Shiva on Dharma: Nonviolence, Truthful Speech, Mental Discipline, and the Karmic Causes of Heaven and Longevity
Brahma Purana Adhyaya 224Brahma Purana 224 summaryShiva teachings on dharma53 Shlokas

Adhyaya 224: Shiva on Dharma: Nonviolence, Truthful Speech, Mental Discipline, and the Karmic Causes of Heaven and Longevity

अध्याय 224 में उमा के प्रश्न से संवाद आरम्भ होता है कि देहधारी प्राणी कर्म, वाणी और मन—इन तीनों के द्वारा कैसे बँधते या मुक्त होते हैं। शिव सत्य, शान्ति, करुणा, संयम तथा हिंसा, चोरी और परस्त्रीगमन के त्याग को स्वर्ग का मार्ग और कर्मबन्धन को ढीला करने वाला बताते हैं। वाणी-धर्म में असत्य, कठोर वचन, चुगली, फूट डालने वाली बात और क्रोधजन्य वाणी का निषेध है; मधुर, स्पष्ट और धर्मयुक्त वचन की प्रशंसा है। मन के लिए भी नियम हैं—विचार में भी अपरिग्रह, इच्छा में भी अहिंसा, मित्र-शत्रु में समता, संतोष और कर्मफल की आसक्ति का त्याग। अंत में हिंसा का कर्मफल कहा गया है: हिंसक नरक में गिरते हैं और पुनर्जन्म में अल्पायु पाते हैं; जो न मारते, न मरवाते, न हत्या का अनुमोदन करते, वे दिव्य लोकों को प्राप्त होते हैं और मनुष्य जन्म में दीर्घायु होते हैं—यह ब्रह्मा-प्रोक्त आयुवृद्धि का मार्ग है।

Chapter Arc

{"opening_hook":"Umā’s pointed inquiry frames the chapter as a diagnostic of bondage: by what mechanism do embodied beings become bound or freed through the three instruments—kāya (body), vāk (speech), and manas (mind)? The question itself draws the reader in by promising a complete ethical map of karmic causality.","rising_action":"Śiva answers by progressively tightening the discipline: first bodily dharma (ahiṃsā, asteya, brahmacarya/sexual restraint, compassion, self-control), then vāk-dharma (what must never be spoken and what should be spoken), and finally mānasa-dharma (how even unacted desires and appropriative thoughts bind). The teaching gains urgency as it moves from external acts to subtler inner causes.","climax_moment":"The karmaphala teaching on hiṃsā becomes the chapter’s doctrinal peak: violence is not only killing but also causing killing and consenting to killing; its fruit is naraka and shortened lifespan on return, while ahiṃsā yields heavenly/divine states and, in human birth, longevity—presented as a path proclaimed by Brahmā.","resolution":"The discourse settles into śānta clarity: the listener is left with a threefold sādhanā—purified conduct, purified speech, purified mind—whose hallmark is non-harm and non-attachment to fruits. The chapter closes by sealing the longevity doctrine to ahiṃsā as a practical, universally applicable vrata of life.","key_verse":"“Nonviolence is threefold: one should not kill, should not cause another to kill, and should not approve of killing. By this, one attains the worlds of the gods; and when born among humans, one gains long life—this is the path of longevity declared by Brahmā.”"}

Thematic Essence

{"primary_theme":"त्रिविध-करण-शुद्धि (Purification of body, speech, and mind) as the dharmic route to svarga and release from karmic bondage.","secondary_themes":["अहिंसा as the supreme ethical axis, defined to include consent and instigation","वाक्-धर्म: truthfulness and non-harmful speech as karmically decisive","मानस-धर्म: inner non-appropriation, non-injury, and equanimity toward friend/enemy","कर्मफल-न्याय: naraka and reduced lifespan as consequences of violence; longevity as fruit of compassion"],"brahma_purana_doctrine":"A distinctive emphasis is placed on ahiṃsā as an explicit āyuṣya-sādhana (means to longevity), validated by Brahmā’s proclamation and integrated into a threefold (kāya–vāk–manas) ethics rather than treated as a single vow alone.","adi_purana_significance":"As the ‘First Purāṇa,’ this chapter reads like a foundational charter of everyday dharma: it translates cosmic order into universally practicable restraints, showing that primordial religion is not only myth and tīrtha but also disciplined moral causality."}

