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यह सोपान ‘विरह-धर्म’ का द्वार है: राजधर्म, पुत्रधर्म, और भक्तिधर्म का एक साथ परीक्षण। अयोध्या काण्ड में राम का वनगमन केवल राजनीतिक घटना नहीं, ‘अनासक्ति’ और ‘आज्ञापालन’ की साधना है—जहाँ सुख (राज्य) त्यागकर ‘राम-नाम-स्मरण’ और ‘मर्यादा’ को मोक्ष-मार्ग की सीढ़ी बनाया जाता है। इस अंश में वन-जीवन की मधुरता (सीता का संतोष) और अयोध्या की वेदना (सुमंत्र-दशरथ का शोक) साथ रखकर तुलसी ‘राग’ को ‘वैराग्य’ में रूपांतरित करते हैं।
इस खंड का प्रधान रस करुण है; पर यह करुणा ‘विषाद’ नहीं, ‘भक्ति-परिपाक’ है। प्रथम भाग में सीता का वन-सुख (श्रृंगार-शान्त का मिश्र) प्रकट होता है—प्रियतम-संग, कन्द-मूल-फल, पर्णकुटी—ये सब मिलकर वन को ‘अवध सहस सम’ प्रिय बना देते हैं। तुलसी यहाँ विषय-भोग-निषेध को नकारात्मक उपदेश से नहीं, वरन् उच्चतर आसक्ति—राम-चरण-अनुराग—से प्रतिस्थापित करते हैं। फिर दृष्टि पलटती है: सुमंत्र की वापसी, घोड़ों का विरह-विकार, नगर का सन्नाटा, और दशरथ का टूटना—करुण-रस अपने चरम पर पहुँचता है। यह सोपान-व्यवस्था में निर्णायक है: राम का ‘मर्यादा-पुरुषोत्तम’ रूप तभी पूर्ण होता है जब उनके त्याग की पीड़ा समाज (अयोध्या) में नैतिक जागरण बनकर उतरती है। इस प्रकार ‘विरह’ तपस्या बनकर मन को विषय-विलास से काटता और नाम-स्मरण में स्थिर करता है।
Verse 286 (चौपाई)
राम संग सिय रहति सुखारी। पुर परिजन गृह सुरति बिसारी।। छिनु छिनु पिय बिधु बदनु निहारी। प्रमुदित मनहुँ चकोरकुमारी।। नाह नेहु नित बढ़त बिलोकी। हरषित रहति दिवस जिमि कोकी।। सिय मनु राम चरन अनुरागा। अवध सहस सम बनु प्रिय लागा।। परनकुटी प्रिय प्रियतम संगा। प्रिय परिवारु कुरंग बिहंगा।। सासु ससुर सम मुनितिय मुनिबर। असनु अमिअ सम कंद मूल फर।। नाथ साथ साँथरी सुहाई। मयन सयन सय सम सुखदाई।। लोकप होहिं बिलोकत जासू। तेहि कि मोहि सक बिषय बिलासू।।
सीता राम के साथ सुखी रहती हैं, नगर, परिजन और गृह को भूलकर। प्रतिक्षण अपने प्रियतम के चंद्रमा समान मुख को देखकर, उनका मन चकोरकुमारी के समान प्रफुल्लित होता है। दिन-प्रतिदिन उनका प्रेम देखते-देखते बढ़ता है; वे दिन में कोकिल के समान हर्षित रहती हैं। सीता का मन राम के चरणों में अनुरक्त है; वन उन्हें सहस्त्र अयोध्या के समान प्रिय लगता है। पर्णकुटी प्रिय है जब प्रियतम साथ हो; प्रिय परिवार वन के मृग और पक्षियों के समान है। सास-ससुर मुनिपत्नी और मुनिश्रेष्ठ के समान हैं; उनका भोजन अमृत समान है, कंद-मूल-फल दिव्य व्यंजन के समान। स्वामी की उपस्थिति से पत्तों का शय्यागृह भी सुहावना लगती है; तृण की शय्या, उत्तम शय्या के समान सुखदायिनी है। जिन्हें देखकर लोकप होते हैं; फिर मुझे कौन सा सांसारिक विलास बाँध सकता है?
