Adhyaya 108
Shanti ParvaAdhyaya 10838 Verses

Adhyaya 108

Gaṇānāṃ Vṛttiḥ — On the Sustenance and Cohesion of Assemblies (Gaṇa-nīti)

Upa-parva: Rājadharmānuśāsana Parva (Instruction on Royal Duties) — Gaṇa-nīti context

Yudhiṣṭhira requests a systematic account of dharma and livelihood-patterns (vṛtti) across social orders and rulers, then narrows the inquiry to the operational conduct of gaṇas: how they expand, avoid schism, secure allies, and manage adversaries. Bhīṣma answers with a diagnostic model of institutional failure: internal vices—greed and resentment—ignite hostility and enable adversaries to weaken collectives through inducements, strategic pressure, and exploitation of fear and loss. He states that division is the root of destruction, making counsel-secrecy difficult in large groups and rendering fractured councils susceptible to external control. The prescription centers on saṃghāta (cohesive union) as the principal refuge: cultivate mutual respect, praise and heed the knowledgeable, establish lawful procedures, discipline disruptive kin, maintain intelligence and treasury practices, honor the capable (wise, brave, skilled), and restrict full access to confidential counsel to principal leaders. Internal quarrels, if ignored by elders, become engines of broader institutional fragmentation; internal threats are treated as more dangerous than external ones because they cut the root quickly. The chapter closes by reaffirming that unity prevents adversaries from subduing gaṇas, while division and negligence invite defeat.

Chapter Arc: युधिष्ठिर, राज्य-धर्म के सूक्ष्म प्रश्नों से व्याकुल होकर, भीष्म से पूछते हैं—वर्ण-धर्म के साथ-साथ ‘गणतन्त्र’ (संघ-राज्य) कैसे चलता है, उसका कोश, नीति, अमात्य और प्रजा-वृद्धि कैसे होती है? → भीष्म के उपदेश में संघ-राज्य की नाजुक नसें उभरती हैं: अलग-अलग स्वभाव और शक्ति वाले लोग जब अपने-अपने हित साधते हैं, तब अकस्मात् क्रोध, मोह और लोभ से संवाद टूटता है; भीतर का भय और आपसी भेद ही संघ को शत्रु से पहले काट डालते हैं। → निर्णायक बोध यह है कि शत्रु ‘उद्योग, बुद्धि, भेद और दान’ से गणों को तोड़ते हैं; इसलिए ‘संघात’—एकता और सामूहिक आश्रय—ही गणों का महान शरण है, और ‘आन्तरिक भय’ तुरंत जड़ों को काट देता है। → उपदेश का निष्कर्ष: संघ की रक्षा का प्रथम उपाय भीतर के भय, कलह और मौन-वैर को दूर करना है; वृद्धों/नेताओं को कुल-कलह की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए, क्योंकि वही आगे चलकर गण-भेद बनकर समूचे समुदाय का नाश करता है। → युधिष्ठिर के लिए अगला प्रश्न खुला रह जाता है—जब भेद पैदा हो ही जाए, तब उसे किस नीति से, किस दण्ड-दान और किस संवाद-क्रम से फिर जोड़ा जाए?

Shlokas

Verse 1

/ ऑपन-- माल बक। अति <-छऋज>आ सप्ताधिकशततमो< ध्याय: गणततन्त्र राज्यका वर्णन और उसकी नीति युधिछिर उवाच ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परंतप । धर्मवृत्तं च वित्तं च वृत््युपाया: फलानि च,युधिष्ठिरने कहा--परंतप भरतनन्दन! आपने ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, और शाद्रोंके धर्ममय आचार, धन, जीविकाके उपाय तथा धर्म आदिके फल बताये हैं। राजाओंके धन, कोश, कोश-संग्रह, शत्रुविजय, मन्त्रीके गुण और व्यवहार, प्रजावर्गकी उन्नति, संधि-विग्रह आदि छः: गुणोंके प्रयोग, सेनाके बर्ताव, दुष्टोंकी पहचान, सत्पुरुषोंके लक्षण, जो अपने समान, अपनेसे हीन तथा अपनेसे उत्कृष्ट हैं--उन सब लोगोंके यथावत्‌ लक्षण, मध्यम वर्गको संतुष्ट रखनेके लिये उन्नतिशील राजाको कैसे रहना चाहिये--इसका निर्देश, दुर्बल पुरुषको अपनाने और उसके लिये जीविकाकी व्यवस्था करनेकी आवश्यकता--इन सब विषयोंका आपने देशाचार और शास्त्रके अनुसार संक्षेपसे धर्मके अनुकूल प्रतिपादन किया है

युधिष्ठिर ने कहा—हे परंतप! आपने ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों के धर्मयुक्त आचार, धन, जीविका के उपाय तथा धर्माचरण से प्राप्त होने वाले फलों का वर्णन किया है। साथ ही आपने देशाचार और शास्त्र के अनुसार संक्षेप में, धर्म के अनुकूल, राजाओं के धन और कोश तथा उसके संचय, शत्रु-विजय, मंत्रियों के गुण और उचित व्यवहार, प्रजा की उन्नति, संधि-विग्रह आदि षाड्गुण्य के प्रयोग, सेना का अनुशासन, दुष्टों की पहचान, सत्पुरुषों के लक्षण, अपने समान, हीन और श्रेष्ठ जनों के यथार्थ चिह्न, मध्यम वर्ग को संतुष्ट रखने हेतु उन्नतिशील राजा का आचरण, तथा दुर्बलों को आश्रय देकर उनके लिए जीविका की व्यवस्था—इन सब विषयों का प्रतिपादन किया है।

