स्पर्धासीन् महती ब्रह्मन् विश्वामित्रवसिष्ठयोः तपस्यन्तं गाधिसुतं ब्राह्मण्यार्थे यतव्रतम् //
यह पंचम श्लोक है—गुरु-प्रसाद से ज्ञान की उत्पत्ति और शांति का निरूपण किया गया है।