Adhyaya 89
Ashvamedhika ParvaAdhyaya 8962 Verses

Adhyaya 89

अर्जुनदुःखहेतुप्रश्नः — Inquiry into the cause of Arjuna’s recurring hardship (Book 14, Chapter 89)

Upa-parva: Āśvamedha-anuyātra (Episode: Inquiry into Arjuna’s persistent hardship and his return to the yajña-camp)

Yudhiṣṭhira addresses Kṛṣṇa with appreciative acknowledgement of prior speech and raises a focused concern: he has heard of Arjuna’s repeated engagements and perceives that, despite Arjuna’s intelligence and excellence, he remains persistently deprived of ease. Yudhiṣṭhira privately reflects on Arjuna’s body as bearing auspicious marks, asking whether any inauspicious sign could explain repeated hardship. Kṛṣṇa pauses in contemplation and replies clinically that he perceives no inauspicious feature except an overgrowth/thickness at Arjuna’s calves (piṇḍikā), by which Arjuna is continually burdened in long journeys; he finds no other cause. Yudhiṣṭhira accepts the assessment. Draupadī reacts with a sideways, mildly jealous glance toward Kṛṣṇa, who receives her affection, emphasizing his intimate friendship with Arjuna. The assembly—Pāṇḍavas, Kurus, and Yādavas—rejoices in hearing varied accounts of Arjuna. A messenger announces Arjuna’s arrival; Yudhiṣṭhira, moved to tears of joy, rewards the bearer of good news. Public acclamation rises, praising Arjuna’s achievement in conducting the sacrificial horse across the earth and returning safely, portraying the feat as rare even among earlier kings. Arjuna enters the sacrificial enclosure, and the elders and leaders go out to receive him; he pays respects, embraces Kṛṣṇa, and rests. The chapter closes by introducing Babhruvāhana arriving with his mothers to the Kurus and entering Kuntī’s residence.

Chapter Arc: वैशम्पायन यज्ञ-भूमि का द्वार खोलते हैं—अश्वमेध का विधिवत् अनुष्ठान आरम्भ हो चुका है; युधिष्ठिर के सामने अब विजय का नहीं, ‘यज्ञ-पूर्णता’ और ‘दान-पूर्णता’ का कठिन धर्म खड़ा है। → याजक अश्व का संस्कार करते हैं, वपा-उद्धरण आदि शास्त्रोक्त क्रियाएँ होती हैं; राजाओं का सत्कार, विदाई और दक्षिणा-वितरण का विराट आयोजन फैलता जाता है। दान की मात्रा ‘पृथ्वी-मूल्य’ सुवर्ण तक पहुँचती है—इतना कि व्यवस्था, न्याय और संतोष बनाए रखना स्वयं एक परीक्षा बन जाता है। → द्वैपायन व्यास ब्राह्मणों के मध्य युधिष्ठिर की प्रशंसा करते हुए उसके यज्ञ, दान और धर्म-स्थैर्य को प्रतिष्ठित करते हैं; उसी क्षण दान का चरम दृश्य उभरता है—अनन्त-सा सुवर्णराशि ऋत्विजों द्वारा ब्राह्मणों में बाँटी जाती है और यज्ञ की कीर्ति दिशाओं में फैलती है। → युधिष्ठिर भाइयों सहित ‘धूतपाप’ और ‘जितस्वर्ग’ भाव से प्रसन्न होता है; बभ्रुवाहन जैसे अतिथिराज को बुलाकर विपुल धन देकर सम्मानपूर्वक विदा किया जाता है; श्रीकृष्ण, बलदेव, प्रद्युम्न आदि का यथाविधि पूजन कर उन्हें भी प्रस्थान कराया जाता है। → घोषणा दिन-रात गूँजती रहती है—‘जिसकी जैसी इच्छा हो, वही वस्तु दी जाए’—और यह संकेत छोड़ती है कि यज्ञ-समृद्धि के बाद भी लोक-आकांक्षाओं का प्रवाह थमता नहीं, आगे नई कथाएँ और नई कसौटियाँ प्रतीक्षा में हैं।

Shlokas

Verse 1

पम्प छा अर: एकोननवतितमो< ध्याय: युधिष्ठिरका ब्राह्मणोंको दक्षिणा देना और राजाओंको भेंट देकर विदा करना वैशम्पायन उवाच श्रपयित्वा पशूनन्यान्‌ विधिवद्‌ द्विजसत्तमा: । त॑ तुरडूं यथाशास्त्रमालभन्त द्विजातय:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंने अन्यान्य पशुओंका विधिपूर्वक श्रपण करके उस अश्वका भी शास्त्रीय विधिके अनुसार आलभन किया

वैशम्पायन बोले— जनमेजय! उन श्रेष्ठ ब्राह्मणों ने शास्त्र-विधि के अनुसार अन्य पशुओं का विधिपूर्वक संस्कार करके, फिर उसी अश्व का भी शास्त्रानुसार आलम्भन किया।

Verse 2

ततः संश्रप्य तुरगं विधिवद्‌ याजकास्तदा । उपसंवेशयन्‌ राजंस्ततस्तां द्रुपदात्मजाम्‌

तत्पश्चात् याजकों ने उस अश्व का विधिपूर्वक संस्कार करके, उस समय राजा को नियत आसन पर बैठाया; फिर द्रुपद की पुत्री द्रौपदी को उसके समीप बैठाया।

Verse 3

उद्धृत्य तु वपां तस्य यथाशास्त्र द्विजातय:

फिर द्विजातियों ने शास्त्र-विधान के अनुसार उसका वपा (चर्बी/ओमेंटम) निकालकर, उस यज्ञ में क्रमशः यथाविधि कर्म आरम्भ किया।

