अर्जुनदुःखहेतुप्रश्नः — Inquiry into the cause of Arjuna’s recurring hardship
Book 14, Chapter 89
पाण्डवाश्व महीपालै: समेतैरभिसंवृता: । अशोभनत महाराज ग्रहास्तारागणैरिव
महाराज! समागत भूपालों से घिरे पाण्डव तारागणों से घिरे ग्रहों की भाँति शोभा पा रहे थे। और राजन्! उस अनन्त धनराशि को भूपाल-मण्डल में बाँटते हुए कुन्तीकुमार युधिष्ठिर वैश्रवण (कुबेर) के समान शोभित होते थे।
वैशम्पायन उवाच