यदुवंश-प्रवचनम्: हैहय-क्रोष्टु-वंशविस्तारः (कृतवीर्यार्जुनादि, ज्यामघ-विदर्भ-शात्वत-पर्यन्तम्)
प्रशान्तः स वनस्थो ऽपि ब्राह्मणैरेव बोधितः जगाम धनुरादाय देशमन्यं ध्वजी रथी
praśāntaḥ sa vanastho 'pi brāhmaṇaireva bodhitaḥ jagāma dhanurādāya deśamanyaṃ dhvajī rathī
वह शांत होकर वनवासी था, फिर भी ब्राह्मणों ने उसे उपदेश दिया; धनुष उठाकर वह ध्वजधारी रथी दूसरे देश को चला गया।
Suta Goswami (narrating to the sages of Naimisharanya)