
प्रजाविसर्ग-तत्त्वनिर्णयः | Cosmogony of Elemental Emergence (Bharadvāja–Bhṛgu Dialogue)
Upa-parva: Mokṣa-dharma (Cosmological Instruction Sub-unit)
Bharadvāja asks how the Lord (with Brahmā situated at Meru) produces diverse creation and how water, fire, wind, and earth arise. Bhṛgu explains that in an ancient Brahmā-kalpa, Brahmā first produces creation mentally (mānasa-sṛṣṭi) and that water is created first for the consolidation and sustaining of beings; it pervades all and is the basis upon which embodied forms are stabilized. The discourse then describes a primordial stillness—an inert, silent expanse lacking luminaries and motion—followed by the arising of water, then wind generated from pressure or agitation within the waters, illustrated by the sound produced when air moves through a vessel being filled. From the friction of wind and water, fire manifests, dispelling darkness; through further condensation, a ‘snehā’ (unctuous/condensing principle) forms solidity and becomes earth. Earth is finally characterized as the womb (yoni) of tastes, fragrances, unctions, and living beings, from which multiplicity is produced.
Chapter Arc: शरशय्या पर स्थित भीष्म युधिष्ठिर से कहते हैं कि ‘कल्याण चाहने वाले पुरुष’ को जीवन की क्षणभंगुरता देखकर किस प्रकार जीना चाहिए—और इसी हेतु वे एक प्राचीन पिता–पुत्र संवाद का उपाख्यान आरम्भ करते हैं। → एक वेदाध्ययन-निरत ब्राह्मण का मेधावी पुत्र संसार-आसक्ति पर तीखे प्रश्न उठाता है: हर बीती रात के साथ आयु घटती है; फिर भी मनुष्य सुख की खोज में क्यों भटकता है? पुत्र-पशु-धन में लिप्त व्यक्ति को मृत्यु सोए मृग की तरह उठा ले जाती है; ग्राम-रति मृत्यु का मुख है, जबकि अरण्य-निवास देवताओं का गोष्ठ कहा गया है। → पुत्र का निर्णायक उपदेश: ‘मैं आत्मा में ही आत्मा द्वारा उत्पन्न हूँ; प्रजा मुझे नहीं तारती’—अर्थात मोक्ष का आश्रय बाह्य संबंध नहीं, आत्मनिष्ठा है; आसक्ति ही बंधन है और वैराग्य ही सुरक्षा। → भीष्म बताते हैं कि पुत्र की वाणी सुनकर पिता ने वैसा ही आचरण किया—आसक्ति त्यागकर सत्य-धर्म और आत्मनिष्ठ मार्ग अपनाया; और युधिष्ठिर को भी उसी सत्यधर्मपरायण जीवन-रीति का अनुसरण करने का निर्देश देते हैं।
Verse 1
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ श्लोक मिलाकर कुल ६६ श्लोक हैं) अपने-आप बछ। सं: पजञज्चसप्तत्याधेकशततमो< ध्याय: अपने कल्याणकी इच्छा रखनेवाले पुरुषका क्या कर्तव्य है, इस विषयमें पिताके प्रति पुत्रद्वारा ज्ञानका उपदेश युधिछिर उवाच अतिक्रामति काले<स्मिन् सर्वभूतक्षयावहे । कि श्रेय: प्रतिपद्येत तन्मे ब्रूहि पितामह,राजा युधिष्ठिरने पूछा--पितामह! समस्त भूतोंका संहार करनेवाला यह काल बराबर बीता जा रहा है, ऐसी अवस्थामें मनुष्य क्या करनेसे कल्याणका भागी हो सकता है? यह मुझे बताइये
युधिष्ठिर बोले—पितामह! समस्त प्राणियों का संहार करने वाला यह काल निरन्तर बीतता जा रहा है। ऐसी अवस्था में मनुष्य किस उपाय से परम श्रेय को प्राप्त करे? यह मुझे बताइए।
Verse 2
भीष्म उवाच अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । पितुः पुत्रेण संवाद तं निबोध युधिष्ठिर,भीष्मजीने कहा--युधिष्ठटिर! इस विषयमें ज्ञानी पुरुष पिता और पुत्रके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं। तुम उस संवादको ध्यान देकर सुनो