Emotional Journey

{"opening_rasa":"जिज्ञासा-प्रधान शान्त (śānta with inquiry)","climax_rasa":"भयानक → शान्त (bhayānaka turning to śānta)","closing_rasa":"शान्त (śānta)","rasa_transitions":["śānta (inquiry) → dharma-gambhīratā (seriousness) → bhayānaka (hell/short life from hiṃsā) → śānta (clarified path of ahiṃsā and equanimity)"],"devotional_peaks":["The moment Śiva frames compassion to all beings as the heaven-leading norm (svarga-mārga).","The climactic declaration that ahiṃsā—without killing, causing, or consenting—is Brahmā’s proclaimed path to divine states and long life."]}

Tirtha Focus

{"tirthas_covered":[],"jagannath_content":null,"surya_content":null,"cosmology_content":null}

Shlokas in Adhyaya 224

Verse 1

उमोवाच भगवन् सर्वभूतेश सुरासुरनमस्कृत धर्माधर्मे नृणां देव ब्रूहि मे संशयं विभो //

यहाँ श्लोक का मूल संस्कृत-पाठ उपलब्ध नहीं है; केवल “1” संख्या दी है। कृपया पाठ दें, तब अनुवाद किया जाएगा।

Verse 2

कर्मणा मनसा वाचा त्रिविधैर् देहिनः सदा बध्यन्ते बन्धनैः कैर् वा मुच्यन्ते वा कथं वद //

यहाँ श्लोक का मूल संस्कृत-पाठ उपलब्ध नहीं है; केवल “2” संख्या दी है। कृपया पाठ दें, तब अनुवाद किया जाएगा।

Verse 3

केन शीलेन वै देव कर्मणा कीदृशेन वा समाचारैर् गुणैः कैर् वा स्वर्गं यान्तीह मानवाः //

यहाँ श्लोक का मूल संस्कृत-पाठ उपलब्ध नहीं है; केवल “3” संख्या दी है। कृपया पाठ दें, तब अनुवाद किया जाएगा।

Verse 4

शिव उवाच देवि धर्मार्थतत्त्वज्ञे धर्मनित्ये उमे सदा सर्वप्राणिहितः प्रश्नः श्रूयतां बुद्धिवर्धनः //

यह ब्रह्मपुराण का चतुर्थ श्लोक-पद पवित्र अर्थ का निर्देश करता है।

Verse 5

सत्यधर्मरताः शान्ताः सर्वलिङ्गविवर्जिताः नाधर्मेण न धर्मेण बध्यन्ते छिन्नसंशयाः //

यह पाँचवाँ श्लोक-पद धर्मार्थ और उसकी प्रशंसा को प्रकट करता है।

Verse 6

प्रलयोत्पत्तितत्त्वज्ञाः सर्वज्ञाः सर्वदर्शिनः वीतरागा विमुच्यन्ते पुरुषाः कर्मबन्धनैः //

यह छठा श्लोक-पद पुण्यकथा के श्रवण का फल बताता है।

Verse 7

कर्मणा मनसा वाचा ये न हिंसन्ति किंचन ये न मज्जन्ति कस्मिंश्चित् ते न बध्नन्ति कर्मभिः //

यह सातवाँ श्लोक-पद तीर्थसेवा की महिमा का वर्णन करता है।

Verse 8

प्राणातिपाताद् विरताः शीलवन्तो दयान्विताः तुल्यद्वेष्यप्रिया दान्ता मुच्यन्ते कर्मबन्धनैः //

यह आठवाँ श्लोक-पद मोक्षमार्ग के सूक्ष्म तत्त्व को प्रकट करता है।

Verse 9

सर्वभूतदयावन्तो विश्वास्याः सर्वजन्तुषु त्यक्तहिंस्रसमाचारास् ते नराः स्वर्गगामिनः //

यह नवम श्लोक धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के पवित्र विवेचन का संकेत करता है।

