Adhyaya 8
Mausala ParvaAdhyaya 853 Verses

Adhyaya 8

मौसलपर्व — अध्याय ८ (Arjuna’s evacuation of Dvārakā, Vasudeva’s rites, and the caravan’s crisis)

Upa-parva: Dvārākā-pralaya and Vṛṣṇi-śeṣa-nayana (Episode: evacuation, rites, and submergence)

Vaiśaṃpāyana narrates Arjuna’s grief-stricken response to Vasudeva and the Yādava catastrophe. Arjuna declares that the Pāṇḍavas (with Draupadī) share a single resolve and recognizes the ‘time’ of royal transition. He convenes the Sudharmā assembly, instructs the citizens to prepare vehicles and valuables, and announces that the sea will inundate Dvārakā; he designates Vajra as future ruler at Śakraprastha (Indraprastha). Vasudeva attains his final departure, prompting communal lamentation; his wives resolve to follow him, and Arjuna oversees the funeral rites and cremation, with ritual procession elements and collective mourning described. After completing rites for the fallen Vṛṣṇis and searching for the bodies of Rāma and Vāsudeva, Arjuna leads the survivors out; Dvārakā is submerged as they depart. During the migration, bandits (ābhīras/dasyus) attack the caravan; Arjuna’s attempt to use Gāṇḍīva and divine weapons falters—he struggles to string the bow, forgets the astras, and runs out of arrows—signaling the contraction of heroic efficacy under kāla. Many women are abducted despite efforts at protection. Arjuna resettles remaining dependents in various places, installs Vajra at Indraprastha, and then, overwhelmed, encounters Kṛṣṇa-Dvaipāyana (Vyāsa) in an āśrama, setting up further interpretive closure.

Chapter Arc: अर्जुन सत्यवती-सुत महर्षि व्यास के आश्रम में प्रवेश करते हैं और एकान्त में बैठे धर्मज्ञ तपोधन को देखते हैं—कृष्ण-वियोग से व्याकुल हृदय उत्तर खोजने आया है। → अर्जुन अपना नाम निवेदित कर व्यास की उपासना करता है और फिर भीतर की टूटन उँडेल देता है: कृष्ण के बिना लोक असह्य है; उससे भी कठोर यह कि उसका अस्त्र-ज्ञान क्षण में लुप्त हो गया और बाण-शक्ति नष्ट-सी हो चली। यह पतन केवल व्यक्तिगत नहीं—युग-परिवर्तन का संकेत है। → व्यास अर्जुन को यथार्थ का बोध कराते हैं: कृष्ण ने पृथ्वी का भार उतारकर देह त्याग अपने परम धाम को प्राप्त किया; और कालचक्र में वही जो ईश्वर-सा समर्थ दिखता है, समय आने पर पराधीन भी हो जाता है—यह क्षय किसी एक पुरुष का नहीं, युगधर्म का विधान है। → व्यास अर्जुन को वैराग्य और परमार्थ की दिशा देते हैं—अब तुम्हारे लिए (और समस्त भरतवंश के लिए) उत्तम गति का समय उपस्थित है; आसक्ति छोड़कर धर्मानुसार आगे बढ़ो। अर्जुन व्यास-वचन का तत्त्व समझकर अनुमति ले हस्तिनापुर लौटने को उद्यत होता है। → अर्जुन की वापसी के साथ प्रश्न शेष रहता है—हस्तिनापुर में वह इस युग-परिवर्तन का संदेश कैसे उतारेगा, और शेष जनों का अंतिम पथ क्या होगा?

Shlokas

Verse 1

पम्प बछ। आर: अं अष्टमोड ध्याय: अर्जुन और व्यासजीकी बातचीत वैशम्पायन उवाच प्रविशन्नर्जुनो राजन्नाश्रमं सत्यवादिन: । ददर्शासीनमेकान्ते मुनिं सत्यवतीसुतम्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्‌! सत्यवादी व्यासजीके आश्रममें प्रवेश करके अर्जुनने देखा कि सत्यवतीनन्दन मुनिवर व्यास एकान्तमें बैठे हुए हैं

वैशम्पायन बोले—राजन्! सत्यवादी मुनि व्यासजी के आश्रम में प्रवेश करते हुए अर्जुन ने सत्यवतीनन्दन मुनिवर व्यास को एकान्त में बैठे देखा।

Verse 2

स तमासाद्य धर्मज्ञमुपतस्थे महाव्रतम्‌ । अर्जुनोअस्मीति नामास्मै निवेद्याभ्यवदत्‌ तत:,महान्‌ व्रतधारी तथा धर्मके ज्ञाता व्यासजीके पास पहुँचकर “मैं अर्जुन हूँ” ऐसा कहते हुए धनंजयने उनके चरणोंमें प्रणाम किया। फिर वे उनके पास ही खड़े हो गये

धर्मज्ञ और महाव्रतधारी व्यासजी के पास पहुँचकर धनंजय ने “मैं अर्जुन हूँ” ऐसा कहकर अपना नाम निवेदित किया, उनके चरणों में प्रणाम किया और फिर उनके निकट आदरपूर्वक खड़े हो गए।

Verse 3

स्वागतं ते<$स्त्विति प्राह मुनि: सत्यवतीसुतः । आस्यतामिति होवाच प्रसन्नात्मा महामुनि:,उस समय प्रसन्नचित्त हुए महामुनि सत्यवती-नन्दन व्यासने अर्जुनसे कहा--“बेटा! तुम्हारा स्वागत है; आओ यहाँ बैठो”

तब प्रसन्नचित्त महामुनि सत्यवतीनन्दन व्यास ने कहा—“तुम्हारा स्वागत है; आओ, यहाँ बैठो।”