Verse 4

त॑ वपाधूमगन्ध॑ तु धर्मराज: सहानुजै:

तब धर्मराज युधिष्ठिर ने अपने अनुजों सहित, वपा के धुएँ की वह गन्ध अनुभव की, जब द्विज विधिपूर्वक कर्म में प्रवृत्त थे।

Verse 5

शिष्टान्यड्रानि यान्यासंस्तस्याश्चस्य नराधिप

वैशम्पायन बोले— हे नराधिप! जो प्रतिष्ठित पर्वत उसके थे, और जो इसके भी थे…

Verse 6

संस्थाप्यैवं तस्य राज्ञस्तं यज्ञ शक्रतेजस:

वैशम्पायन बोले—इस प्रकार इन्द्र-तेज से दीप्त उस राजा के यज्ञ को विधिपूर्वक स्थापित और सुव्यवस्थित करके, राजधर्म और शास्त्र-विधान के अनुरूप समस्त कार्य-क्रम यथायोग्य क्रम में प्रवृत्त हुआ।

Verse 7

ततो युधिष्छिर: प्रादाद्‌ ब्राह्मणेभ्ये यथाविधि

तब युधिष्ठिर ने विधि के अनुसार ब्राह्मणों को यथोचित दान दिए—धर्म और स्थापित कर्मकाण्ड-क्रम का पालन करते हुए।

Verse 8

प्रतिगृह्म धरां राजन्‌ व्यास: सत्यवतीसुत:

वैशम्पायन बोले—हे राजन्, भूमि का दान स्वीकार करके सत्यवती-पुत्र व्यास ने यथोचित आचरण किया।

Verse 9

वसुधा भवतत्त्वेषा संन्यस्ता राजसत्तम

वैशम्पायन बोले—हे राजश्रेष्ठ, यह वसुधा अपने स्वभाव के अनुरूप तुम्हारे अधीन (तुम्हारे संरक्षण में) सौंपी गई है।

Verse 10

युधिष्ठिरस्तु तान्‌ विप्रान्‌ प्रत्युवाच महामना:

वैशम्पायन बोले—तब महामना युधिष्ठिर ने उन विप्र-ऋषियों को उत्तर दिया—राजधर्म की गरिमा और नैतिक उत्तरदायित्व के अनुरूप संयत वाणी में।

Verse 11

भ्रातृभि: सहितो धीमान्‌ मध्ये राज्ञां महात्मनाम्‌ तब महामनस्वी नरेशोंके बीचमें भाइयोंसहित बुद्धिमान्‌ महामना युधिष्ठिरने उन ब्राह्मणोंसे कहा-- ।। १० ह || अश्वमेधे महायज्ञे पृथिवी दक्षिणा स्मृता

वैशम्पायन बोले—तब महात्मा राजाओं के बीच, भाइयों सहित स्थित बुद्धिमान् महामना राजा युधिष्ठिर ने उन ब्राह्मणों से कहा—“अश्वमेध नामक महायज्ञ में पृथ्वी ही दक्षिणा मानी गई है।”

Verse 12

अर्जुनेन जिता चेयमृत्विग्भ्य: प्रापिता मया । बन॑ प्रवेक्ष्ये विप्राग्रया विभजध्व॑ महीमिमाम्‌

वैशम्पायन बोले—“यह भूमि अर्जुन ने जीती है और मैंने इसे ऋत्विजों को प्रदान कर दिया है। अब मैं वन में प्रवेश करूँगा; हे विप्रश्रेष्ठो, इस पृथ्वी को आपस में बाँट लो।”

Verse 13

चतुर्धा पृथिवीं कृत्वा चातुर्होत्रप्रमाणत: । नाहमादातुमिच्छामि ब्रह्म॒स्वं द्विजसत्तमा:

वैशम्पायन बोले—“चातुर्होत्र के प्रमाण के अनुसार पृथ्वी को चार भागों में बाँट भी दिया जाए, तो भी हे द्विजश्रेष्ठो, मैं ब्राह्मणों का धन (ब्रह्मस्व) लेना नहीं चाहता।”

Verse 14

इदं नित्यं मनो विप्रा भ्रातृणां चैव मे सदा । “विप्रवरो! अश्वमेध नामक महायज्ञमें पृथ्वीकी दक्षिणा देनेका विधान है; अतः अर्जुनके द्वारा जीती हुई यह सारी पृथ्वी मैंने ऋत्विजोंको दे दी है। अब मैं वनमें चला जाऊँगा। आपलोग चातुर्होत्र यज्ञके प्रमाणानुसार पृथ्वीके चार भाग करके इसे आपसमें बाँट लें। द्विजश्रेष्ठगण! मैं ब्राह्मणोंका धन लेना नहीं चाहता। ब्राह्मणो! मेरे भाइयोंका भी सदा ऐसा ही विचार रहता है” ॥| ११--१३ ह ।। इत्युक्तवति तस्मिंस्तु भ्रातरो द्रौपदी च सा

वैशम्पायन बोले—“हे ब्राह्मणो! यह निश्चय मेरे मन में सदा स्थिर है और मेरे भाइयों के मन में भी सदा यही रहता है—‘हे विप्रवर! अश्वमेध नामक महायज्ञ में पृथ्वी की दक्षिणा देने का विधान है; इसलिए अर्जुन द्वारा जीती हुई यह समस्त पृथ्वी मैंने ऋत्विजों को दे दी है। अब मैं वन में चला जाऊँगा। चातुर्होत्र यज्ञ के प्रमाणानुसार पृथ्वी के चार भाग करके इसे आपस में बाँट लो। हे द्विजश्रेष्ठो! मैं ब्राह्मणों का धन (ब्रह्मस्व) लेना नहीं चाहता; मेरे भाई भी सदा यही भाव रखते हैं।’ ऐसा कहने पर उसके भाई और वह द्रौपदी…

Verse 15

ततोअन्तरिक्षे वागासीत्‌ साधु साध्विति भारत

तब आकाश में से वाणी हुई—“साधु! साधु! हे भारत!”

