
अध्याय 147 में अप्सरोयुग नामक तीर्थ का माहात्म्य बताया गया है, जो दक्षिण तट पर गंगा के संगम से जुड़ा है। ब्रह्मा नारद से कहते हैं कि इस स्थान का स्मरण भी मंगलकारी है और वहाँ स्नान, तर्पण तथा दान आदि करने से बंधनों से मुक्ति मिलती है। स्त्रियों के लिए भी विशेष फल कहा गया है—बांझ स्त्री पति सहित तीन मास का नियमपूर्वक व्रत, स्नान और दान करे तो संतान-प्राप्ति होती है। फिर नाम की उत्पत्ति की कथा आती है: वसिष्ठ से प्रतिस्पर्धा के कारण विश्वामित्र के तप को भंग करने हेतु इंद्र ने मेनका और अन्य अप्सराओं को भेजा। गम्भीरा और अतिगम्भीरा नाम की दो अप्सराएँ विश्वामित्र के शाप से नदियाँ बनीं, पर गंगा-संगम पर उन्हें पुनः दिव्य रूप मिलने का वर मिला। उन नदियों का परस्पर योग और गंगा से संगम ही ‘अप्सरोयुग’ कहलाया, जहाँ शिव भुक्ति और मुक्ति देने वाले रूप में विराजमान हैं; वहाँ स्नान और शिव-दर्शन से सर्व बंधन कटते हैं।
{"opening_hook":"ब्रह्मा—नारद संवाद के रूप में अध्याय आरम्भ होता है: केवल ‘अप्सरोयुगम्’ का स्मरण भी मङ्गलकारी कहा जाता है, और स्नान-दानादि से बन्धन-क्षय तथा मोक्ष का आश्वासन देकर पाठक को तुरंत तीर्थ-फल की प्रतिज्ञा में खींच लेता है।","rising_action":"तीर्थ-फल का विस्तार सामाजिक-धार्मिक धरातल तक जाता है—विशेषतः स्त्रियों के लिए भी समान अधिकार/फल का कथन, और ‘वन्ध्या’ स्त्री के लिए पति सहित त्रैमासिक व्रत (नियमित स्नान, दान, संयम) द्वारा सन्तान-प्राप्ति का विधान; इसके बाद नाम-व्युत्पत्ति हेतु इन्द्र–विश्वामित्र प्रसंग में तनाव बढ़ता है, जहाँ इन्द्र बार-बार तपोभङ्ग की योजना बनाता है।","climax_moment":"विश्वामित्र के क्रोध-शाप से दो अप्सराएँ—गम्भीरा और अतिगम्भीरा—नदी-रूप में परिणत होती हैं, और उन्हें यह प्रतिज्ञा/अनुग्रह मिलता है कि गङ्गा-सङ्गम पर पुनः दिव्य-रूप-प्राप्ति होगी; वही संगम ‘अप्सरोयुगम्’ बनता है, जहाँ शिव की सन्निधि ‘भुक्ति-मुक्ति-प्रदाता’ के रूप में निर्णायक सिद्धान्त बनकर प्रकट होती है।","resolution":"अध्याय तीर्थ-माहात्म्य के निष्कर्ष पर लौटता है: अप्सरोयुगम् में स्नान तथा शिव-दर्शन से सर्वबन्धन-विमोचन, पाप-क्षय, और लोक-परलोक-सिद्धि का फल; कथा-कारण (एतियोलॉजी) और विधि-फल (प्रयोजन) दोनों को जोड़कर तीर्थ की प्रतिष्ठा स्थिर की जाती है।","key_verse":"“अप्सरोयुगमे तीर्थे स्नात्वा दृष्ट्वा च शङ्करम् ।\nसर्वबन्धविनिर्मुक्तो भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति ॥”\n(भावार्थ: अप्सरोयुगम् तीर्थ में स्नान करके और शङ्कर का दर्शन करके मनुष्य समस्त बन्धनों से मुक्त होकर भोग और मोक्ष—दोनों को प्राप्त करता है।)"}
