Atharva Veda Anuvaka 5
Kanda 2010 Suktas54 Mantras

Anuvaka 5

मुख्य विषय: इन्द्र-सम्बद्ध स्तुति से विजय—मन्त्र को क्रियाशील शक्ति मानकर वह विरोध को तोड़ता है और देव-बल को वाज (विजय-शक्ति), पशुधन-सम्पदा तथा सार्वजनिक यश में रूपान्तरित करता है। उपविषय: (1) शत्रु-भेदन और बाधा-निवारण (वृत्र/द्वेषियों का दमन) (2) धन की पुनर्प्राप्ति और धन-आकर्षण (लूट, मूल्यवान वस्तुएँ, गौ-धन) (3) राजसत्ता और सामाजिक उत्कर्ष (सम्राट्त्व, श्रवस्, वार्चस्) (4) संकटों के पार सुरक्षित गमन; प्रतियोगिताओं में संरक्षण (5) सूर्य द्वारा अन्धकार का प्रत्यावर्तन और प्रकाश/व्यवस्था की पुनर्स्थापना।

Suktas in Anuvaka 5

Sukta 41

यह संक्षिप्त अथर्ववैदिक सूक्त ऋग्वैदिक वीर-पुराकथा-चक्र को तीन मंत्रों के अभिचार-रूप संक्षेप में बाँधता है: दधीचि की अस्थियों से इन्द्र की ‘अप्रतिहत’ विजय को बाधक शक्तियों के दमन का आदर्श बनाया गया है। फिर यह सफल पुनर्प्राप्ति के संकेतों की ओर मुड़ता है—छिपे हुए अश्व-शीर्ष का पता लगाना और गौ के गुप्त नाम का अन्वेषण—ताकि साधक जो कुछ भी आवृत/गुप्त है (बल, समृद्धि, यज्ञ-सिद्धि) उसे पुनः प्राप्त करे तथा उर्वरता और ऋत/व्यवस्था की पुनर्स्थापना हो।

Rishi: Ṛgvedic provenance (Dadhīci/Indra cycle); specific seer per anukramaṇī not provided here. | Devata: Indra | 3 Mantras

Sukta 42

अथर्ववेद 20.42 ऋग्वैदिक युद्ध-काव्य से लिया गया एक संक्षिप्त इन्द्र-स्तोत्र है, जिसका पाठ विजय-तंत्र/विजय-मन्त्र के रूप में किया जाता है। इसमें द्यावा-पृथिवी जैसी ब्रह्माण्डीय शक्तियों को इन्द्र के गर्जन-भरे अग्रगमन से जोड़ा गया है। यह अभिषिक्त वाणी (वाक्) द्वारा रक्षात्मक मन्त्र-आवरण को सोम से उद्दीप्त इन्द्र की युद्ध-तीव्रता के साथ संयुक्त करता है, ताकि शत्रु काँप उठें और साधक-पक्ष को अडिग, अविचल सहायता प्राप्त हो।

Rishi: As in RV source for AV 20: Indra-hymn tradition (ṛṣi per RV Anukramaṇī; commonly attributed within Indra cycles to Vasiṣṭha/Viśvāmitra line depending on the RV locus). | Devata: Indra (with Heaven-and-Earth as attendant cosmic powers) | 3 Mantras

Sukta 43

एवी 20.43 एक संक्षिप्त इन्द्र-सूक्त है, जो शत्रु-भेदन की शक्ति को धन-प्राप्ति और धन-आकर्षण से जोड़ता है। इसमें इन्द्र को आदेश दिया गया है कि वे द्वेषियों और दमनकारी शक्तियों को चूर-चूर करें, और खोखलों या पथरीले स्थानों में छिपे हुए भी मूल्यवान धन को वापस दिलाएँ, तथा विजय के सुनिश्चित परिणामस्वरूप ‘अभिलषित धन’ प्रदान करें।

Rishi: From RV Indra material preserved in AV 20 (ṛṣi per RV locus). | Devata: Indra | 3 Mantras

Sukta 44

AV 20.44 एक संक्षिप्त इन्द्र-स्तुति है (ऋग्वैदिक उधार), जो इन्द्र को सम्राट्—सर्वोच्च अधिपति—के रूप में प्रतिष्ठित करती है, जो स्तुति को प्रभावी बनाकर उसे श्रवस् (यश/कीर्ति) और वाज (विजय/लाभ-लूट) में परिणत करता है। तीन संक्षिप्त मन्त्रों में यह इन्द्र के प्रभुत्व की घोषणा से आरम्भ होकर इस प्रतिपादन तक पहुँचती है कि सभी स्तोत्र उसी में आनन्द और सिद्धि पाते हैं, और अंत में संघर्ष में जय तथा प्राप्ति के लिए प्रत्यक्ष आह्वान करती है। अथर्वणीय प्रयोग में यह अधिकार, यश और प्रतिस्पर्धात्मक सफलता के लिए एक अनुष्ठानिक प्रोत्साहक के रूप में कार्य करती है।

Rishi: Ṛgvedic provenance (borrowed into AV 20); traditional attribution varies by RV source-hymn; treated here as Indra-stuti of the Ṛṣi tradition. | Devata: Indra | 3 Mantras