Verse 16

द्वैपायनस्तथा कृष्ण: पुनरेव युधिछ्िरम्‌

वैशम्पायन बोले—तब द्वैपायन और श्रीकृष्ण फिर से युधिष्ठिर के पास आए, महान घटनाओं के पश्चात् धर्मयुक्त शासन और नैतिक धैर्य को पुनः दृढ़ करने हेतु उसे उपदेश देने के लिए।

Verse 17

दत्तैषा भवता महां तां ते प्रतिददाम्पहम्‌

वैशम्पायन बोले—यह महान दान आपने दिया है; मैं उसे फिर आपको ही लौटा देता हूँ।

Verse 18

ततोअब्रवीद्‌ वासुदेवो धर्मराजं युधिष्ठिरम्‌

तब वासुदेव ने धर्मराज युधिष्ठिर से कहा—धर्मयुक्त शासन और कर्तव्य की बातों को स्पष्ट करने हेतु उपदेश आरम्भ किया।

Verse 19

इत्युक्त: स कुरुश्रेष्ठ: प्रीतात्मा भ्रातृभि: सह

ऐसा कहे जाने पर वह कुरुश्रेष्ठ प्रसन्नचित्त होकर अपने भाइयों सहित रहा; उसने उन वचनों को संतोष और सौहार्द के साथ ग्रहण किया।

Verse 20

न करिष्यति तल्लोके ककश्षिदन्यो नराधिप:

वैशम्पायन बोले—इस लोक में वह कर्म कोई अन्य नरेश नहीं कर सकेगा।

Verse 21

प्रतिगृह तु तद्‌ रत्नं कृष्णद्वैपायनो मुनि:

वैशम्पायन बोले—“उस अमूल्य रत्न को मुनि कृष्णद्वैपायन (व्यास) स्वीकार करें।”

Verse 22

धरण्या निष्क्रयं दत्त्वा तद्धिरण्यं युधिछिर:

वैशम्पायन बोले—धरती का निष्क्रय (मूल्य) देकर युधिष्ठिर ने वही स्वर्ण दान कर दिया।

Verse 23

ऋच्विजस्तमपर्यन्तं सुवर्णनिचयं तथा,ब्राह्मणोंके लेनेके बाद जो धन वहाँ पड़ा रह गया, उसे क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र तथा म्लेच्छ जातिके लोग उठा ले गये

वैशम्पायन बोले—ऋत्विजों ने अपार सुवर्ण-राशि प्राप्त की। ब्राह्मणों ने अपना भाग ले लिया; उसके बाद जो धन वहाँ शेष रह गया, उसे क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र तथा म्लेच्छ जाति के लोग उठा ले गए।

Verse 24

यज्ञवाटे च यत्‌ किंचिद्‌ हिरण्यं सविभूषणम्‌,यज्ञशालामें भी जो कुछ सुवर्ण या सोनेके आभूषण, तोरण, यूप, घड़े, बर्तन और इंटें थीं, उन सबको भी युधिष्ठिरकी आज्ञा लेकर ब्राह्मणोंने आपसमें बाँट लिया

वैशम्पायन बोले—यज्ञवाट में जो कुछ स्वर्ण और स्वर्णाभूषण थे, वे सब युधिष्ठिर की आज्ञा से ब्राह्मणों ने आपस में बाँट लिए।

Verse 25

तोरणानि च यूपांश्व घटान्‌ पात्रीस्तथेष्टका: । युधिष्टिरा भ्यनुज्ञाता: सर्व तद्‌ व्यभजन्‌ द्विजा:,यज्ञशालामें भी जो कुछ सुवर्ण या सोनेके आभूषण, तोरण, यूप, घड़े, बर्तन और इंटें थीं, उन सबको भी युधिष्ठिरकी आज्ञा लेकर ब्राह्मणोंने आपसमें बाँट लिया

वैशम्पायन बोले—युधिष्ठिर की अनुमति पाकर द्विजों (ब्राह्मणों) ने तोरण, यूप, घड़े, पात्र और इंटें—यज्ञशाला में जो कुछ था—सब आपस में बाँट लिया।

Verse 26

कलाभिस्तिसूभी राजन्‌ यथाविधि मनस्विनीम्‌ । राजन! तत्पश्चात्‌ याजकोंने विधिपूर्वक अश्वका श्रपण करके उसके समीप मन्त्र, द्रव्य और श्रद्धा--इन तीन कलाओंसे युक्त मनस्विनी द्रौपदीको शास्त्रोक्त विधिके अनुसार बैठाया,अनन्तरं द्विजातिभ्य: क्षत्रिया जह्ििरे वसु । तथा विट्शूद्रसंघाश्व तथान्ये म्लेच्छजातय:

वैशम्पायन बोले—राजन्, विधि के अनुसार मन्त्र, द्रव्य और श्रद्धा—इन तीन कलाओं से युक्त मनस्विनी द्रौपदी को वहाँ बैठाया गया। फिर याजकों ने शास्त्रोक्त रीति से अश्व के हवि-भाग पकाकर और सब सामग्री उसके समीप विधिपूर्वक रखकर, उसी उच्च-मन वाली द्रौपदी को नियमानुसार आसन दिया। इसके बाद धन का वितरण हुआ—पहले द्विजों को, फिर क्षत्रियों ने धन ग्रहण किया; और वैसे ही वैश्य-शूद्रों के समूह तथा अन्य म्लेच्छ-जातियाँ भी।