Verse 287 (दोहा/सोरठा)
सुमिरत रामहि तजहिं जन तृन सम बिषय बिलासु। रामप्रिया जग जननि सिय कछु न आचरजु तासु।।140।।
जो राम का स्मरण करते हैं, वे सांसारिक विलासों को तृण के समान त्याग देते हैं; सीता जगजननी राम को प्रिय हैं, इसमें कोई आश्चर्य नहीं।
Verse 288 (चौपाई)
सीय लखन जेहि बिधि सुखु लहहीं। सोइ रघुनाथ करहि सोइ कहहीं।। कहहिं पुरातन कथा कहानी। सुनहिं लखनु सिय अति सुखु मानी।। जब जब रामु अवध सुधि करहीं। तब तब बारि बिलोचन भरहीं।। सुमिरि मातु पितु परिजन भाई। भरत सनेहु सीलु सेवकाई।। कृपासिंधु प्रभु होहिं दुखारी। धीरजु धरहिं कुसमउ बिचारी।। लखि सिय लखनु बिकल होइ जाहीं। जिमि पुरुषहि अनुसर परिछाहीं।। प्रिया बंधु गति लखि रघुनंदनु। धीर कृपाल भगत उर चंदनु।। लगे कहन कछु कथा पुनीता। सुनि सुखु लहहिं लखनु अरु सीता।।
जिस प्रकार सीता और लक्ष्मण सुख पाते हैं, रघुनाथ वही करते हैं और वही कहते हैं। वे पुरातन कथाएँ और कहानियाँ सुनाते हैं; लक्ष्मण सुनते हैं और सीता अत्यंत सुख मानती हैं। जब-जब राम अयोध्या का स्मरण करते हैं, तब-तब उनके नेत्रों में जल भर आता है। माता, पिता, परिजन, भाइयों, भरत के स्नेह, शील और सेवकता का स्मरण करके। कृपासिंधु प्रभु दुखी होते हैं; तथापि उचित अवसर विचारकर धैर्य धारण करते हैं। सीता और लक्ष्मण को व्याकुल देखकर वे चिंतित हो जाते हैं, जैसे कोई पुरुष अपने अनुचरों के लिए परेशान रहता है। अपनी प्रिया और भ्राता की अवस्था देखकर, रघुनंदन, धीर और कृपालु, भक्तों के हृदय को शीतल करने वाले चंद्रमा बन जाते हैं। वे कुछ पवित्र कथा कहने लगते हैं; सुनकर लक्ष्मण और सीता सुख पाते हैं।
Verse 289 (दोहा/सोरठा)
रामु लखन सीता सहित सोहत परन निकेत। जिमि बासव बस अमरपुर सची जयंत समेत।।141।।
राम, लक्ष्मण और सीता के साथ अपने वन-निकेतन में शोभायमान थे, जैसे इंद्र देवपुर में शची और जयंत के साथ शोभायमान रहते हैं।
Verse 290 (चौपाई)
जोगवहिं प्रभु सिय लखनहिं कैसें। पलक बिलोचन गोलक जैसें।। सेवहिं लखनु सीय रघुबीरहि। जिमि अबिबेकी पुरुष सरीरहि।। एहि बिधि प्रभु बन बसहिं सुखारी। खग मृग सुर तापस हितकारी।। कहेउँ राम बन गवनु सुहावा। सुनहु सुमंत्र अवध जिमि आवा।। फिरेउ निषादु प्रभुहि पहुँचाई। सचिव सहित रथ देखेसि आई।। मंत्री बिकल बिलोकि निषादू। कहि न जाइ जस भयउ बिषादू।। राम राम सिय लखन पुकारी। परेउ धरनितल ब्याकुल भारी।। देखि दखिन दिसि हय हिहिनाहीं। जनु बिनु पंख बिहग अकुलाहीं।।
