Atharva Veda Anuvaka 7
Kanda 610 Suktas31 Mantras

Anuvaka 7

मुख्य विषय: शुद्धि, सामाजिक सामंजस्य और शत्रु-बलों के विरुद्ध निर्णायक संरक्षण के द्वारा आयुस्/वर्चस् (जीवन-शक्ति) की पुनर्स्थापना और रक्षा। उप-विषय: (1) आपः, सूर्य, अग्नि, वायु, द्यावा–पृथिवी से शुद्धि, माधुर्य और प्रसाद की प्राप्ति। (2) निरृति के बन्धन/पाशरूप विपत्ति से मुक्ति और प्राण-बल में पुनः प्रतिष्ठा। (3) रणभूमि तथा परिधि-रक्षा; शत्रुओं को निष्क्रिय कर भगाना। (4) सामूहिक सन्मनस्य (एक-मन) और एकीकृत संकल्प। (5) वर्चस्, यशस् तथा प्रभावशाली/प्रेरक वाक् की प्राप्ति।

Suktas in Anuvaka 7

Sukta 61

यह संक्षिप्त अथर्ववैदिक सूक्त उपचार-समृद्धि की याचना को मंत्र-प्रामाण्य की दृढ़ प्रतिष्ठा के साथ जोड़ता है। जल और सूर्य से मधुरता, शुद्धि, आनंद और तेज प्रदान करने की प्रार्थना की जाती है, और सविता व्यापक बल-वीर्य की स्थापना करते हैं। इसके बाद यह वाच् (दिव्य वाणी) की आत्म-घोषणा में रूपांतरित होता है, जहाँ वाणी अपने को विश्व-व्यवस्था की नियामक शक्ति बताती है, जिससे पाठक का उच्चारण सामाजिक और याज्ञिक रूप से प्रभावी हो जाता है—‘सत्ता/अस्तित्व’ प्रदान करने में समर्थ, और याज्ञिक आधार से रहित विरोधी को मान्यता/स्थान से वंचित करने वाला।

Rishi: Atharvanic tradition | Devata: Āpaḥ, Sūrya, Viśve Devāḥ (tapo-jāḥ), Savitṛ | 3 Mantras

Sukta 62

यह संक्षिप्त अथर्ववैदिक सूक्त शुद्धि और आरोग्य का एक सघन मंत्र-रूप है, जो वैश्वानर (अग्नि), वात (वायु/प्राण) और द्यावा–पृथिवी (द्युलोक–पृथ्वी) जैसे विश्व-शोधकों का आह्वान करके देहगत तथा यज्ञीय/अनुष्ठानिक मलिनता को दूर करता है। इसमें अशुद्धि-निवारण को सूनृता (मधुर, सत्य वाणी), वर्चस् (दीप्त तेज/जीवन-बल), समृद्धि और दीर्घायु की प्राप्ति से जोड़ा गया है—जिसे ‘दीर्घकाल तक सूर्य का उदय देखना’ कहकर व्यक्त किया गया है।

Rishi: Atharvanic tradition (specific ṛṣi attribution varies in anukramaṇī lists) | Devata: Vaiśvānara (Agni), Vāta, Dyāvā-Pṛthivī | 3 Mantras

Sukta 63

यह संक्षिप्त अथर्ववैदिक सूक्त संकट-काल का मंत्र है, जिसका उद्देश्य निरृति के प्राणघातक बंधन को ढीला करना है—जिसे गले की डोरी या लोहे की बेड़ी के रूप में कल्पित किया गया है—और रोगी को आयुस् (जीवन-काल), वर्चस् (दीप्त तेज) तथा बल (शक्ति) में पुनः स्थापित करना है। इसमें बंधन-उन्मोचन और उद्धार की भाषा के साथ यम और पितृगण के प्रति मर्यादित/नियमित प्रार्थना जुड़ी है; और गृह्य-अग्नि के परिप्रेक्ष्य में अग्नि का प्रज्वलन कर, नव समृद्धि और संरक्षण के लिए इस कर्म को सील/समाप्त किया जाता है।

Rishi: Atharvanic tradition (Anukramaṇī attribution varies; commonly Atharvan/Angiras-type for such apotropaic hymns) | Devata: Nirṛti (as the binding power), with the rite oriented to release into Āyus/Varcas/Bala | 4 Mantras

Sukta 64

यह संक्षिप्त ‘साम्मनस्य’ सूक्त सामाजिक सौहार्द के लिए एक केंद्रित मंत्र-प्रयोग है: यह समुदाय को एक ही संकल्प, हृदय और मन में बाँधता है, ताकि निर्णय और कर्म गुटबाज़ी के बिना उत्पन्न हों। यह मानव एकता का आदर्श ‘प्राचीन’ देवों पर रखता है, जो परस्पर सहमति से अपना भाग साझा करते हैं; इस प्रकार दैवी सामंजस्य को सामुदायिक एकजुटता का प्रतिमान बनाया गया है।

Rishi: Atharvanic tradition | Devata: Saṃmanasya (Concord) / Devāḥ as exemplars | 3 Mantras