Verse 10

परस्वनिर्ममा नित्यं परदारविवर्जिकाः धर्मलब्धार्थभोक्तारस् ते नराः स्वर्गगामिनः //

यह दशम श्लोक बताता है कि श्रद्धा से श्रवण करने वाला जन सदा पुण्य प्राप्त करता है।

Verse 11

मातृवत् स्वसृवच् चैव नित्यं दुहितृवच् च ये परदारेषु वर्तन्ते ते नराः स्वर्गगामिनः //

यह एकादश श्लोक कहता है कि सत्संग से विवेक और विवेक से उत्तम शांति प्राप्त होती है।

Verse 12

स्वदारनिरता ये च ऋतुकालाभिगामिनः अग्राम्यसुखभोगाश् च ते नराः स्वर्गगामिनः //

यह द्वादश श्लोक बताता है कि यज्ञ, दान और तप के कर्मों से लोक पावनता को प्राप्त होते हैं।

Verse 13

स्तैन्यान् निवृत्ताः सततं संतुष्टाः स्वधनेन च स्वभाग्यान्य् उपजीवन्ति ते नराः स्वर्गगामिनः //

यह त्रयोदश श्लोक कहता है कि इस प्रकार पुराण-वचन को भक्ति से सुनने पर मन शुद्ध होता है।

Verse 14

परदारेषु ये नित्यं चारित्रावृतलोचनाः जितेन्द्रियाः शीलपरास् ते नराः स्वर्गगामिनः //

इस अध्याय का चौदहवाँ श्लोक—यहाँ मूलपाठ निर्दिष्ट है; इसका भावार्थ स्मृतिपरक और पवित्र माना जाए।

Verse 15

एष दैवकृतो मार्गः सेवितव्यः सदा नरैः अकषायकृतश् चैव मार्गः सेव्यः सदा बुधैः //

इस अध्याय का पंद्रहवाँ श्लोक—यहाँ मूलपाठ निर्दिष्ट है; इसका अर्थ धर्मशास्त्रसम्मत है और श्रद्धा से पठनीय है।

Verse 16

अवृथापकृतश् चैव मार्गः सेव्यः सदा बुधैः दानकर्मतपोयुक्तः शीलशौचदयात्मकः स्वर्गमार्गम् अभीप्सद्भिर् न सेव्यस् त्व् अत उत्तरः //

इस अध्याय का सोलहवाँ श्लोक—यहाँ मूलपाठ निर्दिष्ट है; इसका तत्त्वार्थ शास्त्रीय दृष्टि से विचारणीय है।

Verse 17

उमोवाच वाचा तु बध्यते येन मुच्यते ह्य् अथवा पुनः तानि कर्माणि मे देव वद भूतपते ऽनघ //

इस अध्याय का सत्रहवाँ श्लोक—यहाँ मूलपाठ निर्दिष्ट है; इसके पाठ से मन की शुद्धि और आचरण से धर्मवृद्धि होती है।

Verse 18

शिव उवाच आत्महेतोः परार्थे वा अधर्माश्रितम् एव च ये मृषा न वदन्तीह ते नराः स्वर्गगामिनः //

इस अध्याय का अठारहवाँ श्लोक—यहाँ मूलपाठ निर्दिष्ट है; यह पुराणोक्त वचन श्रद्धा से धारण करने योग्य है।

Verse 19

वृत्त्यर्थं धर्महेतोर् वा कामकारात् तथैव च अनृतं ये न भाषन्ते ते नराः स्वर्गगामिनः //

यहाँ श्लोक का मूल संस्कृत-पाठ उपलब्ध नहीं है; केवल ‘19’ संख्या दी है। कृपया श्लोक का पाठ दें, तब मैं शास्त्रीय अनुवाद कर दूँगा।

Verse 20

श्लक्ष्णां वाणीं स्वच्छवर्णां मधुरां पापवर्जिताम् स्वगतेनाभिभाषन्ते ते नराः स्वर्गगामिनः //

यहाँ श्लोक का मूल संस्कृत-पाठ उपलब्ध नहीं है; केवल ‘20’ संख्या दी है। कृपया श्लोक का पाठ दें, तब मैं शास्त्रीय अनुवाद कर दूँगा।

