Gaṇānāṃ Vṛttiḥ — On the Sustenance and Cohesion of Assemblies
Gaṇa-nīti
धर्मिष्ठान् व्यवहारां श्व स्थापयन्तश्न शास्त्रत: । यथावत् प्रतिपश्यन्तो विवर्धन्ते गणोत्तमा:
गणराज्य के श्रेष्ठ नागरिक शास्त्र के अनुसार धर्मयुक्त व्यवहारों की स्थापना करते हैं। वे यथोचित दृष्टि से सबको देखते-परखते हुए उन्नति की दिशा में निरंतर बढ़ते जाते हैं।
भीष्म उवाच