Verse 4

तमप्रतीतमनसं नि:श्वसन्तं पुन: पुन: । निर्विण्णमनसं दृष्ट्वा पार्थ व्यासो5ब्रवीदिदम्‌

उसे—जिसका मन सांत्वना न पा रहा था, जो बार-बार दीर्घ निःश्वास ले रहा था और भीतर से खिन्न हो चुका था—देखकर, हे पार्थ, व्यासजी ने उससे ये वचन कहे।

Verse 5

अर्जुनका मन अशान्त था। वे बारंबार लंबी साँस खींच रहे थे। उनका चित्त खिन्न एवं विरक्त हो चुका था। उन्हें इस अवस्थामें देखकर व्यासजीने पूछा-- ।। नखकेशदशाकुम्भवारिणा कि समुक्षित: । आवीरजानुगमनं ब्राह्मणो वा हतस्त्वया

वैशम्पायन बोले: अर्जुन को व्याकुल देखकर व्यासजी ने पूछा—“तुम इतने विचलित और उदास क्यों हो? क्या नख, केश और वस्त्र-धोवन के घड़े के जल से तुम पर छींटे पड़े हैं—जो अशुभ स्पर्श माना जाता है? अथवा क्या तुम अकालमृत्यु वाले के शवयात्रा के पीछे गये हो? या तुमने किसी ब्राह्मण का वध कर दिया है?”

Verse 6

'पार्थ! क्या तुमने नख, बाल अथवा अधोवस्त्र (धोती)-की कोर पड़ जानेसे अशुद्ध हुए घड़ेके जलसे स्नान कर लिया है? अथवा तुमने रजस्वला स्त्रीसे समागम या किसी ब्राह्मणका वध तो नहीं किया है? ।। युद्धे पराजितो वासि गतश्रीरिव लक्ष्यसे । नत्वां प्रभिन्न जानामि किमिदं भरतर्षभ

“हे पार्थ! क्या तुमने नख, बाल अथवा अधोवस्त्र की कोर गिर जाने से अशुद्ध हुए घड़े के जल से स्नान किया है? अथवा तुमने रजस्वला स्त्री से समागम किया है, या किसी ब्राह्मण का वध कर दिया है? तुम युद्ध में पराजित-से, और श्रीहीन-से प्रतीत होते हो। हे भरतश्रेष्ठ! मैं तुम्हें इस बदली हुई दशा में पहचान नहीं पा रहा—यह क्या है?”

Verse 7

इस प्रकार श्रीमह्याभारत मौसलपर्वमें अर्जुनद्वारा वृष्णिवंशकी स्त्रियों और बालकोंका आनयनविषयक सातवाँ अध्याय पूरा हुआ,श्रोतव्यं चेन्मया पार्थ क्षिप्रमाख्यातुमरहसि । “कहीं तुम युद्धमें परास्त तो नहीं हो गये? क्‍योंकि श्रीहीन-से दिखायी देते हो। भरतश्रेष्ठ तुम कभी पराजित हुए हो--यह मैं नहीं जानता; फिर तुम्हारी ऐसी दशा क्‍यों है? पार्थ! यदि मेरे सुननेयोग्य हो तो अपनी इस मलिनताका कारण मुझे शीघ्र बताओ” ।। ६३ || अर्जुन उवाच यः स मेघवपु: श्रीमान्‌ बृहत्पड़्कजलोचन:

“हे पार्थ! यदि यह मेरे सुनने योग्य हो, तो तुम शीघ्र बताने योग्य हो। क्या तुम कहीं युद्ध में परास्त तो नहीं हो गये? तुम श्रीहीन-से दिखायी देते हो। हे भरतश्रेष्ठ! मैं तो तुम्हें कभी पराजित हुआ नहीं जानता; फिर तुम्हारी यह दशा क्यों है? हे पार्थ! यदि यह मेरे सुनने योग्य हो, तो अपनी इस मलिनता का कारण मुझे तुरंत बताओ।” तब अर्जुन ने उत्तर देना आरम्भ किया—“वह, जो मेघ के समान वर्ण वाला, श्रीसम्पन्न, और बड़े कमल-से नेत्रों वाला था…”

Verse 8

(तद्वाक्यस्पर्शनालोकसुखं त्वमृतसंनिभम्‌ । संस्मृत्य देवदेवस्य प्रमुह्माम्यमृतात्मन: ।।) देवताओंके भी देवता, अमृतस्वरूप श्रीकृष्णके मधुर वचनोंको सुनने, उनके श्रीअंगोंका स्पर्श करने और उन्हें देखनेका जो अमृतके समान सुख था, उसे बार-बार याद करके मैं अपनी सुध-बुध खो बैठता हूँ ।। मौसले वृष्णिवीराणां विनाशो ब्रह्मुशापज:,इति श्रीमहाभारते मौसलपर्वणि व्यासार्जुनसंवादे अष्टमोडध्याय:

अर्जुन बोले: देवताओं के भी देवता, अमृतस्वरूप श्रीकृष्ण के मधुर वचनों को सुनने, उनके पावन अंगों का स्पर्श करने और उनका दर्शन करने से जो अमृत-सा सुख मुझे मिलता था—उसे बार-बार स्मरण करके मैं सुध-बुध खो बैठता हूँ और मोहग्रस्त हो जाता हूँ।

Verse 9

बभूव वीरान्तकर: प्रभासे लोमहर्षण: । ब्राह्मणोंके शापसे मौसलयुद्धमें वृष्णिवंशी वीरोंका विनाश हो गया। बड़े-बड़े वीरोंका अन्त कर देनेवाला वह रोमाज्चकारी संग्राम प्रभासक्षेत्रमें घटित हुआ था ।। एते शूरा महात्मान: सिंहदर्पा महाबला:

