Atharva Veda Anuvaka 12
Kanda 2010 Suktas26 Mantras

Anuvaka 12

मुख्य विषय: इन्द्र का आह्वान—उनके शीघ्र आगमन, सोम-बल से समर्थ होने, तथा प्रभावशाली स्तोत्र-वाणी द्वारा विजय और समृद्धि प्रदान करने का विधान। उपविषय: (1) आह्वान—यजमान की ओर इन्द्र को प्रवृत्त कर शीघ्र बुलाना। (2) सोमपान से इन्द्र का मद (रण-उन्माद) जाग्रत होकर वृत्र-विध्वंसक शक्ति प्रकट होना। (3) पौष्टिक प्रयोजन—गौ, अश्व, स्वर्ण-सदृश ऐश्वर्य, पुरस्कार और अन्न। (4) ब्रह्म/स्तुति की प्रभावशक्ति—वर्षा की भाँति लाभ का प्रवाह खोल देना। (5) निवास-स्थल की सुरक्षा और समुदाय की स्थिरता/कल्याण।

Suktas in Anuvaka 12

Sukta 111

यह संक्षिप्त सोम-याज्ञिक सूक्त इन्द्र को आह्वान करता है कि वह यजमान द्वारा निचोड़े गए सोम से (सम्-इन्दुभिः) पूर्णतः प्रमुदित और उन्मत्त हो जाए—जहाँ-जहाँ इन्द्र का प्रायः प्रीति-स्थान माना जाता है: विष्णु के साथ, त्रित आप्त्य के साथ, या मरुतों के साथ, यहाँ तक कि समुद्र के निकट उस दूरस्थ ‘पर प्रदेश’ में भी। दूरी और इन्द्र के ध्यान पर अन्य दावों को हटाकर यह सूक्त उसकी प्रसन्नता को वर्तमान यज्ञकर्म पर एकाग्र करता है, ताकि उसकी शक्ति यजमान के लिए सहायता, वृद्धि और विजय में परिणत हो।

Rishi: Ṛgvedic provenance. | Devata: Indra (with Viṣṇu/Maruts/Trita as associated figures). | 3 Mantras

Sukta 112

यह संक्षिप्त इन्द्र-स्तोत्र वृत्रहन् के परम अधिपत्य की घोषणा करता है: जो कुछ भी “सूर्य की ओर” अग्रसर होता है, वह इन्द्र के वश में बताया गया है। आगे यह इन्द्र की अमर, सत्य-आधारित शक्ति की पुष्टि करता है और उसे निकट या दूर, प्रत्येक सोम-पीषण पर आह्वान करता है, ताकि हवि निश्चय ही स्वीकार हो और यजमान के अभिप्रायों के मार्ग में कोई बाधा न रहे।

Rishi: Ṛgvedic provenance. | Devata: Indra (Vṛtrahan); Sūrya appears as addressed marker. | 3 Mantras

Sukta 113

यह दो-मंत्रों वाला इन्द्र-सूक्त ‘आह्वान’ है, जो इन्द्र को यजमान की वाणी की ओर उन्मुख होने और सोमपान के लिए शीघ्र आने को प्रेरित करता है। साथ ही यह यज्ञ में उन्हें सर्वोच्च शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित करता है, यह कहते हुए कि प्रेरित बुद्धि-शक्तियाँ (धीषणा) उनकी वीर्य-शक्ति को ‘गढ़ती’ हैं और उन्हें यज्ञासन पर स्थिर, अविचल उपस्थिति प्रदान करती हैं।

Rishi: Ṛgvedic attribution via RV parallel (to be fixed by cross-index) | Devata: Indra | 2 Mantras

Sukta 114

यह संक्षिप्त इन्द्र-स्तोत्र इन्द्र को स्वभावतः निरुपम—न किसी का प्रतिद्वन्द्वी, न किसी बन्धन या आश्रय-निर्भरता में बँधा—परन्तु युद्ध के आह्वान पर सख्य-भाव में शीघ्र प्रवृत्त होने वाला बताता है। उसकी अतुल धन-सम्पदा, अश्व-बल और सेना-संग्रहकारी गर्जना का स्तवन करके यह सूक्त यजमान के लिए इन्द्र की रक्षात्मक मैत्री को आकर्षित करता है—प्रतिद्वन्द्वियों (भ्रातृव्य) को दूर भगाते हुए विजय, सहारा और समृद्धि सुनिश्चित करने हेतु।

Rishi: Ṛgvedic attribution via RV parallel (to be fixed by cross-index) | Devata: Indra | 2 Mantras

Sukta 115

यह संक्षिप्त आत्म-समर्थन स्तोत्र (ऋग्वैदिक मूल) वक्ता के लिए मेधा (यज्ञीय/अनुष्ठानिक बुद्धि) का अधिकार घोषित करता है, जो ऋत (ब्रह्माण्डीय-यज्ञीय व्यवस्था) में प्रतिष्ठित है, और “सूर्य के समान” तेजस्विता से दीप्त है। इसके बाद यह इन्द्र की ओर मुड़ता है: कवि की सुगढ़, सुविन्यस्त स्तुति को वह साधन बताया गया है जो इन्द्र के शुष्म (पराक्रम) को जाग्रत करता है। अंत में स्वर प्रतिस्पर्धात्मक है—अन्य स्तुति करने वाले ऋषियों के बीच भी इन्द्र की वृद्धि और अनुग्रह “मेरे लिए” सुनिश्चित करने की कामना।

