
राष्ट्रगुप्ति-संग्रहः (Protection of the Realm and Principles of Revenue & Local Administration)
Upa-parva: Rājadharmānuśāsana Upa-Parva (राजधर्मानुशासन उपपर्व)
Yudhiṣṭhira asks Bhīṣma to explain rāṣṭragupti (security/protection of the realm) and rāṣṭrasaṃgraha (the consolidation and maintenance of the kingdom). Bhīṣma outlines a tiered administrative lattice: village head (grāmika), supervisors over ten villages, then higher officers over larger aggregates (hundreds and thousands), with mandated reporting chains about local conditions and faults. He recommends continuous oversight through capable, dharma-informed officials in towns and cities, including an inspector-like figure who circulates to monitor affairs. Revenue policy is presented as calibrated assessment: taxes on merchants should consider purchase/sale, travel costs, provisions, and risk (yogakṣema); artisans should be levied in relation to production and customary recompense; rates should follow precedent yet remain non-destructive. Bhīṣma warns against over-extraction using the ‘calf-milking’ analogy: the state should draw sustenance without weakening the productive base. In crisis, the king may request extraordinary contributions by transparent communication of threats and assurances of restitution, using measured speech and timing. Special attention is given to pastoralists and frontier dwellers: neglect can ruin them, so the king should apply protection, conciliation, aid, and gentle taxation, recognizing cattle-wealth as a stabilizing resource for agriculture, trade, and overall security.
Chapter Arc: शरशय्या पर लेटे भीष्म युधिष्ठिर से कहते हैं—राजन्, अब मैं राष्ट्र-गुप्ति और राष्ट्र-संग्रह का एक-एक तत्त्व सुनाता हूँ; एकाग्र होकर सुनो। → भीष्म राज्य-रक्षा को केवल शस्त्र नहीं, व्यवस्था बताते हैं: दुर्गों के भेद (धन्वदुर्ग/मरुदुर्ग आदि) और फिर ग्राम से लेकर नगर तक अधिकारियों की सीढ़ी—एक ग्रामाध्यक्ष, दशग्राम्य, विंशत्यधिपति, शत/सहस्र-पालक, और नगरों में ‘सर्वार्थचिन्तक’—ताकि सूचना, न्याय और कर-व्यवस्था ऊपर तक शुद्ध पहुँचे। → कर-नीति का निर्णायक सूत्र उभरता है: ‘फल’ और ‘कर्म’ यदि निरर्थक लगें तो कोई प्रवृत्त नहीं होता; राजा और प्रजा कर्म-फल में भागी हैं—अतः कर ऐसा हो कि व्यापार (वणिज), योग-क्षेम, मजदूरी, लागत और लाभ सब देखकर ही लिया जाए, अन्यथा राष्ट्र का अति-दोहन उसे दरिद्र कर देता है। → भीष्म निष्कर्ष देते हैं कि राष्ट्र ही कोश का मूल है और कोश आपत्ति-काल का आश्रय; इसलिए राजा को प्रजा के पास संचित धन को सुरक्षित/वर्धित रखते हुए, सतत निरीक्षण के साथ न्यायोचित कर-प्रणाली चलानी चाहिए—न तो शोषण, न ढील, बल्कि संतुलित संरक्षण। → युधिष्ठिर के सामने अगला प्रश्न खुला रह जाता है—जब आपत्ति आए, तब कर-वृद्धि, दण्ड और राहत का अनुपात कैसे ठहराया जाए?
Verse 1
7 क्ा-्ण अ--जक्ाा $. धन्वदुर्गका दूसरा नाम मरुदुर्ग भी है। जिसके चारों ओर बालूका घेरा हो, उस किलेको धन्वदुर्ग कहते हैं। . समतल जमीनके अंदर बना हुआ किला या तहखाना महीदुर्ग कहलाता है। . पर्वतशिखरपर बना हुआ वह किला जो चारों ओरसे उत्तुंग पर्वतमालाओंद्वारा घिरा हुआ हो, गिरिदुर्ग कहलाता है। . फौजी किलेका ही नाम मनुष्यदुर्ग है। ५. जिसके चारों ओर जलका घेरा हो, वह जलदुर्ग कहलाता है। ६. जो स्थान कटवाँसी आदिके घने जंगलसे घिरा हुआ हो, उसे वनदुर्ग कहा गया है। ४ [०८ ० |[/० सप्ताशीतितमोब ध्याय: राष्ट्रकी रक्षा तथा वृद्धिके उपाय युधिछिर उवाच राष्ट्रगुप्तिं च मे राजन् राष्ट्रस्यैव तु संग्रहम् । सम्यग्जिज्ञासमानाय प्रब्रूहि भरतर्षभ,युधिष्ठिरने पूछा--भरतश्रेष्ठ नरेश्वर! अब मैं यह अच्छी तरह जानना चाहता हूँ कि राष्ट्रकी रक्षा तथा उसकी वृद्धि किस प्रकार हो सकती है, अतः आप इसी विषयका वर्णन करें