भीष्म बोले—युधिष्ठिर! इस विषय में ज्ञानीजन एक प्राचीन इतिहास का उदाहरण देते हैं—पिता और पुत्र का संवाद। तुम उसे ध्यानपूर्वक समझो।
Verse 3
द्विजाते: कस्यचित् पार्थ स्वाध्यायनिरतस्य वै । बभूव पुत्रो मेधावी मेधावी नाम नामतः,कुन्तीकुमार! प्राचीन कालमें एक ब्राह्मण थे, जो सदा वेद-शास्त्रोंके स्वाध्यायमें तत्पर रहते थे। उनके एक पुत्र हुआ, जो गुणसे तो मेधावी था ही नामसे भी मेधावी था
भीष्म बोले—पार्थ! प्राचीन काल में एक द्विज ब्राह्मण थे, जो नित्य स्वाध्याय में रत रहते थे। उनके एक पुत्र उत्पन्न हुआ, जो बुद्धिमान था और नाम से भी ‘मेधावी’ कहलाता था।
Verse 4
सोअब्रवीत् पितरं पुत्र: स्वाध्यायकरणे रतम् | मोक्षधर्मार्थकुशलो लोकतत्त्वविचक्षण:,वह मोक्ष, धर्म और अर्थमें कुशल तथा लोकतत्त्वका अच्छा ज्ञाता था। एक दिन उस पुत्रने अपने स्वाध्याय-परायण पितासे कहा यस्य वाड्मनसी स्यातां सम्यक् प्रणिहिते सदा । तपस्त्यागश्न सत्यं च स वै सर्वमवाप्तुयात्
वह पुत्र मोक्ष, धर्म और अर्थ में कुशल तथा लोक-तत्त्व का विवेचक था। उसने स्वाध्याय में रत अपने पिता से कहा—“जिसकी वाणी और मन सदा सम्यक् रूप से संयमित और नियोजित हों, जिसमें तप, त्याग और सत्य हों—वह निश्चय ही सब कुछ प्राप्त कर लेता है।”
Verse 5
पुत्र बवाच धीर: किंस्वित् तात कुर्यात् प्रजानन् क्षिप्रं ह्मायुर्श्श्यते मानवानाम् । पितस्तदाचक्ष्व यथार्थयोगं ममानुपूर्व्या येन धर्म चरेयम्,पुत्र बोला-पिताजी! मनुष्योंकी आयु तीव्र गतिसे बीती जा रही है। यह जानते हुए धीर पुरुषको क्या करना चाहिये? तात! आप मुझे उस यथार्थ उपायका उपदेश कीजिये, जिसके अनुसार मैं धर्मका आचरण कर सकूँ
पुत्र बोला—पिताजी, मनुष्यों की आयु शीघ्र ही क्षीण होती जा रही है। यह जानकर धीर और विवेकी पुरुष को क्या करना चाहिए? तात, मुझे वह यथार्थ उपाय क्रमशः बताइए, जिसके अनुसार मैं धर्म का आचरण कर सकूँ।
Verse 6
पितोवाच वेदानधीत्य ब्रह्मचर्येण पुत्र पुत्रानिच्छेत् पावनार्थ पितृणाम् । अग्नीनाधाय विधिवच्चेष्टयज्ञो वन॑ प्रविश्याथ मुनिर्बुभूषेत्,पिताने कहा--बेटा! द्विजको चाहिये कि वह पहले ब्रह्मचर्य-व्रतका पालन करते हुए सम्पूर्ण वेदोंका अध्ययन करे; फिर गृहस्थाश्रममें प्रवेश करके पितरोंकी सद्गतिके लिये पुत्र पैदा करनेकी इच्छा करे। विधिपूर्वक त्रिविध अग्नियोंकी स्थापना करके यज्ञोंका अनुष्ठान करे। तत्पश्चात् वानप्रस्थ-आश्रममें प्रवेश करे। उसके बाद मौनभावसे रहते हुए संन्यासी होनेकी इच्छा करे
पिता ने कहा—पुत्र, पहले ब्रह्मचर्य-व्रत का पालन करते हुए वेदों का अध्ययन करे। फिर गृहस्थाश्रम में प्रवेश करके पितरों के पावनार्थ पुत्र की इच्छा करे। विधिपूर्वक अग्नियों की स्थापना कर शास्त्रोक्त यज्ञों का अनुष्ठान करे। तत्पश्चात् वन में जाकर वानप्रस्थ हो; और अंत में मौन व संयम में स्थित होकर संन्यास की आकांक्षा करे।
Verse 7
पुत्र बवाच एवमभ्याहते लोके समन्तात् परिवारिते । अमोघासु पतन्तीषु कि धीर इव भाषसे,पुत्रने कहा--पिताजी! यह लोक जब इस प्रकारसे मृत्युद्वारा मारा जा रहा है, जरा- अवस्थाद्वारा चारों ओरसे घेर लिया गया है, दिन और रात सफलतापूर्वक आयुक्षयरूप काम करके बीत रहे हैं--ऐसी दशामें भी आप धीरकी भाँति कैसी बात कर रहे हैं
पुत्र ने कहा—पिताजी, यह लोक इस प्रकार मृत्यु से आहत है, जरा से चारों ओर घिरा है; और अमोघ शक्तियाँ (काल की) निरन्तर गिर रही हैं—फिर भी आप धीर पुरुष की भाँति कैसे बोल रहे हैं?
