Atharva Veda Anuvaka 1
Kanda 410 Suktas76 Mantras

Anuvaka 1

ब्रह्म-शक्ति से संरक्षण और पुनर्स्थापन का प्रतिपादन: ‘क/प्रजापति’ की विश्व-सम्राट् सत्ता से लेकर गृह-रक्षा और देहगत् चिकित्सा (जल, औषधियाँ, ताबीज) तक। उपविषय— (1) ब्रह्म और अनाम परम तत्त्व (क/प्रजापति/हिरण्यगर्भ) की सृष्टि-मीमांसा, (2) अपोत्प्रैतिक गृह-सुरक्षा तथा स्थान-विशेष से भय/दुष्प्रभाव का निष्कासन, (3) स्तम्भन और निद्रा-प्रयोग द्वारा जागरूकता व गति का निरोध, (4) विषघ्न कर्म: विष/दोष का शमन और संकट का विधिपूर्वक पृथक्करण, (5) वाजीकरण तथा वीर्य/बल-वर्धन।

Suktas in Anuvaka 1

Sukta 1

यह सूक्त ब्रह्मन् (पवित्र शक्ति/सत्य वाणी) को प्रथमज, जगत्-व्यवस्था स्थापित करने वाली शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित करता है, और फिर उसी पुरोहितीय सामर्थ्य को बृहस्पति/अथर्वन् के रूप में यज्ञ की सिद्धि के लिए आह्वान करता है। देवता को उस विश्व-स्थापक के रूप में चित्रित करते हुए जो द्यौः, पृथ्वी और अन्तरिक्ष को अलग-अलग थामे रखता है, यह सूक्त ब्रह्माण्ड-चिन्तन को रक्षण में रूपान्तरित करता है—क्षेम (सुरक्षित कल्याण), कर्मकाण्ड की सफलता, तथा राक्षस, प्रतिद्वन्द्वी और अव्यवस्था जैसे शत्रुत्वपूर्ण अवरोधों का प्रतिघात।

Rishi: Atharvanic/Angirasa tradition (attribution varies; hymn functions as priestly invocation) | Devata: Bṛhaspati / Atharvan as archetypal priestly power | 7 Mantras

Sukta 2

अथर्ववेद 4.2 ‘कस्मै देवाय’ शैली का एक ब्रह्माण्डीय- पौष्टिक सूक्त है, जिसमें अनाम परम तत्त्व की प्रजापति/हिरण्यगर्भ के रूप में स्तुति की गई है—और जिसे प्रश्नवाचक ध्रुवपद “क (कौन?)” के द्वारा संबोधित किया जाता है। आकाश, पृथ्वी, अन्तरिक्ष, सूर्य, पर्वत, समुद्र तथा उनके ‘रस’ आदि जगत्-आधारों का वर्णन करते हुए यह सूक्त यजमान को जीवन, बल और सुव्यवस्थित लोकों के अधिपति के साथ अनुष्ठानपूर्वक समन्वित करता है, जिससे स्थिरता, प्राणशक्ति और कल्याण की प्राप्ति होती है।

Rishi: Traditionally associated with Prajāpati/Hiraṇyagarbha-type hymnic voice (exact r̥ṣi attribution varies in ancillary lists). | Devata: Prajāpati / Hiraṇyagarbha (the ‘Ka’ deity of the refrain). | 8 Mantras

Sukta 3

यह सूक्त गृहस्थ-परंपरा का एक अपोत्प्रायिक (अपशकुन-निवारक) मंत्र है, जो भेड़ियों, चोरों, फंदों और दुष्ट-चित्त व्यक्तियों जैसे संकटों को बस्ती से दूर, एक “और दूर के पथ” पर ढकेल देता है। इसमें स्थानगत निर्वासन (विपरीत/अशुभ मार्ग से बाहर की ओर खतरे को भेजना) को इन्द्र की दण्डात्मक हिंसा (वज्र-प्रहार) तथा अथर्वणीय बन्धन–मोचन की विद्या के साथ जोड़ा गया है, जो आवश्यकता अनुसार बाँध भी सकती है और छोड़ भी सकती है।