युधिष्ठिर ने कहा—हे राजन्! मैं राष्ट्र की रक्षा तथा राष्ट्र के ही संग्रहन (संवर्धन-स्थैर्य) का उपाय भलीभाँति जानना चाहता हूँ। अतः हे भरतश्रेष्ठ! आप मुझे बताइए कि राज्य की रक्षा और वृद्धि कैसे हो।
Verse 2
भीष्म उवाच राष्ट्रगुप्तिं च ते सम्यग् राष्ट्रस्यैव तु संग्रहम् । हन्त सर्व प्रवक्ष्यामि तत्त्वमेकमना: शृणु,भीष्मजीने कहा--राजन्! अब मैं बड़े हर्षके साथ तुम्हें राष्ट्रकी रक्षा तथा वृद्धिका सारा रहस्य बता रहा हूँ। तुम एकाग्रचित्त होकर सुनो
भीष्म ने कहा—हे राजन्! मैं तुम्हें राष्ट्र की रक्षा तथा राष्ट्र के संग्रहन (संवर्धन-स्थैर्य) का उपाय यथार्थ रूप से बताऊँगा। आओ, मैं सब कुछ—उसका सार-तत्त्व—कहता हूँ; तुम एकाग्रचित्त होकर सुनो।
Verse 3
ग्रामस्थाधिपति: कार्यो दशग्राम्यास्तथा पर: । द्विगुणाया: शतस्यैवं सहस्रस्य च कारयेत्,एक गाँवका, दस गाँवोंका, बीस गाँवोंका, सौ गाँवोंका तथा हजार गाँवोंका अलग- अलग एक-एक अधिपति बनाना चाहिये
एक गाँव के लिए एक अधिपति नियुक्त करना चाहिए; इसी प्रकार दस गाँवों के लिए दूसरा। फिर उसी क्रम से बीस गाँवों, सौ गाँवों तथा हजार गाँवों के लिए भी पृथक्-पृथक् अधिकारी नियुक्त करे।
Verse 4
ग्रामीयान् ग्रामदोषांश्व ग्रामिकः प्रतिभावयेत् । तान् ब्रूयाद् दशपायासौ स तु विंशतिपाय वै,गाँवके स्वामीका यह कर्त्तव्य है कि वह गाँववालोंके मामलोंका तथा गाँवमें जो-जो अपराध होते हों, उन सबका वहीं रहकर पता लगावे और उनका पूरा विवरण दस गाँवके अधिपतिके पास भेजे। इसी तरह दस गाँवोंवाला बीस गाँववालेके पास और बीस गाँवोंवाला अपने अधीनस्थ जनपदके लोगोंका सारा वृत्तान्त सौ गाँवोंवाले अधिकारीको सूचित करे। (फिर सौ गाँवोंका अधिकारी हजार गाँवोंके अधिपतिको अपने अधिकृत क्षेत्रोंकी सूचना भेजे। इसके बाद हजार गाँवोंका अधिपति स्वयं राजाके पास जाकर अपने यहाँ आये हुए सभी विवरणोंको उसके सामने प्रस्तुत करे)
भीष्म ने कहा—ग्रामिक को चाहिए कि वह ग्रामवासियों के व्यवहार तथा ग्राम में उत्पन्न होने वाले दोष-अपराधों का भलीभाँति पता लगाए। फिर वह उनका वृत्तान्त दस ग्रामों के अधिपति को बताए; और दस ग्रामों का अधिपति उसे बीस ग्रामों के अधिपति तक पहुँचाए—इस प्रकार क्रमशः ऊपर तक सूचना पहुँचे, जिससे शासन अज्ञान या उपेक्षा से नहीं, यथार्थ ज्ञान और समयोचित दण्ड-व्यवस्था से चले।
Verse 5
सो<पि विंशत्यधिपतिर्वत्तं जानपदे जने । ग्रामाणां शतपालाय सर्वमेव निवेदयेत्,गाँवके स्वामीका यह कर्त्तव्य है कि वह गाँववालोंके मामलोंका तथा गाँवमें जो-जो अपराध होते हों, उन सबका वहीं रहकर पता लगावे और उनका पूरा विवरण दस गाँवके अधिपतिके पास भेजे। इसी तरह दस गाँवोंवाला बीस गाँववालेके पास और बीस गाँवोंवाला अपने अधीनस्थ जनपदके लोगोंका सारा वृत्तान्त सौ गाँवोंवाले अधिकारीको सूचित करे। (फिर सौ गाँवोंका अधिकारी हजार गाँवोंके अधिपतिको अपने अधिकृत क्षेत्रोंकी सूचना भेजे। इसके बाद हजार गाँवोंका अधिपति स्वयं राजाके पास जाकर अपने यहाँ आये हुए सभी विवरणोंको उसके सामने प्रस्तुत करे)
भीष्म ने कहा—इसी प्रकार बीस गाँवों का अधिपति अपने जनपद के लोगों की समस्त स्थिति का पता लगाकर सब कुछ सौ गाँवों के पालक को निवेदित करे। यह पदानुक्रमित उत्तरदायित्व इसलिए है कि स्थानीय दशा और अपराध बिना छिपाव के ऊपर तक पहुँचें, और शासन व्यवस्था न्याय तथा मर्यादा में स्थिर रहे।
Verse 6
यानि ग्राम्याणि भोज्यानि ग्रामिकस्तान्युपाश्रियात् । दशपस्तेन भर्तव्यस्तेनापि द्विगुणाधिप:,गाँवोंमें जो आय अथवा उपज हो, वह सब गाँवका अधिपति अपने ही पास रखे (तथा उसमेंसे नियत अंशका वेतनके रूपमें उपभोग करे)। उसीमेंसे नियत वेतन देकर उसे दस गाँवोंके अधिपतिका भी भरण-पोषण करना चाहिये, इसी तरह दस गाँवके अधिपतिको भी बीस गाँवोंके पालकका भरण-पोषण करना उचित है
भीष्म ने कहा—ग्राम में जो भोग्य आय और उपज हो, उसे ग्रामिक अपने अधिकार में रखकर उसका प्रबन्ध करे और उसी में से नियत अंश को वेतन रूप में ग्रहण करे। उसी आय से वह दस गाँवों के अधिपति का भी नियत वेतन देकर भरण-पोषण करे; और उसी प्रकार दस गाँवों का अधिपति उचित वेतन देकर बीस गाँवों के अधिपति का पालन करे।