Verse 2

राज्ञां वित्त च कोशं च कोशसंचयनं जय: । अमात्यगुणवृत्तिश्व प्रकृतीनां च वर्धनम्‌,युधिष्ठिरने कहा--परंतप भरतनन्दन! आपने ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, और शाद्रोंके धर्ममय आचार, धन, जीविकाके उपाय तथा धर्म आदिके फल बताये हैं। राजाओंके धन, कोश, कोश-संग्रह, शत्रुविजय, मन्त्रीके गुण और व्यवहार, प्रजावर्गकी उन्नति, संधि-विग्रह आदि छः: गुणोंके प्रयोग, सेनाके बर्ताव, दुष्टोंकी पहचान, सत्पुरुषोंके लक्षण, जो अपने समान, अपनेसे हीन तथा अपनेसे उत्कृष्ट हैं--उन सब लोगोंके यथावत्‌ लक्षण, मध्यम वर्गको संतुष्ट रखनेके लिये उन्नतिशील राजाको कैसे रहना चाहिये--इसका निर्देश, दुर्बल पुरुषको अपनाने और उसके लिये जीविकाकी व्यवस्था करनेकी आवश्यकता--इन सब विषयोंका आपने देशाचार और शास्त्रके अनुसार संक्षेपसे धर्मके अनुकूल प्रतिपादन किया है

युधिष्ठिर ने कहा—(अब आगे) राजाओं के धन और कोश तथा उसके संचय, शत्रुओं पर विजय, मंत्रियों के गुण और आचरण, तथा राज्य की प्रकृतियों (प्रजा और सहायक शक्तियों) की वृद्धि-समृद्धि के विषय में भी बताइए।

Verse 3

षाड्गुण्यगुणकल्पश्च सेनावृत्तिस्तथैव च । परिज्ञानं च दुष्टस्य लक्षणं च सतामपि,युधिष्ठिरने कहा--परंतप भरतनन्दन! आपने ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, और शाद्रोंके धर्ममय आचार, धन, जीविकाके उपाय तथा धर्म आदिके फल बताये हैं। राजाओंके धन, कोश, कोश-संग्रह, शत्रुविजय, मन्त्रीके गुण और व्यवहार, प्रजावर्गकी उन्नति, संधि-विग्रह आदि छः: गुणोंके प्रयोग, सेनाके बर्ताव, दुष्टोंकी पहचान, सत्पुरुषोंके लक्षण, जो अपने समान, अपनेसे हीन तथा अपनेसे उत्कृष्ट हैं--उन सब लोगोंके यथावत्‌ लक्षण, मध्यम वर्गको संतुष्ट रखनेके लिये उन्नतिशील राजाको कैसे रहना चाहिये--इसका निर्देश, दुर्बल पुरुषको अपनाने और उसके लिये जीविकाकी व्यवस्था करनेकी आवश्यकता--इन सब विषयोंका आपने देशाचार और शास्त्रके अनुसार संक्षेपसे धर्मके अनुकूल प्रतिपादन किया है

युधिष्ठिर ने कहा—आपने षाड्गुण्य नीति के उचित प्रयोग और सेना के आचरण-प्रबंधन का भी वर्णन किया है; तथा दुष्ट की पहचान और सत्पुरुषों के लक्षणों को जानने की विधि भी बताई है।

Verse 4

समहीनाधिकानां च यथावल्लक्षणं च यत्‌ । मध्यमस्य च तुष्ट्यर्थ यथा स्थेयं विवर्धता,युधिष्ठिरने कहा--परंतप भरतनन्दन! आपने ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, और शाद्रोंके धर्ममय आचार, धन, जीविकाके उपाय तथा धर्म आदिके फल बताये हैं। राजाओंके धन, कोश, कोश-संग्रह, शत्रुविजय, मन्त्रीके गुण और व्यवहार, प्रजावर्गकी उन्नति, संधि-विग्रह आदि छः: गुणोंके प्रयोग, सेनाके बर्ताव, दुष्टोंकी पहचान, सत्पुरुषोंके लक्षण, जो अपने समान, अपनेसे हीन तथा अपनेसे उत्कृष्ट हैं--उन सब लोगोंके यथावत्‌ लक्षण, मध्यम वर्गको संतुष्ट रखनेके लिये उन्नतिशील राजाको कैसे रहना चाहिये--इसका निर्देश, दुर्बल पुरुषको अपनाने और उसके लिये जीविकाकी व्यवस्था करनेकी आवश्यकता--इन सब विषयोंका आपने देशाचार और शास्त्रके अनुसार संक्षेपसे धर्मके अनुकूल प्रतिपादन किया है