Rishi: Atharvanic/Angiras-type attribution (protective household tradition; specific r̥ṣi not explicit in the provided excerpt). | Devata: Apotropaic ‘Path’/Banishment; implicitly Indraic protection against thieves and predators. | 7 Mantras

Sukta 4

अथर्ववेद 4.4 वाजीकरण-प्रधान एक औषधीय उपचार-सूक्त है, जो जलों और वनस्पतियों के आदिम “रस” को संचित कर देह में पुरुष-वीर्य और बल के रूप में प्रतिष्ठित करता है। गन्धर्व द्वारा वरुण के लिए उस औषधि को खोदकर लाने की मिथकीय स्वीकृति से इसकी शक्ति प्रमाणित होती है, और उसे सोम-सदृश सार-तत्त्व के साथ समन्वित कर सूक्त ग्रहणकर्ता में वृषभ-तुल्य पराक्रम तथा पुनर्स्थापक वीर्य-शक्ति की स्थापना करता है।

Rishi: Atharvan/Āṅgirasa (hymn-cycle attribution typical for AV 4th kāṇḍa charms) | Devata: Vanaspati/Osadhi-rasa (plant-essence), with Soma as paradigmatic correlate | 8 Mantras

Sukta 5

यह सूक्त स्तम्भन (जड़ता/अचलता) और निद्रा (नींद-प्रेरण) का अभिचारिक मंत्र है, जो चारों ओर के क्षेत्र में पहरेदारी को शिथिल कर देता है—वायु, दृष्टि, गति और जागरण को रोककर—ताकि साधक बिना देखे-समझे निकल जाए। इसमें बार-बार सर्वत्र ऊँघ और निद्रा का आदेश दिया गया है (स्त्रियों और प्रहरी-कुत्तों सहित), पर साथ ही एक अपवाद भी रचा गया है: स्वयं प्रयोगकर्ता जाग्रत और अहिंसित रहे, इन्द्र की अवध्यता के आदर्श पर।

Rishi: Atharvan (traditional attribution for stambhana/nidrā material; hymn-level attribution varies by anukramaṇī) | Devata: Nidrā / Stambhana (functional ‘deity’), with Indra invoked indirectly via epithet | 7 Mantras

Sukta 6

अथर्ववेद 4.6 विष-नाशक (विषघ्न) मंत्र है, जिसमें विष को हटाए जाने और एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरित किए जाने योग्य पदार्थ के रूप में माना गया है। इसका प्रतिकार एक आदिम पवित्र प्रतिदृष्टांत से किया जाता है—सोम, जिसे आदिकालीन ब्रह्मन् ने सर्वप्रथम पिया, और जो प्रतिविष के रूप में प्रतिष्ठित है। मंत्रोच्चार-रूप वाणी-कर्म बार-बार विष को ‘कहकर बाहर’ निकालता है—डंक से, लेप/औषधि से, पत्ते के पात्र से, बाण/शाफ्ट से, सींग से, भूसी/छिलके से—अर्थात जहाँ-जहाँ उसके टिकने की कल्पना है। साथ ही ‘वध्रि’ नामक बंधनकारी औषधि को समर्थ किया जाता है कि वह विष को जकड़कर स्थिर करे और उसे उसके कल्पित उद्गम—शिला और पर्वत—में ही बाँधकर बंद कर दे।

Rishi: Atharvanic tradition (attribution varies by anukramaṇī) | Devata: Viṣaghna power; Soma as antidotal paradigm; Brahman as sacral agent | 8 Mantras

