Atharva Veda Anuvaka 1
Kanda 510 Suktas97 Mantras

Anuvaka 1

मुख्य विषय: सशक्त वाणी और पवित्र द्रव्यों के द्वारा रक्षा—चारों ओर अभेद्य, सर्वतोमुखी रक्षाक्षेत्र का निर्माण, जो साथ ही प्राणबल और समृद्धि को पुनर्स्थापित करता है। उपविषय: (1) पत्थर-जैसा कवच (अश्मवर्मन्) और सीमाओं की चौकसी—आक्रमणकारियों के विरुद्ध निगरानी व रक्षण। (2) इन्द्र-सम विजय-शक्ति—शत्रुओं को दूर ढकेलना और अपने ‘विस्तृत लोक/अवकाश’ (उरुलोक) का विस्तार। (3) भैषज्य-चिकित्सा—पर्वत-जन्य औषधियों और सीलन/लेपन करने वाले द्रव्यों (कुष्ठ, लाक्षा, शिलाजी/शिलाची) से आरोग्य। (4) वाच् (वाणी) का यज्ञीय उपकरण रूप—मधुर/मधु-युक्त वाणी द्वारा प्रभावी अभिमंत्रण और कल्याण-साधन।

Suktas in Anuvaka 1

Sukta 1

अथर्ववेद 5.1 मंत्र-शक्ति को उसके उचित गर्भ/आधार-स्थान में “आसीन” करके स्वयं-वर्धमान और अवध्य (अभेद्य) रक्षा की स्थापना करता है, तथा त्रित आप्त्य को त्रिविध रक्षण-बल के पौराणिक धारक के रूप में आवाहन करता है। यह सूक्त रोगी/गृहस्थ के चारों ओर रोधचक्र-रूप रक्षाबंधन रचता है, शत्रुत्वपूर्ण प्रभावों को दूर हटाता है, और रक्षा को समृद्धि में परिणत करता है—अंततः वरुण के ऋत-रक्षक अधिपत्य के अंतर्गत पोषण, तेज, और पशुधन-वृद्धि तक ले जाता है।

Rishi: Atharvanic/Angiras-type attribution (hymn-level tradition varies; verse invokes Trita as mythic authority) | Devata: Mantra-śakti / Trita Āptya as bearer of healing protection | 9 Mantras

Sukta 2

अथर्ववेद 5.2 विजय और समृद्धि का सूक्त है, जो इन्द्र (तथा इन्द्र-सदृश यज्ञ-शक्ति) को उस अतुलनीय बल के रूप में महिमामंडित करता है जो शत्रुओं को दूर ढकेल देता है और यजमान/आश्रयदाता के प्रभुत्व को समस्त माप से परे विस्तीर्ण करता है। इन्द्र के अनेक मार्गों, अजेय पराक्रम और संग्राम में प्रवृत्त करने वाली मधुरता (मधु) का स्तवन करके यह सूक्त संकल्प (क्रतु) को दृढ़ करने, रण-उत्साह (मद) जगाने और सामाजिक, प्रादेशिक तथा सैन्य प्रतिस्पर्धाओं में सर्वोच्चता सुनिश्चित करने का लक्ष्य रखता है।

Rishi: Atharvanic tradition (Indra-stuti; specific r̥ṣi not marked in the supplied excerpt) | Devata: Indra (implicitly, by epithets of might and victory) | 9 Mantras

Sukta 3

अथर्ववेद 5.3 एक पौष्टिक-रक्षा सूक्त है, जो विजय, ‘विस्तृत लोक/विस्तृत स्थान’ (उरुलोक) के विस्तार और सुरक्षित समृद्धि के लिए समस्त देव-व्यवस्था को यजमान/प्रार्थी के पक्ष में एकत्र करता है। यह अग्नि से आरम्भ होता है—जो संघर्षों/प्रतिस्पर्धाओं में यज्ञ का निरीक्षक और मार्गदर्शक है—फिर सर्वदेवता के सहारे (इन्द्र-मरुत, विष्णु, अग्नि, वात) को बुलाता है, और अंततः इन्द्र-आह्वान में परिणत होता है, जहाँ रक्षात्मक शुभाश्रय के अंतर्गत गौ, धन और अश्व जैसे प्रत्यक्ष लाभों की याचना की जाती है।