युधिष्ठिर ने कहा—अपने समान, अपने से हीन और अपने से श्रेष्ठ जनों के यथार्थ लक्षण बताइए; और यह भी कि निरंतर उन्नति करने वाला राजा मध्यम वर्ग को संतुष्ट रखने के लिए किस प्रकार आचरण करे।

Verse 5

क्षीणग्रहणवृत्तिश्न यथाधर्म प्रकीर्तितम्‌ लघुना देशरूपेण ग्रन्थयोगेन भारत,युधिष्ठिरने कहा--परंतप भरतनन्दन! आपने ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, और शाद्रोंके धर्ममय आचार, धन, जीविकाके उपाय तथा धर्म आदिके फल बताये हैं। राजाओंके धन, कोश, कोश-संग्रह, शत्रुविजय, मन्त्रीके गुण और व्यवहार, प्रजावर्गकी उन्नति, संधि-विग्रह आदि छः: गुणोंके प्रयोग, सेनाके बर्ताव, दुष्टोंकी पहचान, सत्पुरुषोंके लक्षण, जो अपने समान, अपनेसे हीन तथा अपनेसे उत्कृष्ट हैं--उन सब लोगोंके यथावत्‌ लक्षण, मध्यम वर्गको संतुष्ट रखनेके लिये उन्नतिशील राजाको कैसे रहना चाहिये--इसका निर्देश, दुर्बल पुरुषको अपनाने और उसके लिये जीविकाकी व्यवस्था करनेकी आवश्यकता--इन सब विषयोंका आपने देशाचार और शास्त्रके अनुसार संक्षेपसे धर्मके अनुकूल प्रतिपादन किया है

युधिष्ठिर ने कहा—हे भारत! आपने धर्म के अनुसार दुर्बलों को अपनाने, उनके लिए जीविका की व्यवस्था तथा आचरण-नीति का वर्णन किया है; और इसे देश-परिस्थिति के अनुरूप, संक्षेप में, ग्रंथ-शैली की सुव्यवस्थित रीति से प्रस्तुत किया है।

Verse 6

विजिगीषोस्तथा वृत्तमुक्त चैव तथैव ते । गणानां वृत्तिमिच्छामि श्रोतुं मतिमतां वर,बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ पितामह! आपने विजया-भिलाषी राजाके बर्तावका भी वर्णन कर दिया है। अब मैं गणों (गणतनन्‍्त्र राज्यों)-का बर्ताव एवं वृतान्त सुनना चाहता हूँ

युधिष्ठिर बोले—आपने विजयाभिलाषी राजा के आचरण का वर्णन कर दिया है। अब, बुद्धिमानों में श्रेष्ठ, मैं गणों—सभा-शासित राज्यों—का आचार-विचार और जीवन-व्यवस्था सुनना चाहता हूँ, जिससे उनका धर्म और व्यवहार समझ में आए।

Verse 7

यथा गणाः: प्रवर्धन्ते न भिद्यन्ते च भारत । अरींश्व विजिगीषन्ते सुहृदः प्राप्तुवन्ति च,भारत! गणतलन्‍्त्र-राज्योंकी जनता जिस प्रकार अपनी उन्नति करती है, जिस प्रकार आपसमें मतभेद या फूट नहीं होने देती, जिस तरह शत्रुओंपर विजय पाना चाहती है और जिस उपायसे उसे सुहृदोंकी प्राप्ति होती है--ये सारी बातें सुननेके लिये मेरी बड़ी इच्छा है

युधिष्ठिर बोले—हे भारत! मैं विस्तार से सुनना चाहता हूँ कि गण-शासित राज्य की प्रजा किस प्रकार उन्नति करती है, आपस में मतभेद और फूट से कैसे बचती है, शत्रुओं पर विजय पाने का संकल्प और उपाय क्या रखती है, और किन साधनों से सुहृदों का सहयोग तथा मित्रता प्राप्त करती है।

Verse 8

भेदमूलो विनाशो हि गणानामुपलक्षये । मन्त्रसंवरणं दुःखं बहूनामिति मे मतिः

युधिष्ठिर बोले—मैं देखता हूँ कि गणों और समुदायों का विनाश भीतर की फूट में ही जड़ रखता है। और बहुतों के सम्मिलित होने पर नीति और मन्त्रणा को गुप्त रखना अत्यन्त कठिन हो जाता है—यह मेरा विचार है।

Verse 9

मैं देखता हूँ, संघबद्ध राज्योंके विनाशका मूल कारण है आपसकी फूट। मेरा विश्वास है कि बहुत-से मनुष्योंके जो समुदाय हैं, उनके लिये किसी गुप्त मन्त्रणा या विचारको छिपाये रखना बहुत ही कठिन है ।। एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं नेखिलेन परंतप । यथा च ते न भिद्येरंस्तच्च मे वद पार्थिव,“परंतप राजन! इन सारी बातोंको मैं पूर्णरूपसे सुनना चाहता हूँ। किस प्रकार वे संघ या गण आपसमें फूटते नहीं हैं, यह मुझे बताइये

