उर्वशीं च ततो मेनां रम्भां चापि तिलोत्तमाम् नैवेत्य् ऊचुर् भयत्रस्ताः पुनर् आह शचीपतिः //
इस श्लोक का मूल संस्कृत पाठ उपलब्ध नहीं है; इसलिए यथार्थ अनुवाद संभव नहीं है।