Rishi: Atharvanic tradition (Anukramaṇī attribution varies; commonly treated as Atharvan/Angiras-type paustika prayer) | Devata: Sarvadevatā with emphasis on Indra-Maruts, Vishnu, Agni, and Vāta | 11 Mantras

Sukta 4

यह भैषज्य-सूक्त पर्वत-जन्य औषधि ‘कुष्ठ’ का अभिषेक/प्रतिष्ठापन करता है—देवताओं द्वारा प्राप्त ‘अमृत-चिह्न’ के रूप में, सोम के साथ संयुक्त—और इसलिए तक्ष्मन् (ज्वर) को दूर करने तथा प्राण-शक्तियों को पुनः स्थापित करने में अद्वितीय समर्थ बताता है। यह औषधि की उत्पत्ति को परम स्वर्ग में (अश्वत्थ के निकट, जहाँ देवताओं का आसन है) स्थापित कर उसकी सिद्धि/प्रभावकारिता को प्रमाणित करता है; फिर उसी दिव्य अधिकार को ठोस उपचार-लक्ष्यों पर लागू करता है—श्वास-प्राण (प्राण, व्यान) और दृष्टि-शक्ति की पुनर्प्राप्ति।

Rishi: Atharvanic tradition (often transmitted under Atharvan/Āṅgirasa headings for bhaiṣajya hymns; specific r̥ṣi attribution depends on Anukramaṇī). | Devata: Kuṣṭha (as personified healing plant) allied with Soma; also implicitly the Devas as source. | 10 Mantras

Sukta 5

अथर्ववेद 5.5 में लाक्षा (लाख) और सिलाची (डामर/बिटुमेन-सदृश औषधीय द्रव्य) को पवित्र ठहराकर उन्हें दिव्य-संबद्ध, रक्षक पदार्थ के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है, जो बाँधने, सील करने और उपचार में उपयुक्त है। स्तुति इन द्रव्यों को जीवित शक्तियों की तरह पुकारती है—देवताओं की बहिनें, रात्रि और नभ से संयुक्त—और फिर अरुन्धती का आवाहन करती है, जो संयमित करने वाली, कल्याणकारी शक्ति बनकर व्यक्तियों और गृह पर रक्षा को दृढ़ता से बाँध देती है।

Rishi: Atharvanic tradition (per Anukramaṇī for AV 5.5). | Devata: Lākṣā/Silācī (personified substance); associated with Rātrī, Nabhas, Aryaman. | 9 Mantras

Sukta 6

अथर्ववेद 5.6 एक रक्षोघ्न (अपोत्प्रायिक) सूक्त है, जो दिव्य निगरानी का सर्वतोमुखी घेरा स्थापित करता है—पहरेदार (स्पशः) और पाश-धारी—ताकि शत्रु/हानिकर प्राणी सीमाओं को लाँघ न सकें और रक्षित व्यक्ति के निकट न आ सकें। यह परिधि-रक्षा के साथ दुर्भाग्य और यज्ञकर्म की त्रुटि से मुक्ति की प्रार्थना जोड़ता है, और अंत में देह, प्राण, कुटुम्ब और संपत्ति के लिए पूर्ण आश्रय रूप में इन्द्र के वरूथ (शरण) में प्रवेश का प्रतिपादन करता है।

Rishi: Atharvanic/Aṅgiras-type attribution (hymn-level tradition; verse-specific r̥ṣi not isolated here). | Devata: Protective guardians (spáśaḥ), noose-bearers; broadly the apotropaic divine retinue. | 14 Mantras

Sukta 7

अथर्ववेद 5.7 समृद्धि और संरक्षण का सूक्त है, जिसमें वाणी (वाच्) को निर्णायक याज्ञिक साधन माना गया है: जब वाणी “स्वीकृत” और “मधुर/मधुमती” होती है, तब देवगण सहमति देते हैं और कर्मकाण्ड से लाभ प्राप्त होता है। इसमें सरस्वती (प्रेरित, सुव्यवस्थित उच्चारण), अनुमति (अनुमोदन/स्वीकृति) और भग (सौभाग्यपूर्ण भाग/विभाजन) का आह्वान है, और साथ ही अपोत्प्रायिक शमन भी—अराति, निरृति जैसी शत्रु/अशुभ शक्तियों का नाम लेकर उन्हें निष्प्रभावी किया जाता है, ताकि वे सफलता में बाधा न डालें।