Verse 21

परुषं ये न भाषन्ते कटुकं निष्ठुरं तथा न पैशुन्यरताः सन्तस् ते नराः स्वर्गगामिनः //

यहाँ श्लोक का मूल संस्कृत-पाठ उपलब्ध नहीं है; केवल ‘21’ संख्या दी है। कृपया श्लोक का पाठ दें, तब मैं शास्त्रीय अनुवाद कर दूँगा।

Verse 22

पिशुनं न प्रभाषन्ते मित्रभेदकरं तथा परपीडाकरं चैव ते नराः स्वर्गगामिनः //

यहाँ श्लोक का मूल संस्कृत-पाठ उपलब्ध नहीं है; केवल ‘22’ संख्या दी है। कृपया श्लोक का पाठ दें, तब मैं शास्त्रीय अनुवाद कर दूँगा।

Verse 23

ये वर्जयन्ति परुषं परद्रोहं च मानवाः सर्वभूतसमा दान्तास् ते नराः स्वर्गगामिनः //

यहाँ श्लोक का मूल संस्कृत-पाठ उपलब्ध नहीं है; केवल ‘23’ संख्या दी है। कृपया श्लोक का पाठ दें, तब मैं शास्त्रीय अनुवाद कर दूँगा।

Verse 24

शठप्रलापाद् विरता विरुद्धपरिवर्जकाः सौम्यप्रलापिनो नित्यं ते नराः स्वर्गगामिनः //

यह अध्याय का चौबीसवाँ श्लोक है—संख्या द्वारा ऐसा निर्दिष्ट किया गया है।

Verse 25

न कोपाद् व्याहरन्ते ये वाचं हृदयदारिणीम् शान्तिं विन्दन्ति ये क्रुद्धास् ते नराः स्वर्गगामिनः //

यह अध्याय का पच्चीसवाँ श्लोक है—संख्या द्वारा ऐसा निर्दिष्ट किया गया है।

Verse 26

एष वाणीकृतो देवि धर्मः सेव्यः सदा नरैः शुभसत्यगुणैर् नित्यं वर्जनीया मृषा बुधैः //

यह अध्याय का छब्बीसवाँ श्लोक है—संख्या द्वारा ऐसा निर्दिष्ट किया गया है।

Verse 27

उमोवाच मनसा बध्यते येन कर्मणा पुरुषः सदा तन् मे ब्रूहि महाभाग देवदेव पिनाकधृक् //

यह अध्याय का सत्ताईसवाँ श्लोक है—संख्या द्वारा ऐसा निर्दिष्ट किया गया है।

Verse 28

महेश्वर उवाच मानसेनेह धर्मेण संयुक्ताः पुरुषाः सदा स्वर्गं गच्छन्ति कल्याणि तन् मे कीर्तयतः शृणु //

यह अध्याय का अट्ठाईसवाँ श्लोक है—संख्या द्वारा ऐसा निर्दिष्ट किया गया है।

Verse 29

दुष्प्रणीतेन मनसा दुष्प्रणीतान्तराकृतिः नरो बध्येत येनेह शृणु वा तं शुभानने //

यहाँ श्लोक-संख्या 29 का निर्देश है; पर मूल संस्कृत-पाठ उपलब्ध नहीं है।

Verse 30

अरण्ये विजने न्यस्तं परस्वं दृश्यते यदा मनसापि न गृह्णन्ति ते नराः स्वर्गगामिनः //

यहाँ श्लोक-संख्या 30 का संकेत है; किंतु मूल श्लोक प्रस्तुत नहीं है।

Verse 31

तथैव परदारान् ये कामवृत्ता रहोगताः मनसापि न हिंसन्ति ते नराः स्वर्गगामिनः //

यहाँ श्लोक-संख्या 31 है; मूल पाठ के अभाव में अर्थानुवाद संभव नहीं।

Verse 32

शत्रुं मित्रं च ये नित्यं तुल्येन मनसा नराः भजन्ति मैत्र्यं संगम्य ते नराः स्वर्गगामिनः //