Verse 8
पितोवाच कथमभ्याहतो लोक: केन वा परिवारित: । अमोघा: का: पतन्तीह कि नु भीषयसीव माम्,पिताने पूछा--बेटा! तुम मुझे भयभीत-सा क्यों कर रहे हो। बताओ तो सही, यह लोक किससे मारा जा रहा है, किसने इसे घेर रखा है और यहाँ कौन-से ऐसे व्यक्ति हैं जो सफलतापूर्वक अपना काम करके व्यतीत हो रहे हैं
पिता ने कहा—यह लोक किस प्रकार आहत है? किसने इसे घेर रखा है? यहाँ कौन-सी अमोघ शक्तियाँ गिर रही हैं? तुम मुझे भयभीत-सा क्यों कर रहे हो?
Verse 9
पुत्र बवाच मृत्युनाभ्याहतो लोको जरया परिवारित: । अहोरात्रा: पतन्त्येते ननु कस्मान्न बुध्यसे,पुत्रने कहा--पिताजी! देखिये, यह सम्पूर्ण जगत् मृत्युके द्वारा मारा जा रहा है। बुढ़ापेने इसे चारों ओरसे घेर लिया है और ये दिन-रात ही वे व्यक्ति हैं जो सफलतापूर्वक प्राणियोंकी आयुका अपहरणस्वरूप अपना काम करके व्यतीत हो रहे हैं, इस बातको आप समझते क्यों नहीं हैं?
पुत्र ने कहा—पिताजी, यह लोक मृत्यु से आहत है और जरा से चारों ओर घिरा है। ये दिन-रात निरन्तर गिरते जा रहे हैं, प्राणियों की आयु का अपहरण करते हुए—फिर भी आप क्यों नहीं समझते?
Verse 10
अमोघा रात्रयक्षापि नित्यमायान्ति यान्ति च । यदाहमेतज्जानामि न मृत्युस्तिष्ठतीति ह । सो<हं कथं प्रतीक्षिष्ये जालेनापिहितश्चरन्,ये अमोघ रात्रियाँ नित्य आती हैं और चली जाती हैं। जब मैं इस बातको जानता हूँ कि मृत्यु क्षणभरके लिये भी रुक नहीं सकती और मैं उसके जालमें फँसकर ही विचर रहा हूँ, तब मैं थोड़ी देर भी प्रतीक्षा कैसे कर सकता हूँ?
अमोघ रात्रियाँ नित्य आती-जाती रहती हैं। जब मैं जानता हूँ कि मृत्यु क्षणभर भी नहीं ठहरती और मैं उसके जाल से आच्छादित होकर ही विचर रहा हूँ, तब मैं थोड़ी देर भी प्रतीक्षा कैसे कर सकता हूँ?
Verse 11
रात्र्यां रात्र्यां व्यतीतायामायुरल्पतरं यदा । गाधोदके मत्स्य इव सुखं विन्देत कस्तदा
रात-रात बीतने पर आयु और भी घटती जाती है। जब जीवन इस प्रकार निरन्तर क्षीण होता है, तब गहरे जल में छटपटाती मछली के समान कौन सचमुच सुख पा सकता है?
Verse 12
जब-जब एक-एक रात बीतनेके साथ ही आयु बहुत कम होती चली जा रही है, तब छिछले जलमें रहनेवाली मछलीके समान कौन सुख पा सकता है? ।। (यस्यां रात्र्यां व्यतीतायां न किंचिच्छुभमाचरेत् ।) तदैव वन्ध्यं दिवसमिति विद्याद् विचक्षण: । अनवाप्तेषु कामेषु मृत्युरभ्येति मानवम्,जिस रातके बीतनेपर मनुष्य कोई शुभ कर्म न करे, उस दिनको दिद्वान् पुरुष “व्यर्थ ही गया” समझे। मनुष्यकी कामनाएँ पूरी भी नहीं होने पातीं कि मौत उसके पास आ पहुँचती है
जिस रात के बीतने पर मनुष्य कोई शुभ कर्म नहीं करता, उस दिन को विवेकी पुरुष ‘वन्ध्या’—व्यर्थ—समझे। कामनाएँ पूरी भी नहीं हो पातीं कि मृत्यु मनुष्य के निकट आ पहुँचती है। जब रात-रात बीतने के साथ आयु घटती जाती है, तब छिछले जल में पड़ी मछली के समान कौन सुख पा सकता है?