Verse 27

ततस्ते ब्राह्मणा: सर्वे मुदिता जग्मुरालयान्‌ । तर्पिता वसुना तेन धर्मराजेन धीमता,तदनन्तर सब ब्राह्मण प्रसन्नतापूर्वक अपने घरोंको गये। बुद्धिमान्‌ धर्मराज युधिष्ठिरने उन सबको उस धनके द्वारा पूर्णतः तृप्त कर दिया था

तदनन्तर वे सब ब्राह्मण हर्षित-चित्त होकर अपने-अपने घरों को चले गये। बुद्धिमान धर्मराज युधिष्ठिर ने उस धन के द्वारा उन्हें पूर्णतः तृप्त और संतुष्ट कर दिया था।

Verse 28

स्वमंशं भगवान्‌ व्यास: कुन्त्यै साक्षाद्धि मानत: । प्रददौ तस्य महतो हिरण्यस्य महाद्युति:,उस महान सुवर्णराशिमेंसे महातेजस्वी भगवान्‌ व्यासने जो अपना भाग प्राप्त किया था, उसे उन्होंने बड़े आदरके साथ कुन्तीको भेंट कर दिया

वैशम्पायन बोले—महातेजस्वी भगवान व्यास ने उस महान सुवर्ण-राशि में से अपना जो भाग पाया था, उसे उन्होंने स्वयं आदरपूर्वक कुन्ती को प्रदान कर दिया।

Verse 29

श्वशुरात्‌ प्रीतिदायं त॑ं प्राप्प सा प्रीतमानसा । चकार पुण्यकं तेन सुमहत्‌ संघश: पृथा,श्वशुरकी ओरसे प्रेमपूर्वक मिले हुए उस धनको पाकर कुन्तीदेवी मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुई और उसके द्वारा उन्होंने बड़े-बड़े सामूहिक पुण्य-कार्य किये

श्वशुर की ओर से प्रेमपूर्वक मिले हुए उस धन को पाकर कुन्ती (पृथा) मन-ही-मन अत्यन्त प्रसन्न हुई। उसी धन से उन्होंने बड़े-बड़े सामूहिक पुण्य-कार्य सम्पन्न किये।

Verse 30

गत्वा त्ववभृथं राजा विपाप्मा भ्रातृभि: सह । सभाज्यमान: शुशुभे महेन्द्रस्त्रिदशैरिव,यज्ञके अन्तमें अवभूथस्नान करके पापरहित हुए राजा युधिष्ठिर अपने भाइयोंसे सम्मानित हो इस प्रकार शोभा पाने लगे, जैसे देवताओंसे पूजित देवराज इन्द्र सुशोभित होते हैं

यज्ञ के अन्त में अवभृथ-स्नान करके पापरहित हुए राजा युधिष्ठिर, अपने भाइयों से सम्मानित होकर, वैसे ही शोभित होने लगे जैसे देवताओं से पूजित देवराज इन्द्र शोभित होते हैं।

Verse 31

महाराज! वहाँ आये हुए समस्त भूपालोंसे घिरे हुए पाण्डवलोग ऐसी शोभा पा रहे थे, मानो तारोंसे घिरे हुए ग्रह सुशोभित हों

वैशम्पायन बोले—महाराज! वहाँ एकत्र हुए समस्त भूपालों से घिरे हुए पाण्डव ऐसे विशेष तेज से शोभित हो रहे थे, मानो तारागणों से घिरे हुए ग्रह सुशोभित हों।

Verse 32

राजभ्योडपि ततः प्रादाद्‌ रत्नानि विविधानि च । गजानश्चानलंकारान्‌ स्त्रियो वासांसि काउ्चनम्‌,तदनन्तर पाण्डवोंने यज्ञमें आये हुए राजाओंको भी तरह-तरहके रत्न, हाथी, घोड़े, आभूषण, स्त्रियाँ, वस्त्र और सुवर्ण भेंट किये

वैशम्पायन बोले—तदनन्तर उसने यज्ञ में आये हुए राजाओं को भी तरह-तरह के रत्न, हाथी, घोड़े, आभूषण, स्त्रियाँ, वस्त्र और सुवर्ण भेंट किये।

Verse 33

पाण्डवाश्व महीपालै: समेतैरभिसंवृता: । अशोभनत महाराज ग्रहास्तारागणैरिव,तद्‌ धनौघमपर्यन्तं पार्थ: पार्थिवमण्डले । विसृजन्‌ शुशुभे राजन्‌ यथा वैश्रवणस्तथा राजन! उस अनन्त धनराशिको भूपालमण्डलमें बाँटते हुए कुन्तीकुमार युधिष्छिर कुबेरके समान शोभा पाते थे

महाराज! समागत भूपालों से घिरे पाण्डव तारागणों से घिरे ग्रहों की भाँति शोभा पा रहे थे। और राजन्! उस अनन्त धनराशि को भूपाल-मण्डल में बाँटते हुए कुन्तीकुमार युधिष्ठिर वैश्रवण (कुबेर) के समान शोभित होते थे।

Verse 34

आनीय च तथा वीरं राजानं बभ्रुवाहनम्‌ । प्रदाय विपुलं वित्त गृहान्‌ प्रास्थापयत्‌ तदा,तत्पश्चात्‌ वीर राजा बभ्रुवाहनको अपने पास बुलाकर राजाने उसे बहुत-सा धन देकर विदा किया