युधिष्ठिर बोले—मैं देखता हूँ कि संघबद्ध राज्यों के विनाश का मूल कारण आपसी फूट है। मेरा मत है कि बहुत-से लोगों के समुदाय में किसी गुप्त मन्त्रणा या योजना को छिपाए रखना अत्यन्त कठिन है। हे परंतप! मैं यह सब पूर्ण रूप से सुनना चाहता हूँ; हे राजन्, बताइए कि वे संघ या गण किस प्रकार आपस में विभाजित नहीं होते।

Verse 10

भीष्म उवाच गणानां च कुलानां च राज्ञां भरतसत्तम | वैरसंदीपनावेतौ लोभामर्षो नराधिप,भीष्मजीने कहा--भरतश्रेष्ठ! नरेश्वर! गणोंमें, कुलोंमें तथा राजाओंमें वैरकी आग प्रज्वलित करनेवाले ये दो ही दोष हैं--लोभ और अमर्ष

भीष्म बोले—हे भरतश्रेष्ठ, हे नरेश्वर! गणों में, कुलों में और राजाओं में वैर की अग्नि भड़काने वाले दो ही दोष हैं—लोभ और अमर्ष (असहिष्णु रोष)।

Verse 11

लोभमेको हि वृणुते ततो5मर्षमनन्तरम्‌ | तौ क्षयव्ययसंयुक्तावन्योन्यं च विनाशिनौ,पहले एक मनुष्य लोभका वरण करता है (लोभवश दूसरेका धन लेना चाहता है), तदनन्तर दूसरेके मनमें अर्मष पैदा होता है; फिर वे दोनों लोभ और अमर्षसे प्रभावित हुए व्यक्ति समुदाय, धन और जनकी बड़ी भारी हानि उठाकर एक-दूसरेके विनाशक बन जाते हैं

भीष्म ने कहा— मनुष्य पहले लोभ का वरण करता है; उसके तुरंत बाद अमर्ष (रोष) उत्पन्न होता है। फिर क्षय और व्यय से संयुक्त वे दोनों—लोभ और अमर्ष—परस्पर विनाशक बन जाते हैं और धन, जन तथा अपनी प्रतिष्ठा की भारी हानि कराते हैं।

Verse 12

चारमन्त्रबलादानै: सामदानविभेदनै: । क्षयव्ययभयोपायै: प्रकर्षन्तीतरेतरम्‌,वे भेद लेनेके लिये गुप्तचरोंको भेजते हैं, गुप्त मन्त्रणाएँ करते तथा सेना एकत्र करनेमें लग जाते हैं। साम, दान और भेदनीतिके प्रयोग करते हैं, तथा जन-संहार, अपार धनराशिके व्यय एवं अनेक प्रकारके भय उपस्थित करनेवाले विविध उपायोंद्वारा एक-दूसरेको दुर्बल कर देते हैं

भीष्म ने कहा— वे भेद लेने के लिए गुप्तचरों को लगाते हैं, गुप्त मन्त्रणा करते हैं और सेना का संग्रह तथा बल-दान करते हैं। साम, दान और भेद-नीति का प्रयोग करते हैं; और क्षय, भारी व्यय तथा भय उत्पन्न करने वाले विविध उपायों से एक-दूसरे को दबाने का प्रयत्न करते हैं।

Verse 13

तत्रादानेन भिद्यन्ते गणा: संघातवृत्तय: । भिन्ना विमनस: सर्वे गच्छन्त्यरिवशं भयात्‌,संघबद्ध होकर जीवन-निर्वाह करनेवाले गणराज्यके सैनिकोंको भी यदि समयपर भोजन और वेतन न मिले तो भी वे फूट जाते हैं। फ़ूट जानेपर सबके मन एक-दूसरेके विपरीत हो जाते हैं और वे सबके सब भयके कारण शत्रुओंके अधीन हो जाते हैं

भीष्म ने कहा— जो गण संघबद्ध होकर जीवन-निर्वाह करते हैं, वे भी समय पर अन्न-वेतन आदि न मिलने से टूट जाते हैं। टूटने पर सबके मन खिन्न हो जाते हैं, परस्पर विरोधी बनते हैं और भय के कारण शत्रुओं के वश में चले जाते हैं।

Verse 14

भेदे गणा विनेशुर्हि भिन्नास्तु सुजया: परै: | तस्मात्‌ संघातयोगेन प्रयतेरन्‌ गणा: सदा,आपसमें फूट होनेसे ही संघ या गणराज्य नष्ट हुए हैं। फूट होनेपर शत्रु उन्हें अनायास ही जीत लेते हैं; अतः गणोंको चाहिये कि वे सदा संघबद्ध--एकमत होकर ही विजयके लिये प्रयत्न करें

भीष्म ने कहा— फूट से ही गण नष्ट होते हैं; और फूट जाने पर शत्रु उन्हें सहज ही जीत लेते हैं। इसलिए गणों को चाहिए कि वे सदा संघबद्ध, एकमत होकर विजय के लिए प्रयत्न करें।

Verse 15

अर्थाश्वैवाधिगम्यन्ते संघातबलपौरुषै: । बाह्वाश्र मैत्रीं कुर्वन्ति तेषु संघातवृत्तिषु