Sukta 65

अथर्ववेद 6.65 एक संक्षिप्त युद्धात्मक-अपोत्प्रायिक (रक्षा-तांत्रिक) मंत्र है, जो शत्रु के क्रोध को जादुई रूप से दबाता है, उसकी प्रहार-शक्ति को निष्क्रिय करता है (उसे “हाथहीन” कर देता है) और उसे पीछे हटने को विवश करता है। इसकी प्रभावशीलता का आधार एक पौराणिक दृष्टांत है—इन्द्र द्वारा आदिकाल में असुरों का निरस्त्रीकरण—और फिर उसी मुक्त हुई शक्ति को विजय तथा यजमान/आश्रयदाता के धन-समृद्धि की ओर मोड़ देता है।

Rishi: Atharvanic/Angirasic milieu (enemy-crushing charm complex; specific r̥ṣi attribution varies) | Devata: Indra-like repelling power / Parāśara (as personified expulsion) | 3 Mantras

Sukta 66

अथर्ववेद 6.66 युद्धभूमि में रक्षा के लिए इन्द्र का संक्षिप्त मन्त्र है, जो शत्रुबल को “निःशस्त्र” कर उन्हें इन्द्र के निर्णायक प्रहार के अधीन कर देता है। तीन तीव्र ऋचाओं में यह स्तोत्र आक्रमणकारियों को जड़ कर देता है, उनके अंगों को दुर्बल करता है और उनकी रणनीतिक सम्मति/परामर्श को खण्डित कर देता है, जिससे सामना होने से पहले ही संकट ढह जाता है। इसकी शक्ति इस घोषणा में है कि शत्रु पहले ही चूर-चूर हो चुका है—निकट आती चढ़ाई को भगदड़ और भ्रम में बदल देता है।

Rishi: Atharvanic tradition (Anukramaṇī attribution not supplied in input) | Devata: Indra (with implicit hostile forces as object) | 3 Mantras

Sukta 67

यह संक्षिप्त आथर्वणिक सूक्त रक्षात्मक तथा आक्रामक—दोनों प्रकार का एक सघन मंत्र है, जो सभी दिशाओं से आने-जाने के मार्गों को सुरक्षित करता है, शत्रु-सेनाओं में भ्रम फैलाता है और उनके नेतृत्व को तोड़ देता है। इन्द्र और पूषन् को चारों ओर के पथों की रखवाली के लिए आह्वान किया गया है; भय और दिशाभ्रम को शत्रु पर ही लौटा दिया जाता है, ताकि समृद्धि—गोधन के रूप में—गायक के पक्ष में सुरक्षित लौट आए।

Rishi: Atharvanic tradition (Anukramaṇī attribution not supplied in input) | Devata: Indra and Pūṣan | 3 Mantras

Sukta 68

यह संक्षिप्त वपनम् (मुण्डन/दाढ़ी बनाना) सूक्त देह-शृंगार के इस कर्म को रक्षात्मक संस्कार के रूप में पवित्र करता है और देव-निपुणता का आह्वान करता है कि उसमें न चोट लगे, न अशुद्धि आए। मनुष्य के वपन को सोम (और वरुण) के उस राज-आदर्श से जोड़कर—जिसे सविता ने मुँडाया—यह संभावित जोखिम वाले कर्म को ऐसे अनुष्ठान में रूपान्तरित करता है जो वर्चस् (तेज), दीर्घायु, निर्मल दृष्टि तथा गौ, अश्व और सन्तान-समृद्धि प्रदान करे।

Rishi: Atharvanic tradition (not specified in the provided excerpt) | Devata: Savitar; Vāyu; Ādityas, Rudras, Vasus; Soma (as royal paradigm) | 3 Mantras

Sukta 69

अथर्ववेद 6.69 एक संक्षिप्त पौष्टिक सूक्त है, जिसका उद्देश्य वरचस् (दीप्तिमान तेज), यशस् (लोक-प्रसिद्धि) और भर्गस्-युक्त वाच् (उज्ज्वल, प्रभावशाली वाणी) की प्राप्ति है। यह वाणी, सुवर्ण, गौ-सम्पदा, उत्सव-रस/पेय और माधुर्य जैसे प्रतिष्ठित सामाजिक क्षेत्रों से तेज को आहूत कर याचक में संकेन्द्रित करता है; और अंत में अश्विनौ के अभिषेक-रूप अनुग्रह से ऐसी स्थिति कर देता है कि जन-समुदाय उसकी वाणी का अनुसरण करे।

Rishi: Atharvanic tradition (often anonymous in AV; associated with Aśvin-invocations for vāc and success) | Devata: Aśvinau (the twin healers), with vāc-brilliance (bhárgas) as the sought power | 3 Mantras

Sukta 70

यह संक्षिप्त पौष्टिक सूक्त एक व्यावहारिक पशु-चिकित्सकीय मंत्र है, जिसका उद्देश्य माता-गाय (अघ्न्या—“जिसे मारा न जाए”) को अपने बछड़े को स्वीकार करने, उसके पीछे चलने और उसे दूध पिलाने के लिए प्रवृत्त करना है। ‘यथा… तथा…’ के बार-बार प्रयुक्त उपमानों द्वारा—अप्रतिरोध्य आसक्ति, खोज/अनुसरण और यांत्रिक बंधन जैसी दृढ़ पकड़—यह मंत्र गाय के मनस् (ध्यान/स्नेह) को बछड़े पर ‘बाँध’ देता है, जिससे उचित मातृत्व-व्यवहार पुनः स्थापित होता है और गृह-समृद्धि बनी रहती है।

Rishi: Atharvanic tradition (household/cattle charm corpus) | Devata: Aghnyā (the cow as sacral being) / manas-binding efficacy | 3 Mantras

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