Verse 7
ग्रामं ग्रामशताध्यक्षो भोक्तुमरहति सत्कृत: । महान्तं भरतश्रेष्ठ सुस्फीतं जनसंकुलम्
भीष्म ने कहा—हे भरतश्रेष्ठ! सौ गाँवों का अध्यक्ष सत्कारपूर्वक भरण-पोषण पाने योग्य है। उसे भोग के लिए एक महान् ग्राम दिया जाए—समृद्ध, सुसज्जित और जनसमूह से परिपूर्ण।
Verse 8
शाखानगरमर्हस्तु सहस्रपतिरुत्तम:
भीष्म ने कहा—और जो सहस्रपति है, वह उत्तम पुरुष ‘शाखानगर’ नामक नगर पाने के योग्य है।
Verse 9
तेषां संग्रामकृत्यं स्याद् ग्रामकृत्यं च तेषु यत्
भीष्म ने कहा—उनके लिए युद्ध के कर्तव्य भी हों और ग्राम-व्यवस्था से जुड़े कर्तव्य भी; जो-जो दायित्व उन पर यथोचित रूप से पड़ते हों, वही उन्हें सौंपे जाएँ।
Verse 10
नगरे नगरे वा स्यादेक: सर्वार्थचिन्तक:,अथवा प्रत्येक नगरमें एक ऐसा अधिकारी होना चाहिये, जो सभी कार्योंका चिन्तन और निरीक्षण कर सके। जैसे कोई भयंकर ग्रह आकाशमें नक्षत्रोंक ऊपर स्थित हो परिभ्रमण करता है, उसी प्रकार वह अधिकारी उच्चतम स्थानपर प्रतिष्ठित होकर उन सभी सभासद् आदिके निकट परिभ्रमण करे और उनके कार्योकी जाँच-पड़ताल करता रहे
भीष्म ने कहा—प्रत्येक नगर में एक ऐसा एकमात्र अधीक्षक होना चाहिए जो समस्त विषयों का विचार करे और सब कार्यों पर दृष्टि रखे। वह उच्चतम स्थान पर प्रतिष्ठित होकर सभासदों और अन्य अधिकारियों के बीच निरन्तर विचरण करे और उनके आचरण तथा कर्तव्य-पालन की जाँच करता रहे—जैसे नक्षत्रों के ऊपर स्थित कोई भयंकर ग्रह आकाश में परिभ्रमण करता है।
Verse 11
उच्चै: स्थाने घोररूपो नक्षत्राणामिव ग्रह: । भवेत् स तान् परिक्रामेत् सर्वानेव सभासद:,अथवा प्रत्येक नगरमें एक ऐसा अधिकारी होना चाहिये, जो सभी कार्योंका चिन्तन और निरीक्षण कर सके। जैसे कोई भयंकर ग्रह आकाशमें नक्षत्रोंक ऊपर स्थित हो परिभ्रमण करता है, उसी प्रकार वह अधिकारी उच्चतम स्थानपर प्रतिष्ठित होकर उन सभी सभासद् आदिके निकट परिभ्रमण करे और उनके कार्योकी जाँच-पड़ताल करता रहे
भीष्म ने कहा—उच्च स्थान पर भयंकर अधिकार वाला एक अधिकारी हो, जो नक्षत्रों के ऊपर स्थित घोर ग्रह के समान हो। वह समस्त सभासदों के बीच निरन्तर परिक्रमा करे और उनके निकट रहकर उनके आचरण तथा कार्य की जाँच करता रहे।
Verse 12
तेषां वृत्ति परिणयेत् कक्रिद् राष्ट्रेषु तच्चर: । जिघांसव: पापकामा: परस्वादायिन: शठा:
भीष्म ने कहा—राज्यों में घूमने वाला कोई गुप्तचर उनके जीवन-यापन और आचरण का पता लगाए—जो हत्या के इच्छुक हों, पापमय उद्देश्यों वाले हों, पराया धन हड़पकर जीते हों और कपटी हों।
Verse 13
विक्रयं क्रयमध्वानं भक्त च सपरिच्छदम्
भीष्म ने कहा—विक्रय, क्रय, व्यापार-यात्रा, और अपने सामान सहित आश्रित जन—इनको वस्तु की भाँति न माना जाए। धर्म का आश्रय लेकर बुद्धिमान को चाहिए कि वह संबंधों और संरक्षण को बाजारू लेन-देन में न गिराए।
Verse 14
उत्पत्तिं दानवृत्तिं च शिल्पं सम्प्रेक्ष्य चासकृत्
भीष्म ने कहा—किसी व्यक्ति की उत्पत्ति, दान-धर्म में उसकी वृत्ति और उसके शिल्प/कौशल को बार-बार परखकर…
Verse 15
शिल्पं प्रति करानेवं शिल्पिन: प्रति कारयेत् । इसी तरह मालकी तैयारी, उसकी खपत तथा शिल्पकी उत्तम-मध्यम आदि श्रेणियोंका बार-बार निरीक्षण करके शिल्प एवं शिल्पकारोंपर कर लगावे ।। १४ $ ।। उच्चावचकरा दाप्या महाराज्ञा युधिष्ठिर,युधिष्ठिर! महाराजको चाहिये कि वह लोगोंकी हैसियतके अनुसार भारी और हलका कर लगावे। भूपालको उतना ही कर लेना चाहिये, जितनेसे प्रजा संकटमें न पड़ जाय। उनका कार्य और लाभ देखकर ही सब कुछ करना चाहिये
शिल्प के अनुसार शिल्पियों से कर लगवाए। माल की तैयारी, उसकी खपत तथा शिल्प की उत्तम‑मध्यम आदि श्रेणियों का बार‑बार निरीक्षण करके शिल्प और शिल्पकारों पर कर नियत करे। हे युधिष्ठिर! महाराज को लोगों की हैसियत के अनुसार भारी‑हलका कर लगाना चाहिए; उतना ही कर ले कि प्रजा संकट में न पड़े। उनके काम और लाभ को देखकर ही सब व्यवस्था करे।
Verse 16