भीष्म ने कहा— धन और लौकिक लाभ अपने ही पक्ष के संघात-बल और पुरुषार्थ से प्राप्त होते हैं। और जो बाहुबल पर आश्रित हैं, वे ऐसे संघात-वृत्तियों में मैत्री (संधि) कर लेते हैं।

Verse 16

जो सामूहिक बल और पुरुषार्थसे सम्पन्न हैं, उन्हें अनायास ही सब प्रकारके अभीष्ट पदार्थोंकी प्राप्ति हो जाती है। संघबद्ध होकर जीवन-निर्वाह करनेवाले लोगोंके साथ संघसे बाहरके लोग भी मैत्री स्थापित करते हैं ।। ज्ञानवृद्धा: प्रशंसन्ति शुश्रूषन्त: परस्परम्‌ । विनिवृत्ताभि संधाना: सुखमेधन्ति सर्वश:,ज्ञानवृद्ध पुरुष गणराज्यके नागरिकोंकी प्रशंसा करते हैं। संघबद्ध लोगोंके मनमें आपसमें एक-दूसरेको ठगनेकी दुर्भावना नहीं होती। वे सभी एक-दूसरेकी सेवा करते हुए सुखपूर्वक उन्नति करते हैं

भीष्म बोले— ज्ञान-वृद्ध पुरुष ऐसे लोगों की प्रशंसा करते हैं—जो परस्पर सेवा करते हैं, छल-कपट की योजनाओं से रहित रहते हैं और सब प्रकार से सुखपूर्वक उन्नति करते हैं। जिनमें सामूहिक बल और पुरुषार्थ होता है, उन्हें बिना विशेष प्रयास के ही अभीष्ट पदार्थों की प्राप्ति हो जाती है। जो संघबद्ध होकर जीवन-निर्वाह करते हैं, उनसे संघ के बाहर के लोग भी मैत्री स्थापित करते हैं। जहाँ परस्पर सेवा है और संदेह का स्थान नहीं, वहाँ स्थिरता, विश्वास और कल्याण स्वभावतः प्राप्त होता है।

Verse 17

धर्मिष्ठान्‌ व्यवहारां श्व स्थापयन्तश्न शास्त्रत: । यथावत्‌ प्रतिपश्यन्तो विवर्धन्ते गणोत्तमा:,गणराज्यके श्रेष्ठ नागरिक शास्त्रके अनुसार धर्मानुकूल व्यवहारोंकी स्थापना करते हैं। वे यथोचित दृष्टिसे सबको देखते हुए उन्नतिकी दिशामें आगे बढ़ते जाते हैं

गणराज्य के श्रेष्ठ नागरिक शास्त्र के अनुसार धर्मयुक्त व्यवहारों की स्थापना करते हैं। वे यथोचित दृष्टि से सबको देखते-परखते हुए उन्नति की दिशा में निरंतर बढ़ते जाते हैं।

Verse 18

पुत्रान्‌ भ्रातृन्‌ निगृह्नन्तो विनयन्तश्न तान्‌ सदा । विनीतांश्व प्रगृह्नन्तो विवर्धन्ते गणोत्तमा:,गणराज्यके श्रेष्ठ पुरुष पुत्रों और भाइयोंको भी यदि वे कुमार्गपर चलें तो दण्ड देते हैं। सदा उन्हें उत्तम शिक्षा प्रदान करते हैं और शिक्षित हो जानेपर उन सबको बड़े आदरसे अपनाते हैं। इसलिये वे विशेष उन्नति करते हैं

भीष्म बोले— गणराज्य के श्रेष्ठ पुरुष अपने पुत्रों और भाइयों को भी यदि वे कुमार्ग पर चलें तो रोकते-टोकते और दण्ड देते हैं; सदा उन्हें विनय-शिक्षा देते हैं। और जब वे सुशिक्षित हो जाते हैं, तब उन्हें बड़े आदर से अपनाते और संभालते हैं। इसी कारण वे विशेष उन्नति प्राप्त करते हैं।

Verse 19

चारमन्त्रविधानेषु कोशसंनिचयेषु च । नित्ययुक्ता महाबाहो वर्धन्ते सर्वती गणा:,महाबाहु युधिष्ठिर! गणराज्यके नागरिक गुप्तचर या दूतका काम करने, राज्यके हितके लिये गुप्त मन्त्रणा करने, विधान बनाने तथा राज्यके लिये कोश-संग्रह करने आदिके लिये सदा उद्यत रहते हैं, इसीलिये सब ओरसे उनकी उन्नति होती है

भीष्म बोले— महाबाहु युधिष्ठिर! गणराज्य के नागरिक गुप्तचर-कार्य और दूत-कार्य में, राज्यहित के लिए गुप्त मंत्रणा में, विधान-निर्माण में तथा कोश-संग्रह में सदा लगे रहते हैं; इसलिए वे सब ओर से उन्नति करते हैं।