अर्जुन बोले—प्रभास में एक रोमांचकारी संग्राम हुआ, जो बड़े-बड़े वीरों का भी अन्त कर देने वाला था। ब्राह्मणों के शाप के प्रभाव से मौसल-युद्ध में वृष्णिवंशी योद्धा नष्ट हो गए। वही भयावह और अद्भुत युद्ध प्रभास के पवित्र क्षेत्र में घटित हुआ। वे सब शूरवीर, महात्मा, सिंह-गर्व से भरे और अत्यन्त बलवान थे।

Verse 10

गदापरिघशक्तीनां सहा: परिघबाहव:

वे गदा, परिघ और शक्ति धारण करने वाले थे; सब एक साथ खड़े थे, जिनकी भुजाएँ मानो परिघ के समान प्रचण्ड थीं।

Verse 11

हतं पञ्चशतं तेषां सहस्नं बाहुशालिनाम्‌

उनमें पाँच सौ—हाँ, एक हजार तक—बलिष्ठ भुजाओं वाले योद्धा मारे जा चुके हैं।

Verse 12

पुन: पुनर्न मृष्पयामि विनाशममितौजसाम्‌,उन अमित तेजस्वी वीरोंके विनाशका दुःख मुझसे किसी तरह सहा नहीं जाता। मैं बार-बार उस दुःखसे व्यथित हो जाता हूँ। यशस्वी श्रीकृष्ण और यदुवंशियोंके परलोक- गमनकी बात सोचकर तो मुझे ऐसा जान पड़ता है, मानो समुद्र सूख गया, पर्वत हिलने लगे, आकाश फट पड़ा और अग्निके स्वभावमें शीतलता आ गयी। शार्ज्रधनुष धारण करनेवाले श्रीकृष्ण भी मृत्युके अधीन हुए होंगे--यह बात विश्वासके योग्य नहीं है। मैं इसे नहीं मानता

अर्जुन बोले—बार-बार मैं उन अमित-पराक्रमी वीरों के विनाश को सह नहीं पाता। उन तेजस्वी योद्धाओं के नाश से उत्पन्न शोक किसी भी प्रकार मेरे लिए असह्य है; मैं बार-बार उसी दुःख से व्यथित हो उठता हूँ। जब मैं यशस्वी श्रीकृष्ण और यदुवंश के परलोक-गमन का विचार करता हूँ, तब मुझे ऐसा प्रतीत होता है मानो समुद्र सूख गया हो, पर्वत डोलने लगे हों, आकाश फट पड़ा हो और अग्नि के स्वभाव में शीतलता आ गई हो। शार्ङ्गधनुष धारण करने वाले श्रीकृष्ण भी मृत्यु के वश हुए होंगे—यह बात मुझे विश्वास योग्य नहीं लगती; मैं इसे स्वीकार नहीं करता।

Verse 13

चिन्तयानो यदूनां च कृष्णस्य च यशस्विन: । शोषणं सागरस्येव पर्वतस्येव चालनम्‌,उन अमित तेजस्वी वीरोंके विनाशका दुःख मुझसे किसी तरह सहा नहीं जाता। मैं बार-बार उस दुःखसे व्यथित हो जाता हूँ। यशस्वी श्रीकृष्ण और यदुवंशियोंके परलोक- गमनकी बात सोचकर तो मुझे ऐसा जान पड़ता है, मानो समुद्र सूख गया, पर्वत हिलने लगे, आकाश फट पड़ा और अग्निके स्वभावमें शीतलता आ गयी। शार्ज्रधनुष धारण करनेवाले श्रीकृष्ण भी मृत्युके अधीन हुए होंगे--यह बात विश्वासके योग्य नहीं है। मैं इसे नहीं मानता

यदुओं और यशस्वी श्रीकृष्ण का चिन्तन करते हुए मुझे ऐसा लगता है मानो समुद्र सूख रहा हो और पर्वत हिल रहा हो।

Verse 14

नभस: पतन चैव शैत्यमग्नेस्तथैव च । अश्रद्धेयमहं मन्ये विनाशं शार्ईधन्वचन:,उन अमित तेजस्वी वीरोंके विनाशका दुःख मुझसे किसी तरह सहा नहीं जाता। मैं बार-बार उस दुःखसे व्यथित हो जाता हूँ। यशस्वी श्रीकृष्ण और यदुवंशियोंके परलोक- गमनकी बात सोचकर तो मुझे ऐसा जान पड़ता है, मानो समुद्र सूख गया, पर्वत हिलने लगे, आकाश फट पड़ा और अग्निके स्वभावमें शीतलता आ गयी। शार्ज्रधनुष धारण करनेवाले श्रीकृष्ण भी मृत्युके अधीन हुए होंगे--यह बात विश्वासके योग्य नहीं है। मैं इसे नहीं मानता

अर्जुन बोले— आकाश का गिर पड़ना और अग्नि का शीतल हो जाना—ये असंभव बातें भी मुझे इस विनाश के समाचार से अधिक विश्वासयोग्य लगती हैं। शार्ङ्गधनुषधारी श्रीकृष्ण के नाश को मैं स्वीकार नहीं कर सकता। यशस्वी श्रीकृष्ण और यदुवंशियों के परलोक-गमन का विचार आते ही मेरा हृदय शोक और अविश्वास से भर उठता है; मानो समुद्र सूख गया हो, पर्वत डोलने लगे हों, आकाश फट पड़ा हो और अग्नि के स्वभाव में शीतलता आ गई हो। श्रीकृष्ण भी मृत्यु के अधीन हुए—यह बात मेरे लिए श्रद्धेय नहीं; मैं इसे नहीं मानता।

