क्षीणायुः केन भवति कर्मणा भुवि मानवः विपाकं कर्मणां देव वक्तुम् अर्हस्य् अनिन्दित //
तीर्थों में स्नान, दान आदि से जो फल कहा गया है, वह सब मनुष्य को पुराण-श्रवण से तुरंत प्राप्त हो जाता है।