यथा यथा न सीदेरंस्तथा कुर्यान्महीपति: । फलं कर्म च सम्प्रेक्ष्य ततः सर्व प्रकल्पयेत्,युधिष्ठिर! महाराजको चाहिये कि वह लोगोंकी हैसियतके अनुसार भारी और हलका कर लगावे। भूपालको उतना ही कर लेना चाहिये, जितनेसे प्रजा संकटमें न पड़ जाय। उनका कार्य और लाभ देखकर ही सब कुछ करना चाहिये
राजा ऐसी व्यवस्था करे कि प्रजा किसी प्रकार से न दबे। फल और कर्म—दोनों को भलीभाँति देखकर, फिर सब कुछ नियत करे, हे युधिष्ठिर।
Verse 17
फलं कर्म च निर्लहेतु न कश्चित् सम्प्रवर्तते । यथा राजा च कर्ता च स्यातां कर्मणि भागिनौ
फल या कर्म—किसी हेतु के बिना कोई प्रवृत्त नहीं होता। उसी प्रकार किसी कार्य में राजा और कर्ता—दोनों उस कर्म के भागी होते हैं।
Verse 18
नोच्छिन्द्यादात्मनो मूलं परेषां चापि तृष्णया,अधिक तृष्णाके कारण अपने जीवनके मूल आधार प्रजाओंके जीवनभूत खेती-बारी आदिका उच्छेद न कर डाले। राजा लोभके दरवाजोंको बंद करके ऐसा बने कि उसका दर्शन प्रजामात्रको प्रिय लगे। यदि राजा अधिक शोषण करनेवाला विख्यात हो जाय तो सारी प्रजा उससे द्वेष करने लगती है
तृष्णा के वश होकर राजा न अपने कल्याण की जड़ काटे, न दूसरों की। अत्यधिक लोभ से वह प्रजाओं के जीवनाधार—खेती-बारी और आजीविका—का उच्छेद न करे। लोभ के द्वार बंद करके ऐसा बने कि उसका दर्शन ही प्रजामात्र को प्रिय लगे; क्योंकि यदि राजा अधिक शोषक के रूप में कुख्यात हो जाए, तो सारी प्रजा उससे द्वेष करने लगती है।
Verse 19
ईहाद्वाराणि संरुध्य राजा सम्प्रीतदर्शन: । प्रद्धिषन्ति परिख्यातं राजानमतिखादिनम्,अधिक तृष्णाके कारण अपने जीवनके मूल आधार प्रजाओंके जीवनभूत खेती-बारी आदिका उच्छेद न कर डाले। राजा लोभके दरवाजोंको बंद करके ऐसा बने कि उसका दर्शन प्रजामात्रको प्रिय लगे। यदि राजा अधिक शोषण करनेवाला विख्यात हो जाय तो सारी प्रजा उससे द्वेष करने लगती है
राजा को लोभ और स्वार्थ के द्वार बंद कर देने चाहिए और ऐसा बनना चाहिए कि उसका दर्शन ही प्रजाजनों को प्रिय लगे। वह अत्यधिक तृष्णा के कारण प्रजाओं के जीवनाधार—खेती-बारी आदि—का उच्छेद न करे। यदि राजा अत्यधिक शोषण करने वाला, ‘अतिखादि’ के रूप में कुख्यात हो जाए, तो समस्त प्रजा उससे द्वेष करने लगती है।
Verse 20
प्रद्धिष्टस्य कुत: श्रेयो नाप्रियो लभते फलम् | वत्सौपम्येन दोग्धव्यं राष्ट्रमक्षीणबुद्धिना,जिससे सब लोग द्वेष करते हों, उसका कल्याण कैसे हो सकता है? जो प्रजावर्गका प्रिय नहीं होता, उसे कोई लाभ नहीं मिलता। जिसकी बुद्धि नष्ट नहीं हुई है, उस राजाको चाहिये कि वह गायसे बछड़ेकी तरह राष्ट्रसे धीरे-धीरे अपने उदरकी पूर्ति करे
जिससे सब लोग द्वेष करते हों, उसका कल्याण कैसे हो सकता है? जो प्रजावर्ग का प्रिय नहीं होता, उसे कोई सच्चा लाभ नहीं मिलता। इसलिए जिसकी बुद्धि अक्षीण है, उस राजा को चाहिए कि वह राष्ट्र से अपनी उदरपूर्ति धीरे-धीरे करे—जैसे बछड़ा गाय से दूध पीता है—ताकि राज्य को क्षति न पहुँचे और प्रजा का स्नेह बना रहे।
Verse 21
भृतो वत्सो जातबल: पीडां सहति भारत | न कर्म कुरुते वत्सो भृशं दुग्धो युधिष्ठिर,भरतनन्दन युधिष्ठिर! जिस गायका दूध अधिक नहीं दुह्ा जाता, उसका बछड़ा अधिक कालतक उसके दूधसे पुष्ट एवं बलवान् हो भारी भार ढोनेका कष्ट सहन कर लेता है; परंतु जिसका दूध अधिक दुह लिया गया हो, उसका बछड़ा कमजोर होनेके कारण वैसा काम नहीं कर पाता
भरतनन्दन युधिष्ठिर! जो बछड़ा ठीक से पाला-पोसा जाता है, वह बलवान होकर कष्ट और भारी भार सह लेता है। पर जिसकी माता का दूध अत्यधिक दुह लिया गया हो, वह बछड़ा दुर्बल हो जाता है और वैसा काम नहीं कर पाता।
Verse 22
राष्ट्रमप्यतिदुग्धं हि न कर्म कुरुते महत् । यो राष्ट्रमनुगृह्नाति परिरक्षन् स्वयं नूप:
अत्यधिक दुहा गया राष्ट्र भी कोई महान कार्य नहीं कर पाता। पर जो नरेश स्वयं उसकी रक्षा करते हुए समूचे राष्ट्र पर अनुग्रह करता है, वही उसे समृद्ध बनाकर बड़े कार्यों के योग्य करता है।
Verse 23
संजातमुपजीवन् स लभते सुमहत् फलम् | इसी प्रकार राष्ट्रका भी अधिक दोहन करनेसे वह दरिद्र हो जाता है; इस कारण वह कोई महान् कर्म नहीं कर पाता। जो राजा स्वयं रक्षामें तत्पर होकर समूचे राष्ट्रपर अनुग्रह करता है और उसकी प्राप्त हुई आयसे अपनी जीविका चलाता है, वह महान् फलका भागी होता है ।। आपदर्थ च निर्यात धनं त्विह विवर्धयेत्