प्रभु, सीता और लक्ष्मण इस प्रकार जुड़े थे, जैसे पलकें नेत्रगोलक से जुड़ी होती हैं। लक्ष्मण सीता और रघुवीर की सेवा करते थे, जैसे अविवेकी शरीर आत्मा की सेवा करता है। इस प्रकार प्रभु वन में सुखपूर्वक निवास करते थे, पक्षियों, मृगों, देवताओं और तपस्वियों के हितकारी। मैंने राम के वनगमन का सुहावना वर्णन किया; अब सुनिए सुमंत्र, कैसे वे अयोध्या आए। निषाद ने प्रभु को पहुँचाकर लौटकर रथ और मंत्री के साथ आ गए। मंत्री निषाद को देखकर व्याकुल थे; जो शोक हुआ था वह कहा नहीं जा सकता। राम, राम, सीता, लक्ष्मण पुकारते हुए वे भारी व्याकुलता से धरती पर गिर पड़े। घोड़ों को दक्षिण दिशा की ओर देखकर, ऐसा लग रहा था जैसे बिना पंखों के पक्षी अत्यंत संतप्त हों।
Verse 291 (दोहा/सोरठा)
नहिं तृन चरहिं पिअहिं जलु मोचहिं लोचन बारि। ब्याकुल भए निषाद सब रघुबर बाजि निहारि।।142।।
वे घास नहीं चरते, जल नहीं पीते, उनके नेत्रों से जल बहता है। सभी निषाद रघुवर के अश्वों को देखकर व्याकुल हो गए।
Verse 292 (चौपाई)
धरि धीरज तब कहइ निषादू। अब सुमंत्र परिहरहु बिषादू।। तुम्ह पंडित परमारथ ग्याता। धरहु धीर लखि बिमुख बिधाता।। बिबिध कथा कहि कहि मृदु बानी। रथ बैठारेउ बरबस आनी।। सोक सिथिल रथ सकइ न हाँकी। रघुबर बिरह पीर उर बाँकी।। चरफराहिं मग चलहिं न घोरे। बन मृग मनहुँ आनि रथ जोरे।। अढ़ुकि परहिं फिरि हेरहिं पीछें। राम बियोगि बिकल दुख तीछें।। जो कह रामु लखनु बैदेही। हिंकरि हिंकरि हित हेरहिं तेही।। बाजि बिरह गति कहि किमि जाती। बिनु मनि फनिक बिकल जेहि भाँती।।
तब निषाद ने धैर्य धारण करके कहा: अब सुमंत्र, शोक त्याग दीजिए। आप पंडित हैं, परमार्थ के ज्ञाता हैं; विधाता को विमुख जानकर धैर्य रखिए। अनेक कोमल वचनों और कथाओं से उन्हें बलपूर्वक रथ में बैठाकर लाए। शोक से शिथिल रथ को हाँकना संभव नहीं था; रघुवर के विरह का पीड़ा हृदय में बनी रही। घोड़े काँपते थे और आगे नहीं बढ़ते थे; मानो वन के मृग रथ में जुते गए हों। वे ठोकर खाकर गिरते और पीछे मुड़कर देखते; राम वियोग से व्याकुल और दुखी। जब कोई राम, लक्ष्मण या वैदेही का नाम लेता, वे हिनहिनाकर उसी ओर अपने प्रिय को देखते। अश्वों की विरह की अवस्था कौन कह सकता है? वे बिना मणि के सर्प के समान अत्यंत व्याकुल थे।
Verse 293 (दोहा/सोरठा)
भयउ निषाद बिषादबस देखत सचिव तुरंग। बोलि सुसेवक चारि तब दिए सारथी संग।।143।।
निषाद शोक से अभिभूत होकर मंत्री और घोड़ों को देखता रहा। तब उसने चार अच्छे सेवकों को बुलाकर उन्हें सारथी के साथ भेज दिया।
Verse 294 (चौपाई)
गुह सारथिहि फिरेउ पहुँचाई। बिरहु बिषादु बरनि नहिं जाई।। चले अवध लेइ रथहि निषादा। होहि छनहिं छन मगन बिषादा।। सोच सुमंत्र बिकल दुख दीना। धिग जीवन रघुबीर बिहीना।। रहिहि न अंतहुँ अधम सरीरू। जसु न लहेउ बिछुरत रघुबीरू।। भए अजस अघ भाजन प्राना। कवन हेतु नहिं करत पयाना।। अहह मंद मनु अवसर चूका। अजहुँ न हृदय होत दुइ टूका।। मीजि हाथ सिरु धुनि पछिताई। मनहँ कृपन धन रासि गवाँई।। बिरिद बाँधि बर बीरु कहाई। चलेउ समर जनु सुभट पराई।।