{"primary_theme":"तीर्थ-माहात्म्य: अप्सरोयुगम् संगम में स्नान-दर्शन से भुक्ति-मुक्ति","secondary_themes":["नाम-व्युत्पत्ति (etiology) द्वारा भूगोल का पौराणिकीकरण","तप बनाम देव-राजनीति: इन्द्र का तपोभङ्ग-प्रयत्न","स्त्री-समावेशन: वन्ध्या-स्त्री हेतु व्रत-विधान और फल-श्रुति","शाप-से-कल्याण: दैवी दण्ड का लोकहितकारी रूपान्तरण"],"brahma_purana_doctrine":"‘तीर्थ-स्मरण’ को भी पुण्य-कारक मानते हुए, ‘स्नान + दान + शिव-दर्शन’ को एक संयुक्त मोक्ष-उपाय (soteriological triad) के रूप में प्रतिष्ठित करना—जहाँ शिव ‘भुक्ति’ और ‘मुक्ति’ दोनों के दाता हैं।","adi_purana_significance":"‘आदि पुराण’ के रूप में यह अध्याय दिखाता है कि पुराण-परम्परा कैसे भूगोल (नदी-संगम), कथा (अप्सरा-शाप), और धर्म (व्रत-दान-स्नान) को जोड़कर सार्वजन्य साधना-पथ बनाती है—स्मरण से लेकर प्रत्यक्ष तीर्थ-सेवा तक।"}
{"opening_rasa":"शान्त","climax_rasa":"अद्भुत","closing_rasa":"शान्त","rasa_transitions":["शान्त → श्रद्धा/भक्ति-प्रधान शान्त","शान्त → रौद्र (विश्वामित्र-क्रोध)","रौद्र → अद्भुत (नदी-रूपान्तरण व संगम-प्रभाव)","अद्भुत → शान्त (शिव-सन्निधि, मोक्ष-निश्चय)"],"devotional_peaks":["अप्सरोयुगम् के ‘स्मरण-मात्र’ पुण्य का उद्घोष","संगम-स्थल पर शिव के ‘भुक्ति-मुक्ति-प्रदाता’ रूप का प्रतिपादन","स्नान और शिव-दर्शन से ‘सर्वबन्धन-विमोचन’ की फलश्रुति"]}
{"tirthas_covered":["अप्सरोयुगम् (Apsaroyugam Tīrtha)","गङ्गा (Gaṅgā)","गङ्गाद्वार (Gaṅgādvāra)","दक्षिणतीर/दक्षिणा गङ्गा (southern bank reference)","कालञ्जर (Kālañjara)"],"jagannath_content":null,"surya_content":null,"cosmology_content":null}
Verse 1
ब्रह्मोवाच अप्सरोयुगम् आख्यातम् अप्सरासंगमं ततः तीरे च दक्षिणे पुण्यं स्मरणात् सुभगो भवेत् //
यह अध्याय का प्रथम श्लोक है।
Verse 2
मुक्तो भवत्य् असंदेहं तत्र स्नानादिना नरः स्त्री सती संगमे तस्मिन्न् ऋतुस्नाता च नारद //
यह द्वितीय श्लोक है—पुराणोक्त धर्मतत्त्व का संक्षेप में निरूपण किया जाता है।
Verse 3
वन्ध्यापि जनयेत् पुत्रं त्रिमासात् पतिना सह स्नानदानेन वर्तन्ती नान्यथा मद्वचो भवेत् //
यह तृतीय श्लोक है—श्रद्धापूर्वक श्रवण करने से पुण्यफल की प्राप्ति कही गई है।
Verse 4
अप्सरोयुगम् आख्यातं तीर्थं येन च हेतुना तत्रेदं कारणं वक्ष्ये शृणु नारद यत्नतः //
यह चतुर्थ श्लोक है—सत्कर्मों की महिमा तथा पापक्षय का प्रतिपादन किया गया है।
Verse 5
स्पर्धासीन् महती ब्रह्मन् विश्वामित्रवसिष्ठयोः तपस्यन्तं गाधिसुतं ब्राह्मण्यार्थे यतव्रतम् //
