अर्जुनदुःखहेतुप्रश्नः — Inquiry into the cause of Arjuna’s recurring hardship
Book 14, Chapter 89
न व | / |! ( ४ 5 ॥ भक्ष्यखाण्डवरागाणां क्रियतां भुज्यतां तथा । पशूनां बध्यतां चैव नान््तं ददृशिरे जना:
Vaiśampāyana uvāca | bhakṣya-khāṇḍava-rāgāṇāṃ kriyatāṃ bhujyatāṃ tathā | paśūnāṃ badhyatāṃ caiva nāntaṃ dadṛśire janāḥ ||
वैशम्पायन बोले— वहाँ भक्ष्य-भोज्य पदार्थ और खाण्डवराग इतनी अधिक मात्रा में बनाए और खाए जा रहे थे कि लोगों को उसका कोई अन्त दिखाई नहीं देता था। उसी प्रकार वहाँ बाँधे गए पशुओं की संख्या का भी कोई छोर उन्हें नहीं दिखता था।
वैशम्पायन उवाच