जो राजा प्राप्त हुई उचित आय पर ही निर्वाह करता है, वह अत्यन्त महान फल पाता है। इसी प्रकार राष्ट्र का अधिक दोहन करने से वह दरिद्र हो जाता है; इसलिए वह कोई महान कर्म नहीं कर पाता। जो राजा स्वयं रक्षा में तत्पर रहकर समूचे राष्ट्र पर अनुग्रह करता है और जो आय उसे न्यायपूर्वक प्राप्त होती है उसी से अपनी जीविका चलाता है, वह महान पुण्य का भागी होता है। और आपत्ति-काल के लिए उसे यहाँ धन का संचय करके उसे बढ़ाते भी रहना चाहिए।
Verse 24
पौरजानपदान सर्वान् संश्रितोपश्ितांस्तथा | यथाशक्त्यनुकम्पेत सर्वान् स््वल्पधनानपि,नगर और ग्रामके लोग यदि साक्षात् शरणमें आये हों या किसीको मध्यस्थ बनाकर उसके द्वारा शरणागत हुए हों, राजा उन सब स्वल्प धनवालोंपर भी अपनी शक्तिके अनुसार कृपा करे
नगर और ग्राम के समस्त जन—जो साक्षात् शरण में आए हों अथवा किसी मध्यस्थ के द्वारा शरणागत हुए हों—उन सब स्वल्पधन वालों पर भी राजा अपनी शक्ति के अनुसार करुणा करे।
Verse 25
बाहां जन॑ भेदयित्वा भोक्तव्यो मध्यम: सुखम् । एवं नास्य प्रकुप्यन्ति जना: सुखितदु:खिता:,जंगली लुटेरोंको बाह्मजन कहते हैं, उनमें भेद डालकर राजा मध्यमवर्गके ग्रामीण मनुष्योंका सुखपूर्वक उपभोग करे--उनसे राष्ट्रके हितके लिये धन ले, ऐसा करनेसे सुखी और दु:खी दोनों प्रकारके मनुष्य उसपर क्रोध नहीं करते
जंगली लुटेरों को ‘बाह्मजन’ कहते हैं; उनमें फूट डालकर राजा मध्यमवर्ग के ग्रामीण जनों से राष्ट्रहित के लिये मर्यादित रीति से धन ले—उन्हें न कुचलते हुए। ऐसा करने से सुखी और दुःखी, दोनों प्रकार के मनुष्य उस पर क्रोध नहीं करते।
Verse 26
प्रागेव तु धनादानमनुभाष्य तत: पुन: । संनिपत्य स्वविषये भयं राष्ट्रे प्रदर्शयेत्,राजा पहले ही धन लेनेकी आवश्यकता बताकर फिर अपने राज्यमें सर्वत्र दौरा करे और राष्ट्रपर आनेवाले भयकी ओर सबका ध्यान आकर्षित करे
राजा पहले ही धन लेने की आवश्यकता समझाकर, फिर अपने राज्य में सर्वत्र भ्रमण करे; और प्रजा को एकत्र करके राष्ट्र पर आने वाले भय को स्पष्ट दिखाए।
Verse 27
इयमापत्समुत्पन्ना परचक्रभयं महत् | अपि चान्ताय कल्पन्ते वेणोरिव फलागमा:
यह आपत्ति में उत्पन्न हुआ परचक्र का महान भय है; तथापि ये घटनाएँ अंत में हित के लिये भी परिणत हो सकती हैं—जैसे बाँस में फल का आगमन अंततः अपने अंतिम परिणाम तक पहुँचता है।
Verse 28
अरयो मे समुत्थाय बहुभिर्दस्युभि: सह । इदमात्मवधायैव राष्ट्रमिच्छन्ति बाधितुम्
मेरे शत्रु बहुत से दस्युओं के साथ उठ खड़े हुए हैं; वे इस राज्य को पीड़ित करना चाहते हैं—मानो मेरे ही वध के लिये।
Verse 29
वह लोगोंसे कहे--'सज्जनो! अपने देशपर यह बहुत बड़ी आपत्ति आ पहुँची है। शत्रुदलके आक्रमणका महान् भय उपस्थित है। जैसे बाँसमें फलका लगना बाँसके विनाशका ही कारण होता है, उसी प्रकार मेरे शत्रु बहुत-से लुटेरोंको साथ लेकर अपने ही विनाशके लिये उठकर मेरे इस राष्ट्रको सताना चाहते हैं ।। अस्यामापदि घोरायां सम्प्राप्ते दारुणे भये | परित्राणाय भवतः प्रार्थयिष्ये धनानि वः,“इस घोर आपत्ति और दारुण भयके समय मैं आप लोगोंकी रक्षाके लिये (ऋणके रूपमें) धन माँग रहा हूँ
भीष्म ने कहा— “इस घोर आपत्ति और दारुण भय के आ पड़ने पर मैं आप लोगों से धन माँगता हूँ—अपने सुख के लिए नहीं, बल्कि आप सबकी रक्षा के लिए। ऐसे संकट में सामूहिक रक्षा हेतु साधन जुटाना धर्म है; क्योंकि प्रजा की सुरक्षा और राज्य का संरक्षण समय पर मिले सामूहिक सहयोग पर ही निर्भर है।”
Verse 30
प्रतिदास्ये च भवतां सर्व चाहं भयक्षये | नारय: प्रतिदास्यन्ति यद्धरेयुर्बलादित:,“जब यह भय दूर हो जायगा, उस समय सारा धन मैं आपलोगोंको लौटा दूँगा। शत्रु आकर यहाँसे बलपूर्वक जो धन लूट ले जायँगे, उसे वे कभी वापस नहीं करेंगे
“जब यह भय टल जाएगा, तब मैं आप लोगों का सारा धन लौटा दूँगा। पर शत्रु यदि बलपूर्वक यहाँ से जो धन लूट ले जाएँगे, उसे वे कभी वापस नहीं करेंगे; इसलिए रक्षा के लिए दिया गया धन ही कल्याणकारी है।”
Verse 31