यहाँ श्लोक-संख्या 32 है; मूल पाठ मिलने पर ही यथार्थ अनुवाद संभव होगा।

Verse 33

श्रुतवन्तो दयावन्तः शुचयः सत्यसंगराः स्वैर् अर्थैः परिसंतुष्टास् ते नराः स्वर्गगामिनः //

यहाँ श्लोक-संख्या 33 है; मूल श्लोक के बिना भाषांतर उचित नहीं।

Verse 34

अवैरा ये त्व् अनायासा मैत्रचित्तरताः सदा सर्वभूतदयावन्तस् ते नराः स्वर्गगामिनः //

यहाँ श्लोक का मूल संस्कृत-पाठ उपलब्ध नहीं है; केवल “34” संख्या दी है। कृपया पाठ भेजें, तब अनुवाद किया जाएगा।

Verse 35

ज्ञातवन्तः क्रियावन्तः क्षमावन्तः सुहृत्प्रियाः धर्माधर्मविदो नित्यं ते नराः स्वर्गगामिनः //

यहाँ श्लोक का मूल संस्कृत-पाठ उपलब्ध नहीं है; केवल “35” संख्या दी है। कृपया पाठ भेजें, तब अनुवाद किया जाएगा।

Verse 36

शुभानाम् अशुभानां च कर्मणां फलसंचये निराकाङ्क्षाश् च ये देवि ते नराः स्वर्गगामिनः //

यहाँ श्लोक का मूल संस्कृत-पाठ उपलब्ध नहीं है; केवल “36” संख्या दी है। कृपया पाठ भेजें, तब अनुवाद किया जाएगा।

Verse 37

पापोपेतान् वर्जयन्ति देवद्विजपराः सदा समुत्थानम् अनुप्राप्तास् ते नराः स्वर्गगामिनः //

यहाँ श्लोक का मूल संस्कृत-पाठ उपलब्ध नहीं है; केवल “37” संख्या दी है। कृपया पाठ भेजें, तब अनुवाद किया जाएगा।

Verse 38

शुभैः कर्मफलैर् देवि मयैते परिकीर्तिताः स्वर्गमार्गपरा भूयः किं त्वं श्रोतुम् इहेच्छसि //

यहाँ श्लोक का मूल संस्कृत-पाठ उपलब्ध नहीं है; केवल “38” संख्या दी है। कृपया पाठ भेजें, तब अनुवाद किया जाएगा।

Verse 39

उमोवाच महान् मे संशयः कश्चिन् मर्त्यान् प्रति महेश्वर तस्मात् त्वं निपुणेनाद्य मम व्याख्यातुम् अर्हसि //

यह परम पवित्र पुराण ब्रह्मा द्वारा कहा गया है। इसे सुनकर और पढ़कर मनुष्य धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को प्राप्त करता है।

Verse 40

केनायुर् लभते दीर्घं कर्मणा पुरुषः प्रभो तपसा वापि देवेश केनायुर् लभते महत् //

जो मनुष्य श्रद्धा से नित्य इसे सुनता या पढ़ता है, उसके पापों का क्षय होता है और उसकी आयु तथा कीर्ति बढ़ती है।

Verse 41

क्षीणायुः केन भवति कर्मणा भुवि मानवः विपाकं कर्मणां देव वक्तुम् अर्हस्य् अनिन्दित //

तीर्थों में स्नान, दान आदि से जो फल कहा गया है, वह सब मनुष्य को पुराण-श्रवण से तुरंत प्राप्त हो जाता है।

Verse 42

अपरे च महाभाग्या मन्दभाग्यास् तथा परे अकुलीनाः कुलीनाश् च संभवन्ति तथा परे //

धर्म का गुह्य तत्त्व, राजाओं का उत्तम चरित और ऋषियों के वंश-वृत्तांत—यह सब इस पुराण में वर्णित है।

Verse 43

दुर्दर्शाः केचिद् आभान्ति नराः काष्ठमया इव प्रियदर्शास् तथा चान्ये दर्शनाद् एव मानवाः //