Verse 15

न चेह स्थातुमिच्छामि लोके कृष्णविनाकृत: । इत: कष्टतरं चान्यच्छुणु तद्‌ वै तपोधन,फिर भी श्रीकृष्ण मुझे छोड़कर चले गये। मैं इस संसारमें उनके बिना नहीं रहना चाहता। तपोधन! इसके सिवा जो दूसरी घटना घटित हुई है वह इससे भी अधिक कष्टदायक है। आप इसे सुनिये

अर्जुन बोले— मैं इस लोक में श्रीकृष्ण के बिना रहना नहीं चाहता। तपोधन! इससे भी अधिक कष्टदायक एक और घटना घटी है—उसे सुनिए।

Verse 16

मनो मे दीर्यते येन चिन्तयानस्य वै मुहु: । पश्यतो वृष्णिदाराश्न मम ब्रह्मन्‌ सहस्रशः

अर्जुन बोले— बार-बार सोचते-सोचते मेरा मन फटता जाता है। हे ब्राह्मण! मेरी आँखों के सामने वृष्णिवंशी पुरुष और उनकी स्त्रियाँ सहस्रों की संख्या में नष्ट हो रहे हैं।

Verse 17

धनुरादाय तत्राहं नाशकं तस्य पूरणे

वहाँ मैंने धनुष उठाया, पर उसे चढ़ा न सका। उसी क्षण वह अस्त्र, जो पहले मेरी इच्छा के अनुसार चलता था, मेरे वश में न रहा। तब मुझे बोध हुआ कि बल और कौशल सदा नहीं टिकते; काल के पलटते ही समर्थ पुरुष को भी विनयपूर्वक अपनी सीमा स्वीकार करनी पड़ती है।

Verse 18

अस्त्राणि मे प्रणष्टानि विविधानि महामुने

अर्जुन बोले— हे महामुने! मेरे विविध प्रकार के अस्त्र नष्ट हो गए हैं। जो पराक्रम का आधार था, वह अब निष्फल हो गया—काल और दैव के पलटते ही लौकिक बल की क्षणभंगुरता प्रकट हो जाती है।

Verse 19

शराशक्ष क्षयमापतन्ना: क्षणेनैव समन्तत: । महामुने! मेरा नाना प्रकारके अस्त्रोंका ज्ञान विलुप्त हो गया। मेरे सभी बाण सब ओर जाकर क्षणभरमें नष्ट हो गये ।। १८ $ ।। पुरुषश्चाप्रमेयात्मा शड्खचक्रगदाधर:

अर्जुन बोले—हे महामुने! क्षणभर में ही मेरे बाण चारों ओर नष्ट हो गये। नाना प्रकार के अस्त्रों का मेरा ज्ञान भी लुप्त हो गया है; मेरे सब बाण दिशाओं में जाकर पलभर में विनष्ट हो गये।

Verse 20

चतुर्भुज:ः पीतवासा: श्याम: पद्मदलेक्षण: । यश्व याति पुरस्तान्मे रथस्य सुमहाद्मयुति:

अर्जुन बोले—जो मेरे रथ के आगे-आगे चलता था—चार भुजाओं वाला, पीताम्बरधारी, श्यामवर्ण, कमलदल-नेत्र और अत्यन्त महान् तेज से दीप्त—वही दिव्य पुरुष मार्ग दिखाता था।

Verse 21

प्रदहन्‌ रिपुसैन्यानि न पश्याम्यहमच्युतम्‌ । जिनका स्वरूप अप्रमेय है, जो शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले, चतुर्भुज, पीताम्बरधारी, श्यामसुन्दर तथा कमलदलके समान विशाल नेत्रोंवाले हैं, जो महातेजस्वी प्रभु शत्रुओंकी सेनाओंको भस्म करते हुए मेरे रथके आगे-आगे चलते थे, उन्हीं भगवान्‌ अच्युतको अब मैं नहीं देख पाता हूँ || १९-२० ई || येन पूर्व प्रदग्धानि शत्रुसैन्यानि तेजसा,साधुशिरोमणे! जो पहले स्वयं ही अपने तेजसे शत्रुसेनाओंको दग्ध कर देते थे, उसके बाद मैं गाण्डीव धनुषसे छूटे हुए बाणोंद्वारा उन शत्रुओंका नाश करता था, उन्हीं भगवान्‌को आज न देखनेके कारण मैं विषादमें डूबा हुआ हूँ। मुझे चक्‍्कर-सा आ रहा है

शत्रुओं की सेनाओं को भस्म करते हुए भी अब मैं अच्युत को नहीं देख पाता। जिनका स्वरूप अप्रमेय है, जो शंख-चक्र-गदा धारण करने वाले, चतुर्भुज, पीताम्बरधारी, श्यामसुन्दर, कमलदल-नेत्र और महातेजस्वी प्रभु थे—जो मेरे रथ के आगे-आगे चलकर शत्रुसेनाओं को राख कर देते थे—उन्हीं भगवान् को अब मैं नहीं देखता; उनके न दिखने से मैं शोक में डूब गया हूँ और मोह-सा छा गया है।

Verse 22

शरैगण्डीवनिर्मुक्तिरहं पश्चाच्च नाशयम्‌ | तमपश्यन्‌ विषीदामि घूर्णामीव च सत्तम,साधुशिरोमणे! जो पहले स्वयं ही अपने तेजसे शत्रुसेनाओंको दग्ध कर देते थे, उसके बाद मैं गाण्डीव धनुषसे छूटे हुए बाणोंद्वारा उन शत्रुओंका नाश करता था, उन्हीं भगवान्‌को आज न देखनेके कारण मैं विषादमें डूबा हुआ हूँ। मुझे चक्‍्कर-सा आ रहा है