कलत्रमादित: कृत्वा सर्व वो विनशेदिति । अपि चेत् पुत्रदारार्थमर्थसंचय इष्यते,'शत्रुओंका आक्रमण होनेपर आपकी स्त्रियोंपर पहले संकट आयगा। उनके साथ ही आपका सारा धन नष्ट हो जायगा। स्त्री और पुत्रोंकी रक्षाके लिये ही धनसंग्रहकी आवश्यकता होती है
“शत्रुओं के आक्रमण में पहले संकट स्त्रियों पर आता है; फिर उसी के साथ सारा धन भी नष्ट हो जाता है। धन-संग्रह का औचित्य तो पुत्र और पत्नी की रक्षा के लिए ही माना जाता है; पर विपत्ति में जिनके लिए धन जोड़ा जाता है, वही पहले भय के मार्ग में पड़ते हैं—इसलिए आसक्ति, रक्षा और सावधानी का विवेक से विचार करना चाहिए।”
Verse 32
नन्दामि व: प्रभावेण पुत्राणामिव चोदये । यथाशक्त्युपगृह्नामि राष्ट्स्यापीडया च व:,जैसे पुत्रोंके अभ्युदयसे पिताको प्रसन्नता होती है, उसी प्रकार मैं आपके प्रभावसे-- आप लोगोंकी बढ़ती हुई समृद्धिशक्तिसे आनन्दित होता हूँ। इस समय राष्ट्रपर आये हुए संकटको टालनेके लिये मैं आप लोगोंसे आपकी शक्तिके अनुसार ही धन ग्रहण करूँगा, जिससे राष्ट्रवासियोंको किसी प्रकारका कष्ट न हो
“जैसे पिता पुत्रों के अभ्युदय से प्रसन्न होता है, वैसे ही मैं आप लोगों के प्रभाव से आनन्दित होता हूँ। पर अब राष्ट्र पर आए संकट से दबकर मैं आपसे आपकी शक्ति के अनुसार ही धन ग्रहण करूँगा—जिससे प्रजा को किसी प्रकार का कष्ट न हो।”
Verse 33
आपत्स्वेव च वोढव्यं भवद्धि: पुड़वैरिव । न च प्रियतरं कार्य धनं कस्याज्चिदापदि,'जैसे बलवान बैल दुर्गम स्थानोंमें भी बोझ ढोकर पहुँचाते हैं, उसी प्रकार आप लोगोंको भी देशपर आयी हुई इस आपत्तिके समय कुछ भार उठाना ही चाहिये। किसी विपत्तिके समय धनको अधिक प्रिय मानकर छिपाये रखना आपके लिये उचित न होगा”
“आपत्ति में आप लोगों को भी बलवान बैलों की तरह भार उठाना चाहिए। विपत्ति के समय धन को सबसे प्रिय मानकर छिपाए रखना उचित नहीं; बल्कि लोकहित के लिए जो कर्तव्य है, उसे धैर्य से निभाना चाहिए।”
Verse 34
इति वाचा मधुरया शलक्ष्णया सोपचारया । स्वरश्मीनभ्यवसृजेद् योगमाधाय कालवित्,समयकी गतिविधिको पहचाननेवाले राजाको चाहिये कि वह इसी प्रकार स्नेहयुक्त और अनुनयपूर्ण मधुर वचनोंद्वारा समझा-बुझाकर उपयुक्त उपायका आश्रय ले अपने पैदल सैनिकों या सेवकोंको प्रजाजनोंके घरपर धनसंग्रहके लिये भेजे
इस प्रकार मधुर, कोमल और शिष्ट वाणी से—समय और परिस्थिति को जानने वाला राजा—युक्ति को साधकर आगे बढ़े। वह कठोरता से नहीं, बल्कि स्नेहयुक्त अनुनय-वचनों से समझा-बुझाकर उचित उपाय अपनाए और राज्य-कार्य हेतु घर-घर से धन-संग्रह के लिए अपने पैदल सैनिकों या सेवकों को भेजे।
Verse 35
प्राकारं भृत्यभरणं व्ययं संग्रामतो भयम् । योगक्षेमं च सम्प्रेक्ष्य गोमिन: कारयेत् करम्,नगरकी रक्षाके लिये चहारदिवारी बनवानी है, सेवकों और सैनिकोंका भरण-पोषण करना है, अन्य आवश्यक व्यय करने हैं, युद्धके भयको टालना है तथा सबके योग-क्षेमकी चिन्ता करनी है, इन सब बातोंकी आवश्यकता दिखाकर राजा धनवान वैश्योंसे कर वसूल करे
नगर-रक्षा के लिए प्राकार (चारदीवारी) बनवानी है, सेवकों और सैनिकों का भरण-पोषण करना है, अन्य आवश्यक व्यय करने हैं, युद्ध से उत्पन्न भय को टालना है और सबके योग-क्षेम की चिंता करनी है—इन सब बातों को भलीभाँति देखकर और स्पष्ट करके राजा धनवान, गो-सम्पन्न वैश्यों से कर वसूल करे।
Verse 36
उपेक्षिता हि नश्येयुगोंमिनो5रण्यवासिन: । तस्मात् तेषु विशेषेण मृदुपूर्व समाचरेत्,यदि राजा वैश्योंके हानि-लाभकी परवा न करके उन्हें करभारसे विशेष कष्ट पहुँचाता है तो वे राज्य छोड़कर भाग जाते और वनमें जाकर रहने लगते हैं; अतः उनके प्रति विशेष कोमलताका बर्ताव करना चाहिये
यदि राजा वैश्यों के हानि-लाभ की परवा न करके उन्हें कर-भार से विशेष कष्ट पहुँचाता है, तो वे उपेक्षित होकर राज्य छोड़ भाग जाते हैं और वन में रहने लगते हैं। इसलिए उनके प्रति विशेष रूप से पहले कोमलता से व्यवहार करना चाहिए।
Verse 37
सान्त्वनं रक्षणं दानमवस्था चाप्यभीक्षणश: । गोमिनां पार्थ कर्तव्य: संविभाग: प्रियाणि च,कुन्तीनन्दन! वैश्योंको सान्त्वना दे, उनकी रक्षा करे, उन्हें धनकी सहायता दे, उनकी स्थितिको सुदृढ़ रखनेका बारंबार प्रयत्न करे, उन्हें आवश्यक वस्तुएँ अर्पित करे और सदा उनके प्रिय कार्य करता रहे