Sukta 45

एवी 20.45 ऋग्वैदिक शैली का एक संक्षिप्त इन्द्र-स्तोत्र है, जिसे अथर्ववेद के अनुष्ठानिक संग्रह में अपनाया गया है। इसका उद्देश्य समुदाय के उच्चारित स्तोत्र को “समतस्” (उपयुक्त/संगत) बनाना है, ताकि वह प्रभावी रूप से इन्द्र की सहायता आकर्षित कर सके। इसमें दान के स्वामी और विजयी पराक्रम वाले इन्द्र से प्रार्थना की जाती है कि वे सार्वजनिक प्रतिस्पर्धा (वाज) में गायक-स्तुतिकर्ताओं के पक्ष में खड़े हों, समृद्धि और रक्षा प्रदान करें, तथा सूनृता—कृपालु, सत्य और मंगलमय वाणी—का वर दें।

Rishi: Ṛgvedic provenance (borrowed into AV 20) | Devata: Indra (probable, by AV 20 Indra-stotra context; exact RV source would fix devatā) | 3 Mantras

Sukta 46

यह संक्षिप्त इन्द्र-स्तोत्र देव को रणभूमि के अग्रणी और तेजस्वी कर्ता के रूप में निकट बुलाता है, जो प्रतिस्पर्धाओं को “उत्तम कल्याण” की ओर मोड़ देता है। इसमें प्रार्थना है कि इन्द्र गायक/स्तोता को संकटों के पार सुरक्षित ले जाएँ—जैसे नाव भयावह जलधारा के पार—और समस्त द्वेषियों तथा शत्रु शक्तियों को परास्त करें। इस सूक्त की शक्ति इन्द्र के मार्गदर्शन में विजय, सुरक्षित पारगमन और कल्याण (वाज/स्वस्ति/सुम्न) को एक सूत्र में बाँधने में है।

Rishi: Rigvedic source attribution (Indra hymn tradition) | Devata: Indra | 3 Mantras

Sukta 47

अथर्ववेद 20.47 ऋग्वेद-आधारित सौर-लिटर्जिकल स्तुति है, जो सूर्य (और सहायक इन्द्र-तत्त्व) की शक्ति से अन्धकार, अवरोध और शत्रु शक्तियों को पलटकर दूर करने तथा सही दिशा-बोध, दृष्टि और प्राण-शक्ति को पुनः स्थापित करने का आह्वान करती है। इसमें उपचार और रक्षा को सूर्य की प्रकाशक दृष्टि के अधीन हानि का ‘प्रत्यक्’—अर्थात् उलटकर लौटाया जाना—के रूप में देखा गया है; साथ ही वृत्र-वध के प्रतिमान को स्मरण कर अवरोधों को तोड़ने और जीवनदायी प्रकाश को मुक्त करने की प्रार्थना की गई है।

Rishi: Traditionally connected with Sūrya/Āditya stanzas in AV 20 (RV-derived); specific r̥ṣi attribution varies by anukramaṇī tradition. | Devata: Sūrya (Āditya), as revealer and reverser of darkness/evil | 21 Mantras

Sukta 48

अथर्ववेद 20.48 समृद्धि और प्रतिष्ठा का सूक्त है, जो मंत्र (गिरः/वाक्) की अभिषेककारी शक्ति से यजमान/लाभार्थी को ‘वर्चस्’—दीप्तिमान व्यक्तित्व, अधिकार और लोक-प्रसिद्धि—से अभिषिक्त करता है। गौ-वत्स के पोषण-रूपक और माता (पृथ्वी) से पिता (स्वर्गीय प्रकाश) तक की ब्रह्माण्डीय यात्रा के माध्यम से यह व्यक्तिगत तेज को दिन, उषा और प्रकाशमय धामों की स्थिर ऋत-व्यवस्था में स्थापित करता है, ताकि बल और कीर्ति निरन्तर बढ़ती रहे।

Rishi: Traditionally Atharvanic/Angiras lineage (AV 20 often reuses RV material; attribution follows the borrowed RV hymn’s ascription in many recensions). | Devata: Várchas (Splendour) / the praised subject as bearer of radiance; implicitly Agni/Soma-style consecratory power via speech. | 6 Mantras

Sukta 49

अथर्ववेद 20.49 ऋग्वेद-आधारित इन्द्र-स्तुति है, जो इन्द्र की विजयी शक्ति को ठोस समृद्धि में रूपान्तरित करती है—विशेषतः “वाज” (विजय-शक्ति/पुरस्कार) की शीघ्र प्राप्ति और गो-धन में वृद्धि के लिए। इसमें इन्द्र को तेजस्वी, उदार दाता और बाधा-निवारक के रूप में सराहा गया है, तथा प्रेरित वाणी (वाच्) और स्तुति-गिर् को ऐसा साधन माना गया है जो देव-अनुमोदन प्राप्त कर भौतिक उन्नति सुनिश्चित करता है।

Rishi: As in RV parallel tradition: attributed to a Vedic seer of Indra-stuti cycles (RV 8/1 style); AV20 is largely RV-derived. | Devata: Indra | 7 Mantras

Sukta 50

अथर्ववेद 20.50 एक संक्षिप्त किन्तु प्रबल इन्द्र-स्तुति है, जिसमें “नवीन स्तुति” (नव्य स्तुति) को उस यज्ञ-प्रेरक शक्ति के रूप में माना गया है जो बार-बार इन्द्र की अनुकम्पा का नवीकरण करती है। यह सूक्त प्रतिपादित करता है कि इन्द्र का पराक्रम अक्षय है—कोई भी स्तुति उसे पूर्णतः नहीं छू सकती—और इसी अतिशयता के कारण निरन्तर पाठ उचित ठहरता है, ताकि इन्द्र का आगमन शीघ्र हो और ऋत के अनुरूप स्थित यजमान/अर्पणकर्ता को सहायता प्राप्त हो।

Rishi: RV-derived Indra hymn tradition | Devata: Indra | 2 Mantras

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