जिनके तेज से पहले शत्रुसेनाएँ दग्ध हो जाती थीं, उनके बाद मैं गाण्डीव से छूटे बाणों द्वारा उन शत्रुओं का नाश करता था। अब उन्हें न देखकर मैं विषाद में डूब गया हूँ; हे श्रेष्ठ पुरुष, मुझे चक्कर-सा आ रहा है।

Verse 23

परिनिर्विण्णचेताश्न शान्तिं नोपलभेडपि च । (देवकीनन्दनं देवं वासुदेवमजं प्रभुम्‌ ।) विना जनार्दनं वीर नाहं जीवितुमुत्सहे,मेरे चित्तमें निर्वेद छा गया है। मुझे शान्ति नहीं मिलती है। मैं देवस्वरूप, अजन्मा, भगवान्‌ देवकीनन्दन वासुदेव वीर जनार्दनके बिना अब जीवित रहना नहीं चाहता

मेरा चित्त निर्वेद से भर गया है; मुझे तनिक भी शान्ति नहीं मिलती। देवस्वरूप, अजन्मा प्रभु—देवकीनन्दन वासुदेव—वीर जनार्दन के बिना अब मैं जीना नहीं चाहता।

Verse 24

श्र॒ुत्वैव हि गतं विष्णुं ममापि मुमुहुर्दिश: । प्रणष्टज्ञातिवीर्यस्य शून्यस्य परिधावत:

अर्जुन बोले—ज्यों ही मैंने सुना कि विष्णुरूप श्रीकृष्ण प्रस्थान कर गए, मुझे लगा मानो दिशाएँ भी डोल उठीं। स्वजनों के बल से वंचित होकर मैं शून्य-सा, भ्रमित और विह्वल, इधर-उधर दौड़ता फिरा।

Verse 25

व्यास उवाच (देवांशा देवदेवेन सम्मतास्ते गता: सह । धर्मव्यवस्थारक्षार्थ देवेन समुपेक्षिता: ।।) व्यासजी बोले--कुन्तीकुमार! वे समस्त यदुवंशी देवताओंके अंश थे। वे देवाधिदेव श्रीकृष्णके साथ ही यहाँ आये थे और साथ ही चले गये। उनके रहनेसे धर्मकी मर्यादाके भंग होनेका डर था; अतः भगवान्‌ श्रीकृष्णने धर्म-व्यवस्थाकी रक्षाके लिये उन मरते हुए यादवोंकी उपेक्षा कर दी ।। ब्रह्मशापविनिर्दग्धा वृष्ण्यन्धकमहारथा:,कुरुश्रेष्ठ! वृष्णि और अन्धकवंशके महारथी ब्राह्मणोंके शापसे दग्ध होकर नष्ट हुए हैं; अतः तुम उनके लिये शोक न करो। उन महामनस्वी वीरोंकी भवितव्यता ही ऐसी थी। उनका प्रारब्ध ही वैसा बन गया था

व्यासजी बोले—कुन्तीकुमार! वे समस्त यादव देवताओं के अंश थे। देवाधिदेव श्रीकृष्ण की सम्मति से वे उनके साथ ही यहाँ आए थे और उनके साथ ही चले गए। उनके बने रहने से धर्म-सीमा के भंग होने का भय था; इसलिए धर्म-व्यवस्था की रक्षा हेतु भगवान् श्रीकृष्ण ने उनके विनाश के समय जान-बूझकर उपेक्षा की।

Verse 26

विनष्टा: कुरुशार्टूल न तान्‌ शोचितुम्हसि । भवितव्यं तथा तच्च दिष्टमेतन्महात्मनाम्‌,कुरुश्रेष्ठ! वृष्णि और अन्धकवंशके महारथी ब्राह्मणोंके शापसे दग्ध होकर नष्ट हुए हैं; अतः तुम उनके लिये शोक न करो। उन महामनस्वी वीरोंकी भवितव्यता ही ऐसी थी। उनका प्रारब्ध ही वैसा बन गया था

व्यासजी बोले—कुरुशार्दूल! वे नष्ट हो चुके हैं; तुम्हें उनके लिए शोक नहीं करना चाहिए। जो हुआ, वही होने योग्य था; उन महात्मा वीरों का भाग्य ही ऐसा ठहरा था। वृष्णि और अन्धकवंश के महारथी ब्राह्मणों के शाप से दग्ध होकर नष्ट हुए हैं; इसलिए उनके लिए विषाद में मत डूबो।

Verse 27

उपेक्षितं च कृष्णेन शक्तेनापि व्यपोहितुम्‌ । त्रैलोक्यमपि गोविन्द: कृत्स्नं स्थावरजड्रमम्‌

व्यासजी बोले—जिसे टालने की शक्ति होते हुए भी श्रीकृष्ण ने उसे उपेक्षित ही रहने दिया। गोविन्द तो समस्त त्रैलोक्य—चराचर सहित—को भी हटा-फेर सकते थे; फिर भी उन्होंने हस्तक्षेप नहीं किया।