हे पार्थ! गो-सम्पन्न वैश्यों के प्रति बार-बार सान्त्वना देना, उनकी रक्षा करना, उन्हें धन-सहायता देना, उनकी स्थिति को स्थिर रखने का निरन्तर प्रयत्न करना, आवश्यक वस्तुओं का उनके साथ संविभाग करना और सदा उनके प्रिय कार्य करना—यह सब करना चाहिए।
Verse 38
अजस्मुपयोक्तव्यं फलं गोमिषु भारत । प्रभावयन्ति राष्ट्र च व्यवहारं कृषिं तथा,भारत! व्यापारियोंको उनके परिश्रमका फल सदा देते रहना चाहिये; क्योंकि वे ही राष्ट्रके वाणिज्य, व्यवसाय तथा खेतीकी उन्नति करते हैं
हे भारत! विशेषकर व्यापार-वाणिज्य में लगे लोगों को उनके परिश्रम का फल निरन्तर और यथोचित देते रहना चाहिए; क्योंकि वही राष्ट्र के वाणिज्य, व्यवहार, आजीविका-व्यवस्था तथा खेती को उन्नत करते हैं।
Verse 39
तस्माद् गोमिषु यत्नेन प्रीति कुर्याद् विचक्षण: । दयावानप्रमत्तश्न करान् सम्प्रणयन् मृदून्
इसलिए विवेकी पुरुष को चाहिए कि वह यत्नपूर्वक गौओं के प्रति प्रेम और सद्भाव बनाए। दयालु और सावधान रहकर वह उन्हें कोमलता से स्पर्श करे, मृदु हाथों से उनका पालन करे।
Verse 40
अतः बुद्धिमान् राजा सदा उन वैश्योंपर यत्नपूर्वक प्रेमभाव बनाये रखे। सावधानी रखकर उनके साथ दयालुताका बर्ताव करे और उनपर हलके कर लगावे ।। सर्वत्र क्षेमचरणं सुलभं नाम गोमिषु | न हात: सदृशं किंचिद् वरमस्ति युधिष्ठिर,युधिष्ठिर! राजाको वैश्योंके लिये ऐसा प्रबन्ध करना चाहिये, जिससे वे देशमें सब ओर कुशलपूर्वक विचरण कर सकें। राजाके लिये इससे बढ़कर हितकर काम दूसरा नहीं है
भीष्म ने कहा—अतः बुद्धिमान राजा को चाहिए कि वह वैश्यवर्ग के प्रति सदा यत्नपूर्वक प्रेमभाव बनाए रखे। सावधानी से, दयालुता के साथ उनका व्यवहार करे और उन पर हल्के कर लगाए। हे युधिष्ठिर! गोपालक वैश्य जहाँ-तहाँ क्षेमपूर्वक विचर सकें—ऐसा प्रबन्ध करना राजा के लिए अत्यन्त हितकर है; इससे बढ़कर कोई कल्याणकारी कार्य नहीं।
Verse 76
तत्र हानेकपायत्तं राज्ञो भवति भारत । जो सत्कारप्राप्त व्यक्ति सौ गाँवोंका अध्यक्ष हो, वह एक गाँवकी आमदनीको उपभोगमें ला सकता है। भरतश्रेष्ठ! वह गाँव बहुत बड़ी बस्तीवाला, मनुष्योंसे भरपूर और धन-धान्यसे सम्पन्न हो। भरतनन्दन! उसका प्रबन्ध राजाके अधीनस्थ अनेक अधिपतियोंके अधिकारमें रहना चाहिये
भीष्म ने कहा—हे भरतवंशी! इस विषय में राजा का शासन अनेक उत्तरदायी अधिकारियों पर आधारित होना चाहिए। जो सत्कार-प्राप्त पुरुष सौ गाँवों का अध्यक्ष हो, उसे निर्वाह हेतु एक गाँव की आय भोगने की अनुमति दी जा सकती है। वह गाँव बड़ी बस्तीवाला, जनसमृद्ध तथा धन-धान्य से सम्पन्न हो। हे भरतनन्दन! उसका प्रबन्ध राजा के अधीनस्थ अनेक अधिपतियों के अधिकार में रहे, जिससे शासन स्थिर और उत्तरदायी बना रहे।
Verse 83
धान्यहैरण्यभोगेन भोक्तुं राष्ट्रिससज्भत: । सहस्र गाँवका श्रेष्ठ अधिपति एक शाखानगर (कस्बे)-की आय पानेका अधिकारी है। उस कस्बेमें जो अन्न और सुवर्णकी आय हो, उसके द्वारा वह इच्छानुसार उपभोग कर सकता है। उसे राष्ट्रवासियोंक साथ मिलकर रहना चहिये
भीष्म ने कहा—जो सहस्र गाँवों का श्रेष्ठ अधिपति हो, वह एक शाखानगर (कस्बे) की आय पाने का अधिकारी है। उस कस्बे की अन्न और सुवर्ण-आय से वह अपने पद के अनुरूप इच्छानुसार उपभोग कर सकता है; परन्तु उसे राष्ट्रवासियों के साथ मिलकर, उनके साथ सामंजस्य में रहना चाहिए।
Verse 86
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधरमानुशासनपर्वमें दुर्गपरीक्षाविषयक छियासीवाँ अध्याय पूरा हुआ
इस प्रकार श्रीमहाभारत के शान्तिपर्व के अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्व में दुर्गपरीक्षा-विषयक छियासीवाँ अध्याय समाप्त हुआ।
Verse 87
इति श्रीमहा भारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि राष्ट्रगुप्त्पादिकथ ने सप्ताशीतितमो<ध्याय:
इस प्रकार श्रीमहाभारत के शान्तिपर्व में, राजधर्म-उपदेश-प्रकरण के अंतर्गत, राष्ट्र-रक्षा के प्रसंग में सत्तासीवाँ अध्याय समाप्त होता है।
Verse 96