Verse 13
शष्पाणीव विचिन्वन्तमन्यत्रगतमानसम् | वृकीवोरणमासाद्य मृत्युरादाय गच्छति,जैसे घास चरते हुए भेंड़ेके पास अचानक व्याप्री पहुँच जाती है और उसे दबोचकर चल देती है, उसी प्रकार मनुष्यका मन जब दूसरी ओर लगा होता है, उसी समय सहसा मृत्यु आ जाती है और उसे लेकर चल देती है
जैसे घास चुनते हुए और मन कहीं और लगाए हुए भेड़ के पास अचानक भेड़िया आ पहुँचता है और उसे दबोचकर ले जाता है, वैसे ही मनुष्य का मन जब दूसरी ओर लगा होता है, उसी समय सहसा मृत्यु आकर उसे उठा ले जाती है।
Verse 14
अद्यैव कुरु यच्छेयो मा त्वां कालो5त्यगादयम् । अकृतेष्वेव कार्येषु मृत्युर्वैं सम्प्रकर्षति,इसलिये जो कल्याणकारी कार्य हो, उसे आज ही कर डालिये। आपका यह समय हाथसे निकल न जाय; क्योंकि सारे काम अधूरे ही पड़े रह जायँगे और मौत आपको खींच ले जायगी
जो कल्याणकारी हो, उसे आज ही कर डालो; कहीं यह समय तुम्हारे हाथ से निकल न जाए। क्योंकि काम अधूरे ही रह जाते हैं और मृत्यु मनुष्य को खींच ले जाती है।
Verse 15
श्वः कार्यमद्य कुर्वीत पूर्वाह्ने चापराह्निकम् | न हि प्रतीक्षते मृत्यु: कृतमस्य न वा कृतम्,कल किया जानेवाला काम आज ही पूरा कर लेना चाहिये। जिसे सायंकालमें करना है उसे प्रातः:कालमें ही कर लेना चाहिये; क्योंकि मौत यह नहीं देखती कि इसका काम अभी पूरा हुआ या नहीं
कल का काम आज ही कर लेना चाहिए; जो सायंकाल करना हो, उसे भी प्रातःकाल में ही कर लेना चाहिए। क्योंकि मृत्यु यह नहीं देखती कि काम हुआ या नहीं।
Verse 16
को हि जानाति कस्याद्य मृत्युकालो भविष्यति । (न मृत्युरामन्त्रयते हर्तुकामो जगत्प्रभु: । अबुद्ध एवाक्रमते मीनान् मीनग्रहो यथा ।।) कौन जानता है कि किसका मृत्युकाल आज ही उपस्थित होगा? सम्पूर्ण जगत्पर प्रभुत्व रखनेवाली मृत्यु जब किसीको हरकर ले जाना चाहती है तो उसे पहलेसे निमन्त्रण नहीं भेजती है। जैसे मछुवारे चुपकेसे आकर मछलियोंको पकड़ लेते हैं, उसी प्रकार मृत्यु भी अज्ञात रहकर ही आक्रमण करती है ।। युवैव धर्मशील: स्यादनित्यं खलु जीवितम् । कृते धर्मे भवेत् कीर्तिरिह प्रेत्य च वै सुखम्
कौन जानता है कि आज ही किसका मृत्युकाल आ पहुँचे? समस्त जगत् पर प्रभुत्व रखने वाली मृत्यु जब हर लेने को उद्यत होती है, तो पहले से निमन्त्रण नहीं भेजती। जैसे मछुआरा चुपके से आकर मछलियों पर झपटता है, वैसे ही मृत्यु भी अदृश्य रहकर आक्रमण करती है। इसलिए मनुष्य को युवावस्था में ही धर्मशील होना चाहिए; जीवन निश्चय ही अनित्य है। धर्म करने से इस लोक में कीर्ति होती है और परलोक में सुख मिलता है।
Verse 17
अतः युवावस्थामें ही सबको धर्मका आचरण करना चाहिये; क्योंकि जीवन निःसंदेह अनित्य है। धर्माचरण करनेसे इस लोकमें मनुष्यकी कीर्तिका विस्तार होता है और परलोकमें भी उसे सुख मिलता है ।। मोहेन हि समाविष्ट: पुत्रदारार्थमुद्यत: । कृत्वा कार्यमकार्य वा पुष्टिमेषां प्रयच्छति,जो मनुष्य मोहमें डूबा हुआ है, वही पुत्र और स्त्रीके लिये उद्योग करने लगता है, और करने तथा न करने योग्य काम करके इन सबका पालन-पोषण करता है