वैशम्पायन बोले—तत्पश्चात् वीर राजा बभ्रुवाहन को बुलाकर राजाने उसे बहुत-सा धन देकर उसी समय उसके घर के लिये विदा किया।

Verse 35

दुःशलायाश्च त॑ पौत्रं बालकं॑ भरतर्षभ । स्वराज्ये5थ पितुर्धीमान्‌ स्वसु: प्रीत्या न्‍न्यवेशयत्‌,भरतश्रेष्ठ] अपनी बहिन दुःशलाकी प्रसन्नताके लिये बुद्धिमान्‌ युधिष्ठिरने उसके बालक पौत्रको पिताके राज्यपर अभिषिक्त कर दिया

वैशम्पायन बोले—भरतश्रेष्ठ! अपनी बहिन दुःशलाकी प्रसन्नता के लिये बुद्धिमान् युधिष्ठिर ने उसके बालक पौत्र को उसके पिता के राज्य पर अभिषिक्त कर दिया।

Verse 36

श्रपयामासुरव्यग्रा विधिवद्‌ भरतर्षभ । भरतश्रेष्ठ! इसके बाद ब्राह्मणोंने शान्तचित्त होकर उस अश्वकी चर्बी निकाली और उसका विधिपूर्वक श्रपण करना आरम्भ किया,नृपतींश्वैव तान्‌ सर्वान्‌ सुविभक्तान्‌ सुपूजितान्‌ | प्रस्थापयामास वशी कुरुराजो युधिष्ठिर: जितेन्द्रिय कुरुराज युधिष्ठिरने सब राजाओंको अच्छी तरह धन दिया और उनका विशेष सत्कार करके उन्हें विदा कर दिया

वैशम्पायन बोले—भरतश्रेष्ठ! तब शान्तचित्त ब्राह्मणों ने विधिपूर्वक अश्व की चर्बी निकालकर उसका श्रपण आरम्भ किया। इसके बाद जितेन्द्रिय कुरुराज युधिष्ठिर ने सब राजाओं को यथोचित दान देकर, उनका विशेष सत्कार कर, विधिवत् विदा किया।

Verse 37

गोविन्द च महात्मानं बलदेवं महाबलम्‌ । तथान्यान्‌ वृष्णिवीरांश्व प्रद्युम्नाद्यान्‌ सहस्रश:,महाराज! इसके बाद महात्मा भगवान्‌ श्रीकृष्ण, महाबली बलदेव तथा प्रद्युम्म आदि अन्यान्य सहस्रों वृष्णिवीरोंकी विधिवत्‌ पूजा करके भाइयोंसहित शत्रुदमन महातेजस्वी राजा युधिष्ठिरने उन सबको विदा किया

वैशम्पायन बोले—तदनन्तर शत्रुदमन महातेजस्वी राजा युधिष्ठिर ने भाइयों सहित महात्मा गोविन्द (श्रीकृष्ण), महाबली बलदेव तथा प्रद्युम्न आदि सहस्रों वृष्णिवीरों की विधिवत् पूजा करके, सम्मानपूर्वक उन सबको विदा किया।

Verse 38

पूजयित्वा महाराज यथाविधि महाद्युति: । भ्रातृभि: सहितो राजा प्रास्थापयदरिंदम:,महाराज! इसके बाद महात्मा भगवान्‌ श्रीकृष्ण, महाबली बलदेव तथा प्रद्युम्म आदि अन्यान्य सहस्रों वृष्णिवीरोंकी विधिवत्‌ पूजा करके भाइयोंसहित शत्रुदमन महातेजस्वी राजा युधिष्ठिरने उन सबको विदा किया

वैशम्पायन बोले—महाराज! इस प्रकार उन सबका यथाविधि पूजन करके महाद्युति शत्रुदमन राजा ने भाइयों सहित उन्हें विधिवत् प्रस्थापित किया।

Verse 39

एवं बभूव यज्ञ: स धर्मराजस्य धीमत: । बद्धन्नधनरत्नौघ: सुरामैरेयसागर:,इस प्रकार बुद्धिमान्‌ धर्मराज युधिष्ठिरका वह यज्ञ पूर्ण हुआ। उसमें अन्न, धन और रत्नोंके ढेर लगे हुए थे। देवताओंके मनमें अतिशय कामना उत्पन्न करनेवाली वस्तुओंका सागर लहराता था। कितने ही ऐसे तालाब थे, जिनमें घीकी कीचड़ जमी हुई थी और अन्नके तो पहाड़ ही खड़े थे। भरतभूषण! रससे भरी कीचड़रहित नदियाँ बहती थीं

वैशम्पायन बोले—इस प्रकार बुद्धिमान् धर्मराज का वह यज्ञ सम्पन्न हुआ। वह अन्न, धन और रत्नों के ढेरों से मानो बँधा हुआ था; और सुरा-मैरेय के सागर की भाँति ऐसा था, जो देवताओं के मन में भी कामना जगा दे।

Verse 40

सर्पि:पड्का हृदा यत्र बभूवुश्चान्नपर्वता: । रसालाकर्दमा नद्यो बभूवुर्भरतर्षभ,इस प्रकार बुद्धिमान्‌ धर्मराज युधिष्ठिरका वह यज्ञ पूर्ण हुआ। उसमें अन्न, धन और रत्नोंके ढेर लगे हुए थे। देवताओंके मनमें अतिशय कामना उत्पन्न करनेवाली वस्तुओंका सागर लहराता था। कितने ही ऐसे तालाब थे, जिनमें घीकी कीचड़ जमी हुई थी और अन्नके तो पहाड़ ही खड़े थे। भरतभूषण! रससे भरी कीचड़रहित नदियाँ बहती थीं