धर्मज्ञ: सचिव: कश्चित् तत् तत्पश्येदतन्द्रित: । इन अधिपतियोंके अधिकारमें जो युद्धसम्बन्धी तथा गाँवोंके प्रबन्धसम्बन्धी कार्य सौंपे गये हों, उनकी देखभाल कोई आलस्यरहित धर्मज्ञ मन््त्री किया करे
भीष्म ने कहा—कोई धर्मज्ञ, विवेकी और आलस्यरहित मन्त्री प्रत्येक विषय की निरन्तर देख-रेख करे; विशेषतः जो कार्य अधिपतियों के अधिकार में सौंपे गए हों—जैसे युद्ध-सम्बन्धी कार्य और ग्राम-प्रबन्ध।
Verse 123
रक्षाभ्यधिकृता नाम तेभ्यो रक्षेदिमा: प्रजा: । उस निरीक्षकका कोई गुप्तचर राष्ट्रमें घूमता रहे और सभासद् आदिके कार्य एवं मनोभावको जानकर उसके पास सारा समाचार पहुँचाता रहे। रक्षाके कार्यमें नियुक्त हुए अधिकारी लोग प्राय: हिंसक स्वभावके हो जाते हैं। वे दूसरोंकी बुराई चाहने लगते हैं और शठतापूर्वक पराये धनका अपहरण कर लेते हैं। ऐसे लोगोंसे वह सर्वार्थचिन्तक अधिकारी इस सारी प्रजाकी रक्षा करे
भीष्म ने कहा—रक्षा-कार्य में नियुक्त अधिकारी वास्तव में उन लोगों से भी प्रजा की रक्षा करें जो उनके ऊपर रखे गए हैं। कोई गुप्त निरीक्षक अपने गुप्तचरों को राष्ट्र में घूमता रखे; सभासदों और अन्य अधिकारियों के कर्म तथा मनोभाव जानकर समस्त समाचार उसी तक पहुँचाए। क्योंकि सुरक्षा-कार्य में लगे अधिकारी प्रायः हिंसक स्वभाव के हो जाते हैं; वे दूसरों का अहित चाहने लगते हैं और छल से पराया धन हड़प लेते हैं। ऐसे लोगों से वह सर्वार्थचिन्तक अधीक्षक समस्त प्रजा की रक्षा करे।
Verse 133
योगक्षेमं च सम्प्रेक्ष्य वणिजां कारयेत् करान् | राजाको मालकी खरीद--बिक्री, उसके मँगानेका खर्च, उसमें काम करनेवाले नौकरोंके वेतन, बचत और योग-क्षेमके निर्वाहकी ओर दृष्टि रखकर ही व्यापारियोंपर कर लगाना चाहिये
भीष्म ने कहा—व्यापारियों के योग-क्षेम, अर्थात् हित और सुरक्षा, को भलीभाँति देखकर ही राजा को उन पर कर लगाना चाहिए—माल की खरीद-बिक्री, मँगाने का व्यय, उसमें लगे सेवकों का वेतन, बचत तथा संरक्षण-व्यवस्था—इन सब पर दृष्टि रखकर, ताकि राजस्व भी हो और व्यापार को आघात भी न पहुँचे।
Verse 176
संवेक्ष्य तु तथा राज्ञा प्रणेया: सततं करा: । लाभ और कर्म दोनों ही यदि निष्प्रयोजन हुए तो कोई भी काम करमेमें प्रवृत्त नहीं होगा। अतः जिस उपायसे राजा और कार्यकर्ता दोनोंको कृषि, वाणिज्य आदि कर्मके लाभका भाग प्राप्त हो, उसपर विचार करके राजाको सदैव करोंका निर्णय करना चाहिये
भीष्म ने कहा—राजा को स्थिति का निरन्तर निरीक्षण करके करों का निर्धारण करना चाहिए। यदि लाभ और परिश्रम—दोनों ही निष्प्रयोजन हो जाएँ, तो कोई भी कर्म में प्रवृत्त नहीं होगा। इसलिए जिस उपाय से कृषि, वाणिज्य आदि कार्यों के लाभ में राजा और कर्मकर्ता—दोनों का उचित भाग हो, उसी पर विचार करके राजा को सदा कर निश्चित करने चाहिए।
Verse 236
राष्ट्र च कोशभूतं स्यात् कोशो वेश्मगतस्तथा । राजाको चाहिये कि वह अपने देशमें लोगोंके पास इकट्ठे हुए धनको आपत्तिके समय काम आनेके लिये बढ़ावे और अपने राष्ट्रको घरमें रखा हुआ खजाना समझे
राज्य को ही कोश समझना चाहिए और कोश को घर में सुरक्षित रखे धन के समान। इसलिए राजा को अपने देश में प्रजाजनों के पास संचित धन को आपत्ति-काल के लिए बढ़ाना चाहिए और अपने राष्ट्र को घर में रखा हुआ आरक्षित खजाना मानना चाहिए।
A graded chain of officers (village head and successive supervisors over larger clusters) with explicit reporting of local conditions, complemented by vigilant, dharma-informed oversight in urban centers through a circulating inspector-like authority.
Assessment must be proportional and productivity-preserving: taxes should reflect capacity, costs, and risk, follow justified precedent, and avoid over-extraction that damages the kingdom’s economic root.
Yes: in danger the king may solicit resources by convening subjects, explaining the threat, promising restitution where possible, and employing measured, conciliatory speech—framing extraordinary levies as protective necessity rather than routine extraction.