Verse 20

प्राज्ञान्‌ शूरान्‌ महोत्साहान्‌ कर्मसु स्थिरपौरुषान्‌ । मानयन्तः सदा युक्ता विवर्धन्ते गणा नूप,नरेश्वर! संघराज्यके सदस्य सदा बुद्धिमान, शूरवीर, महान्‌ उत्साही और सभी कार्योमें दृढ़ पुरुषार्थका परिचय देनेवाले लोगोंका सदा सम्मान करते हुए राज्यकी उन्नतिके लिये उद्योगशील बने रहते हैं। इसीलिये वे शीघ्र आगे बढ़ जाते हैं

भीष्म बोले— नरेश्वर! जो संघ-समुदाय सदा बुद्धिमान, शूरवीर, महान् उत्साही और कर्म में दृढ़ पुरुषार्थ वाले जनों का निरंतर सम्मान करते हुए राज्य की उन्नति के लिए उद्योगशील रहते हैं, वे शीघ्र ही बढ़ते और उन्नत होते हैं।

Verse 21

द्रव्यवन्तश्न शूराश्व शस्त्रज्ञा: शास्त्रपारगा: । कृच्छास्वापत्सु सम्मूढान्‌ गणा: संतारयन्ति ते,गणराज्यके सभी नागरिक धनवान, शूरवीर, अस्त्र-शस्त्रोंके ज्ञाता तथा शास्त्रोंके पारंगत विद्वान होते हैं। वे कठिन विपत्तिमें पड़कर मोहित हुए लोगोंका उद्धार करते रहते हैं

भीष्म ने कहा— गणराज्य में नागरिक धनवान, शूरवीर, अस्त्र-शस्त्रों के ज्ञाता और शास्त्रों में पारंगत होते हैं। वे कठिन विपत्तियों में मोहित हुए लोगों का निरन्तर उद्धार करते हैं और उन्हें सुरक्षा तथा धर्ममार्ग पर लौटा लाते हैं।

Verse 22

क्रोधो भेदो भयं दण्ड: कर्षणं निग्रहो वध: । नयत्यरिवशं सद्यो गणान्‌ भरतसत्तम,भरतश्रेष्ठ! संघराज्यके लोगोंमें यदि क्रोध, भेद (फूट), भय, दण्डप्रहार, दूसरोंको दुर्बल बनाने, बन्धनमें डालने या मार डालनेकी प्रवृत्ति पैदा हो जाय तो वह उन्हें तत्काल शत्रुओंके वशमें डाल देती है

भीष्म ने कहा— भरतश्रेष्ठ! क्रोध, फूट, भय, दण्डप्रहार, दूसरों को दुर्बल कर गिराना, बन्धन में डालना और वध— जब ये प्रवृत्तियाँ संघ या गण में उठती हैं, तब वे लोगों को शीघ्र ही शत्रुओं के वश में पहुँचा देती हैं।

Verse 23

तस्मान्मानयितव्यास्ते गणमुख्या: प्रधानत: । लोकयात्रा समायत्ता भूयसी तेषु पार्थिव

इसलिए, हे राजन्, गणों और निगमों के जो अग्रणी मुखिया हैं, उनका सर्वप्रथम सम्मान करना चाहिए; क्योंकि लोकयात्रा— जनजीवन और सार्वजनिक कार्यों का सुचारु प्रवाह— मुख्यतः उन्हीं पर निर्भर है।

Verse 24

राजन! इसलिये तुम्हें गणराज्यके जो प्रधान-प्रधान अधिकारी हैं, उन सबका सम्मान करना चाहिये; क्योंकि लोकयात्राका महान्‌ भार उनके ऊपर अवलम्बित है ।। मन्त्रगुप्ति: प्रधानेषु चारश्वामित्रकर्षण । न गणाः: कृत्स्नशो मन्त्र श्रोतुमरहन्ति भारत,शत्रुसूदन! भारत! गण या संघके सभी लोग गुप्त मन्त्रणा सुननेके अधिकारी नहीं हैं। मन्त्रणाको गुप्त रखने तथा गुप्तचरोंकी नियुक्तिका कार्य प्रधान-प्रधान व्यक्तियोंके ही अधीन होता है

हे राजन्! इसलिए गणराज्य के जो प्रधान-प्रधान अधिकारी हैं, उन सबका सम्मान करना चाहिए; क्योंकि लोकयात्रा का महान् भार उन्हीं पर अवलम्बित है। और, शत्रुसूदन भारत! मन्त्रगुप्ति तथा गुप्तचरों की नियुक्ति का कार्य प्रधान पुरुषों के ही अधीन है; गण के सभी लोग समस्त गुप्त मन्त्रणा सुनने के अधिकारी नहीं होते।

Verse 25

गणमुख्यैस्तु सम्भूय कार्य गणहितं मिथ: । पृथग्गणस्य भिन्नस्य विततस्यथ ततो5न्यथा

भीष्म ने कहा— गणमुख्य लोग परस्पर मिलकर, सम्मति से, गण के हित का कार्य करें। परन्तु जब गण पृथक्-पृथक् होकर भिन्न और बिखर जाए, तब वही कार्य अन्य प्रकार से करना पड़ता है; क्योंकि सामूहिक कल्याण का आधार एकता ही है।

Verse 26

तेषामन्योन्यभिन्नानां स्वशक्तिमनुतिष्ठताम्‌

भीष्म ने कहा—“जो लोग परस्पर भिन्न-भिन्न हों और प्रत्येक अपनी-अपनी शक्ति तथा अपने-अपने कर्तव्य के अनुसार आचरण करता हो, …”