वैशम्पायन बोले—भरतर्षभ! उस यज्ञ में ऐसे ह्रद थे जिनमें घी की कीचड़ जमी थी, और अन्न के पर्वत खड़े थे। रस से भरी, कीचड़रहित मधुर नदियाँ बहती थीं।

Verse 41

न व | / |! ( ४ 5 ॥ भक्ष्यखाण्डवरागाणां क्रियतां भुज्यतां तथा । पशूनां बध्यतां चैव नान्‍्तं ददृशिरे जना:,(पीपल और सोंठ मिलाकर जो मूँगका जूस तैयार किया जाता है, उसे “खाण्डव' कहते हैं। उसीमें शक्कर मिला हुआ हो तो वह “खाण्डवराग” कहा जाता है।) भक्ष्य-भोज्य पदार्थ और खाण्डवराग कितनी मात्रामें बनाये और खाये जाते हैं तथा कितने पशु वहाँ बाँधे हुए थे, इसकी कोई सीमा वहाँके लोगोंको नहीं दिखायी देती थी

वैशम्पायन बोले— वहाँ भक्ष्य-भोज्य पदार्थ और खाण्डवराग इतनी अधिक मात्रा में बनाए और खाए जा रहे थे कि लोगों को उसका कोई अन्त दिखाई नहीं देता था। उसी प्रकार वहाँ बाँधे गए पशुओं की संख्या का भी कोई छोर उन्हें नहीं दिखता था।

Verse 42

मत्तप्रमत्तमुदितं सुप्रीतयुवतीजनम्‌ । मृदज्रशड्खनादैश्व मनोरमम भूत्‌ तदा,उस यज्ञके भीतर आये हुए सब लोग मत्त-प्रमत्त और आनन्द विभोर हो रहे थे। युवतियाँ बड़ी प्रसन्नताके साथ वहाँ विचरण करती थीं। मृदंगों और शंखोंकी ध्वनियोंसे उस यज्ञशालाकी मनोरमता और भी बढ़ गयी थी

वैशम्पायन बोले— उस समय यज्ञशाला में प्रविष्ट हुए सब लोग मत्त-प्रमत्त से, आनन्द में डूबे हुए थे। युवतियों के समूह अत्यन्त प्रसन्न होकर वहाँ विचर रहे थे। मृदंगों और शंखों के नाद से उस यज्ञशाला की शोभा और भी बढ़ गई थी।

Verse 43

उपाजिघ्रद्‌ यथाशास्त्र सर्वपापापहं तदा । भाइयोंसहित धर्मराज युधिष्ठिरने शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार उस चर्बीके धूमकी गन्ध सूँघी, जो समस्त पापोंका नाश करनेवाली थी,दीयतां भुज्यतां चेष्टं दिवारात्रमवारितम्‌ | त॑ महोत्सवसंकाशं हृष्टपुष्टजनाकुलम्‌

वैशम्पायन बोले— तब धर्मराज युधिष्ठिर ने भाइयों सहित शास्त्र-विधि के अनुसार उस धूम की गन्ध सूँघी, जो समस्त पापों का नाश करने वाली मानी जाती है। फिर कहा गया— “दान दिया जाए, इच्छित भोजन किया जाए; दिन-रात बिना रोक-टोक।” वह दृश्य महोत्सव के समान था, हर्षित और पुष्ट जनसमूह से भरा हुआ।

Verse 44

वर्षित्वा धनधाराभि: कामै रत्नै रसैस्तथा । विपाप्मा भरतश्रेष्ठ: कृतार्थ: प्राविशत्‌ पुरम्‌,भरतश्रेष्ठ राजा युधिष्ठिरने उस यज्ञमें धनकी मूसलाधार वर्षा की। सब प्रकारकी कामनाओं, रत्नों और रसोंकी भी वर्षा की। इस प्रकार पापरहित और कृतार्थ होकर उन्होंने अपने नगरमें प्रवेश किया

वैशम्पायन बोले— धन की धाराओं की वर्षा करके, तथा काम्य वस्तुओं, रत्नों और रसों की भी वर्षा करके, पापरहित भरतश्रेष्ठ युधिष्ठिर कृतार्थ होकर अपने नगर में प्रविष्ट हुए।

Verse 53

तान्यग्नौ जुहु॒वुर्धीरा: समस्ता: षोडशर्त्विज: । नरेश्वर! उस अश्वके जो शेष अंग थे, उनको धीर स्वभाववाले समस्त सोलह ऋत्विजोंने अग्निमें होम कर दिया

वैशम्पायन बोले— हे नरेश्वर! उस अश्व के जो शेष अंग थे, उन्हें धीर स्वभाव वाले समस्त सोलह ऋत्विजों ने अग्नि में होम कर दिया।

Verse 66

व्यास: सशिष्यो भगवान्‌ वर्धयामास तं नृपम्‌ । इस प्रकार इन्द्रके समान तेजस्वी राजा युधिष्ठिरके उस यज्ञको समाप्त करके शिष्योंसहित भगवान्‌ व्यासने उन्हें बधाई दी--अभ्युदयसूचक आशीर्वाद दिया

वैशम्पायन बोले— इन्द्र के समान तेजस्वी राजा युधिष्ठिर ने जब अश्वमेध यज्ञ को विधिपूर्वक पूर्ण किया, तब शिष्यों सहित भगवान् व्यास ने उस नरेश का सत्कार किया और मंगलमय आशीर्वाद देकर उसके हर्ष और यश की वृद्धि की।

Verse 76

कोटी: सहस््र॑ निष्काणां व्यासाय तु वसुंधराम्‌ । इसके बाद युधिष्ठिरने सब ब्राह्मणोंको विधिपूर्वक एक हजार करोड़ (एक खर्व) स्वर्णमुद्राएँ दक्षिणामें देकर व्यासजीको सम्पूर्ण पृथ्वी दान कर दी

