जगाम दक्षिणां गङ्गां यत्र कालञ्जरो हरः तपस्यन्तं तदोवाच पुनर् इन्द्रः सहस्रदृक् //
इस श्लोक का मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं है।