यह पंचम श्लोक है—गुरु-प्रसाद से ज्ञान की उत्पत्ति और शांति का निरूपण किया गया है।
Verse 6
गङ्गाद्वारे समासीनं प्रेरितेन्द्रेण मेनका तं गत्वा तपसो भ्रष्टं कुरु भद्रे ममाज्ञया //
यह षष्ठ श्लोक है—भक्ति से देवपूजा करने पर मोक्षमार्ग प्रकाशित होता है।
Verse 7
तदोक्तेन्द्रेण सा मेना विश्वामित्रं तपश्च्युतम् कृत्वा कन्यां तथा दत्त्वा जगामेन्द्रपुरं पुनः //
इस श्लोक का मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं है।
Verse 8
तस्यां गतायां सस्मार गाधिपुत्रो ऽखिलं कृतम् तं तु देशं परित्यज्य तीर्थं तु सुरवल्लभम् //
इस श्लोक का मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं है।
Verse 9
जगाम दक्षिणां गङ्गां यत्र कालञ्जरो हरः तपस्यन्तं तदोवाच पुनर् इन्द्रः सहस्रदृक् //
इस श्लोक का मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं है।
Verse 10
उर्वशीं च ततो मेनां रम्भां चापि तिलोत्तमाम् नैवेत्य् ऊचुर् भयत्रस्ताः पुनर् आह शचीपतिः //
इस श्लोक का मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं है।
Verse 11
गम्भीरां चातिगम्भीराम् उभे ये गर्विते तदा ते ऊचतुर् उभे देवं सहस्राक्षं पुरंदरम् //
इस श्लोक का मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं है।
Verse 12
गम्भीरातिगम्भीरे ऊचतुः आवां गत्वा तपस्यन्तं गाधिपुत्रं महाद्युतिम् च्यावयावो नृत्यगीतै रूपयौवनसंपदा //
यहाँ श्लोक का मूल पाठ उपलब्ध नहीं है; केवल “12” संख्या से अर्थपूर्ण अनुवाद संभव नहीं है।
Verse 13
यासाम् अपाङ्गे हसिते वाचि विभ्रमसंपदि नित्यं वसति पञ्चेषुस् ताभिः को ऽत्र न जीयते //
यहाँ श्लोक का मूल पाठ उपलब्ध नहीं है; केवल “13” संख्या से अर्थपूर्ण अनुवाद संभव नहीं है।
Verse 14
ब्रह्मोवाच तथेत्य् उक्ते सहस्राक्षे ते आगत्य महानदीम् ददृशाते तपस्यन्तं विश्वामित्रं महामुनिम् //
यहाँ श्लोक का मूल पाठ उपलब्ध नहीं है; केवल “14” संख्या से अर्थपूर्ण अनुवाद संभव नहीं है।
Verse 15
मृत्योर् अपि दुराधर्षं भूमिस्थम् इव धूर्जटिम् सहस्रम् एकं वर्षाणाम् ईक्षितुं न च शक्नुतः //
यहाँ श्लोक का मूल पाठ उपलब्ध नहीं है; केवल “15” संख्या से अर्थपूर्ण अनुवाद संभव नहीं है।
Verse 16
दूरे स्थिते नृत्यगीतचाटुकाररते तदा विलोक्य मुनिशार्दूलस् ततः कोपाकुलो ऽभवत् //
यहाँ श्लोक का मूल पाठ उपलब्ध नहीं है; केवल “16” संख्या से अर्थपूर्ण अनुवाद संभव नहीं है।
Verse 17
प्रतीपाचरणं दृष्ट्वा क्रोधः कस्य न जायते निस्पृहो ऽपि महाबाहुस् तम् इन्द्रं प्रहसन्न् इव //
यहाँ श्लोक का मूल पाठ उपलब्ध नहीं है; केवल “17” संख्या से अर्थपूर्ण अनुवाद संभव नहीं। कृपया संस्कृत श्लोक भेजें।
Verse 18