Verse 28

प्रसहेदन्‍्यथाकर्तु कुत: शापं महात्मनाम्‌ । यद्यपि भगवान्‌ श्रीकृष्ण उनके संकटको टाल सकते थे तथापि उन्होंने इसकी उपेक्षा कर दी। श्रीकृष्ण तो सम्पूर्ण चराचर प्राणियोंसहित तीनों लोकोंकी गतिको पलट सकते हैं, फिर उन महामनस्वी वीरोंको प्राप्त हुए शापको पलट देना उनके लिये कौन बड़ी बात थी।। (स्त्रियश्व॒ ता: पुरा शप्ता: प्रहासकुपितेन वै । अष्टावक्रेण मुनिना तदर्थ त्वदूबलक्षय: ।।) (तुम्हारे देखते-देखते स्त्रियोंका जो अपहरण हुआ है, उसमें भी देवताओंका एक रहस्य है।) वे स्त्रियाँ पूर्वजन्ममें अप्सराएँ थीं। उन्होंने अष्टावक्र मुनिके रूपका उपहास किया था। मुनिने शाप दिया था (कि “तुमलोग मानवी हो जाओ और दस्युओंके हाथमें पड़नेपर तुम्हारा इस शापसे उद्धार होगा।”) इसीलिये तुम्हारे बलका क्षय हुआ (जिससे वे डाकुओंके हाथमें पड़कर उस शापसे छुटकारा पा जायँ), (अब वे अपना पूर्वरूप और स्थान पा चुकी हैं, अत: उनके लिये भी शोक करनेकी आवश्यकता नहीं है) ।। रथस्य पुरतो याति य: स चक्रगदाधर:

व्यासजी बोले—महात्मा ऋषियों के शाप को भला कौन उलट सकता है? यद्यपि भगवान् श्रीकृष्ण उनके संकट को टालने में समर्थ थे, तथापि उन्होंने उसे उपेक्षित ही रहने दिया। श्रीकृष्ण तो चराचर सहित तीनों लोकों की गति पलट सकते हैं; फिर उन वीरों पर पड़े शाप को पलट देना उनके लिए कौन-सी बड़ी बात थी? और वे स्त्रियाँ भी पूर्वकाल में अष्टावक्र मुनि के उपहास से कुपित होकर दिए गए शाप से बँधी थीं; उसी हेतु तुम्हारा बल क्षीण हुआ, ताकि वे दस्युओं के हाथ पड़कर शाप से मुक्त हों। अब वे अपना पूर्वरूप और स्थान पा चुकी हैं; इसलिए उनके लिए भी शोक आवश्यक नहीं।

Verse 29

कृत्वा भारावतरणं पृथिव्या: पृुथुलोचन:

पृथ्वी का भार उतारकर, वह विशाल-नेत्र प्रभु (अपना प्रयोजन सिद्ध कर) आगे की कथा में निवृत्ति और उपसंहार की ओर प्रवृत्त होते हैं।

Verse 30

त्वयापीह महत्‌ कर्म देवानां पुरुषर्षभ

व्यास बोले—“पुरुषश्रेष्ठ! तुमने भी यहाँ देवताओं से सम्बन्ध रखने वाला एक महान कर्म सिद्ध किया है।”

Verse 31

कृतकृत्यांश्व वो मन्ये संसिद्धान्‌ कुरुपुड्रव

व्यास बोले—“कुरुश्रेष्ठ! मैं तुम्हें कृतकृत्य और पूर्ण सिद्धि को प्राप्त मानता हूँ।”

Verse 32

गमन॑ प्राप्तकालं व इदं श्रेयस्करं विभो । कुरुश्रेष्ठ! मैं समझता हूँ कि अब तुमलोगोंने अपना कर्तव्य पूर्ण कर लिया है। तुम्हें सब प्रकारसे सफलता प्राप्त हो चुकी है। प्रभो! अब तुम्हारे परलोक-गमनका समय आया है और यही तुमलोगोंके लिये श्रेयस्कर है ।। ३१ $ ।। एवं बुद्धिश्व तेजश्न प्रतिपत्तिश्न भारत

व्यास बोले—“विभो, कुरुश्रेष्ठ! अब तुम्हारे प्रस्थान का उचित समय आ पहुँचा है और यही तुम्हारे लिए परम कल्याणकारी है। मैं समझता हूँ कि तुमने अपना कर्तव्य पूर्ण कर लिया है; तुम सब प्रकार से सिद्धि को प्राप्त हो चुके हो। प्रभो! अब परलोक-गमन का समय है, और वही तुम्हारे लिए श्रेयस्कर है।”

Verse 33

कालमूलमिदं सर्व जगद्वीजं धनंजय

व्यास बोले—“धनंजय! यह समस्त जगत् काल को ही मूल मानता है; काल ही इसका बीज है।”

Verse 34

स एव बलवान भूत्वा पुनर्भवति दुर्बल:

वही पुरुष बलवान होकर भी फिर दुर्बल हो जाता है—इससे लोक की शक्ति और पराक्रम की चंचलता तथा उलट-फेर का बोध होता है।

Verse 35

कृतकृत्यानि चास्त्राणि गतान्यद्य यथागतम्‌

और अस्त्र—अपना कार्य सिद्ध कर—आज वैसे ही चले गए जैसे आए थे।

Verse 36

पुनरेष्यन्ति ते हस्ते यदा कालो भविष्यति । तुम्हारे अस्त्र-शस्त्रोंका प्रयोजन भी पूरा हो गया है; इसलिये वे जैसे मिले थे वैसे ही चले गये। जब उपयुक्त समय होगा तब वे फिर तुम्हारे हाथमें आयेंगे ।। कालो गन्तुं गतिं मुख्यां भवतामपि भारत

वे तुम्हारे हाथ में फिर आएँगे, जब काल उपस्थित होगा। तुम्हारे अस्त्र-शस्त्रों का प्रयोजन भी पूर्ण हो गया है; इसलिए वे जैसे मिले थे वैसे ही चले गए। जब उपयुक्त समय होगा तब वे फिर तुम्हारे अधिकार में आ जाएँगे। क्योंकि, हे भारत, काल तो तुम जैसे पुरुषों के लिए भी अपनी परम गति से आगे बढ़ता रहता है।

Verse 37

वैशम्पायन उवाच एतद्‌ वचनमाज्ञाय व्यासस्यामिततेजस:

वैशम्पायन बोले: व्यास के—अमित तेजस्वी—इस वचन का अभिप्राय समझकर (उन्होंने वैसा ही किया)।

