मौसलपर्व — अध्याय ८
Arjuna’s evacuation of Dvārakā, Vasudeva’s rites, and the caravan’s crisis
'पार्थ! क्या तुमने नख, बाल अथवा अधोवस्त्र (धोती)-की कोर पड़ जानेसे अशुद्ध हुए घड़ेके जलसे स्नान कर लिया है? अथवा तुमने रजस्वला स्त्रीसे समागम या किसी ब्राह्मणका वध तो नहीं किया है? ।। युद्धे पराजितो वासि गतश्रीरिव लक्ष्यसे । नत्वां प्रभिन्न जानामि किमिदं भरतर्षभ
Pārtha! kiṁ tvayā nakha-bāla athavā adhovastra-dhotī-kora-patana-hetunā aśuddhī-bhūta-ghaṭa-jalena snānaṁ kṛtam? athavā tvayā rajasvalā-striyā saha samāgamaḥ kṛto vā, kiṁcid brāhmaṇa-vadhaṁ vā kṛtam? yuddhe parājito vāsi gataśrīr iva lakṣyase; na tvāṁ prabhinnam jānāmi—kim idaṁ, bharatarṣabha?
“हे पार्थ! क्या तुमने नख, बाल अथवा अधोवस्त्र की कोर गिर जाने से अशुद्ध हुए घड़े के जल से स्नान किया है? अथवा तुमने रजस्वला स्त्री से समागम किया है, या किसी ब्राह्मण का वध कर दिया है? तुम युद्ध में पराजित-से, और श्रीहीन-से प्रतीत होते हो। हे भरतश्रेष्ठ! मैं तुम्हें इस बदली हुई दशा में पहचान नहीं पा रहा—यह क्या है?”
वैशम्पायन उवाच