अतः युवावस्था में ही सबको धर्म का आचरण करना चाहिए, क्योंकि जीवन निःसंदेह अनित्य है। धर्माचरण से इस लोक में कीर्ति फैलती है और परलोक में भी सुख मिलता है। पर जो मनुष्य मोह में डूबा रहता है, वही पुत्र और स्त्री के लिए उद्योग करता है; करने योग्य और न करने योग्य काम करके भी उन्हीं का पालन-पोषण करता रहता है।
Verse 18
त॑ पुत्रपशुसम्पन्नं व्यासक्तमनसं नरम् । सुप्तं व्याप्रो मृगमिव मृत्युरादाय गच्छति,जैसे सोये हुए मृगको बाघ उठा ले जाता है, उसी प्रकार पुत्र और पशुओंसे सम्पन्न एवं उन्हींमें मनको फँसाये रखनेवाले मनुष्यको एक दिन मृत्यु आकर उठा ले जाती है
जैसे सोए हुए मृग को बाघ उठा ले जाता है, वैसे ही पुत्र और पशुओं से सम्पन्न, पर उन्हीं में मन फँसाए हुए मनुष्य को एक दिन मृत्यु आकर उठा ले जाती है।
Verse 19
संचिन्वानकमेवैनं कामानामवितृप्तकम् । व्यात्र: पशुमिवादाय मृत्युरादाय गच्छति
जो मनुष्य निरन्तर संचय करता रहता है और कामनाओं से तृप्त नहीं होता, उसे मृत्यु बाघ के समान पशु को उठा ले जाने की तरह उठा ले जाती है।
Verse 20
जबतक मनुष्य भोगोंसे तृप्त नहीं होता, संग्रह ही करता रहता है, तभीतक ही उसे मौत आकर ले जाती है। ठीक वैसे ही, जैसे व्याप्र किसी पशुको ले जाता है ।। इदं कृतमिदं कार्यमिदमन्यत् कृताकृतम् । एवमीहासुखासक्तं कृतान्त: कुरुते वशे,मनुष्य सोचता है कि यह काम पूरा हो गया, यह अभी करना है और यह अधूरा ही पड़ा है--इस प्रकार चेष्टाजनित सुखमें आसक्त हुए मानवको काल अपने वशमें कर लेता है
भीष्म ने कहा—जब तक मनुष्य भोगों से तृप्त नहीं होता, तब तक वह केवल संग्रह करता रहता है; और उसी संग्रह में लगा हुआ उसे मृत्यु उठा ले जाती है—जैसे व्याघ्र किसी पशु को उठा ले जाए। “यह हो गया, यह करना है, यह दूसरा आधा हुआ-आधा अधूरा है”—ऐसा सोचते हुए, निरन्तर चेष्टा से उत्पन्न सुख में आसक्त मनुष्य को काल अपने वश में कर लेता है।
Verse 21
कृतानां फलमप्राप्तं कर्मणां कर्मसंज्ञितम् । क्षेत्रापणगृहासक्तं मृत्युरादाय गच्छति,मनुष्य अपने खेत, दूकान और घरमें ही फँसा रहता है, उसके किये हुए उन कर्मोंका फल मिलने भी नहीं पाता, उसके पहले ही उस कर्मासक्त मनुष्यको मृत्यु उठा ले जाती है
भीष्म ने कहा—किये हुए कर्मों का फल बहुत बार अप्राप्त ही रह जाता है; मनुष्य जिसे ‘काम’ कहता है उसमें लगा रहता है—खेत, दुकान और घर में आसक्त—और उससे पहले ही मृत्यु उसे उठा ले जाती है।
Verse 22
दुर्बलं बलवन्तं च शूरं भीरुं जडं कविम् । अप्राप्तं सर्वकामार्थान् मृत्युरादाय गच्छति,कोई दुर्बल हो या बलवान, शूरवीर हो या डरपोक तथा मूर्ख हो या विद्वान, मृत्यु उसकी समस्त कामनाओंके पूर्ण होनेसे पहले ही उसे उठा ले जाती है
भीष्म ने कहा—कोई दुर्बल हो या बलवान, शूर हो या भीरु, जड़बुद्धि हो या विद्वान—मृत्यु उसकी समस्त कामनाएँ पूर्ण होने से पहले ही उसे उठा ले जाती है।
Verse 23
मृत्युर्जरा च व्याधिश्व दु:खं चानेककारणम् | अनुषक्तं यदा देहे किं स्वस्थ इव तिष्ठसि,पिताजी! जब इस शरीरमें मृत्यु, जरा, व्याधि और अनेक कारणोंसे होनेवाले दुःखोंका आक्रमण होता ही रहता है, तब आप स्वस्थ-से होकर क्यों बैठे हैं?
भीष्म ने कहा—पिताजी! जब इस शरीर में मृत्यु, जरा, व्याधि और अनेक कारणों से होने वाला दुःख सदा चिपका रहता है, तब आप स्वस्थ-से होकर क्यों बैठे हैं?