Verse 38

प्रविश्य च पुरी वीर: समासाद्य युधिष्ठटिरम्‌ । आचरष्ट तद्‌ यथावृत्तं वृष्ण्यन्धककुलं प्रति,नगरमें प्रवेश करके वीर अर्जुन युधिष्ठिससे मिले और वृष्णि तथा अन्धकवंशका यथावत्‌ समाचार उन्होंने कह सुनाया

नगर में प्रवेश करके वीर अर्जुन युधिष्ठिर के पास पहुँचे और वृष्णि तथा अन्धक कुल के विषय में जो जैसा घटित हुआ था, वह सब क्रम से कह सुनाया।

Verse 73

स कृष्ण: सह रामेण त्यक्त्वा देहं दिवं गत: । अर्जुनने कहा--भगवन्‌! जिनका सुन्दर विग्रह मेघके समान श्याम था और जिनके नेत्र विशाल कमलदलके समान शोभा पाते थे वे श्रीमान्‌ भगवान्‌ कृष्ण बलरामजीके साथ देहत्याग करके अपने परम धामको पधार गये

अर्जुन ने कहा—वे भगवान् श्रीकृष्ण बलरामजी के साथ देह त्यागकर दिव्य लोक को, अपने परम धाम को पधार गए।

Verse 96

भोजवृष्ण्यन्धका ब्रद्दान्नन्योन्यं तैर्हतं युधि । ब्रह्मन! भोज, वृष्णि और अन्धकवंशके ये महा-मनस्वी शूरवीर सिंहके समान दर्पशाली और महान्‌ बलवान थे; परन्तु वे गृहयुद्धमें एक-दूसरेके द्वारा मार डाले गये

अर्जुन ने कहा—हे ब्रह्मन्! भोज, वृष्णि और अन्धक—वे सिंहों के समान गर्वीले और बलवान शूरवीर—गृहयुद्ध में एक-दूसरे के हाथों रणभूमि में मारे गए; अपने ही हाथों नष्ट हो गए।

Verse 106

त एरकाभिननिहता: पश्य कालस्य पर्ययम्‌ | जो गदा, परिघ और शक्तियोंकी मार सह सकते थे वे परिघके समान सुदृढ़ बाहोंवाले यदुवंशी एरका नामक तृणविशेषके द्वारा मारे गये--यह समयका उलट-फेर तो देखिये

अर्जुन ने कहा—वे एरका नामक तृण से मारे गए; काल का यह उलट-फेर देखिए। जो गदा, परिघ और शक्तियों के प्रहार सह सकते थे, वे तिनके-से घास से ढेर कर दिए गए।

Verse 116

निधन समनुप्राप्तं समासाद्येतरेतरम्‌ । अपने बाहुबलसे शोभा पानेवाले पाँच लाख वीर आपसमें ही लड़-भिड़कर मर मिटे

अर्जुन ने कहा—वे अपने निश्चित निधन को प्राप्त होकर परस्पर भिड़ गए। अपने बाहुबल की शोभा से प्रसिद्ध पाँच लाख वीर आपस में लड़कर अंततः सब के सब मारे गए।

Verse 163

आभीरैरनुसृत्याजी हृता: पञ्चनदालयै: । जब मैं उस घटनाका चिन्तन करता हूँ तब बारंबार मेरा हृदय विदीर्ण होने लगता है। ब्रह्म! पंजाबके अहीरोंने मुझसे युद्ध ठानकर मेरे देखते-देखते वृष्णिवंशकी हजारों स्त्रियोंका अपहरण कर लिया

अर्जुन ने कहा—हे ब्रह्मन्! पंचनद-प्रदेश में रहने वाले आभीर मेरा पीछा करते हुए, युद्ध का निश्चय करके, मेरे देखते-देखते वृष्णिवंश की हजारों स्त्रियों का अपहरण कर ले गए। उस विपत्ति का स्मरण करते ही मेरा हृदय बार-बार विदीर्ण हो उठता है।

Verse 173

यथा पुरा च मे वीर्य भुजयोर्न तथाभवत्‌ । मैंने धनुष लेकर उनका सामना करना चाहा परंतु मैं उसे चढ़ा न सका। मेरी भुजाओंमें पहले-जैसा बल था वैसा अब नहीं रहा

अर्जुन बोले—जैसा पहले मेरी भुजाओं में बल था, वैसा अब नहीं रहा। मैंने धनुष उठाकर उनका सामना करना चाहा, पर उसे चढ़ा भी न सका। जो शक्ति पहले मेरे पराक्रम को संभालती थी, वह अब मुझसे दूर हो गई है।

Verse 243

उपदेष्ठूं मम श्रेयो भवानहति सत्तम । सर्वव्यापी भगवान्‌ श्रीकृष्ण अन्तर्धान हो गये, यह बात सुनते ही मुझे सम्पूर्ण दिशाओंका ज्ञान भूल जाता है। मेरे भी जाति-भाइयोंका नाश तो पहले ही हो गया था, अब मेरा पराक्रम भी नष्ट हो गया; अतः शून्यहृदय होकर इधर-उधर दौड़ लगा रहा हूँ। संतोंमें श्रेष्ठ महर्ष] आप कृपा करके मुझे यह उपदेश दें कि मेरा कल्याण कैसे होगा?

अर्जुन बोले—हे सत्तम! मेरे कल्याण का उपदेश देने के योग्य आप ही हैं। सर्वव्यापी भगवान् श्रीकृष्ण के अन्तर्धान होने की बात सुनते ही मुझे मानो सभी दिशाओं का ज्ञान भूल जाता है। मेरे जाति-भाइयों का नाश तो पहले ही हो चुका था, अब मेरा पराक्रम भी क्षीण हो गया है। शून्य-हृदय होकर मैं इधर-उधर भटकता दौड़ रहा हूँ। हे महर्षि, संतों में श्रेष्ठ! कृपा करके बताइए—मेरा कल्याण कैसे होगा?

