कर्मणा मनसा वाचा ये न हिंसन्ति किंचन ये न मज्जन्ति कस्मिंश्चित् ते न बध्नन्ति कर्मभिः //
यह सातवाँ श्लोक-पद तीर्थसेवा की महिमा का वर्णन करता है।