Sukta 7

यह सूक्त शमन और उपचार का मंत्र है, जो हानिकारक शक्ति (विष, अशुभ प्रभाव, शत्रु-प्रयोग) को कर्मकाण्डीय रूप से “छाँटकर” अलग करता है और करम्भ (जौ की मांड/दलिया-मिश्रण) के द्वारा जीवन-समर्थ, सुरक्षित अंश तैयार करता है। इसमें अन्न को शान्ति-उपाय के रूप में अथर्वणिक वाणी के साथ जोड़ा गया है, जो रोगी की अवस्था को “स्थिर” करती है, देह में स्थैर्य स्थापित करती है और पूर्व या चल रहे अभिचार के विरुद्ध रक्षात्मक मोर्चा खड़ा करती है।

Rishi: Atharvanic/Angirasa tradition (ascribed generically; hymn-level attribution varies by anukramaṇī tradition) | Devata: Karambha/food as pacifying medium; implicitly the healing power of Oṣadhi and apotropaic speech (vāc) | 7 Mantras

Sukta 8

यह अथर्ववैदिक सूक्त अभिषेक (छिड़काव/अनुलेपन) द्वारा जल को दीक्षा और चिकित्सा का मंत्र बनाता है। इसके प्रभाव से प्राप्तकर्ता में प्राणबल, सौन्दर्य और सामाजिक तेज/वर्चस् (vārchas) प्रत्यक्ष रूप से पुनः प्रकट होते हैं। राजकीय प्रसंग में यह राजसत्ता को स्थिर करता है—राजा में पोषणकारी ‘दुग्ध-सदृश’ सार का आह्वान करता है—और शासन के साथ आने वाले संकट (मृत्यु) को विधिपूर्वक सीमाबद्ध कर प्रजा की निष्ठा तथा दिशाओं में विस्तार को सुनिश्चित करता है।

Rishi: Atharvanic tradition (hymn-seer not securely fixed in all anukramaṇīs) | Devata: Āpaḥ (Waters) as healing and lustre-conferring powers | 7 Mantras

Sukta 9

यह सूक्त अञ्जन (काजल/नेत्र-लेप) को पर्वत-जन्य, सजीव औषधि के रूप में अभिषिक्त करता है, जो नेत्र का उपचार करती है और रोगी के चारों ओर रक्षात्मक परिधि स्थापित करती है। इसमें विश्वे देवाः से इसके दिव्य उद्गम के साक्षी-रक्षक होने की याचना की जाती है, ताकि इसका प्रयोग रोग, शत्रु-प्रयोग, दुःस्वप्न तथा ‘दृष्टि-दोष’—अर्थात् आँख के माध्यम से होने वाले भयित अनिष्ट—के विरुद्ध रक्षाकवच बन जाए। औषधि का नाम लेकर और उसका स्तवन करके यह सूक्त चिकित्सा को मंत्र में रूपान्तरित करता है—एक साथ उपचारक भी और अपोत्प्रायिक (रक्षा-प्रधान) भी।

Rishi: Atharvanic tradition (uncertain) | Devata: Āñjana (personified remedy) / Viśve Devāḥ (as guarantors) | 10 Mantras

Sukta 10

अथर्ववेद 4.10 एक मणि-सूक्त है, जो शङ्ख को जीवित, व्यक्तित्वयुक्त औषधि—कृशान—के रूप में प्रतिष्ठित करता है, जिसे धारण कर ताबीज़ की भाँति अभिमन्त्रित किया जा सकता है। समुद्र-जन्य उत्पत्ति की कल्पना, स्वर्णिम/सोम-सम्भूत तेज, और राक्षस-विनाशक दावों के द्वारा यह सूक्त रोग, मानसिक विक्षेप (उन्माद), तथा जिद्दी दुर्भाग्य को दूर करता है और सुरक्षित गमन तथा दीर्घायु को सुनिश्चित करता है।

Rishi: Atharvanic tradition (often transmitted under Atharvan/Angiras lineages for maṇi-hymns) | Devata: Śaṅkha/Kṛśana as personified remedy (maṇi-devatā) | 7 Mantras

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