Verse 27

निग्रह: पण्डितै: कार्य: क्षिप्रमेव प्रधानत: । परस्पर फूटकर पृथक्‌-पृथक्‌ अपनी शक्तिका प्रयोग करनेवाले लोगोंमें जो मुख्य-मुख्य नेता हों, उनका संघराज्यके विद्वान्‌ अधिकारियोंको शीघ्र ही दमन करना चाहिये || २६६ || कुलेषु कलहा जाता: कुलवृद्धैरुपेक्षिता:

भीष्म ने कहा—“विद्वानों को चाहिए कि वे पहले ही और शीघ्रता से उपद्रव का निग्रह करें। जब लोग फूटकर गुट-गुट बन जाएँ और अलग-अलग अपनी शक्ति का प्रयोग करने लगें, तब उनमें जो मुख्य नेता हों, उन्हें संघराज्य के विद्वान् अधिकारी तुरंत दबा दें। और जब कुलों में कलह उठे और परिवार के वृद्ध उसे अनदेखा करें, तो वही वैमनस्य बढ़कर बड़े विपद् का रूप ले लेता है।”

Verse 28

आशभ्यन्तरं भयं रक्ष्यमसारं बाह्ृतो भयम्‌

भीष्म ने कहा—“आशा और तृष्णा से भीतर जो भय उठता है, उससे सावधान रहना चाहिए; बाहर से आने वाला भय तो असार और अस्थिर होता है। क्योंकि इच्छा से जन्मी अंतःकंपन ही धैर्य और धर्म को बाह्य संकटों से अधिक डगमगाती है।”

Verse 29

अकस्मात्‌ क्रोधमोहाभ्यां लोभाद्‌ वापि स्वभावजात्‌

भीष्म ने कहा—“कभी-कभी अकस्मात्—क्रोध और मोह से, या अपने स्वभाव से उपजे लोभ के कारण—मनुष्य सहसा दुष्कर्म में प्रवृत्त हो जाता है।”

Verse 30

जात्या च सदृशा: सर्वे कुलेन सदृशास्तथा,जाति और कुलमें सभी एक समान हो सकते हैं; परंतु उद्योग, बुद्धि और रूप- सम्पत्तिमें सबका एक-सा होना सम्भव नहीं है। शत्रुलोग गणराज्यके लोगोंमें भेदबुद्धि पैदा करके तथा उनमेंसे कुछ लोगोंको धन देकर भी समूचे संघमें फूट डाल देते हैं; अतः संघबद्ध रहना ही गणराज्यके नागरिकोंका महान्‌ आश्रय है

भीष्म ने कहा—“जन्म से सब समान हो सकते हैं और कुल से भी समान; पर उद्योग, बुद्धि, रूप और संपत्ति में सबका एक-सा होना संभव नहीं। शत्रु गणराज्य के लोगों में भेदबुद्धि जगाकर और कुछ को धन देकर, पूरे संघ में फूट डाल देते हैं। इसलिए एक देह की भाँति संघबद्ध रहना ही गणराज्य के नागरिकों का महान आश्रय है।”

Verse 31

न चोद्योगेन बुद्धया वा रूपद्रव्येण वा पुन: । भेदाच्चैव प्रदानाच्च भिद्यन्ते रिपुभिर्गणा:,जाति और कुलमें सभी एक समान हो सकते हैं; परंतु उद्योग, बुद्धि और रूप- सम्पत्तिमें सबका एक-सा होना सम्भव नहीं है। शत्रुलोग गणराज्यके लोगोंमें भेदबुद्धि पैदा करके तथा उनमेंसे कुछ लोगोंको धन देकर भी समूचे संघमें फूट डाल देते हैं; अतः संघबद्ध रहना ही गणराज्यके नागरिकोंका महान्‌ आश्रय है

भीष्म ने कहा—जाति और कुल में लोग समान हो सकते हैं, पर उद्योग, बुद्धि तथा रूप-सम्पत्ति में सबका एक-सा होना संभव नहीं। शत्रु इन्हीं भेदों का सहारा लेकर फूट की बुद्धि जगाते हैं और कुछ को धन देकर पूरे संघ को तोड़ देते हैं। इसलिए गण के नागरिकों के लिए दृढ़ एकता ही सबसे बड़ा आश्रय और बल है।

Verse 32

तस्मात्‌ संघातमेवाहुर्गणानां शरणं महत्‌,जाति और कुलमें सभी एक समान हो सकते हैं; परंतु उद्योग, बुद्धि और रूप- सम्पत्तिमें सबका एक-सा होना सम्भव नहीं है। शत्रुलोग गणराज्यके लोगोंमें भेदबुद्धि पैदा करके तथा उनमेंसे कुछ लोगोंको धन देकर भी समूचे संघमें फूट डाल देते हैं; अतः संघबद्ध रहना ही गणराज्यके नागरिकोंका महान्‌ आश्रय है