गुह ने सारथी को पहुँचाकर वापस किया; विरह का शोक वर्णन नहीं किया जा सकता। निषादों ने रथ लेकर अयोध्या के लिए प्रस्थान किया; प्रति क्षण वे शोक में डूबे रहे। सुमंत्र चिंता और शोक से व्याकुल होकर बोले: 'रघुवीर के बिना यह जीवन धिक्कार है! यह नीच शरीर अंत तक नहीं रहेगा, क्योंकि रघुवीर के वियोग में इसने यश नहीं पाया। मेरा प्राण पाप और अपयश का पात्र बन गया; किस कारण से यह नष्ट नहीं होता? हाय, मेरा मन मंद था और मैंने अवसर खो दिया; अभी तक मेरा हृदय दो टुकड़े नहीं हुआ। वह हाथ से सिर पीटकर पछताता रहा, और मन में उसने अपना धन खो दिया। प्रतिज्ञा से बद्ध होकर वह वीर कहलाया; वह युद्ध के लिए चला, जैसे योद्धा युद्धभूमि को जाता है।
Verse 295 (दोहा/सोरठा)
बिप्र बिबेकी बेदबिद संमत साधु सुजाति। जिमि धोखें मदपान कर सचिव सोच तेहि भाँति।।144।।
जो ब्राह्मण विवेकी, वेदविद्, साधुओं द्वारा स्वीकृत और उत्तम कुल में जन्मा हो, जब वह गुप्त रूप से मद्य पान करता है, तो उसी प्रकार मंत्री चिंता से भर जाता है।
Verse 296 (चौपाई)
जिमि कुलीन तिय साधु सयानी। पतिदेवता करम मन बानी।। रहै करम बस परिहरि नाहू। सचिव हृदयँ तिमि दारुन दाहु।। लोचन सजल डीठि भइ थोरी। सुनइ न श्रवन बिकल मति भोरी।। सूखहिं अधर लागि मुहँ लाटी। जिउ न जाइ उर अवधि कपाटी।। बिबरन भयउ न जाइ निहारी। मारेसि मनहुँ पिता महतारी।। हानि गलानि बिपुल मन ब्यापी। जमपुर पंथ सोच जिमि पापी।। बचनु न आव हृदयँ पछिताई। अवध काह मैं देखब जाई।। राम रहित रथ देखिहि जोई। सकुचिहि मोहि बिलोकत सोई।।
जैसे कुलीन, साध्वी और बुद्धिमती स्त्री अपने पतिदेवता की कर्म, मन और वाणी से पूजा करती है और पति के वश में रहकर अन्य सब त्याग देती है, उसी प्रकार मंत्री के हृदय में भयंकर ज्वाला जली। उसके नेत्र आर्द्र हो गए, दृष्टि अस्थिर हो गई; कान कुछ नहीं सुनते थे, उसका मन मोहित हो गया था। ओठ सूख गए, मुख सूखा; प्राण नहीं जाते थे, हृदय के कपाट बंद थे। वह पहचाने न जाने योग्य विवर्ण हो गया; मानो पिता और माता की मृत्यु हो गई हो। हानि और लज्जा ने मन को व्याप लिया, जैसे पापी यमपुर के मार्ग का चिंतन करता है। शब्द नहीं आते थे, हृदय पछताता था; अयोध्या में मैं जाकर क्या दिखाऊँगा? जो भी राम रहित रथ को देखेगा, वह मुझे देखकर लज्जित होगा।
Verse 297 (दोहा/सोरठा)
धाइ पूँछिहहिं मोहि जब बिकल नगर नर नारि। उतरु देब मैं सबहि तब हृदयँ बज्रु बैठारि।।145।।
जब नगर के व्याकुल पुरुष और स्त्रियाँ दौड़कर मुझसे पूछेंगी, तब मैं हृदय में वज्र बैठाकर उन सबको उत्तर दूँगा।
Verse 298 (चौपाई)