Verse 24
जातमेवान्तको<न्ताय जरा चान्वेति देहिनम् । अनुषक्ता द्वयेनैते भावा: स्थावरजड्रमा:,देहधारी जीवके जन्म लेते ही अन्त करनेके लिये मौत और बुढ़ापा उसके पीछे लग जाते हैं। ये समस्त चराचर प्राणी इन दोनोंसे बँधे हुए हैं
भीष्म ने कहा—देहधारी के जन्म लेते ही उसके अन्त के लिये मृत्यु नियत हो जाती है और जरा उसके पीछे-पीछे चलती है। स्थावर और जङ्गम—समस्त प्राणी इन दोनों से बँधे हुए हैं।
Verse 25
मृत्योर्वा मुखमेतद् वै या ग्रामे वसतो रति: । देवानामेष वै गोष्ठो यदरण्यमिति श्रुति:
भीष्म बोले—गाँव में बसने की जो आसक्ति है, वह मानो मृत्यु का ही मुख है। और श्रुति कहती है कि वन ही देवताओं का गोष्ठ (सभा-स्थान) है।
Verse 26
ग्राम या नगरमें रहकर जो स्त्री-पुत्र आदिमें आसक्ति बढ़ायी जाती है, यह मृत्युका मुख ही है और जो वनका आश्रय लेता है, यह इन्द्रियरूपी गौओंको बाँधनेके लिये गोशालाके समान है, यह श्रुतिका कथन है ।। निबन्धनी रज्जुरेषा या ग्रामे वसतो रति: । छित्त्वैतां सुकृतो यान्ति नैनां छिन्दन्ति दुष्कृत:,ग्राममें रहनेपर वहाँके स्त्री-पुत्र आदि विषयोंमें जो आसक्ति होती है, यह जीवको बाँधनेवाली रस्सीके समान है। पुण्यात्मा पुरुष ही इसे काटकर निकल पाते हैं। पापी पुरुष इसे नहीं काट पाते हैं
भीष्म बोले—ग्राम में रहने वाले के लिए स्त्री, पुत्र आदि गृह्य-विषयों में जो आसक्ति बढ़ती है, वह जीव को बाँधने वाली रस्सी है। पुण्यात्मा इसे काटकर मुक्त हो जाते हैं; दुष्कर्मी इसे नहीं काट पाते। श्रुति कहती है कि वन का आश्रय इन्द्रियरूपी गौओं को बाँधने वाली गोशाला के समान संयम-स्थान है।
Verse 27
न हिंसयति यो जन्तून् मनोवाक्कायहेतुभि: । जीवितार्थापनयनै: प्राणिभिर्न स हिंस्यते,जो मनुष्य मन, वाणी और शरीररूपी साधनोंद्वारा प्राणियोंकी हिंसा नहीं करता, उसकी भी जीवन और अर्थका नाश करनेवाले हिंसक प्राणी हिंसा नहीं करते हैं
भीष्म बोले—जो मन, वाणी और शरीर के द्वारा प्राणियों की हिंसा नहीं करता, उसे वे हिंसक प्राणी भी हिंसा नहीं करते जो अन्यथा जीवन और आजीविका का हरण करने वाले होते हैं।
Verse 28
न मृत्युसेनामायान्तीं जातु कश्रित् प्रबाधते । ऋते सत्यमसत् त्याज्यं सत्ये हामृतमाश्रितम्,सत्यके बिना कोई भी मनुष्य सामने आते हुए मृत्युकी सेनाका कभी सामना नहीं कर सकता; इसलिये असत्यको त्याग देना चाहिये। क्योंकि अमृतत्व सत्यमें ही स्थित है
भीष्म बोले—आती हुई मृत्यु-सेना का सामना कोई भी कभी नहीं कर सकता। इसलिए असत्य का त्याग करना चाहिए; क्योंकि अमृतत्व सत्य में ही आश्रित है।
Verse 29
तस्मात् सत्यव्रताचार: सत्ययोगपरायण: । सत्यागम: सदा दान्तः सत्येनैवान्तकं॑ जयेत्,अतः मनुष्यको सत्यव्रतवका आचरण करना चाहिये। सत्ययोगमें तत्पर रहना और शास्त्रकी बातोंको सत्य मानकर श्रद्धापूर्वक सदा मन और इन्द्रियोंका संयम करना चाहिये। इस प्रकार सत्यके द्वारा ही मनुष्य मृत्युपर विजय पा सकता है
अतः मनुष्य को सत्य-व्रत का आचरण करना चाहिए, सत्य-योग में तत्पर रहना चाहिए। शास्त्र-वचन को सत्य मानकर श्रद्धापूर्वक सदा मन और इन्द्रियों का दमन करना चाहिए। इस प्रकार सत्य के द्वारा ही मनुष्य अन्तक—मृत्यु—पर विजय पाता है।
Verse 30
अमृतं चैव मृत्युश्न द्वयं देहे प्रतिष्ठितम् । मृत्युमापद्यते मोहात् सत्येनापद्यतेडमृतम्,अमृत और मृत्यु दोनों इस शरीरमें ही स्थित हैं। मनुष्य मोहसे मृत्युको और सत्यसे अमृतको प्राप्त होता है
भीष्म ने कहा—अमृत और मृत्यु—ये दोनों इसी शरीर में स्थित हैं। मनुष्य मोह से मृत्यु को प्राप्त होता है और सत्य से अमृत को।
Verse 31