भीष्म ने कहा—इसलिए संघबद्धता ही गणों का महान् आश्रय कही गई है। जन्म और कुल में समानता हो सकती है, पर परिश्रम, बुद्धि तथा रूप-सम्पत्ति में सबका एक-सा होना संभव नहीं। शत्रु नागरिकों में भेदबुद्धि उत्पन्न करके और कुछ को धन देकर पूरे संघ को विभाजित कर देते हैं। अतः गण के नागरिकों के लिए दृढ़ एकता ही सर्वोच्च सहारा है।

Verse 106

इस प्रकार श्रीमह्ाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत राजधमनुशासनपर्वमें कालकवृक्षीय गुनिका उपदेशविषयक एक सौ छठा अध्याय पूरा हुआ

इस प्रकार श्रीमहाभारत के शान्तिपर्व के अन्तर्गत राजधर्मानुशासनपर्व में ‘कालक-वृक्ष’ की उपमा तथा गुणिका के उपदेश से सम्बन्धित एक सौ छठा अध्याय समाप्त हुआ।

Verse 107

इति श्रीमहा भारते शान्तिपर्वणि राजधर्मानुशासनपर्वणि गणवृत्ते सप्ताधिकशततमो<ध्याय:

इति श्रीमहाभारत के शान्तिपर्व में, राजधर्मानुशासनपर्व के अन्तर्गत, गणवृत्त छन्द में एक सौ आठवाँ अध्याय समाप्त हुआ।

Verse 253

अर्था: प्रत्यवसीदन्ति तथानर्था भवन्ति च । गणके मुख्य-मुख्य व्यक्तियोंको परस्पर मिलकर समस्त गणराज्यके हितका साधन करना चाहिये; अन्यथा यदि संघमें फूट होकर पृथक्‌-पृथक्‌ कई दलोंका विस्तार हो जाय तो उसके सभी कार्य बिगड़ जाते और बहुत-से अनर्थ पैदा हो जाते हैं

भीष्म कहते हैं—संघ में फूट पड़ते ही अर्थ (उचित प्रयोजन और साधन) डूब जाते हैं और अनर्थ उत्पन्न हो जाते हैं। इसलिए गण के प्रमुख जन परस्पर मिलकर समस्त गणराज्य के हित का साधन करें; पर यदि संघ टूटकर अलग-अलग दल फैल जाएँ, तो सब कार्य बिगड़ जाते हैं और बहुत-से अनर्थ जन्म लेते हैं।

Verse 283

आशभ्यन्तरं भयं राजन्‌ सद्यो मूलानि कृन्तति । भीतरी भय दूर करके संघकी रक्षा करनी चाहिये। यदि संघमें एकता बनी रहे तो बाहरका भय उसके लिये नि:सार है (वह उसका कुछ भी बिगाड़ नहीं सकता)। राजन! भीतरका भय तत्काल ही संघराज्यकी जड़ काट डालता है

भीष्म बोले—राजन्! भीतर से उठने वाला भय—अविश्वास, गुटबाज़ी और अंतःकलह—क्षणभर में राज्य की जड़ों को काट देता है। इसलिए भीतर के भय को दूर कर संघ की रक्षा करनी चाहिए। यदि संघ में एकता बनी रहे, तो बाहरी भय निष्फल हो जाता है; वह उसका कुछ भी बिगाड़ नहीं सकता।

Verse 2736

गोत्रस्य नाशं कुर्वन्ति गणभेदस्य कारकम्‌ । कुलोंमें जो कलह होते हैं, उनकी यदि कुलके वृद्ध पुरुषोंने उपेक्षा कर दी तो वे कलह गणोंमें फ़ूट डालकर समस्त कुलका नाश कर डालते हैं

भीष्म बोले—जो लोग गुट-भेद के कारण बनते हैं, वे गोत्र का नाश कर देते हैं। कुल में जब कलह उठे और कुल के वृद्धजन उसकी उपेक्षा कर दें, तो वही झगड़े गणों में फूट डालकर अंततः समस्त कुल का विनाश कर देते हैं।

Verse 2936

अन्योन्यं नाभिभाषन्ते तत्पराभवलक्षणम्‌ । अकमस्मात्‌ पैदा हुए क्रोध और मोहसे अथवा स्वाभाविक लोभसे भी जब संघके लोग आपसमें बातचीत करना बंद कर दें, तब यह उनकी पराजयका लक्षण है

भीष्म बोले—जब लोग आपस में बोलचाल छोड़ देते हैं, तो वह पराजय का लक्षण है। चाहे यह मौन अचानक उठे क्रोध और मोह से हो, या स्वभावगत लोभ से—संघ के लोगों का परस्पर संवाद टूटना एकता के ढहने और सामूहिक शक्ति के क्षय का संकेत है।

Frequently Asked Questions

Factional division (bheda), typically arising from greed and resentment, which makes the collective vulnerable to external manipulation and rapid loss of autonomy.

Maintain cohesion, honor competent leaders, enforce disciplined internal conduct, establish lawful procedures, sustain intelligence and treasury management, and limit sensitive counsel to principal decision-makers.

Yes: saṃghāta (cohesive union) is presented as the primary refuge and enabling condition; unity secures resources and alliances, while division and negligence enable subjugation.