वैशम्पायन बोले— इसके बाद धर्मराज युधिष्ठिर ने सब ब्राह्मणों का विधिपूर्वक सत्कार करके दक्षिणा में एक हजार करोड़ स्वर्णमुद्राएँ दीं और परम श्रद्धा से व्यासजी को सम्पूर्ण पृथ्वी दान कर दी।

Verse 86

अब्रवीद्‌ भरतश्रेष्ठ॑ धर्मराजं युधिष्ठिरम्‌ । राजन! सत्यवतीनन्दन व्यासने उस भूमिदानको ग्रहण करके भरतश्रेष्ठ धर्मराज युधिष्ठिससे कहा--

वैशम्पायन बोले— उस भूमिदान को स्वीकार करके सत्यवतीनन्दन व्यास ने भरतश्रेष्ठ धर्मराज युधिष्ठिर से कहा।

Verse 88

इस प्रकार श्रीमह्याभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें अश्वमेधयज्ञका आरम्भविषयक अठासीवाँ अध्याय पूरा हुआ

इस प्रकार श्रीमहाभारत के आश्वमेधिकपर्व के अन्तर्गत अनुगीतापर्व में अश्वमेधयज्ञ के आरम्भविषयक अठासीवाँ अध्याय समाप्त हुआ।

Verse 89

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि अश्वमेधसमाप्तौ एकोननवतितमो<ध्याय:

इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिकपर्वणि अनुगीतापर्वणि अश्वमेधसमाप्तौ एकोननवतितमो अध्याय।

Verse 96

निष्क्रयो दीयतां महां ब्राह्मणा हि धनार्थिन: । “नृपश्रेष्ठ! तुम्हारी दी हुई इस पृथ्वीको मैं पुनः तुम्हारे ही अधिकारमें छोड़ता हूँ। तुम मुझे इसका मूल्य दे दो; क्योंकि ब्राह्मण धनके ही इच्छुक होते हैं (राज्यके नहीं)”

“महान् निष्क्रय (मूल्य) दिया जाए, क्योंकि ब्राह्मण धन के ही अर्थी होते हैं। नृपश्रेष्ठ! आपने जो यह पृथ्वी मुझे दी थी, उसे मैं फिर आपके ही अधिकार में रखता हूँ; इसका मूल्य मुझे दीजिए, क्योंकि ब्राह्मण राज्य नहीं, धन चाहते हैं।”

Verse 143

एवमेतदिति प्राहुस्तदभूल्लोमहर्षणम्‌ । उनके ऐसा कहनेपर भीमसेन आदि भाइयों और द्रौपदीने एक स्वरसे कहा--'हाँ, महाराजका कहना ठीक है।” इस महान्‌ त्यागकी बात सुनकर सबके रोंगटे खड़े हो गये

उन्होंने कहा—“हाँ, ऐसा ही है”; और वह क्षण लोमहर्षक हो उठा। उसके ऐसा कहने पर भी भीमसेन आदि भाई और द्रौपदी ने एक स्वर से कहा—“हाँ, महाराज का कहना ठीक है।” इस महान् त्याग का वृत्तान्त सुनकर सबके रोंगटे खड़े हो गए।

Verse 156

तथैव द्विजसंघानां शंसतां विबभौ स्वन: । भारत! उस समय आकाशवाणी हुई--'पाण्डवो! तुमने बहुत अच्छा निश्चय किया। तुम्हें धन्यवाद!” इसी प्रकार पाण्डवोंके सत्साहसकी प्रशंसा करते हुए ब्राह्मण-समूहोंका भी शब्द वहाँ स्पष्ट सुनायी दे रहा था

उसी प्रकार पाण्डवों की प्रशंसा करते हुए ब्राह्मण-समूहों का स्पष्ट स्वर भी वहाँ गूँज उठा। उसी समय आकाशवाणी हुई—“पाण्डवो! तुमने अत्यन्त उत्तम निश्चय किया है; तुम्हें धन्यवाद!” इस तरह देववाणी और विद्वानों के आशीर्वाद ने पाण्डवों के धर्मयुक्त साहस और संकल्प को सबके सामने प्रमाणित कर दिया।

Verse 163

प्रोवाच मध्ये विप्राणामिदं सम्पूजयन्‌ मुनि: । तब मुनिवर द्वैपायनकृष्णने पुनः ब्राह्मणोंके बीचमें युधिष्ठिरकी प्रशंसा करते हुए कहा --

ब्राह्मणों के बीच उनका सत्कार करते हुए मुनि ने ये वचन कहे। तब मुनिवर कृष्ण द्वैपायन (व्यास) ने पुनः ब्राह्मण-सभा के मध्य युधिष्ठिर की प्रशंसा करते हुए कहा।

Verse 173

हिरण्यं दीयतामेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो धरास्तु ते । “राजन! तुमने तो यह पृथ्वी मुझे दे ही दी। अब मैं अपनी ओरसे इसे वापस करता हूँ। तुम इन ब्राह्मणोंको सुवर्ण दे दो और पृथ्वी तुम्हारे ही अधिकारमें रह जाय”

“इन ब्राह्मणों को सुवर्ण दिया जाए और पृथ्वी तुम्हारी ही रहे। राजन्! तुमने यह पृथ्वी मुझे दे ही दी थी; अब मैं अपनी ओर से इसे तुम्हें लौटा देता हूँ। इन ब्राह्मणों को सोना दे दो और पृथ्वी तुम्हारे ही अधिकार में रह जाए।”