पुछिहहिं दीन दुखित सब माता। कहब काह मैं तिन्हहि बिधाता।। पूछिहि जबहिं लखन महतारी। कहिहउँ कवन सँदेस सुखारी।। राम जननि जब आइहि धाई। सुमिरि बच्छु जिमि धेनु लवाई।। पूँछत उतरु देब मैं तेही। गे बनु राम लखनु बैदेही।। जोइ पूँछिहि तेहि ऊतरु देबा। जाइ अवध अब यहु सुखु लेबा।। पूँछिहि जबहिं राउ दुख दीना। जिवनु जासु रघुनाथ अधीना।। देहउँ उतरु कौनु मुहु लाई। आयउँ कुसल कुअँर पहुँचाई।। सुनत लखन सिय राम सँदेसू। तृन जिमि तनु परिहरिहि नरेसू।।
सब माताएँ दीन और दुखी होकर पूछेंगी; हे विधाता, मैं उन्हें क्या कहूँ? जब लक्ष्मण की माता पूछेंगी, मैं कौन सा सुखद संदेश दूँ? जब राम की माता दौड़ी चली आएँगी, जैसे गाय अपने बछड़े को स्मरण करके हम्बाती है, मैं उन्हें यह उत्तर दूँगा: राम, लक्ष्मण और वैदेही वन गए हैं। जो भी पूछेगा, उसे उत्तर दूँगा; अब मैं अयोध्या जाकर यह सांत्वना लूँगा। जब राजा दुखी और दीन होकर पूछेंगे, जिनका जीवन रघुनाथ के अधीन है, मैं किस मुख से उत्तर दूँ? मैं कुमारों को पहुँचाकर आया हूँ। राम, लक्ष्मण और सीता का संदेश सुनकर राजा अपना शरीर त्याग देंगे, जैसे मनुष्य तृण को त्यागता है।
Verse 299 (दोहा/सोरठा)
ह्रदउ न बिदरेउ पंक जिमि बिछुरत प्रीतमु नीरु। जानत हौं मोहि दीन्ह बिधि यहु जातना सरीरु।।146।।
मेरा हृदय नहीं फटा, जैसे कीचड़ से जल अलग होने पर वह नहीं फटता। मैं जानता हूँ कि ब्रह्मा ने मुझे यह शरीर इस पीड़ा को सहने के लिए दिया है।
Verse 300 (चौपाई)
एहि बिधि करत पंथ पछितावा। तमसा तीर तुरत रथु आवा।। बिदा किए करि बिनय निषादा। फिरे पायँ परि बिकल बिषादा।। पैठत नगर सचिव सकुचाई। जनु मारेसि गुर बाँभन गाई।। बैठि बिटप तर दिवसु गवाँवा। साँझ समय तब अवसरु पावा।। अवध प्रबेसु कीन्ह अँधिआरें। पैठ भवन रथु राखि दुआरें।। जिन्ह जिन्ह समाचार सुनि पाए। भूप द्वार रथु देखन आए।। रथु पहिचानि बिकल लखि घोरे। गरहिं गात जिमि आतप ओरे।। नगर नारि नर ब्याकुल कैंसें। निघटत नीर मीनगन जैंसें।।
इस प्रकार पछताते हुए मार्ग करते हुए, रथ शीघ्र ही तमसा के तट पर पहुँचा। निषाद ने विनय करके विदा ली; फिर चरणों में गिरकर शोक से अभिभूत होकर वे लौट गए। मंत्री लज्जा से नगर में प्रवेश किया, मानो गुरु, ब्राह्मण या गाय की हत्या कर आए हों। वह वृक्ष के नीचे बैठकर दिन बिताता रहा; फिर सायंकाल को अवसर मिला। उसने अंधेरे में अयोध्या में प्रवेश किया; घर में जाकर रथ को द्वार पर रखा। जिन-जिन राजाओं ने समाचार सुनकर रथ देखने द्वार पर आए, उन्होंने रथ को पहचानकर भय से व्याकुल हो गए; उन्होंने अपने शरीर को धिक्कारा, जैसे धूप से जले वस्त्र को। नगर की स्त्रियाँ और पुरुष व्याकुल थे, जैसे जल सूखने पर मछलियाँ तड़पती हैं।
Verse 301 (दोहा/सोरठा)
सचिव आगमनु सुनत सबु बिकल भयउ रनिवासु। भवन भयंकरु लाग तेहि मानहुँ प्रेत निवासु।।147।।
जब सबने मंत्री के आगमन का समाचार सुना, राजप्रासाद व्याकुलता से भर गया। उन्हें वह भवन भयंकर लगा, मानो प्रेतों का निवास हो।
Verse 302 (चौपाई)
