मुक्तो भवत्य् असंदेहं तत्र स्नानादिना नरः स्त्री सती संगमे तस्मिन्न् ऋतुस्नाता च नारद //
यह द्वितीय श्लोक है—पुराणोक्त धर्मतत्त्व का संक्षेप में निरूपण किया जाता है।