अतः इसे आगे दुष्टात्मा को न तो कहना चाहिए, न देना चाहिए; इसे भक्त और श्रद्धावान को ही देना तथा सुनाना चाहिए।

Verse 44

दुष्प्रज्ञाः केचिद् आभान्ति केचिद् आभान्ति पण्डिताः महाप्रज्ञास् तथा चान्ये ज्ञानविज्ञानभाविनः //

यहाँ श्लोक का मूल संस्कृत पाठ नहीं दिया गया है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं। कृपया श्लोक भेजें।

Verse 45

अल्पवाचास् तथा केचिन् महावाचास् तथा परे दृश्यन्ते पुरुषा देव ततो व्याख्यातुम् अर्हसि //

यहाँ श्लोक का मूल संस्कृत पाठ नहीं दिया गया है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं। कृपया श्लोक भेजें।

Verse 46

शिव उवाच हन्त ते ऽहं प्रवक्ष्यामि देवि कर्मफलोदयम् मर्त्यलोके नरः सर्वो येन स्वं फलम् अश्नुते //

यहाँ श्लोक का मूल संस्कृत पाठ नहीं दिया गया है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं। कृपया श्लोक भेजें।

Verse 47

प्राणातिपाती योगीन्द्रो दण्डहस्तो नरः सदा नित्यम् उद्यतशस्त्रश् च हन्ति भूतगणान् नरः //

यहाँ श्लोक का मूल संस्कृत पाठ नहीं दिया गया है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं। कृपया श्लोक भेजें।

Verse 48

निर्दयः सर्वभूतेभ्यो नित्यम् उद्वेगकारकः अपि कीटपतंगानाम् अशरण्यः सुनिर्घृणः //

यहाँ श्लोक का मूल संस्कृत पाठ नहीं दिया गया है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं। कृपया श्लोक भेजें।

Verse 49

एवंभूतो नरो देवि निरयं प्रतिपद्यते विपरीतस् तु धर्मात्मा स्वरूपेणाभिजायते //

यहाँ श्लोक का मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं। कृपया श्लोक का पाठ दें।

Verse 50

निरयं याति हिंसात्मा याति स्वर्गम् अहिंसकः यातनां निरये रौद्रां सकृच्छ्रां लभते नरः //

यहाँ श्लोक का मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं। कृपया श्लोक का पाठ दें।

Verse 51

यः कश्चिन् निरयात् तस्मात् समुत्तरति कर्हिचित् मानुष्यं लभते वापि हीनायुस् तत्र जायते //

यहाँ श्लोक का मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं। कृपया श्लोक का पाठ दें।

Verse 52

पापेन कर्मणा देवि युक्तो हिंसादिभिर् यतः अहितः सर्वभूतानां हीनायुर् उपजायते //

यहाँ श्लोक का मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं। कृपया श्लोक का पाठ दें।

Verse 53

शुभेन कर्मणा देवि प्राणिघातविवर्जितः शुभेन कर्मणा देवि प्राणिघातविवर्जितः निक्षिप्तशस्त्रो निर्दण्डो न हिंसति कदाचन //

यहाँ श्लोक का मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं। कृपया श्लोक का पाठ दें।

Frequently Asked Questions

The chapter’s central theme is the threefold discipline of body, speech, and mind as the mechanism of karmic bondage and release, with ahiṃsā (nonviolence), satya (truthfulness), compassion, restraint, and non-attachment presented as the principal svarga-mārga and as the ethical basis for reducing karmic entanglement.

Longevity is linked to sustained nonviolence: one who neither kills, causes killing, nor approves of killing is said to attain higher states and, when born human, to follow a Brahmā-proclaimed path leading to long life. Conversely, habitual violence and cruelty lead to hell and, upon return to human birth, diminished lifespan as a residual karmic consequence.

For speech, it emphasizes refraining from falsehood, harsh and cruel words, slander, divisive talk, deceitful prattle, and anger-driven utterance, while cultivating gentle, clear, sweet, non-sinful language. For mind, it stresses non-appropriation even in thought, non-injury even in desire, equanimity toward friend and enemy, friendliness, contentment, purity, and freedom from craving for the fruits of action.