अति आरति सब पूँछहिं रानी। उतरु न आव बिकल भइ बानी।। सुनइ न श्रवन नयन नहिं सूझा। कहहु कहाँ नृप तेहि तेहि बूझा।। दासिन्ह दीख सचिव बिकलाई। कौसल्या गृहँ गईं लवाई।। जाइ सुमंत्र दीख कस राजा। अमिअ रहित जनु चंदु बिराजा।। आसन सयन बिभूषन हीना। परेउ भूमितल निपट मलीना।। लेइ उसासु सोच एहि भाँती। सुरपुर तें जनु खँसेउ जजाती।। लेत सोच भरि छिनु छिनु छाती। जनु जरि पंख परेउ संपाती।। राम राम कह राम सनेही। पुनि कह राम लखन बैदेही।।
अत्यंत व्याकुल होकर सब रानियाँ पूछने लगीं, परंतु उत्तर नहीं आया, क्योंकि उनकी वाणी रुद्ध हो गई थी। उनके कान कुछ नहीं सुनते थे, नेत्र कुछ नहीं देखते थे; वे पूछती थीं: 'बताओ, राजा कहाँ हैं?' और प्रत्येक उनसे पूछती थी। जब दासियों ने मंत्री को व्याकुल देखा, तो उन्होंने कौसल्या के गृह में ले जाया। सुमंत्र गए और देखा कि राजा कैसे हैं, अमृत रहित चंद्रमा के समान। आसन, शय्या और आभूषणों से रहित, वे पृथ्वी पर पड़े थे, पूर्णतः मलिन। वे इस प्रकार सोचकर उदासीन श्वास लेते थे, मानो स्वर्ग से गिरा दिए गए हों। वे क्षण-क्षण हृदय भरकर सोच लेते थे, जैसे जले पंखों वाला पक्षी गिर पड़ा हो। वे कहते: 'राम, राम, हे प्रिय राम', और पुनः कहते: 'राम, लक्ष्मण, वैदेही।'
Verse 303 (दोहा/सोरठा)
देखि सचिवँ जय जीव कहि कीन्हेउ दंड प्रनामु। सुनत उठेउ ब्याकुल नृपति कहु सुमंत्र कहँ रामु।।148।।
मंत्री को देखकर उन्होंने 'जय, आप जीवित रहें' कहकर सिर झुकाकर प्रणाम किया। उन्हें सुनकर राजा व्याकुल होकर उठे और बोले, 'हे सुमंत्र, बताओ, राम कहाँ हैं?'
Verse 304 (चौपाई)
भूप सुमंत्रु लीन्ह उर लाई। बूड़त कछु अधार जनु पाई।। सहित सनेह निकट बैठारी। पूँछत राउ नयन भरि बारी।। राम कुसल कहु सखा सनेही। कहँ रघुनाथु लखनु बैदेही।। आने फेरि कि बनहि सिधाए। सुनत सचिव लोचन जल छाए।। सोक बिकल पुनि पूँछ नरेसू। कहु सिय राम लखन संदेसू।। राम रूप गुन सील सुभाऊ। सुमिरि सुमिरि उर सोचत राऊ।। राउ सुनाइ दीन्ह बनबासू। सुनि मन भयउ न हरषु हराँसू।। सो सुत बिछुरत गए न प्राना। को पापी बड़ मोहि समाना।।
राजा ने सुमंत्र को हृदय से लगा लिया, जैसे कोई डूबता हुआ व्यक्ति किसी आधार को पा ले। उन्होंने उन्हें प्रेमपूर्वक पास बैठाया और आँखें आँसुओं से भरकर पूछा, 'हे प्रिय मित्र, राम का कुशल मंगल बताओ; रघुनाथ, लक्ष्मण और वैदेही कहाँ हैं? क्या वे लौट आए या वन को चले गए?' यह सुनकर मंत्री की आँखें आँसुओं से भर गईं। शोक से व्याकुल होकर राजा ने पुनः पूछा, 'सीता, राम और लक्ष्मण का क्या संदेश है?' राम के स्वरूप, गुण, चरित्र और स्वभाव को बार-बार स्मरण करते हुए राजा के हृदय में शोक भर गया। राजा ने वनवास की बात सुनी; सुनकर उनके मन में न हर्ष हुआ न शोक। ऐसे पुत्रों से बिछड़ने पर भी उनके प्राण नहीं गए; मेरे जैसा बड़ा पापी कौन होगा?