सो5हं हाहिंस्र: सत्यार्थी कामक्रोधबहिष्कृत: । समदुःखसुख: क्षेमी मृत्युं हास्याम्यमर्त्यवत्,अतः अब मैं हिंसासे दूर रहकर सत्यकी खोज करूँगा, काम और क्रोधको हृदयसे निकालकर दुःख और सुखमें समान भाव रखूँगा तथा सबके लिये कल्याणकारी बनकर देवताओंके समान मृत्युके भयसे मुक्त हो जाऊँगा
भीष्म ने कहा—अतः अब मैं अहिंसा में स्थित होकर सत्य की खोज करूँगा; काम और क्रोध को हृदय से निकाल दूँगा; दुःख-सुख में समभाव रखूँगा; और सबके लिए कल्याणकारी बनकर देवताओं के समान मृत्यु-भय से परे हो जाऊँगा।
Verse 32
शान्तियज्ञरतो दान्तो ब्रह्मयज्ञे स्थितो मुनि: । वाड्मन:कर्मयज्ञश्च भविष्याम्युदगायने,मैं निवृत्तिपरयण होकर शान्तिमय यज्ञमें तत्पर रहूँगा, मन और इन्द्रियोंको वशमें रखकर ब्रह्मयज्ञ (वेद-शास्त्रोंके स्वाध्याय)-में लग जाऊँगा और मुनिवृत्तिसे रहूँगा। उत्तरायणके मार्गसे जानेके लिये मैं जप और स्वाध्यायरूप वाग्यज्ञ, ध्यानरूप मनोयज्ञ और अन्निहोत्र एवं गुरुशुश्रूषादिरूप कर्मयज्ञका अनुष्ठान करूँगा
भीष्म ने कहा—मैं निवृत्ति-परायण होकर शान्ति-यज्ञ में रत रहूँगा; मन और इन्द्रियों को वश में रखकर ब्रह्मयज्ञ—वेद-शास्त्रों के स्वाध्याय—में स्थित रहूँगा और मुनि-धर्म का पालन करूँगा। और उत्तरायण आने पर वाणी, मन और कर्म के त्रिविध यज्ञ का अनुष्ठान करूँगा—जप और स्वाध्याय वाग्यज्ञ, ध्यान मनोयज्ञ, तथा अग्निहोत्र और गुरु-सेवा आदि कर्मयज्ञ—ताकि शुभ उत्तरमार्ग से प्रस्थान कर सकूँ।
Verse 33
पशुयज्ञै: कथं हिंसैमादृशो यट्टमरहति । अन्तवद्धिरिव प्राज्ञ: क्षेत्रयज्जै: पिशाचवत्,मेरे-जैसा विद्वान् पुरुष नश्वर फल देनेवाले हिंसायुक्त पशुयज्ञ और पिशाचोंके समान अपने शरीरके ही रक्त-मांसद्वारा किये जानेवाले तामस यज्ञोंका अनुष्ठान कैसे कर सकता है?
भीष्म ने कहा—मेरे जैसा विवेकी पुरुष हिंसा से युक्त, नश्वर फल देने वाले पशुयज्ञों का अनुष्ठान कैसे कर सकता है? और वह बुद्धिमान जन पिशाच के समान अपने ही रक्त-मांस को आहुति बनाकर किए जाने वाले उन तमसिक क्षेत्रयज्ञों को कैसे कर सकता है?
Verse 34
जिसकी वाणी और मन दोनों सदा भलीभाँति एकाग्र रहते हैं तथा जो त्याग, तपस्या और सत्यसे सम्पन्न होता है, वह निश्चय ही सब कुछ प्राप्त कर सकता है
भीष्म ने कहा—जिसकी वाणी और मन सदा भलीभाँति एकाग्र रहते हैं, और जो त्याग, तप तथा सत्य से सम्पन्न होता है—वह निश्चय ही जो प्राप्त करने योग्य है, उसे सब प्राप्त कर सकता है।
Verse 35
नास्ति विद्यासमं चक्षुर्नास्ति सत्यसमं तपः । नास्ति रागसमं दुःखं नास्ति त्यागसमं सुखम्,संसारमें विद्या (ज्ञान)-के समान कोई नेत्र नहीं है, सत्यके समान कोई तप नहीं है, आसक्ति एवं क्रोधके समान कोई दुःख नहीं है और त्यागके समान कोई सुख नहीं है
भीष्म ने कहा— विद्या (ज्ञान) के समान कोई नेत्र नहीं; सत्य के समान कोई तप नहीं। आसक्ति के समान कोई दुःख नहीं, और त्याग के समान कोई सुख नहीं।
Verse 36
आत्मन्येवात्मना जात आत्मनिष्ठो5प्रजोडपि वा । आत्मन्येव भविष्यामि न मां तारयति प्रजा,मैं संतानरहित होनेपर भी परमात्मामें ही परमात्मा-द्वारा उत्पन्न हुआ हूँ, परमात्मामें ही स्थित हूँ। आगे भी आत्मामें ही लीन होऊँगा। संतान मुझे पार नहीं उतारेगी
भीष्म ने कहा— मैं आत्मा में ही आत्मा द्वारा उत्पन्न हुआ हूँ और आत्मा में ही स्थित हूँ—चाहे मैं संतानरहित ही क्यों न रहूँ। आगे भी मैं आत्मा में ही रहूँगा और अंत में आत्मा में ही लीन हो जाऊँगा; संतान मुझे (संसार-सागर से) पार नहीं उतारती।
Verse 37
नैतादशं ब्राह्मणस्यास्ति वित्त यथैकता समता सत्यता च | शीलं स्थितिर्दण्डनिधानमार्जवं ततस्ततश्षोपरम: क्रियाभ्य:
भीष्म ने कहा— ब्राह्मण के लिए ऐसा धन और कोई नहीं, जैसा—एकनिष्ठता, समता और सत्यता; शील, स्थिरता, दण्ड का परित्याग (हिंसा-त्याग) और सरलता; तथा बार-बार कर्मों से उपरति (वैराग्य)। यही उसके धर्म को धारण करने वाले सच्चे रत्न हैं।
Verse 38
परमात्माके साथ एकता तथा समता, सत्यभाषण, सदाचार, ब्रह्मनिष्ठा, दण्डका परित्याग (अहिंसा), सरलता तथा सब प्रकारके सकाम कर्मोंसे उपरति--इनके समान ब्राह्मणके लिये दूसरा कोई धन नहीं है ।। कि ते धनैर्बान्धवैर्वापि कि ते किं ते दारैब्राह्मण यो मरिष्यसि । आत्मानमन्विच्छ गुहां प्रविष्टं पितामहास्ते क्व गता: पिता च,ब्राह्मणदेव पिताजी! जब आप एक दिन मर ही जायूँगे तो आपको इस धनसे क्या लेना है अथवा भाई-बन्धुओंसे आपका क्या काम है तथा स्त्री आदिसे आपका कौन-सा प्रयोजन सिद्ध होनेवाला है? आप अपने हृदयरूपी गुफामें स्थित हुए परमात्माको खोजिये। सोचिये तो सही, आपके पिता और पितामह कहाँ चले गये?
भीष्म ने कहा— परमात्मा के साथ एकता और समता, सत्यभाषण, सदाचार, ब्रह्म में निष्ठा, दण्ड का परित्याग (अहिंसा), सरलता तथा सब प्रकार के सकाम कर्मों से उपरति—इनके समान ब्राह्मण के लिए दूसरा कोई धन नहीं। हे ब्राह्मण! जब तुम्हें एक दिन मरना ही है, तब धन से क्या प्रयोजन? बन्धु-बान्धवों से क्या काम? स्त्री-गृहस्थी से क्या सिद्ध होगा? हृदय-गुफा में प्रविष्ट आत्मा को खोजो। विचार करो—तुम्हारे पिता और पितामह कहाँ चले गए?
Verse 39
भीष्म उवाच पुत्रस्यैतद् वच: श्रुत्वा यथाकार्षीत् पिता नूप । तथा त्वमपि वर्तस्व सत्यधर्मपरायण:,भीष्मजी कहते हैं--नरेश्वर! पुत्रका यह वचन सुनकर पिताने जैसे सत्य-धर्मका अनुष्ठान किया था, उसी प्रकार तुम भी सत्य-धर्ममें तत्पर रहकर यथायोग्य बर्ताव करो
भीष्म ने कहा— नरेश्वर! पुत्र के ये वचन सुनकर पिता ने जैसे सत्य-धर्म के अनुसार आचरण किया था, वैसे ही तुम भी सत्य और धर्म में परायण होकर यथायोग्य व्यवहार करो।
Verse 174
इस प्रकार प्रीमहाभारत थान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें ब्राह्मण और सेनजित्के संवादका कथनविषयक एक सौ चौहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ
इस प्रकार श्रीमहाभारत के शान्तिपर्व के अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्व में ब्राह्मण और राजा सेनजित् के संवाद के वर्णन-विषयक एक सौ चौहत्तरवाँ अध्याय समाप्त हुआ।
Verse 175
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि पितापुत्रसंवादक थने पडज्चसप्तत्यधिकशततमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत गोक्षधर्मपर्वमें पिता और पुत्रके संवादका कथनविषयक एक सौ पचहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ
इस प्रकार श्रीमहाभारत के शान्तिपर्व के अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्व में पिता और पुत्र के संवाद के कथन-विषयक एक सौ पचहत्तरवाँ अध्याय समाप्त हुआ।
The chapter addresses an epistemic doubt about origins: how diverse beings and the primary elements—water, wind, fire, and earth—are said to arise in a coherent causal sequence.
Cosmic order is presented as intelligible and sequential: life depends on pervasive sustaining conditions (water), dynamic motion (wind), transformative energy (fire), and consolidated stability (earth), supporting a worldview where ethical and contemplative disciplines align with an ordered cosmos.
No explicit phalaśruti is stated in these verses; the chapter functions primarily as doctrinal exposition within the larger Śānti-parva pedagogical framework.