Verse 286

तव स्नेहात्‌ पुराणर्षिवासुदेवश्वतुर्भुज: । जो स्नेहवश तुम्हारे रथके आगे चलते थे (सारथिका काम करते थे), वे वासुदेव कोई साधारण पुरुष नहीं, साक्षात्‌ चक्र-गदाधारी पुरातन ऋषि चतुर्भुज नारायण थे

व्यास बोले—तुम्हारे प्रति स्नेह के कारण पुरातन ऋषि, चतुर्भुज वासुदेव, तुम्हारे रथ के आगे-आगे चलते हुए सारथी का कार्य करते थे। जानो, वह वासुदेव कोई साधारण पुरुष नहीं था; वह साक्षात् चक्र-गदाधारी, पुरातन ऋषि, चतुर्भुज नारायण ही थे।

Verse 293

मोक्षयित्वा तनु प्राप्त: कृष्ण: स्वस्थानमुत्तमम्‌ । वे विशाल नेत्रोंवाले श्रीकृष्ण इस पृथ्वीका भार उतारकर शरीर त्याग अपने उत्तम परम धामको जा पहुँचे हैं

व्यास बोले—विशाल नेत्रोंवाले श्रीकृष्ण ने पृथ्वी का भार उतारकर, अपना कार्य पूर्ण करके, शरीर का त्याग किया और अपने उत्तम परम धाम को प्राप्त हो गए।

Verse 306

कृतं भीमसहायेन यमाभ्यां च महाभुज । पुरुषप्रवर! महाबाहों! तुमने भी भीमसेन और नकुल-सहदेवकी सहायतासे देवताओंका महान्‌ कार्य सिद्ध किया है

व्यास बोले—हे महाभुज! भीम की सहायता से और यम के दोनों पुत्रों के साथ महान् कार्य सिद्ध हुआ। हे पुरुषप्रवर, महाबाहो! तुमने भी भीमसेन तथा नकुल-सहदेव की सहायता से देवताओं का महान् कार्य पूर्ण किया है।

Verse 326

भवन्ति भवकालेषु विपद्यन्ते विपर्यये । भरतनन्दन! जब उद्धवका समय आता है तब इसी प्रकार मनुष्यकी बुद्धि, तेज और ज्ञानका विकास होता है और जब विपरीत समय उपस्थित होता है तब इन सबका नाश हो जाता है

भरतनन्दन! जब शुभ समय आता है—जैसे उद्धव का नियत समय—तब मनुष्य की बुद्धि, तेज और ज्ञान स्वभावतः बढ़ते हैं; और जब विपरीत समय उपस्थित होता है, तब इन्हीं का क्षय और नाश हो जाता है।

Verse 336

काल एव समादत्ते पुनरेव यदृच्छया । धनंजय! काल ही इन सबकी जड़ है। संसारकी उत्पत्तिका बीज भी काल ही है और काल ही फिर अकस्मात्‌ सबका संहार कर देता है

धनंजय! काल ही मानो यदृच्छा से सबको फिर समेट लेता है। काल ही इन सबका मूल है; संसार की उत्पत्ति का बीज भी काल है और काल ही अकस्मात् सबका संहार कर देता है।

Verse 343

स एवेशश्व भूत्वेह परैराज्ञाप्यते पुन: । वही बलवान्‌ होकर फिर दुर्बल हो जाता है और वही एक समय दूसरोंका शासक होकर कालान्तरमें स्वयं दूसरोंका आज्ञापालक हो जाता है

इसी संसार में वही मनुष्य बलवान होकर फिर दुर्बल हो जाता है; वही एक समय दूसरों का शासक होकर कालान्तर में स्वयं दूसरों की आज्ञा मानने वाला बन जाता है।

Verse 363

एतत्‌ श्रेयो हि वो मन्ये परमं भरतर्षभ । भारत! अब तुमलोगोंके उत्तम गति प्राप्त करनेका समय उपस्थित है। भरतश्रेष्ठ! मुझे इसीमें तुमलोगोंका परम कल्याण जान पड़ता है

भरतर्षभ! मैं इसे ही तुम लोगों का परम श्रेय मानता हूँ। भारत! अब तुम सबके उत्तम गति प्राप्त करने का समय उपस्थित है; इसी में मुझे तुम्हारा परम कल्याण दिखाई देता है।

Verse 3736

अनुज्ञातो ययौ पार्थो नगरं नागसाह्दयम्‌ । वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! अमिततेजस्वी व्यासजीके इस वचनका तत्त्व समझकर अर्जुन उनकी आज्ञा ले हस्तिनापुरको चले गये

वैशम्पायन बोले—जनमेजय! अमिततेजस्वी व्यासजी के वचन का तत्त्व समझकर पार्थ अर्जुन उनकी आज्ञा लेकर नागसाह्वय नगर—हस्तिनापुर—को चले गए।

Frequently Asked Questions

Arjuna confronts the conflict between duty to protect vulnerable survivors and the recognition that his former means of protection (divine weapons and assured victory) no longer operate reliably, forcing a shift from heroic certainty to managerial responsibility under constraint.

The chapter teaches that political power and personal prowess are contingent; dharma is sustained through right action—evacuation planning, succession, and rites—even when outcomes are partially governed by kāla and prior causality.

No explicit phalaśruti is stated here; the meta-commentary is implicit in the narrative design, using Arjuna’s diminished efficacy and Dvārakā’s submergence to underscore impermanence and the epic’s transition toward renunciation and final closure.