Verse 305 (दोहा/सोरठा)
सखा रामु सिय लखनु जहँ तहाँ मोहि पहुँचाउ। नाहिं त चाहत चलन अब प्रान कहउँ सतिभाउ।।149।।
हे मित्र, जहाँ भी राम, सीता और लक्ष्मण हों, मुझे वहाँ पहुँचाओ। यदि तुम ऐसा नहीं करोगे, तो जानो कि मुझे जीने की इच्छा नहीं है; मैं सत्य हृदय से कहता हूँ।
मुख्य शिक्षा यह है कि ‘त्याग’ का आधार निषेध नहीं, प्रेम है—सीता का वन-सुख बताता है कि राम-सान्निध्य/राम-स्मरण से अभाव भी ऐश्वर्य बन जाता है। ‘आज्ञापालन’ (पितृ-वचन/धर्म) को राम ने मोक्ष-मार्ग की सीढ़ी बनाया; और अयोध्या का करुण-विरह दिखाता है कि भक्ति केवल व्यक्तिगत आनंद नहीं—वह संबंधों की पीड़ा को भी धर्म-साधना में रूपांतरित करती है। विरह यहाँ शोक नहीं, तप है: मन को विषय-विलास से काटकर नाम-स्मरण में टिकाने वाली अग्नि। इस खंड में भक्तिधर्म का सार उभरता है—राम-चरण अनुराग ही सर्वोच्च आसक्ति है, जो राग को वैराग्य और करुणा को करुणा-रस के माध्यम से ‘भक्ति-परिपाक’ में बदल देती है।
इस खंड का प्रमुख रस करुण है, पर करुणा ‘विषाद’ नहीं, ‘भक्ति-परिपाक’ है। पहले भाग में सीता का वन-सुख (श्रृंगार-शांत मिश्र) दिखता है: प्रियतम-संग, कंद-मूल-फल, पर्णकुटी—ये सब ‘अवध सहस सम’ बन को प्रिय बना देते हैं। तुलसी यहाँ विषय-भोग के निषेध को नकारात्मक उपदेश से नहीं, बल्कि उच्चतर आसक्ति (राम-चरण अनुराग) से प्रतिस्थापित करते हैं। फिर दृष्टि पलटती है: सुमंत्र की वापसी, घोड़ों का विरह-विकार, नगर का सन्नाटा, और दशरथ का टूटना—करुण-रस अपने चरम पर। यह व्यवस्था-सोपान में निर्णायक है: राम का ‘मर्यादा-पुरुषोत्तम’ रूप तभी पूर्ण है जब उसके त्याग की पीड़ा समाज (अयोध्या) में नैतिक जागरण बनकर उतरती है। इस तरह ‘विरह’ एक तपस्या बनकर मन को विषय-विलास से काटता और नाम-स्मरण में टिकाता है।
आरंभ में ‘श्रृंगार-शांत’ का मधुर संयोग: सीता का राम-सान्निध्य ही वन को ‘अवध सम’ बना देता है—कंद-मूल-फल, पर्णकुटी, सरल जीवन में भी तृप्ति। यह सुख विषय-भोग का नहीं, ‘उच्चतर आसक्ति’ (राम-चरण अनुराग) का है। फिर रस-परिवर्तन: दृष्टि अयोध्या की ओर पलटते ही ‘करुण’ तीव्र होता है—सुमंत्र की वापसी, घोड़ों का विरह-विकार, नगर का सन्नाटा; सामूहिक शोक ‘धर्म-संकट’ बनकर उभरता है। अंत में करुणा ‘विषाद’ नहीं रहती—वह ‘भक्ति-परिपाक’ बनती है: त्याग की पीड़ा समाज में नैतिक जागरण, और स्मरण-मार्ग की दृढ़ता पैदा करती है; विरह तपस्या का रूप लेता है।
परंपरागत मान्यता में यह अंश ‘विरह में नाम-स्मरण’ और ‘विषय-वैराग्य’ को पुष्ट करता है: सीता-जैसा संतोष, लक्ष्मण-जैसी सेवा-बुद्धि, और सुमंत्र-दशरथ के करुण प्रसंग से हृदय द्रवित होकर अहंकार गलता है। पाठक के मन में ‘राम-रहित सुख’ तृणवत् प्रतीत होता और शरणागति की वृत्ति दृढ़ होती है।
सामान्य पाठ-परंपरा में ‘राम नाम’ का सम्पुट—विशेषतः “श्रीराम जय राम जय जय राम” या केवल “राम राम” (जैसा पाठ में स्वयं अनुगूँजता है)—करुण/विरह प्रसंगों में जोड़ा जाता है, ताकि शोक ‘स्मरण’ में रूपांतरित हो।
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