Rishi: Rigvedic self-laudatory/ṛṣi-voice tradition (borrowed into AV 20); specific r̥ṣi depends on RV source. | Devata: Medhā / Ṛta / Sūrya (concept-deity complex; primary tone is self-empowerment under ṛta) | 3 Mantras

Sukta 116

अथर्ववेद 20 में ऋग्वेद-प्रसूत यह संक्षिप्त इन्द्र-स्तुति इन्द्र से सुरक्षित निवास, समुदाय की स्थिरता, और उसकी रक्षा से “अलग” होने पर उत्पन्न होने वाली असुरक्षा/दुर्बलता के निवारण की याचना करती है। तत्पश्चात यह स्तोत्र-रूप स्तुति को प्रभावी अर्पण (स्तोम) के रूप में प्रतिष्ठित करती है, जो इन्द्र की “महान उदारता” को उद्घाटित करती है, और सम्यक्-उन्मुख उपासना द्वारा समृद्धि तथा यज्ञकर्म की अबाध गति का आश्वासन देती है।

Rishi: RV provenance (Indra-stuti tradition; AV 20 is a collection of RV hymns/verses in Saunaka) | Devata: Indra (Vṛtrahan) | 2 Mantras

Sukta 117

यह संक्षिप्त इन्द्र–सोम सूक्त इन्द्र से आग्रह करता है कि वे भली-भाँति निचोड़े गए सोम का पान करें, जिससे उनका युद्धोन्माद (मद) जाग्रत हो और वे ‘वृत्रों’—समस्त अवरोधक शक्तियों—का संहार करें। साथ ही, वसिष्ठ की प्रामाणिक परम्परा का आह्वान करके यह सूक्त यजमान-समुदाय के सोम-उत्सव में पाठक की स्तुति को इन्द्र द्वारा सावधानतापूर्वक ग्रहण कराता है और अनुष्ठान की सिद्धि सुनिश्चित करता है।

Rishi: RV provenance (Soma-pressing Indra hymn tradition; specific RV attribution requires RV parallel identification) | Devata: Indra (with Soma as enabling power) | 3 Mantras

Sukta 118

अथर्ववेद 20.118 ऋग्वेद-आधारित इन्द्र-स्तुति है, जो पौष्टिक (समृद्धि) सूक्त के रूप में प्रयुक्त होती है। इसमें इन्द्र से—गौ, अश्व और ‘स्वर्णिम’ ऐश्वर्य के दाता—यह प्रार्थना की जाती है कि यजमान जो भी चाहता है, उसे बिना किसी बाधा के प्रदान करें। याचना को दृढ़ करने हेतु सूक्त इन्द्र के विश्वव्यापी पराक्रमों का स्मरण कराता है—स्वर्ग और पृथ्वी का विस्तार, सूर्य का प्रज्वलन, समस्त प्राणियों तथा सोम का धारण-पोषण—जिससे माँगा गया धन और रक्षण उनकी सिद्ध शक्ति से सुनिश्चित प्रतीत होता है।

Rishi: Traditionally attributed to Ṛgvedic Indra-poets (AV 20 is largely RV-recitational); specific r̥ṣi per anukramaṇī for 20.118 aligns with RV source-hymn attribution. | Devata: Indra | 4 Mantras

Sukta 119

अथर्ववेद 20.119 ऋग्वैदिक मूल का संक्षिप्त इन्द्र-स्तुति सूक्त है, जिसमें स्तुति को ही प्राचीन, प्रभावशाली ब्रह्म माना गया है—जिसका उच्चारण मेघों के फटकर वर्षा बरसाने की भाँति कल्याण को मुक्त कर देता है। यह ऋत-आधारित वाणी रूपी शुद्ध स्तोत्र को सोम और घृत की मधुरता से जोड़कर धन-समृद्धि (रयि), पुरुषार्थी/वीर्यवान बल (वृष्ण्यं शवः) और सामुदायिक ऐश्वर्य-वृद्धि की कामना करता है।

Rishi: RV-derived; per RV source-hymn attribution for the parallel of AV 20.119. | Devata: Indra | 2 Mantras

Sukta 120

यह संक्षिप्त दो-ऋचा सूक्त इन्द्र का दिशाओं और समस्त भू-प्रदेशों से तात्कालिक युद्ध-सहायता हेतु आह्वान है। इसमें इन्द्र से कहा गया है कि वह अनु-वंशी यजमान (आनव) के पक्ष में नामित प्रतिद्वन्द्वी तुर्वश के विरुद्ध ‘आगे बढ़कर’ प्रहार करे। कण्व-स्तुति पर इन्द्र की सिद्ध, शीघ्र-प्रतिक्रिया को विशिष्ट स्थलों पर स्मरण कर यह सूक्त राजसत्ता और समृद्धि को पुष्ट करता है तथा इन्द्र के त्वरित आगमन और विजय-प्रद बल को अनिवार्य करता है।

Rishi: Kāṇva / RV-derived attribution (Book 20 is predominantly Rigvedic material in Atharvan arrangement) | Devata: Indra | 2 Mantras

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