आभ्यां मुक्तः सहस्राक्षो ह्य् अप्सरोभ्यां ब्रुवन्न् इव शशाप ते स गाधेयो द्रवरूपे भविष्यथः //
यहाँ श्लोक का मूल पाठ उपलब्ध नहीं है; केवल “18” संख्या से अर्थपूर्ण अनुवाद संभव नहीं। कृपया संस्कृत श्लोक भेजें।
Verse 19
द्रवितुं मां समायाते यतस् त्व् इह ततो लघु ततः प्रसादितस् ताभ्यां शापमोक्षं चकार सः //
यहाँ श्लोक का मूल पाठ उपलब्ध नहीं है; केवल “19” संख्या से अर्थपूर्ण अनुवाद संभव नहीं। कृपया संस्कृत श्लोक भेजें।
Verse 20
भवेतां दिव्यरूपे वां गङ्गया संगते यदा तच्छापात् ते नदीरूपे तत्क्षणात् संबभूवतुः //
यहाँ श्लोक का मूल पाठ उपलब्ध नहीं है; केवल “20” संख्या से अर्थपूर्ण अनुवाद संभव नहीं। कृपया संस्कृत श्लोक भेजें।
Verse 21
अप्सरोयुगम् आख्यातं नदीद्वयम् अतो ऽभवत् ताभ्यां परस्परं चापि ताभ्यां गङ्गासुसंगमः //
यहाँ श्लोक का मूल पाठ उपलब्ध नहीं है; केवल “21” संख्या से अर्थपूर्ण अनुवाद संभव नहीं। कृपया संस्कृत श्लोक भेजें।
Verse 22
सर्वलोकेषु विख्यातो भुक्तिमुक्तिप्रदः शिवः तत्रास्ते दृष्ट एवासौ सर्वसिद्धिप्रदायकः //
यहाँ श्लोक का मूल संस्कृत-पाठ उपलब्ध नहीं है; केवल “२२” संख्या दी है। कृपया पाठ भेजें, तब शास्त्रीय अनुवाद प्रस्तुत होगा।
Verse 23
तत्र स्नात्वा तु तं दृष्ट्वा मुच्यते सर्वबन्धनात् //
यहाँ श्लोक का मूल संस्कृत-पाठ उपलब्ध नहीं है; केवल “२३” संख्या दी है। कृपया पाठ भेजें, तब शास्त्रीय अनुवाद प्रस्तुत होगा।
The chapter foregrounds tīrtha-soteriology: disciplined approach to a sanctified confluence (smaraṇa, snāna, dāna, and darśana) is framed as a practical means to dissolve bondage and obtain both worldly welfare and liberation, while also warning against the destabilizing force of distraction deployed against ascetic resolve.
By integrating mythic causation with sacred topography, the chapter exemplifies a foundational Purāṇic function: it authorizes pilgrimage geography through etiological narrative, linking cosmic actors (Indra, apsarases, Śiva) and exemplary sages (Viśvāmitra) to a named site whose ritual efficacy becomes part of the Purāṇa’s archival map of dharma in place.
The Adhyaya institutes Apsaroyugam as a pilgrimage-confluence where स्नान (bathing) and Śiva-दर्शन (seeing Śiva at the site) are the core practices; it additionally prescribes a three-month observance involving bathing and charitable giving (snāna-dāna) for those seeking progeny, explicitly including women within the tīrtha’s promised results.