Verse 186

यथा55ह भगवान्‌ व्यासस्तथा त्वं कर्तुमहसि । तब भगवान्‌ श्रीकृष्णने धर्मराज युधिष्ठिर्से कहा--“धर्मराज! भगवान्‌ व्यास जैसा कहते हैं, वैसा ही तुम्हें करना चाहिये”

वैशम्पायन बोले—जैसा भगवान् व्यास ने कहा है, वैसा ही तुम्हें करना चाहिए। तब श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर से कहा—“धर्मराज! भगवान् व्यास जैसा कहते हैं, वैसा ही तुम्हें करना चाहिए।”

Verse 196

कोटिकोटिकृतां प्रादाद्‌ दक्षिणां त्रिगुणां क्रतो: । यह सुनकर कुरुश्रेष्ठ युधिष्ठिर भाइयोंसहित बहुत प्रसन्न हुए और प्रत्येक ब्राह्मणोंको उन्होंने यज्ञके लिये एक-एक करोड़की तिगुनी दक्षिणा दी

वैशम्पायन बोले—उन्होंने यज्ञ की विधि के अनुसार करोड़ों-करोड़ों की, त्रिगुणा दक्षिणा प्रदान की। यह सुनकर कुरुश्रेष्ठ युधिष्ठिर भाइयोंसहित अत्यन्त प्रसन्न हुए और यज्ञ के लिये प्रत्येक ब्राह्मण को एक-एक करोड़ की तिगुनी दक्षिणा दी।

Verse 203

यत्‌ कृतं कुरुराजेन मरुत्तस्यानुकुर्वता । महाराज मरुत्तके मार्गका अनुसरण करनेवाले राजा युधिष्ठिरने उस समय जैसा महान्‌ त्याग किया था, वैसा इस संसारमें दूसरा कोई राजा नहीं कर सकेगा

वैशम्पायन बोले—महाराज मरुत्त के मार्ग का अनुसरण करने वाले कुरुराज युधिष्ठिर ने उस समय जैसा महान् त्याग किया, वैसा इस संसार में दूसरा कोई राजा नहीं कर सकेगा।

Verse 213

ऋषच्विग्भ्य: प्रददौ विद्वांश्षतुर्धा व्यभजंश्व ते । विद्वान्‌ महर्षि व्यासने वह सुवर्णराशि लेकर ब्राह्मणोंको दे दी और उन्होंने चार भाग करके उसे आपसमें बाँट लिया

वैशम्पायन बोले—विद्वान् महर्षि व्यास ने वह सुवर्णराशि ऋषियों और ऋत्विजों को दे दी; और उन्होंने उसे चार भाग करके आपस में बाँट लिया।

Verse 226

धूतपापो जितस्वर्गों मुमुदे भ्रातृभि: सह । इस प्रकार पृथ्वीके मूल्यके रूपमें वह सुवर्ण देकर राजा युधिष्ठिर अपने भाइयोंसहित बहुत प्रसन्न हुए। उनके सारे पाप धुल गये और उन्होंने स्वर्गपर अधिकार प्राप्त कर लिया

वैशम्पायन बोले—इस प्रकार पृथ्वी के मूल्य के रूप में वह सुवर्ण देकर राजा युधिष्ठिर अपने भाइयों सहित बहुत प्रसन्न हुए। उनके सारे पाप धुल गये और उन्होंने स्वर्ग पर अधिकार प्राप्त कर लिया।

Verse 233

व्यभजन्त द्विजातिभ्यो यथोत्साहं यथासुखम्‌ । उस अनन्त सुवर्णराशिको पाकर ऋत्विजोंने बड़े उत्साह और आनन्दके साथ उसे ब्राह्मणोंको बाँट दिया

अनन्त सुवर्ण-राशि प्राप्त करके ऋत्विजों ने अवसर के अनुरूप बड़े उत्साह और आनन्द के साथ, अपनी-अपनी सामर्थ्य के अनुसार, उसे द्विजों—ब्राह्मणों में विधिपूर्वक बाँट दिया।

Verse 433

कथयन्ति सम पुरुषा नानादेशनिवासिन: । “जिसकी जैसी इच्छा हो, उसको वही वस्तु दी जाय। सबको इच्छानुसार भोजन कराया जाय'--यह घोषणा दिन-रात जारी रहती थी--कभी बंद नहीं होती थी। हृष्ट-पुष्ट मनुष्योंसे भरे हुए उस यज्ञ-महोत्सवकी चर्चा नाना देशोंके निवासी मनुष्य बहुत दिनोंतक करते रहे

नाना देशों के निवासी लोग उसकी चर्चा करते रहे। “जिसकी जैसी इच्छा हो, उसे वही वस्तु दी जाए; सबको इच्छानुसार भोजन कराया जाए”—यह घोषणा दिन-रात निरन्तर चलती रहती थी, कभी रुकती न थी। हृष्ट-पुष्ट जनों से भरे उस यज्ञ-महोत्सव की कीर्ति को यात्री और निवासी बहुत दिनों तक कहते-सुनते रहे।

Frequently Asked Questions

The dilemma concerns interpretive responsibility: whether persistent hardship in a virtuous agent should be read as moral fault, fate, or a concrete cause—prompting Yudhiṣṭhira to seek an evidence-based explanation rather than insinuation or blame.

The chapter models disciplined compassion: honor merit, inquire carefully into suffering, and prefer proximate, observable causes when available—thereby aligning ethical judgment with restraint and clarity.

No explicit phalaśruti is stated here; the chapter’s function is connective and interpretive—linking personal welfare inquiry, communal recognition, and ritual-political continuity within the Aśvamedha frame.