे वसु! तेरे जनक ने तुझे रक्षस्-हन्ता के रूप में ही उत्पन्न किया—हे वसु, तुझे रक्षस्-हन्ता के रूप में ही उत्पन्न किया।
It asks Indra to empower the poet’s inspired speech and to protect the community by crushing evil intent, slander, and hostile forces (rakṣas).
The ‘chariot’ is the moving power of inspired mind and mantra, and the ‘arrow-force’ describes focused, penetrating praise meant to defeat negativity and opposition.
Yes. One verse offers the spoken praise as fit for the ‘growing Indu’ (Soma), aligning Indra’s power with Soma’s strengthening delight in ritual.
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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