Rishi: Atharvanic tradition (hymn attributed in the AV ancillary tradition to Atharvan/Angiras-type seers; exact r̥ṣi assignment varies by anukramaṇī) | Devata: Sarasvatī, Anumatī, Bhaga; and implicitly Vāc | 10 Mantras

Sukta 8

अथर्ववेद 5.8 इन्द्र का एक मन्त्र-प्रयोग है, जिसमें अपोत्प्राय (अपशकुन-निवारक) चिकित्सा और बाध्यकारी अभिचार-शक्ति का संयोग है। इन्द्र की वाणी का आवाहन किया जाता है कि वह ‘अतीसार’ आदि प्रवाह-रोगों को बाहर निकाल दे, और साथ ही उस पीड़ा के पीछे कार्यरत शत्रु-कारकों को आघात करे, बाँधे और वश में करे। इस सूक्त की शक्ति दो परस्पर पूरक क्रियाओं में प्रकट होती है—रोग का निष्कासन और शत्रुओं का अधोमुखीकरण/वेधन—जिससे रोगी का प्राण दृढ़तापूर्वक स्थिर रहता है और अनुष्ठाता इन्द्र की रक्षात्मक प्रभुता के अधीन सुरक्षित खड़ा रहता है।

Rishi: Atharvan/Āṅgirasa (Indra-abhicaric style; specific r̥ṣi attribution depends on anukramaṇī tradition for AVŚ 5.8) | Devata: Indra (Vṛtrahan, Ugra) | 9 Mantras

Sukta 9

अथर्ववेद 5.9 यजुस्-शैली की संक्षिप्त ‘स्वाहा’ आहुतियों का अथर्वणिक संकलन है, जो प्राणस्वरूप आत्मा और रक्षात्मक संकल्प को द्यौ (स्वर्गीय लोक) को ‘समर्पित/नियोजित’ करके विश्व-आश्रय स्थापित करता है। अंत में एक व्यापक ‘उत्थापन’ सूत्र आता है, जो जीवन, बल, मन/विचार और इन्द्रिय-शक्तियों को ऊपर उठाता है, साथ ही कृत्या (जादू-टोना) तथा पहले से किए गए अनिष्ट को दूर भगाता है, और आत्मा के भीतर युग्मित जीवन-रक्षकों की स्थापना करता है।

Rishi: Atharvanic tradition (short svāhā formulas; specific r̥ṣi per anukramaṇī for AVŚ 5.9) | Devata: Dyaus/Heaven (cosmic region as recipient); svāhā as offering-power | 8 Mantras

Sukta 10

अथर्ववेद 5.10 एक रक्षात्मक (रक्षोघ्न) सूक्त है, जो जपकर्ता को ‘अश्मवर्मन्’—पत्थर-सा कठोर, अभेद्य कवच—से आच्छादित करता है, ताकि शत्रुबल और आक्रमणकारी शक्तियाँ देह तक पहुँचने के बजाय प्रतिहत होकर लौट जाएँ। इसके मंत्र दिशानुसार (ऊर्ध्व/शीर्ष सहित) भय और हानि के कारणों को रोकते हुए चारों ओर पूर्ण घेरा बनाते हैं; अंत में यह मन, प्राण, इन्द्रियाँ और वाणी आदि जीवन-शक्तियों को उनके ब्रह्माण्डीय स्रोतों से पुनः बुलाकर यथास्थान प्रतिष्ठित करता है, जिससे भय, आघात या भूत-प्रेत/आत्मिक बाधा के बाद व्यक्ति स्थिर और सुरक्षित हो जाता है।

Rishi: Atharvanic tradition (specific ṛṣi attribution for AV 5.10 varies by anukramaṇī; commonly treated as Atharvan/Angiras-type protective composition) | Devata: Aśmavarman (personified protective armour); implicitly the protective power resident in the charm | 8 Mantras

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